माल्यवान और सुमाली रक्ष संस्कृति के प्रणेता हेति और प्रहेति के प्रपौत्र थे।
रक्ष संस्कृति का प्रादुर्भाव यक्ष संस्कृति के साथ एक ही समय में एक ही स्थान पर हुआ था। पर कालांतर में उनमें बड़ी दूरियाँ आ गयी थीं। यक्षों की देवों से मित्रता हो गयी थी और रक्षों की शत्रुता। रक्ष या दैत्य आर्यों से कोई भिन्न प्रजाति हों ऐसा नहीं था किंतु आर्य क्योंकि देवों के समर्थक थे (पिछलग्गू शब्द प्रयोग नहीं कर रहा मैं) इसलिये उन्होंने देव विरोधी सभी शक्तियों को त्याज्य मान लिया। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे कालांतर…
Added by Sulabh Agnihotri on June 20, 2016 at 8:39am — 4 Comments
पूर्व-पीठिका
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-1-
‘‘ए ! कौन हो तुम लोग ? कैसे घुस आये यहाँ ? बाग खाली करो अविलम्ब !’’ यह एक तेरह-चैदह साल की किशोरी थी अपनी कमर पर दोनों हाथ रखे क्रोध से चिल्ली रही थी। क्रोध होना स्वाभाविक भी था। तकरीबन चार-पाँच सौ घुड़सवारों ने उसके बाग में डेरा डाल दिया था। जगह-जगह घोड़े चर रहे थे। कुछ ही बँधे थे, बाकी तो खुले ही हुये थे किंतु उनके सबके सामने आम की पत्तियों के ढेर लगे थे। तमाम डालियाँ टूटी पड़ी थीं। बहुत से लोग पेड़ों पर चढ़े हुये आम नीचे गिरा रहे…
ContinueAdded by Sulabh Agnihotri on June 19, 2016 at 7:53pm — 3 Comments
पिता
परिवार -नैया पिता पतवार
तूफान-आंधी में खेते जाते
बोते जाते श्रम -कण फसलें
साधिकार पल जाती नस्लें
पिता के काँधे …
ContinueAdded by amita tiwari on June 19, 2016 at 7:18pm — 3 Comments
2122 2122 212
जिंदगी में जीत भी कुछ हार भी
और यारो प्यार भी तकरार भी
लोग दरिया से उतारें पार भी
छोड़ देते बीच कुछ मजधार भी
हर कदम पे ही मिले हमको सबक
राह में कुछ फूल भी कुछ ख़ार भी
हम भले फुटपाथ पर धीमे चले
पार करने को बढ़ी रफ़्तार भी
जो मिले पैसे उसी में सब्र था
बीस आये हाथ में या चार भी
हम सदा खेला किये बस गोटियाँ
खेल में खंजर मिले तलवार…
ContinueAdded by rajesh kumari on June 19, 2016 at 11:10am — 9 Comments
Added by Janki wahie on June 18, 2016 at 1:29pm — 16 Comments
Added by जयनित कुमार मेहता on June 17, 2016 at 10:00pm — 6 Comments
महीन है विलासिनी
महीन हैंं विलासिनी तलाशती रही हवा, विकास के कगार नित्य छांटते ज़मीन हैं.
ज़मीन हैं विकास हेतु सेतु बंध, ईट वृन्द, रोपते मकान शान कांपते प्रवीण हैं.
प्रवीण हैं सुसभ्य लोग सृष्टि को संवारते, उजाड़ते असंत - कंत नोचते नवीन हैं.
नवीन हैं कुलीन बुद्ध सत्य को अलापते, परंतु तंत्र - मंत्र दक्ष काटते महीन हैं.
मौलिक व अप्रकाशित
रचनाकार.... केवल प्रसाद सत्यम
Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 17, 2016 at 8:30pm — 13 Comments
आक्रोश – (लघुकथा) –
" रूपा, तू यहाँ, रात के दो बजे! आज तो तेरी सुहागरात थी ना"!
"सही कह रही हो मौसी, आज हमारी सुहागरात थी! तुम्हारी सहेली के उस लंपट छोरे के साथ जिसे तुम बहुत सीधा बता रहीं थी! बोल रहीं थीं कि उसके मुंह में तो जुबान ही नहीं है"!
"क्या हुआ, इतनी उखडी हुई क्यों है"!
"उसी से पूछ लो ना फोन करके, अपनी सहेली के बिना जुबान के छोरे से"!
"अरे बेटी, तू भी तो कुछ बोल! तू तो मेरी सगी स्वर्गवासी बहिन की इकलौती निशानी है"!
"तभी तो तुमने उस नीच के…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on June 17, 2016 at 10:53am — 26 Comments
2222 2222 2222 2222
दिन रात भरी तनहाई में इक उम्र गुज़ारी भी तो है ।
पाकर तुमको एहसास हुआ इक चीज हमारी भी तो है ।
हम बैठ तसव्वुर में तेरे बस ख्वाब नहीं देखा करते,
तेरी सूरत इन आँखों से इस दिल में उतारी भी तो है…
ContinueAdded by Neeraj Nishchal on June 17, 2016 at 10:00am — 12 Comments
Added by Manan Kumar singh on June 16, 2016 at 11:00pm — 6 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 16, 2016 at 5:11pm — 11 Comments
चेहरा ...
