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मै कौन हूँ तुम्हारा [गीत]

इतना मुझे बता दो , मै कौन हूँ तुम्हारा ।

तेरी ओर बहती जाये , मेरी ज़िन्दगी की धारा ।

साँसों से बन्ध के जैसे , कोई डोर खींचती है ।

जाने मुझे क्यों पल पल , तेरी ओर खींचती है ।

हर सांस में सिसक कर, दिल ने तुम्हे पुकारा ।

तेरी ओर बहती जाये , मेरी ज़िन्दगी की धारा ।

मैकश अगर मै कोई , तू मेरा मैकदा है ।

पीता हूँ जाम तेरे , मुझको तेरा नशा है ।

आँखों में तैरता है , तेरे प्यार का नज़ारा ।

तेरी ओर बहती जाये , मेरी ज़िन्दगी…

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Added by Neeraj Nishchal on May 24, 2013 at 2:54pm — 19 Comments

पहेली है ये जिंदगी ......

क्या है - जिंदगी ,

संध्या है या प्रभात,

शीत है या उष्ण,

सूरज की लाली या चांदनी है चाँद की ,

आदि है या अंत 

स्वप्न है या चैतन्य…

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Added by Anuj kumar Pandey on May 24, 2013 at 12:30pm — 8 Comments

सॉनेट/ तुम आ जाओ

14 पंक्तियां, 24 मात्रायें

तीन बंद (Stanza)

पहले व दूसरे बंद में 4 पंक्तियां

पहली और चौथी पंक्ति तुकान्त

दूसरी व तीसरी पंक्ति तुकान्त

तीसरे बंद में 6 पंक्तियां

पहली और चौथी तुकान्त…

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Added by बृजेश नीरज on May 23, 2013 at 3:30pm — 23 Comments

प्रहार ये प्रचण्ड है

खण्ड खण्ड में विभक्त है मनुष्यता अपार
आसुरी प्रवृत्ति का प्रहार ये प्रचण्ड है
आ रहा समक्ष भी न देव शक्ति का प्रभाव
दुष्ट को प्रताड़ना विधान या न दण्ड है
सन्त हीन है समाज, शक्तिवान में प्रभूत --
आज देख लो सखे बढ़ा हुआ घमण्ड है
भारती अपंग हो गई सुनो परन्तु मित्र
घोष हो रहा कि राष्ट्र नित्य ही अखण्ड है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 23, 2013 at 10:41am — 11 Comments

चले चलो, बढे चलो...

चले चलो, बढे चलो...

------------------------

बढे चलो, बढे चलो

हिन्द के ओ सुरमाओ

बढे चलो, बढे चलो

सीमाओं की तुम ढाल हो,

रणभूमि की तुम नाल हो,

देश के द्वारपाल हो

माँ के तुम लाडले,

वतन के तुम कर्णधार हो,

बढे चलो बढे चलो

दुश्मन तुम्हे निहार रहा

ताक़त को है ललकार रहा

लहू को अपने उबाल के

जान अपनी वार के

धरती पर उसको मार के

बढे चलो बढे चलो.

-दिनेश सोलंकी

-फोटो महू छावनी के माल रोड का, छाया: दिनेश…

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Added by dinesh solanki on May 23, 2013 at 7:00am — 6 Comments

कुछ दोहे

जीवन में सद्काम का,........... हुआ सदा सम्मान |

आये दिन अब कर्म के,........ जाने सजग किसान ||

 

कारी रैना भोर में,..................... बीती देकर ज्ञान |

चार प्रहर में दोपहर,.............…

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Added by Ashok Kumar Raktale on May 22, 2013 at 10:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल: हिंदी को भूल इंग्लिश में वाव हो रहा है...

भीषण विनाशकारी बदलाव हो रहा है,

मासूमियत पे जमकर पथराव हो रहा है,

आदत बदल रही है फितरत बदल रही है,

रिश्तों में प्यार का भी अभाव हो रहा है,…

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Added by अरुन 'अनन्त' on May 22, 2013 at 10:00pm — 8 Comments

जिस वक्त कोई

जिस वक्त कोई

बना रहा होता क़ानून

कर रहा होता बहस

हमारी बेहतरी के लिए

हम छह सौ फिट गहरी

कोयला खदान के अंदर

काट रहे होते हैं कोयला

जिस वक्त कोई

तोड़ रहा होता क़ानून

धाराओं-उपधाराओं की उड़ा-कर धज्जियां

हम पसीने से चिपचिपाते

ढो रहे होते कोयला अपनी पीठ पर..

