आरक्षण – (लघुकथा ) –
राज्य के कुछ तेज तर्रार देशी कुत्तों ने समाज की महा पंचायत बुलाई ! प्रदेश के कोने कोने से देशी कुत्ते एकत्र हुए ! सबसे बुजुर्ग कुत्ते को सभापति बनाया गया! तेज तर्रार कुत्तों में से एक प्रवक्ता बनाया गया! प्रवक्ता ने मंच से संबोधित किया,
"साथियो, आप सभी को ज्ञात है कि हमारी क़ौम वफ़ादारी की मिसाल है! हम बिना किसी लोभ, लालच के घरों, बाज़ारों और सड़कों की चौकीदारी करते हैं! मगर अफ़सोस की बात है कि मानव जाति हमारे साथ घोर अन्याय करती है! हमें कोई सुविधा नहीं दी…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on June 12, 2016 at 12:02pm — 4 Comments
Added by Rahul Dangi Panchal on June 12, 2016 at 9:07am — 2 Comments
पंडितजी पूजा के पहले साफ करते करते बुदबुदाते न खुश न दुखी अजीब सी ऊहापोह में दबाए रखते क्रोध को,न बाहर आने देते न जज्ब ही कर पाते।
"क्या हो गया पंडित जी ?"
"देखो तो, पूरा गर्भगृह गंदा कर देते हैं, रोज रोज रगड़ रगड़ के साफ करना पड़ता है।"
"अरे ये तो बहुत गंदगी करते हैं।"
मूर्ति की ओर इशारा करते हुए,"सब इनकी मर्जी है।"
"क्या इनकी मर्जी, शाम को सब प्रसाद उठा लिया करो,और बंद कर दो सारे बिल,पिंजरा भी रख दो।"
"शुभ शुभ बोलो भइया, उनका भी तो हिस्सा है इस चढावा में, हम…
Added by Pawan Jain on June 11, 2016 at 10:00am — 2 Comments
बैठ हिमालय की चोटी
करते हैं वे तपस्या हरदम
नीचे जंगल के पेड़ों का
कटना है जारी
जो उन्हे करता
नही
किसी तरह से
चिन्तित
लगा हमें क्यों न हम ही
जाकर करें विनती
हमें चाहिए शिव का वरदान
उनके द्वारा दिया गया
वचन ही हमें ं
प्रदान कर सकता है
अभय
नहीं चाहिए जनविनाश
हमें चाहिए कल्याण
उनका समर्थन
जो बढ़ायेगा
हमारा संबल
देखा हमें
स्वच्छ व स्वस्थ
जिंदगी
मौलिक…
Added by indravidyavachaspatitiwari on June 10, 2016 at 8:26pm — 1 Comment
तू ही रे.....तू ही रे.....
मेरे दिल मे है समाया,
तू ही रे....
तुझे दिल मे है बसाया,
तू ही रे....
1}एक तू ही तो दुआ थी,एक तू ही थी मंज़िल,
तुझसे शुरू मेरी राहें, मेरा हर पल तुझमे शामिल,
इतना बेसूध हुआ मैं, पाने को प्यार तेरा,
तेरी रज़ा तेरी कुरबत,बस इंतेज़ार है तेरा.
तू ही रे.....तू ही रे.....
.
जादू था तेरी नज़र मे, हुआ पागल मैं दीवाना,
तेरी मदहोश सी अदा ने, किया दिल को आशिकाना,
बंदिशों की है ना परवाह, ना…
Added by M Vijish kumar on June 10, 2016 at 4:00pm — 2 Comments
एक गुंचा ...
(२१२ x ३ )
क्यूँ हवा में ज़हर हो गया
हर शजर बेसमर हो गया !!१ !!
एक लम्हा राह में था खड़ा
याद में वो खंडर हो गया !!२!!
भर गया ज़ख्म कैसे भला
किस दुआ का असर हो गया !!३!!
आँख से जो गिरा टूट कर
दर्द वो एक सागर हो गया !!४!!
गुमशुदा था शहर आज तक
जल के वो इक खबर हो गया !!५!!
एक गुंचा क्या खिला बाग़ में
ख्वाब का वो एक घर हो गया !!६!!
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on June 10, 2016 at 2:55pm — 2 Comments
दोहो का उपकार
सदा सूफियाना गज़ल, गम को करके ध्वस्त.
