टूटे पैमाने ....
२२ २२ २२ २
कुछ टूटे पैमाने हैं
कुछ रूठे दीवाने हैं
कुछ हैं सपनों में डूबे
कुछ खुद से अंजाने है
यादों के तहखानों में
बंद कई अफ़साने हैं
सोये शानों पर मेरे
टूटे ख़्वाब पुराने हैं
सहमे सहमे आँखों से
छलके दर्द दीवाने हैं
मुझको उसकी नज़रों से
बहते ज़ख्म चुराने हैं
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on June 4, 2016 at 6:40pm — 12 Comments
2212 2212 2212 2212
नखरे ततैय्ये से अजी इनको मिले भरपूर हैं
अपनी करें मन की खुदी खुद में बड़े मगरूर हैं
मतलब पड़े तारीफ़ करते हैं मगर सच बात ये
जोरू इन्हें मुर्गी, पड़ोसन सारी लगती हूर हैं
अंदाज इनके देख के गिरगिट भरें पानी यहाँ
पल में करेले नीम से पल में लगें अंगूर हैं
वादा करें ये तोड़ के देंगे फ़लक से चाँद को
माँगें अगर साड़ी कहें जानम दुकानें दूर हैं
गाते चुराकर गीत ये चोरी की…
ContinueAdded by rajesh kumari on June 4, 2016 at 5:19pm — 10 Comments
Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 4, 2016 at 4:22pm — 1 Comment
एक बड़े ही अनुकूल सर्व सुविधा युक्त घूरे पर बर्षों से घरेलू मक्खियों की पीढ़ियां मजे से जिंदगी बसर कर रही थीं। ऐसे में ना जाने कौन साफ तबियत वाले ने नगर पालिका को घूरा हटाने का आवेदन दे मारा । इसकी खबर जैसे ही मख्खियों को लगी, उनमें खलबली मच गई । उन्हें इतना व्यथित देख,एक बूढ़ी सियानी मक्खी ने सांत्वना दी ।
"अरे इतना क्यूं घबरा रही हो? इतिहास गवाह है, आजतक हमें कोई नहीं मिटा पाया । "
"लेकिन दादी मख्खी! अगर नगर पालिका वाले सचमुच आ गये तो,हम बच्चों को लेकर कहाँ जायेंगे? "
"कहीं…
Added by Rahila on June 4, 2016 at 7:00am — 13 Comments
Added by डॉ पवन मिश्र on June 4, 2016 at 5:30am — 10 Comments
बहर - 222 221 221 22
माला के मोती बिखर जा रहे हैं
सब एक एक कर अपने घर जा रहे हैं
कर आँखें नम छोड़कर यूँ अकेला
देकर इतनें गम किधर जा रहे हैं
ढूंढेगें फ़िर भी नही अब मिलेंगे
हमसा कोई भी जिधर जा रहे हैं
देखो पूरी हो गयी है पढ़ाई
ले बिस्तर वापस शहर जा रहे हैं
भगवन मेरे यार रखना सलामत
साथी मेरे जिस डगर जा रहे हैं
.
मौलिक व अप्रकाशित
(बी.टेक पूरा होने पर अपने मित्रों के जाने पर लिखी गज़ल )
Added by maharshi tripathi on June 3, 2016 at 11:30pm — 4 Comments
दिल-ऐ-बिस्मिल में ...