जिस वक्त कोई

कर रहा होता आंदोलन

व्यवस्था के खिलाफ लामबंद

राजधानियों की व्यस्ततम सड़कों पर

हम हाँफते- दम…

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Added by anwar suhail on May 22, 2013 at 8:20pm — 3 Comments

ज़िन्दगी

वजहों के बोझों तले क्यों , बेवजह है ज़िन्दगी |

जीने वालों के लिए , जैसे सज़ा है ज़िन्दगी |

 

साँसों के संग ही चल रही साँसों के संग थम जायेगी ,

आती जाती सांसो का एक सिलसिला है ज़िन्दगी |

 

हमने बनाये जो यहाँ खो जायेंगे वो सब मकाँ 

जिसकी मंजिल मौत है वो रास्ता है ज़िन्दगी |

 

हम जी रहे हैं आज में और सोचते कल की सदा ,

इस जगह को छोड़कर क्यों उस जगह है ज़िन्दगी |

 

ये दिल हमारा है मगर यहाँ ख्याल है किसी और का…

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Added by Neeraj Nishchal on May 22, 2013 at 11:30am — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
फिर मिलेंगे अगर खुदा लाया (तरही ग़ज़ल)

(प्रवास पर होने के कारण तरही मुशायरा अंक ३५ की ग़ज़ल यहाँ पेश कर रही हूँ )

आज जिस हाल में खुदा लाया

वक्त सपने वहीँ सजा लाया

रात सपने हसीन लाती है

दिन बुलाकर करीब क्या लाया

चाँदनी से सितारे रूठेंगे

चाँद दिल रात का चुरा लाया

तुम मिलोगे हजार कोशिश की

फिर हमें आज वास्ता लाया

जाते- जाते यही कहा उसने

फिर मिलेंगे अगर खुदा लाया

मोड़ जिसपर जुदा हुए थे हम

फिर वहीँ आज…

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Added by rajesh kumari on May 22, 2013 at 11:00am — 18 Comments

स्वाभिमान से रहे तना हुआ

काल अग्नि युक्त है तृतीय नेत्र और शम्भु
कन्ठ कालकूट युक्त आपका बना हुआ
और माल भी भुजंग ही बने हुए अनेक
दंग हूँ शिवत्व किन्तु आपका घना हुआ
बाँटते रहे प्रसाद आप भक्त के निमित्त
सोम वृष्टि से कृतार्थ मुक्त-वेदना हुआ
आशुतोष भक्ति ध्यान में रहूँ रमा सदैव
और भाल स्वाभिमान से रहे तना हुआ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 22, 2013 at 10:47am — 8 Comments

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ई-पत्रिका "प्रयास" का चतुर्थ अंक "माँ" विशेषांक

सुधि पाठकगण,

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ई-पत्रिका “प्रयास” का चतुर्थ अंक ’माँ’ विशेषांक के रूप में विश्व की कोटि-कोटि माओं को पूरे आदर के साथ समर्पित है। हमें पूरा विश्वास है कि समस्त हिंदी प्रेमियों को यह अंक पसंद आयेगा।

आप इस अंक को www.vishvahindisansthan.com/prayas4 पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं। पेज को बड़ा-छोटा करने की सुविधा पेज पर ही उपलब्ध है। पेज की बायीं तरफ़ नीचे एक + चिन्ह वाला लैंस है, उस पर क्लिक करेंगे तो पेज/फ़ांट…

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Added by Prof. Saran Ghai on May 22, 2013 at 7:55am — 2 Comments

बिजली मिस्त्री की कहानी / जवाहर

मई का महीना, जेठ की दुपहरी

पारा जब चालीस से पैन्तालीश के बीच रहता है 

धरती जलती और सूरज तपता है.

एक दिहारी मजदूर बिजली के टावर पर 

जूते दस्ताने और हेलमेट पहन 

क्या खटाखट चढ़ता है. 

सेफ्टी बेल्ट के एक हुक को

ऊपर के पट्टी में फंसाता 

दूसरे हुक को खोलता,

ऊपर और ऊपर चढ़ता है

 

"अरे क्या सूर्य से टकराएगा?