शब्द अर्थ रस भाव से, ऊर्जा भरे समस्त.१
मंदिर की श्रद्धा लिये खड़ी दीप- जयमाल.
वरे नित्य सुख- शांति को, रखे प्रेम खुशहाल.२
मस्ज़िद का ताखा प्रखर, लिये धूप की गंध.
मेघ-मेह की भांति ही, जोड़े मृदु सम्बंध.३
पश्चिम का तारा उदय, हुआ ईद का चांद.
उन्तिस रोज़ो से डरा, छिपा शेर की मांद.४
रोज़ो से सहरी मिली, सांझ करे इफ्तार.
उन्तिस दिन…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 9, 2016 at 8:30pm — 12 Comments
कह के तो नहीं गया था,
-पर सामान रह गया था
समय का ऐसा सैलाब,
-वजूद भी बह गया था
क्या आए हो सोच कर,
-हर चेहरा कह गया था
बाद रोने के यों सोचा,
-घात कई सह गया था
गिरा, मंज़िल से पहले,
-निशाना लह गया था
पुरजोर कोशिश में थी हवा,
-मकां ढह गया था
तुम आए, खैरमकदम!
-वरक मेरा दह गया था?
मौलिक है, अप्रकाशित भी
सुधेन्दु ओझा
Added by SudhenduOjha on June 9, 2016 at 7:30pm — 7 Comments
बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22
कहाँ गए थे यूँ ही छोड़कर मुझे तनहा
बिना तुम्हारे मुझे ये जहां लगे तनहा
कभी-कभी तो बहुत काटता अकेलापन
मगर न भूल कि पैदा सभी हुये तनहा
तमाम उम्र जो बर्दाश्त है किया हमने
समझ वही सकता जो कभी जिये तनहा
मगर न फिर कभी वो बात रात आ पायी
है याद आज भी वो शाम जब मिले तनहा
बिखर ही…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 9, 2016 at 6:30pm — 10 Comments
चारो तरफ से पानी..पानी..पानी की आवाज सुनाई दे रही है | जिधर देखो उधर पानी के लिए लम्बी कतारें व पानी के लिए जूझते लोग, पानी ढोते टैंकर से ले कर ट्रेन तक दिखाई दे रहे हैं | हैण्डपम्प, कुँए सूख गए हैं और तालाब अब रहे नहीं, उस पर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए हैं | पानी के लिए चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है | देश का रीढ़ किसान आस भरी नजरों से आसमान की ओर देख रहा है | प्यास से घरती का कलेजा फट रहा है | विकाश के नाम पर वन प्रदेश खत्म होते जा रहे हैं, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई हो रही है क्यों की हम…
ContinueAdded by Meena Pathak on June 9, 2016 at 5:47pm — 4 Comments
2122 2122 2122 212
नाम को गर बेच कर व्यापार होना चाहिए
दोस्तों फिर तो हमें अखबार होना चाहिए
आपके भी नाम से अच्छी ग़ज़ल छप जायेगी
सरपरस्ती में बड़ा सालार होना चाहिए
सोचता हूँ मैं अदब का एक सफ़हा खोलकर
रोज़ ही यारो यही इतवार होना चाहिए
क्या कहेंगे शह्र के पाठक हमारे नाम पर
छोड़िये, बस सर्कुलेशन पार होना चाहिए
हम निकट के दूसरे से हर तरह से भिन्न हैं
आंकड़ो का क्या यही मेयार होना…
Added by Ravi Shukla on June 9, 2016 at 5:00pm — 25 Comments
आज मौक़ा पाते ही बाबूजी ने अपने बेटे को समझाते हुए कहा- "देखो छोटे, या तो तुम्हारी पत्नी और तुम हमारी परम्परा के अनुसार चलो, या फिर अपने रहने की कोई और व्यवस्था कर लो!"
