ग़ज़ल ( हादसा घट गया )
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212 -212 -212
यक बयक हादसा घट गया ।
राहे उल्फत से वह हट गया ।
ज़ुल्म में ही था शामिल करम
था गुमाँ मुझको वह पट गया ।
जाऊं सदक़े सियासत तेरे
हर कोई क़ौम में बट गया ।
नाव भी डगमगाने लगी
हो रहा है गुमाँ तट गया ।
ऐसा लगता है फ़हरिस्त से
नाम शायद मेरा कट गया ।
खाये पत्थर गली में तेरी
सर मेरा यूँ नहीं फट गया…
ContinueAdded by Tasdiq Ahmed Khan on June 15, 2016 at 7:33am — 21 Comments
आज तुम असमंजस में क्यूँ हो
देखकर गंगा में बहते फूलों को
जब तुम ही नहीं हो अब सुनने को
अब अपाहिज हुए अनुभूत तथ्यों को
अंधेरे बंद कमरे में कल रात
बड़ी देर तक ठहर गई थी रात
अकुलाती, दर्द भरी, रतजगी
आस्था रह न गई
ख़्यालों के अनबूझे ब्रह्माण्ड में
छटपटाती छिपी हुई कोई गहरी पहचान
भोर से पहले रात की अंतिम-दम चीखें
अन्धकार भरे अम्बर में जीवन्त पीड़ा
ऐसे में हमारे निजी अनुभूत तथ्यों ने
लिख कर…
ContinueAdded by vijay nikore on June 15, 2016 at 1:55am — 18 Comments
ईंट का आखिरी खेप सिर से उतार कर पास रखे ड्रम से पानी ले हाथ-मुँह धो सीधे उसके पास आकर खड़ा हो गया ।
" सेठ , अब जल्दी से आज का हिसाब कर दो "
" कल ले लेना इकट्ठे दोनों दिन की मजूरी ।"
" नहीं सेठ , आज का हिसाब आज करो , कल को मै काम आता या नहीं , भरोसा नहीं "
" मतलब "
" इस हफ्ते पाँच दिन काम किया ना , बहुत कमा लिया ,इतना ही काफी है । अब अगले हफ्ते ही काम पर आऊँगा ।"
" बहुत कमा लिया , हूँ ह ! इतनी-सी कमाई में क्या - क्या करोगे ?"
" क्या-क्या नहीं…
ContinueAdded by kanta roy on June 14, 2016 at 12:30pm — 22 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on June 14, 2016 at 11:03am — 20 Comments
Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 14, 2016 at 10:00am — 8 Comments
Added by Manan Kumar singh on June 14, 2016 at 7:03am — 11 Comments
"भाभी, चाय खौल चुकी है, कहाँ खोई हुई हो तुम!" देवरानी ने गैस चूल्हा बंद करते हुए जिठानी से कहा।
"ओह, मैं चाय की पत्ती के बारे में सोच रही थी!"
"क्यों?"
"मैं भी यहाँ चाय की पत्ती ही तो हूँ!"
"क्या मतलब?"
"बिना शक्कर के सबको चाय कड़वी ही तो लगती है, मिठास मिले तो सबको मीठी चाय भाये!"
"लेकिन चाय मीठी हो या फीकी, रिश्ते मधुर बनाने में एक पहल तो करती ही है, बस यह ध्यान रहे कि कहां फीकी चलेगी और कहां मीठी!"
"सही कहा तुमने, लेकिन नौकरी पेशा औरत को जब मध्यमवर्गीय…
Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 13, 2016 at 4:00pm — 12 Comments
मायाजाल ...
ये मकड़ी भी
कितनी पागल है
बार बार गिरती है
मगर जाल बुनना
बंद नहीं करती
बहुत सुकून मिलता है उसे
अपने ही जाल के मोह में
स्वयं को उलझाए रखने में
वो स्वयं को
वासनाओं के जाल में
लिप्त रखना चाहती है
शायद वो जानती है
जिस दिन भी वो
अपना कर्म छोड़ देगी
वो अपनी पहचान खो देगी
पाकीज़गी उसे मोक्ष तक ले जाएगी
लेकिन इस तरह का मोक्ष
कभी उसकी पसंद नहीं होता
उसे तो अपनी वही दुनियां पसंद है…
Added by Sushil Sarna on June 13, 2016 at 3:35pm — 12 Comments
२१२२ ११२२ ११२२ २१२
आइना सब को दिखाते हैं कभी खुद देखिये
क्यूँ लगी ये आग हरसू आप खुद ही सोचिये
हुक्मरानों ने खता की बच्चों से बचपन छिना
अब्बू ना लौटेंगे चाहे लाख आंसू पोंछिये
अम्मी के हाथों के सेवइ अम्मा के हाथों की खीर
एक जैसा ही सुकू देती है खाकर देखिये
दिल हमीदों का न तोड़ो गर है कोई सिरफिरा
मौत हिन्दी की हुई मत हिन्दू मुस्लिम बोलिये
जो बचाने में लगा है इस वतन की आबरू
हम बिरोधी उसके हैं या नीतियों के…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on June 13, 2016 at 1:57pm — 12 Comments
'मत्तगयन्द सवैया'
हे! जगदीश! सुनो विनती अब, भक्त तुम्हें दिन-रैन पुकारे।
व्याकुल नैन निहार रहे मग, दर्शन को तव साँझ-सकारे।
कौन भला जग में तुम्हरे बिन, संकट से प्रभु ! मोहि उबारे?
