डेढ़ साल हो चुका था नकुल को गये आज भी उस घर की दीवारों चौखटों से सिसकियों की आवाज सुनाई देती है बगीचे के हरे सफ़ेद लाल फूल उस तिरंगे झंडे की याद दिलाते हैं जिसमें लिपटा हुआ उस घर का चिराग कुछ वक़्त के लिए रुका था | नई नई दुल्हन की कुछ चूड़ियाँ आज भी उस तुलसी के पौधे ने पहन रक्खी हैं | घर में से बीमार माँ की खाँसी की आवाजें कराह में बदलती हुई सुनाई देती हैं|
किसी वक़्त प्रतिदिन पांच किलोमीटर दौड़ने वाले रामलाल की लाठी की ठक-ठक सुबह-सुबह सुनाई दी तो बदरी प्रसाद ने गेट खोल दिया दोनों…
ContinueAdded by rajesh kumari on August 7, 2016 at 7:00pm — 36 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 7, 2016 at 5:00pm — 4 Comments
सागर मंथन जब हुआ , निकले चौदह रत्न/
कल्पवृक्ष उद्भव हुआ , दानव देव प्रयत्न /
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कल्पवृक्ष महिमा अमित , सदा जवानी देत /
मनोकामना पूर्ण कर , करे बुढ़ापा खेत /
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सतभामा कहने लगी, सुनिए मेरे नाथ /
पारिजात को लाइए , बैठूं प्रियतम साथ /
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राजकिशोर मिश्र 'राज' प्रतापगढ़ी
Added by राजकिशोर मिश्र 'राज' प्रतापगढ़ी on August 7, 2016 at 4:09pm — No Comments
151 प्रदूषण
जिंदगी जन्म से डूबी थी अश्रुसागर में,
अब तो लहरों के भंवर और भी गहरा रहे हैं!!
सांस की आस ले बाहर की ओर झाॅंका तो,
प्रदूषण की भभक से ही चेतना थर्रा गई।
डूबती उतरा रही नव कल्पनायें भी
घड़कते घड़घडाते घोष से घबरा गई।
विषैले गगनभेदी विकिरणों के दीर्घ ध्वज लहरा रहे हैं!!
स्वार्थी अर्थलोलुप वणिकवृत्ति व्याप्त घर घर में
मनुष्यता हर मनुज से दूर, कोसों दूर पाई।
परस्पर निकटतम संबंध भी दूषित विखंडित,
आत्मीयता, भ्रातृत्व और…
Added by Dr T R Sukul on August 7, 2016 at 3:18pm — No Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on August 7, 2016 at 10:57am — 2 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 6, 2016 at 10:03pm — 4 Comments
1222 1222 1222 1222
तड़फते हैं सभी मंज़र कहीं से तुम चले आओ
खमोशी रात की औ दूर तक तन्हाई का आलम
रुके से जल में है कंकर कहीं से तुम चले आओ
क्षितिज के पार से किरणें सुहानी मुस्कुराईं यूँ
चुभे ज्यूँ रूह में खंजर कहीं से तुम चले आओ
मिटाने से नहीं मिटता ये रिश्ता आसमानी है
रहेगा जन्म जन्मान्तर कहीं से तुम चले आओ
अज़ब सी बेबसी हर सूं सफ़र भी कातिलाना…
Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 6, 2016 at 10:00pm — 4 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 6, 2016 at 6:31pm — 8 Comments
ग़ुल अहसासों के ......