"क्यों बाबूजी, आपको हमसे क्या परेशानी होने लगी है?" छोटे ने हैरान हो कर पूछा।
"बेटे, परेशानी मुझे उतनी नहीं, जितनी बड़े को और उसके परिवार को है! उसे बिलकुल पसंद नहीं है घर पर भी फूहड़ पहनावा, बाज़ार का जंक और फास्ट फूड वग़ैरह और तुम्हारी पत्नी की बोलचाल! बच्चों से भी बात-बात पर 'यार' कहना, तू और तेरी कहकर बात करना!…
Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 9, 2016 at 4:00pm — 16 Comments
१)
जन्नत से आगे इक जहान तेरा…
Added by M Vijish kumar on June 9, 2016 at 10:30am — 6 Comments
दर्द मेरी कविता में नहीं है ... दर्द मेरी कविता है।
दर्द के भाव में बहाव है, केवल बहाव, .. कोई तट नहीं है, कोई हाशिया नहीं है जो उसकी रुकावट बने।
पत्तों से बारिश की बूँदों को टपकते देख यह आलेख कुछ वैसे ही अचानक जन्मा जैसे मेरी प्रत्येक कविता का जन्म अचानक हुआ है। कोई खयाल, कोई भाव, कोई दर्द दिल को दहला देता है, और भीतर कहीं गहरे में कविता की पंक्तियाँ उतर आती हैं।
दर्द एक नहीं होता, और प्राय: अकेला नहीं आता। समय-असमय हम नए, “और” नए, दर्द झोली…
ContinueAdded by vijay nikore on June 9, 2016 at 9:49am — 3 Comments
22 22 22 22 22 22
बात सही है आज भी , यूँ तो है प्राचीन
जिसकी जितनी चाह है , वो उतना गमगीन
फर्क मुझे दिखता नहीं, हो सीता-लवलीन
खून सभी के लाल हैं औ आँसू नमकीन
क्या उनसे रिश्ता रखें, क्या हो उनसे बात
कहो हक़ीकत तो जिन्हें, लगती हो तौहीन
सर पर चढ़ बैठे सभी , पा कर सर पे हाथ
जो बिकते थे हाट में , दो पैसे के तीन
बीमारी आतंक की , रही सदा गंभीर
मगर विभीषण देश के , करें और…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on June 9, 2016 at 7:30am — 40 Comments
सड़क के मुख्य मार्ग से २१ कि.मी. कच्चे रास्ते पर धूल उड़ाती जीप चली जा रही थी। जीप में पीछे बैठे कर्मचारी ने मुझसे कहा साहब २ कि.मी. बाद सुनारिया गांव है, वहाँ का एक किसान पिछले ६-७ साल से नहीं मिल रहा है, जब देखो, तब झोपड़ी बंद मिलती है, आज मिल जाये, तो उसे निपटाना है,बहुत पुराना कर्ज बाकी है,मैंने कहा कितना बाकी है ? वो बोला बाकी तो ५००० है, पर ७-८ साल का बाकी है।
तभी जीप सुनारिया पहुँच गई , दो-तीन कर्मचारी तेजी से उतरे और झोपड़ी की तरफ लपके पर झोपड़ी बंद थी , दरवाजे…
ContinueAdded by Rajendra kumar dubey on June 8, 2016 at 8:00pm — 3 Comments
(१) दुर्मिल सवैया ....करुणाकर राम
करुणाकर राम प्रणाम तुम्हें, तुम दिव्य प्रभाकर के अरूणा.
अरुणाचल प्रज्ञ विदेह गुणी, शिव विष्णु सुरेश तुम्हीं वरुणा.
वरुणा क्षर - अक्षर प्राण लिये, चुनती शुभ कुम्भ अमी तरुणा.
तरुणा नद सिंधु मही दुखिया, प्रभु राम कृपालु करो करुणा.
(२) किरीट सवैया ...अनुप्राणित वृक्ष
कल्प अकल्प विकल्प कहे तरु, पल्लव एक विशेष सहायक.
तुष्ट करें वन-बाग नमी -जल विंदु समस्त विशेष…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 8, 2016 at 8:00pm — 8 Comments
Added by maharshi tripathi on June 8, 2016 at 2:06pm — 9 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 8, 2016 at 11:30am — 14 Comments
क्यों कोई आया है ,
जान लेते हो ,
चेहरा पढ़ लेते हो ,
अनकहा , सुन लेते हो ,
आंसू जो बहे ही नहीं ,
देख - सुन लेते हो।
********************
सपने उन्हें दिखाते हो ,
पूरे अपने करते हो।
********************
अपनी सब जरूरतें जानते हो ,
गरीब की रोटी भी जानते हो।
********************
जान कहाँ बसती है , जानते हो ,
उनकीं भी जान है , जानते हो।
********************
सरकार में हो ,
पर सरकार से ऊपर हो।…
Added by Dr. Vijai Shanker on June 8, 2016 at 11:30am — 7 Comments
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