आय करो उजियार प्रभो ! हिय, जीवन के हर लो दुख सारे।।1।।
'दुर्मिल सवैया'
जय हे जगदीश! कृपा करके, कर आय प्रभो! मम शीश धरो।
तुम मूरत बुद्धि-दया-बल के, सदबुद्धि-दया-बल दान करो।
शुचि ज्ञान-प्रकाश बहा प्रभु हे ! मन के तम-पाप-प्रमाद हरो।
हर लो हर दुर्बलता हिय के, उर…
Added by रामबली गुप्ता on June 13, 2016 at 1:00pm — 6 Comments
Added by SudhenduOjha on June 13, 2016 at 12:36pm — No Comments
Added by SudhenduOjha on June 13, 2016 at 12:31pm — 1 Comment
"सुनो , कुछ कहना है " बड़ी हिम्मत करके पति की तरफ देखा उसने ।
" क्या हुआ अब , आज फिर माँ से कहा-सुनी हो गई है क्या ?" उन्होंने पूछा ।
" अरे नहीं , माँ से कुछ नहीं हुआ । बात दीपू की है " उसने तीखे स्वर में कहा ।
" अब उसने क्या कर दिया "
" वो ..."
" वो क्या , अरे बताओ भी , किसी से सिर फुट्व्वल करके तो नहीं आया है " उन्होंने तमतमाये चेहरे से पूछा ।
" कैसी बात करते है आप , अपना दीपू वैसा नहीं है " वह एकदम से कह उठी ।
" तो कैसा है , अब तुम्हीं बता दो ? "
"…
Added by kanta roy on June 13, 2016 at 10:00am — 14 Comments
‘भूकंप’
“सेठ साहब, ये बुढ़िया रोज आती है और इस दीवार को छू छू कर देखती है फिर घंटो यहाँ बैठी रहती है मैं तो मना कर-कर के थक गया लगता है कुछ गड़बड़ है जाने सेंध लगवाने के लिए कुछ भेद लेने आती है क्या” चौकीदार ने कहा |
“माई, कौन है तू क्या नाम है तेरा और तेरा रोज यहाँ आने का मकसद क्या है”? साहब ने पूछा |
“जुबैदा हूँ सेठ साहब, आपने तो नहीं पहचाना पर आपके कुत्ते ने पहचान लिया अब तो ये भी बड़ा हो गया साहब देखिये कैसे पूंछ हिला रहा है”|
सेठ दीन दयाल भी ये देखकर…
ContinueAdded by rajesh kumari on June 13, 2016 at 10:00am — 22 Comments
स्वप्न, बच्चों की आँखों में
पलना चाहिए।
आगया है समय, हमको
बदलना चाहिए॥
जर्जरावस्था है,
बता दो तन को।
उसे, झुक-झुक के
चलना चाहिए॥
बदल रहा है अब,
मौसम का मिजाज़।
उन्हें दरख्तों पर
उतरना चाहिए॥
कुछ परिंदे,
सारी हदों को तोड़ते हैं।
बुलंद हौसलों को
करना चाहिए॥
मेरा सच,
दुनिया के सच से ख़ूब है।
‘आप’ को इसे
समझना चाहिए॥
‘निर्भया’ से…
ContinueAdded by SudhenduOjha on June 12, 2016 at 7:30pm — 2 Comments
सारा देश दहशत में था .भारत के सर्वाधिक सम्मानित नेता देश के सुरक्षा संबंधी गुप्त दस्तावेज दुश्मन देश को सौंपते हुए कैमरे में कैद कर लिए गये थे . मीडिया में देश के खिलाफ इस प्रकार के षड्यंत्र में नेता जी के लिप्त होने को लेकर गरमागरम बहस चालू थी . जिस टी वी चैनल ने यह स्ट्रिंग आपरेशन किया था , वह बार-बार उन दृश्यों को जनता के सामने परोस रहा था .या सीधे -सीधे देश-द्रोह का मामला था अनेक चैनेल इस विषय पर सीधे नेता जी से सम्पर्क कर उनकी ज़ुबानी सारा सत्य उगलवाना चाहते थे . नेता जी इन सब…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 12, 2016 at 6:42pm — 5 Comments
Added by जयनित कुमार मेहता on June 12, 2016 at 5:15pm — 8 Comments
2212 2212 2212 2212
भरने लगीं आँहें तड़फ के संगदिल तनहाइयाँ
ढलने चला सूरज अभी बढ़ने लगी परछाइयाँ
थीं कोशिशें की थाम लें उड़ता हुआ दामन तेरा
पर मुददतों से फासले पसरे हुये हैं दरमियाँ
ये कौन सा माहौल है ये वादियाँ हैं कौन सीं ?
हर ओर सन्नाटा ज़हन में चीखतीं खामोशियाँ
तुमभी परेशां हो बड़े दिल की खलाओं से अभी
छू कर तुझे आईं हवायें करती हैं…
Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 12, 2016 at 5:13pm — 4 Comments
गान मेरा स्वांस है,
यह अजब विश्वास है
दूरियाँ ही दूरियाँ हैं
लक्ष्य तक,
तम ही तम है
सूर्य के द्वार तक
पाँव में
सर्पदंशी फांस है
गान मेरा स्वांस है,
यह अजब विश्वास है
ओस में कागज़ों से
मुस गए हैं आदमी
भय अजब सा लिए घरों में
घुस गए हैं आदमी
दीप उज्ज्वल
एक मेरे पास है
गान मेरा स्वांस है,
यह अजब विश्वास है
हाशिये से उतर…
ContinueAdded by SudhenduOjha on June 12, 2016 at 2:32pm — 2 Comments
Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 12, 2016 at 12:36pm — 11 Comments
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