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ग़ज़ल -- रुख़-ए-पुरज़र्द को गुलफ़ाम कर दे। ( दिनेश कुमार 'दानिश' )

1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2

___________________



रुख़-ए-पुरज़र्द को गुलफ़ाम कर दे

तबीयत में मेरी आराम कर दे



थी अपनी इब्तिदा-ए-इश्क़ मद्धम

तू इसका सुर्ख़रू अंजाम कर दे



किसे मालूम जन्नत की हक़ीक़त

तू आना मयकदे में आम कर दे



पिला नज़रों से अपनी कुछ तो मुझको

नहीं कुछ और , ज़िक्र-ए-जाम कर दे



मोहब्बत की सज़ा ! तुझ गुलबदन को

तू आयद मुझ पे सब इल्ज़ाम कर दे



रगों में इसकी धोका झूट लालच

सियासत पल में क़त्ल-ए-आम कर… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 20, 2016 at 4:52am — 5 Comments

ग़ज़ल

सुना है दिल लगाने में बहुत मशहूर है दिल्ली ।

मुझे कह कर गई है वो अभी तो दूर है दिल्ली ।।



जहाँ हर शाम ढलती हो मैकदों को सजाने में ।

कहा अक्सर ज़माने ने नशे में चूर है दिल्ली ।।



चली आती है ख़्वाबों में हजारों दास्ताँ लेकर ।

तुम्हारे जुर्म से होने लगी बेनूर है दिल्ली ।।



सड़क के हादसों के नाम पर लूटी गयी है वो ।

दफ़न कुछ आबरू करके बड़ी मगरूर है दिल्ली।।



सितमगर की कहानी पूछती शरहद की वो लाशें ।

न जाने किस मुरव्वत में लगी मजबूर है दिल्ली… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on August 19, 2016 at 10:51pm — 1 Comment

कविता-बन के शुचि स्नेह-सरोज.... रामबली गुप्ता

मत्त सवैया छंद

बन के शुचि स्नेह-सरोज सदा,
सबके उर-सर में विकसित हो।

मद-लोभ व द्वेष न हो मन में,
सर्वोपरि मानव का हित हो।।

कुछ कर्म करो इस भाँति सखे!
निज राष्ट्र-धर्म सम्मानित हो।

नर होने पर हो गर्व सदा,
नरता न कभी अपमानित हो।।

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on August 19, 2016 at 10:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल

हरी रंगत गुलाबी सुर्खरूं चेहरा मचल जाए ।

मेरी महफ़िल में आ जाओ मिरा रुतबा बदल जाए ।।



नजाकत से भरी नजरों से छलके जाम है तेरे ।

अंधेरी रात किस्मत में जरा सूरज निकल जाए ।।



बड़ी मासूमियत से कत्ल करने का हुनर तुझमे ।

मेरे कातिल चला शमसीर तेरा दिल बहल जाए ।।



हमारी हर कलम तो सिर्फ तेरी जीत लिखती है ।

तेरी जुल्फों के साये में चलो लिक्खी गजल जाए ।।



खुदा महफूज रक्खे उन रकीबों के नजारों से ।

कहीं ये वक्त से पहले न तेरा हुस्न ढल जाए… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on August 18, 2016 at 10:02pm — 12 Comments

याद

 एक तू ही थी

जो बचपन में

अपने जोड़े पैसों से

मुझे खिलाती थी

मेरी मनपसंद चीज

और झूठ बोलकर मुझे

बचाती थी पिता के प्यार से

फिर एक दिन तू उड़ गयी

कही दूर किसी अजानी जगह

और फिर बनाया उसे

अपनी कर्म भूमि

आजीवन पूजती रही बट-वृक्ष

और सींचती रही अपने लगाये पौधे

बिताया अपना सारा जीवन

पत्रों से भेजती रही

मेरे लिए राखी

मैं बाँध लेता था उन्हें

आँखें नम हो जाती थे स्वतः

पर आज…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 18, 2016 at 3:32pm — 8 Comments

लघु कथा राखी वाला नोट

लघु कथा

राखी वाला नोट

जैसे ही चौराहे  पर लाल रंग का सिगनल हुआ वह अपनी बहन लाली को गोदी में ले कर दौड़ पड़ा भीख माँगने के लिये। बन्द कारों के शीशों के पार उसकी आवाज पँहुच नहीं पा रही थी।