क्यों
कोई
अपना
बेवज़ह
दर्द देता है
ख़्वाबों की क़बा से
सांसें चुरा लेता है
ज़िस्म
अजनबी हो जाता है
रूह बेबस हो जाती है
इक तड़प साथ होती है
इक आवाज़
साथ सोती है
कुछ लम्स
रक्स करते हैं
कुछ अक्स
बनते बिगड़ते हैं
शीशे के गुलदानों में
कागज़ी फूलों से रिश्ते
बिना किसी
अहसास की महक के
सालों साल चलते हैं
फिर क्यों
इंसानी अहसासों के रिश्ते
ज़िंदा होते हुए…
Added by Sushil Sarna on August 6, 2016 at 4:19pm — 6 Comments
Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 6, 2016 at 11:00am — 3 Comments
22 22 22 22 22 22 - बहरे मीर
अर्थ निकालें, उनको लाली हम भी दे दें
जो भी मर्ज़ी आये गाली हम भी दे दें
किसी शहर में हुआ सुना है आज धमाका
कोई खुश है, आओ ताली हम भीं दे दें
दूर बहुत, आये हैं अपने आकाओं से ,
थोड़ी सी उनको रखवाली हम भी दे दें
थाली के बैंगन वैसे तो साथ लगे. पर
कोई कारण, कोई थाली हम भी दे दें
वैसे तो तैनाती दिखती सभी बाग़ में
फर्दा की खातिर कुछ माली हम भी दे…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on August 6, 2016 at 9:22am — 10 Comments
Added by sarita panthi on August 6, 2016 at 8:23am — 5 Comments
भारत में हर मास में, होता इक त्यौहार
केवल सावन मास है, पर्वों से भरमार |1|
रस्सी बांधे साख में, झूला झूले नार
रिमझिम रिमझिम वृष्टि में, है आनन्द अपार |२|
जितने हैं गहने सभी, पहन कर अलंकार
साथ हरी सब चूड़ियाँ, बहू करे श्रृंगार |३|
काजल बिन्दी साड़ियाँ, माथे का सिन्दूर
और देश में ये नहीं, सब हैं इन से दूर |४|
कभी तेज धीरे कभी, कभी मूसलाधार
सावन में लगती झड़ी, घर द्वार अन्धकार…
ContinueAdded by Kalipad Prasad Mandal on August 6, 2016 at 8:00am — 4 Comments
गाय हमारी माता है
हमको कुछ नहीं आता है..
हमको कुछ नहीं आता है
कि, गाय हमारी माता है !
गाय हमारी माता है
और हमको कुछ नहीं आता है !?
जब गाय हमारी माता है
हमको कुछ क्यों नहीं आता है ?
गाय हमारी माता है
फिरभी हमको कुछ नहीं आता है !
फिर क्यों गाय हमारी माता है..
जब हमको कुछ नहीं आता है ?
तो फिर, गाय हमारी कैसी माता है
कि हमको कुछ नहीं आता है ?
चूँकि गाय हमारी माता है..
क्या…
Added by Saurabh Pandey on August 6, 2016 at 1:30am — 19 Comments
Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 5, 2016 at 5:46pm — 8 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 4, 2016 at 11:00pm — 10 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 4, 2016 at 7:29pm — 11 Comments
" तुमसे कुछ भी कहना बेकार है । तुम कभी नहीं सुधर सकते । जाने कितनी बार जेल जा चुके हो , हर बार कहते हो बस यह आखरी चोरी है , फिर वही करने लग जाते हो । तुम्हारे पीछे तुम्हारे परिवार वालों को जो परेशानियाँ होती है , तुमने कभी इस और ध्यान ही नहीं दिया ......।"रमेश अपने दोस्त को कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था पर वह दोस्त तो !!!
"बन्द करो अपनी शिक्षा दिक्षा नहीं सुनना तुमसे कोई भाषण । मेरी मर्ज़ी जो चाहूँ करूँ । बचपन से करते आया हूँ । घर में किसीने नहीं रोका अब यह मेरी बेरी बीवी जब से आई है…
Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 4, 2016 at 3:30pm — 11 Comments
अँधेरे में रहा करता है साया साथ अपने पर
बिना जोखिम उजाले में है रह पाना बहुत मुश्किल
ख्वाबों और यादों की गली में उम्र गुजारी है
समय के साथ दुनिया में है रह पाना बहुत मुश्किल
कहने को तो कह लेते है अपनी बात सबसे हम
जुबां से दिल की बातो को है कह पाना बहुत मुश्किल
ज़माने से मिली ठोकर तो अपना हौसला बढता
अपनों से मिली ठोकर तो सह पाना बहुत मुश्किल
कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है
क्या खोया और क्या पाया कह पाना बहुत मुश्किल
कुछ…
ContinueAdded by Madan Mohan saxena on August 4, 2016 at 1:03pm — 3 Comments
Added by रामबली गुप्ता on August 4, 2016 at 12:37pm — 8 Comments
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