सम्पाती की तरह खुद को झुलसायेगा ?" 

वह मुस्कुराता

अपने साथियों को इशारे से…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on May 22, 2013 at 4:30am — 10 Comments

ग़ज़ल : जब नयन गुनगुना हो गया

जब नयन गुनगुना हो गया

तो सृजन गुनगुना हो गया

 

रूप की धूप में बैठकर

ये बदन गुनगुना हो गया

 

तेरी यादों की भट्ठी जली

मेरा मन गुनगुना हो गया

 

उसने डुबकी लगाई कहीं

आचमन गुनगुना हो गया

 

नर्म होंठों पे जुंबिश हुई

हरिभजन गुनगुना हो गया

 

थामकर हाथ हम चल पड़े

पर्यटन गुनगुना हो गया

 

उनके आने की आहट हुई

अंजुमन गुनगुना हो गया

 

साँस ने साँस को आग…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 22, 2013 at 1:33am — 4 Comments

बस इतनी सी ख़ता हमारी

बस इतनी थी

खता हमारी

कि थोड़ा

जीना चाहा

कॉफी के

हर घूंट में हमने

कितना कुछ

पीना चाहा

मगर बेहया

इन रातों को

इतना भी

मंजूर न था

पलट हंसा

सारे प्रश्‍नों को

जब उत्‍तर कुछ

दूर ना था

और छपे तब

कितने किस्‍से

चेहरे के

अखबार में

समझ चुका था

गहन दहन ही

मिलता इस

संसार में

बस इतनी थी

ख़ता हमारी

कि…

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Added by राजेश 'मृदु' on May 21, 2013 at 1:11pm — 7 Comments

एक नवगीत--सूर्य देवा...

सूर्य देवा, लाँघना कुछ सोचकर,

इस गाँव की चौखट। 

 

बढ़ रहे तेवर तुम्हारे,

सिर चढ़े वैसाख में।

भू हुई बंजर चला जल,

भाप बन आकाश में।

देव! है स्वागत तुम्हारा,

ध्यान हो लेकिन हमारा,

बाँध लेना प्रथम अपनी आग सी,

किरणों की बिखरी लट।

 

मौन हैं प्यासे दुधारू 

खूँटियों से द्वंद है।

हलक सूखे हैं, नज़र में

याचना की गंध है।

शेष जल यदि तुम निगल लो,

गागरी उदरस्थ कर लो,

अन्नपूर्णा किस…

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Added by कल्पना रामानी on May 21, 2013 at 1:00pm — 16 Comments

अपने अपने हिस्से का पानी

हम अपने अपने हिस्से का पानी लिए जिए जा रहें है...

देह में मचलता हुआ, लहू में बहता हुआ

और लोग जो अपनों के साथ हर सुख दुःख मे ढल जाते हैं  

हर उस आकार में जिसमें

उस घडी उनका अपना उन्हें होना देखना चाहता है

वह उनके लिए पानी सा हो जातें है .......

तो है न यह अपनों का संसार|

फिर तुम मैं

कहाँ .... दो किनारों से

अपने अपने हिस्से के पानी के साथ बढते हुए, उन्हें थामे हुए|

कभी न मिलने के लिए|

और मैं हर…

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Added by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on May 21, 2013 at 12:30pm — 15 Comments

व्यंग्य

मैने नेता ज़ी से पूछा-
चरित्र किसे कहते हैं?
नेता जी बोले- आप भी कमाल करते हैं
मैं और चरित्र
हो पूरे विचित्र
जब तक रहा चरित्र से वास्ता
ढूँढे नही मिला विधान सभा का रास्ता
 

Added by aditya chaturvedi on May 21, 2013 at 12:12pm — 9 Comments

वरो माँ

जागृत भारत को कर दूँ मुझमे पुरुषार्थ अपार भरो माँ
मन्त्र महार्णव मन्त्र महोदधि विस्मृत हैं यह ध्यान धरो माँ
छन्द जपे मम मानव तो तुम मन्त्र समान प्रभाव करो माँ
दिव्य अलौकिक बात कहूँ मम लेखन को इस भांति वरो माँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 21, 2013 at 9:30am — 8 Comments

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