तभी एक कार का शीशा खुला और एक महिला ने पचास रूपये का नोट उसे पकड़ा दिया। लाली को उसने नीचे बिठाया और वह उस पचास रूपये के नोट को निहारने लगा। ’’ भैया वह देखो कितनी सुन्दर राखियाँ सामने दुकान पर टगीं हैं एक राखी मुझे भी चाहिये’’

भाई उठा और राखी लेने के लिये दौड़ पड़ा। अचानक चूूूू.......... की…

Continue

Added by Abha saxena Doonwi on August 18, 2016 at 2:00pm — 3 Comments

पावन भाव(कुण्डलिया)

पावन ही यदि भाव हो,तो पावन त्यौहार
सूत्र रक्षार्थ बाँधती, भाई को हर नार
भाई को हर नार,चाह रक्षा की रखती
हर भाई में नेक,मनुष वह हर पल लखती
सतविन्दर कविराय,विचारों का हो धावन
पूजित हो हर नार,रहे सबका दिल पावन।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 18, 2016 at 11:00am — 6 Comments

ग़ज़ल: अंदाज कातिलों के बेहतरीन बहुत हैं

अंदाज कातिलों के बेहतरीन बहुत हैं ।

कुछ शख्स इस शहर में नामचीन बहुत हैं ।।



वो खैर मांगते रहे बुरहान की सदा।

उसकी दुआ में पेश हाज़रीन बहुत हैं ।।



आज़ाद मीडिया है अदावत का तर्जुमा ।

गुमराह हर खबर पे नाज़रीन बहुत हैं ।।



जब भी जला वतन तो जश्ने रात आ गयी ।

दैरो हरम के पास मजहबीन बहुत हैं ।।



मिटते हैं वही मुल्क बड़े जोर- शोर से ।

बैठे जहाँ घरों में फिदाईन बहुत हैं ।।



मेरी बलूच आसुओं पे जब नज़र गई ।

वो हुक्मरान देखिए…

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Added by Naveen Mani Tripathi on August 18, 2016 at 11:00am — 6 Comments

स्वाभिमानी पत्थर-रामबली गुप्ता

मानव उवाच(कुकुभ छंद)



सुनो कथा पत्थर की भैया,

पत्थर क्या-क्या सहते हैं?

कथा व्यथा है इनकी सच मे,

डरे-डरे-से रहते हैं।।

जिसका भी जी चाहे इनको,

दीवारों में चुनवा दे ।

और हथौड़े की चोटों से,

टुकड़ों मे भी तुड़वा दे।।



पत्थर उवाच(ताटंक छंद)



चोटों की परवाह नही है,

चोटों पर दिल वारा है।

मानवता के काम आ सकें,

ये सौभाग्य हमारा है।।

महल-अटारी-मंदिर-मस्जिद,

नगर-डगर गुरुद्वारा है।

जग में गिरि से लघु कंकड़… Continue

Added by रामबली गुप्ता on August 18, 2016 at 6:34am — 4 Comments

रक्षा का बंधन ( लेख ) - डॉo विजय शंकर

रक्षा बंधन बहन-भाई के पारस्परिक स्नेह , प्रेम , एक दूसरे के प्रति जीवन-पर्यन्त चलने वाले दायित्व बोध का एक अत्यंत खुशनुमा पर्व। शायद इसी का एक रूप विकसित हुआ है ," फ्रेंडशिप बैंड " . राखियों का विशाल बाजार , हीरे और अन्य रत्नों से जड़ी लाख लाख रुपये की राखियां, दिल्ली जैसे महानगर में रक्षा बंधन के दिन ट्रैफिक का भर-पूर रश , डी टी सी द्वारा प्रायः बहनों के लिए रक्षा - बंधन को फ्री-सर्विस। कितना सुन्दर लगता है , सब कुछ। एक दिन भाई के लिए , बहन के लिए , वैसे ही जैसे सारी दुनियाँ में एक साथ " मदर्स… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 17, 2016 at 8:31pm — 2 Comments