एक चेहरा एक पल में
लाखों चेहरे जी रहा
कौन जाने कौन सा चेहरा
हंस के आंसू पी रहा
एक चेहरा लगता अपना
एक क्यों बेगाना लगे
कौन दिल की बात कहता
कौन होठों को सी रहा
कत्ल होता रोज इक चेहरा
रोज इक जन्म हो रहा
एक जागे किसी की खातिर
आगोश में इक सो रहा
एक चेहरा ख्वाब बन के
ख़्वाबों में बस जाता है
एक चेहरा अक्स बन के
नींदें किसी की पी रहा
एक चेहरा अपनी दुनिया
चेहरों में बसाता है
एक चेहरा दुनिया…
Added by Sushil Sarna on June 16, 2016 at 2:59pm — 6 Comments
२१२२ २१२२ २१२२ २१२
इक दफा ये मर्ज लग जाये तो छुटकारा नहीं
इश्क है ये मस्त खुशबू का कोई झोंका नहीं
यार तुमने जिन्दगी को गौर से देखा नहीं
दरमियाँ मेरे तुम्हारे लक्ष्मनी रेखा नहीं
तपती साँसों की तपिश कुछ सच बयानी कर रही
धड़कने कहती हैंं दिल की प्यार है धोखा नहीं
इश्क का अहसास कैसे ज़िंदगी में आ गया
शेख जी कुछ राय देंगे मैंने कुछ सोचा नहीं
इश्क है रब की इबादत राज गहरा जान लो
देख…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on June 16, 2016 at 2:30pm — 5 Comments
दिए जो तूने मुझको गम,
हुए जुदा खुद से हम,
रुख़ ये तूने मोड़ा क्यूँ,
दिल मेरा तोड़ा क्यूँ...
तेरी यादों मे जिया, ज़ख़्म दिल का है सिया,
तेरी यादों मे जिया, ज़ख़्म दिल का है सिया,
आँखों से बहते रहे अश्क, दर्द का प्याला पिया....
दिए जो तूने मुझको गम,
हुए जुदा खुद से हम....
बातें तेरी अनकही,
पास तू भी है नही,
बातें तेरी अनकही,
पास तू भी है नही,
करले कुछ वक़्त यार तू अब, प्यार झूठा ही सही....
दिए जो तूने मुझको…
Added by M Vijish kumar on June 16, 2016 at 9:30am — No Comments
Added by amita tiwari on June 15, 2016 at 10:00pm — 5 Comments
"ओ रे बुधिया , अब ये फूस हटाना ही पड़ेगा अपनी टपरी से "
" ई का कह रहे हो बुड्ढा , अब हम सब बिना छत के रहें का ? "
" नाहीं रे , कुछ टीन टपरा जोड़ लेंगे "
" काहे जोड़ लेंगे टीन-टप्पर , क्यु कहे तुम फूस हटाने को ?"
" खेत से आवत रहें तो गाँव के जोरगरहा दुई जन को कुछ कहते सुनत रहे , ओही से कहे है "
" का सुन लिये रहे हो ?"
" कहत रहे कि फुसहा घर गाँव के विकास में…
ContinueAdded by kanta roy on June 15, 2016 at 8:00pm — 5 Comments
Added by dileepvishwakarma on June 15, 2016 at 1:46pm — 5 Comments
Added by maharshi tripathi on June 15, 2016 at 1:06pm — 14 Comments
2122 1122 1122 22 /112
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तुम जो चाहो तो ये गिर्दाब, किनारा लिख दो
डूब भी जाये कोई , पार उतारा लिख दो
कैसे उस चाँद को धरती पे उतारा लिख दो
कैसे आँगन में हुआ खूब नज़ारा लिख दो
खटखटाने से कोई दर न खुले, तो दर पर
बारहा मैने तेरा नाम पुकारा लिख दो
जंग अपनो से भला कैसे कोई कर लेता
ख़ुद को जीता, तो कहीं मुझको ही हारा लिख दो
हो यक़ीं या कि न हो तुम तो लिखो सच अपना
दश्ते…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on June 15, 2016 at 9:30am — 59 Comments
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222
ग़ज़ल
सड़क पर बजबजाते चीखते नारों से क्या होगा
हवा में फुस्स हो जायें जो, गुब्बारों से क्या होगा ?
लडाई है बहुत बाकी बहुत कुछ कर गुजरना है
नही है हौसला दिल में तो नक्कारों से क्या होगा ?
जिन्हें हमने अता की है, हकूमत देश की यारों
उन्ही में बदगुमानी है तो उद्गारों से क्या होगा ?
पड़े है एक कोने…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 15, 2016 at 8:39am — 18 Comments
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