बिलखते हैं बच्चे , सिसकती हैं माएँ मनाएं भला जश्न कैसे बता दो------------ग़ज़ल

122 122 122 122 122 122 122 122

अभी जाने कितने घरों में न चूल्हा

न जाने ही कितनों के घर, ये तो जानो।

बहुत कीमती फोन हाथों में लेकर

वो नेता बताता दिखा मीडिया को।।1।।



सफेदी थी झक्कास गाड़ी गज़ब की

सफ़ारी थी शायद औ मॉडल नया था।

गरीबी पे व्याख्यान देकरके जिसमें

मसीहा गरीबों का चढ़कर गया, वो।।2।।



परिस्थिति पे घड़ियाली आँसू बहाकर

तसल्ली बहुत दे गया था जो नेता।

मदद को बुलाया था आवास पर ही

मिटाये कहाँ दाग मन पर दिया ,… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 17, 2016 at 3:30pm — 4 Comments

अपराधबोध--

"मैं जा रही हूँ घर छोड़कर, मुझे रोकना मत", फोन पर रितू को ये कहते सुनकर सलिल चौंक गया|

"क्या हुआ, मैंने तो सब कुछ भुला दिया है, तुम भी क्यूँ नहीं भूल जाती सब कुछ", उसने तुरंत पूछा|

"वही तो नहीं कर पा रही हूँ, मैं इंसान हूँ, तुम्हारी तरह देवता नहीं", बोलते बोलते वो सुबकने लगी|

"मैं आ रहा हूँ, एक बार मिलने के बाद बेशक चली जाना, मैं रोकूंगा नहीं", कहते हुए उसने फोन रख दिया और ऑफिस से निकल कर घर चल पड़ा| घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला हुआ ही था, वो अंदर कमरे में पहुँचा, रितू अपना…

Continue

Added by विनय कुमार on August 17, 2016 at 1:30pm — 8 Comments

गजल(मनन)

(रमल मुसद्दस सालिम)
2122 2122 2122
हो फटा दामन भले पर मत लजाओ
फेंकते पत्थर जरा उनकी गिनाओ।1

टाँकते फिरते वसन अबतक रहे तुम
अब जरा उनकी हकीकत भी बताओ।2

घाटियों को घर समझने हैं लगे सब
जेब में कौड़ी पड़ी अपनी बताओ।3

दोस्ती कुर्बान अबतक सरहदों पर
पार से आवाज आती कर बढ़ाओ।4

हार जाता जो हमेशा वार कर के
चाहता दुश्मन चलो भी आजमाओ।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on August 17, 2016 at 9:30am — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - इक अक़ीदा चल के बुतखाना हुआ -( गिरिराज भंडारी )

2122    2122    212 -

की मुहब्बत पर न जल जाना हुआ

जल उठूँ, ऐसा न मस्ताना हुआ

 

इक अक़ीदत बढ के मस्ज़िद हो गई   *---  श्रद्धा

इक अक़ीदा चल के बुतखाना हुआ  ----    विश्वास ,

वो न आयें, तो रहीं मजबूरियाँ 

हम न पहुँचे तो ये तरसाना हुआ

बात उनकी सच बयानी हो गई

हम हक़ीक़त जब कहे , ताना हुआ

 

आपने कैसी खुशी बाँटी हुज़ूर

चेह्रा चेह्रा आज ग़मख़ाना हुआ

 

चाहते…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on August 17, 2016 at 9:30am — 14 Comments

ताटंक छंद

ताटंक छंद

---

1

बुरे समय का खेला चलता, गुण की कीमत जाती है

लोग बुरे आगे बढ़ते हैं,अच्छों की मत जाती है

मक्कारी के घर भरते हैं,सच्चाई घबराई है

जनता देखो भूखी मरती,कुत्ता खात मलाई है।

2.

बहा पसीना खेत कमाता, पोषण सबका होता है

खुद का बच्चा तड़प तड़प कर, भूखा घर में सोता है

कुदरत ने तो मारा उसको,करता तंत्र पिसाई है

जनता देखो भूखी मरती,कुत्ता खात मलाई है।



3

जो करते हैं काम अनेकों ,नाम कभी क्या होता है,

काट लफंगे खा जाते… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 16, 2016 at 9:00pm — 6 Comments

आ मेरे ख़यालों में हाज़िरी लगा दीजै (ग़ज़ल)

बह्र : २१२ १२२२ २१२ १२२२

 

आ मेरे ख़यालों में हाज़िरी लगा दीजै

मन की पाठशाला में मेरा जी लगा दीजै

 

फिर रही हैं आवारा ये इधर उधर सब पर

आप इन निगाहों की नौकरी लगा दीजै

 

दिल की कोठरी में जब आप घुस ही आये हैं

द्वार बंद कर फौरन सिटकिनी लगा दीजै

 

स्वाद भी जरूरी है अन्न हज़्म करने को

प्यार की चपाती में कुछ तो घी लगा दीजै

 

आग प्यार की बुझने लग गई हो गर ‘सज्जन’

फिर पुरानी यादों की धौंकनी लगा…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 16, 2016 at 9:00pm — 16 Comments

कि जब तुम लौट कर आओगे::एक स्मृति

हौसला टूट चुका है, अब यकीन कहीं जख्मी बेजान मिलेगा,

कि जब तुम लौट कर आओगे तो सब वीरान मिलेगा ll



वो बरगद का पेड़ जहां दोनों छुपकर मिला करते थे,

वो बाग जहां सब फूल तेरी हंसी से खिला करते थे,

वो खिड़की जहां से छुपकर तुम मुझे अक्सर देखा करती थी,

वो गलियां जो हम दोनों की ऐसी शोख दिली पर मरती थीं,

वो बरगद,वो गलियां, वो बाग बियाबान मिलेगा,

कि जब तुम लौट कर आओगे……………l



खेत-खलिहान तक तुमको बंजर मिलेगा,

मेरी दुनिया का बर्बाद मंजर…

Continue

Added by Er Anand Sagar Pandey on August 16, 2016 at 6:30pm — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
एक तरही ग़ज़ल // --सौरभ

२२१ २१२१ १२२१ २१२



पगडंडियों के भाग्य में कोई नगर कहाँ ?

मैदान गाँव खेत सफ़र किन्तु घर कहाँ ? 

 

होठों पे राह और सदा मंज़िलों की बात

पर इन लरजते पाँव से होगा सफ़र कहाँ ? 

 

हम रोज़ मर रहे हैं यहाँ, आ कभी तो देख..

किस कोठरी में दफ़्न हैं शम्सो-क़मर कहाँ ? 

 

सबके लिए दरख़्त ये साया लिये खड़ा

कब सोचता है धूप से मुहलत मगर कहाँ !

 

जो कृष्ण अब नही तो कहाँ द्रौपदी कहीं ?

सो, मित्रता की ताब में कोई असर कहाँ ? 

 

क़ातिल…

Continue

Added by Saurabh Pandey on August 16, 2016 at 4:00pm — 27 Comments

इन्सां के लिए ... (क्षणिकाएं)

इन्सां के लिए ... (क्षणिकाएं)

1 .

एक पत्थर उठा

शैतां के लिए

एक पत्थर उठा

जहां के लिए

एक पत्थर उठा

मकां के लिए

देवता बन

जी उठा

एक पत्थर

इन्सां के लिए

...... ..... ..... .....

२.

मैं आज तक

वो रिक्तता

नहीं नाप सका

जिसमें

कोई माँ

अपने जन्मे को

तन्हा छोड़

ब्रह्मलीन हो जाती है

मन को शून्यता की

क़बा दे जाती है

..... ..... ..... ..... .....

३.

हमने

प्रवाहित कर दी थी…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 16, 2016 at 2:19pm — 10 Comments

अब भी कुछ संभावनाएँ शेष हैं (ग़ज़ल)

2122 2122 212



जानता हूँ आपदाएँ शेष हैं।

क्यों डरूँ?जब तक दुआएँ शेष हैं।



जन्म लेते ही रहेंगे राम-कृष्ण,

जब तलक धरती पे माँएँ शेष हैं।



कोशिशें तो आप सारी कर चुके,

अब तो केवल प्रार्थनाएँ शेष हैं।



सूर्य ढलने को अभी कुछ वक़्त है,

अब भी कुछ संभावनाएँ शेष हैं।



बोलिये! इस दौर में कैसे जिये?

जिसके दिल में भावनाएँ शेष हैं।



मंदिरों से देवता ग़ायब हुए,

मूर्तियों में आस्थाएँ शेष हैं।



बस्तियाँ तो बाढ़ में… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on August 16, 2016 at 1:16pm — 11 Comments

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