कुछ भी तो नहीं बदला
नसीम-ऐ-सहर
आज भी मेरे अहसासों को
कुरेद जाती है
मेरी पलकों पे
तेरी नमनाक नज़रों की
नमी छोड़ जाती है
कहाँ बदलता है कुछ
किसी के जाने से
बस दर्द मिलता है
गुजरे हुए लम्हात के मरकदों पे
यादों के चराग़ जलाने में
और लगता है वक्त
लम्हा लम्हा मिली
अनगिनित खराशों को
जिस्म-ओ-ज़हन से मिटाने में
अपनी ज़फा से तुमने
वफ़ा के पैरहन को
तार तार कर दिया…
Added by Sushil Sarna on June 3, 2016 at 9:00pm — 8 Comments
ग़ज़ल ( आँखों से निकलते हैं )
१२२२ -१२२२ -१२२२ -१२२२
तड़प कर जो गमे जाने जहाँ दिल में पिघलते हैं ।
वही तो अश्क बन कर मेरी आँखों से निकलते हैं ।
क़यादत पर मेरी यह सोच के उंगली उठाना तुम
मेरे पीछे ही अपनों की तरह अग्यार चलते हैं ।
अगर देना नहीं था साथ तो पहले बता देते
अचानक कबले मंज़िल किस लिए रस्ता बदलते हैं ।
मुहब्बत करने वालों को है कब परवाह दुनिया की
जहाँ भी शमआ जलती है वहां परवाने जलते हैं…
ContinueAdded by Tasdiq Ahmed Khan on June 3, 2016 at 7:58pm — 6 Comments
"अबे तू मुंह बन्द करके बैठेगा, देखता नहीं बड़े लोग आपस में बात कर रहे हैं"
थानेदार ने घुड़की पिलाई और पत्रकार मित्र की ओर खींसे निपोरी। बेचारा शंकरा और सिमट गया, मुलिया ने बारह वर्षीया चुन्नी के पैरों पर का कपड़ा ठीक किया और बड़बड़ाने लगी दिमाग ठिकाने नहीं था उसका जब से बेटी की ऐसी हालत देखी थी चारों तरफ लाल ही रंग दिख रहा था उसे। पत्रकार महोदय ने कहा:
"ये तो और भी अच्छा है कि शंकरा नेता जी के घर के पास वाली झुग्गियों में रहता है नहीं तो चैनल…
ContinueAdded by Abha Chandra on June 3, 2016 at 4:00pm — 24 Comments
सुबह सुबह सिंह साहब का ड्राईवर कल्याण ,शर्मा जी के घर आया I
“सर, आप नगरपालिका में हैं ना , जानवर उठाने वाली गाड़ी के लिए फोन कर दीजिये मेहरबानी करके” I
“क्या हुआ “?
“वो सीज़र” कल्याण का गला भर आया “आज सुबह चल बसा “I
सीज़र सिंह साहब का एल्सेशियन कुत्ता था I सिंह साहब रोज़ उसे घुमाने ले जाते थे और उसी दौरान शर्मा जी की उनसे थोड़ी बहुत जान पहचान हो गई थी I आधे घंटे के प्रातः भ्रमण में , सिंह साहब के पास बातों का विषय, ज़्यादातर सीज़र ही होता था I कभी कभी शर्मा जी को…
ContinueAdded by pratibha pande on June 3, 2016 at 12:30pm — 30 Comments
2122 2122 2122
जब हवायें चल रहीं हैं क्यों घुटन है
सूर्य है उजला तो क्यों काला गगन है
कल बहुत उछला था अपनी जीत पर जो
आज क्यों हारा हुआ बोझिल सा मन है
चिन्ह घावों का नहीं है पीठ पर अब
पर हृदय में आज भी जीती चुभन है
मन ललक कर आँखों को उकसा रहा था
कह रहा संसार पर दोषी नयन है
सत्य तर्कों में समाया है भला कब ?
तर्क झूठों को बचाने का जतन है
क्या हृदय-मन, सोच जीती है कहीं…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on June 3, 2016 at 8:54am — 12 Comments
Added by Samar kabeer on June 3, 2016 at 12:00am — 20 Comments
इस्लाह के लिए विशेषकर काफ़िए को लेकर मन में शंकायें हैं
2122 2122 2122 212
है ग़मों की इन्तहां अब आजमा लें दर्द को
बात पहले प्यार से फिर भी नहीं जो मानता
गेंद की तरहा हवा में फिर उछालें दर्द को
गर ग़मों की चाहतें हैं ज़िन्दगी भर साथ की
हमसफ़र अपना बना उर में छुपा लें दर्द को
नफरतों के राज में क्या रीत…
ContinueAdded by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 2, 2016 at 8:36pm — 12 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 2, 2016 at 8:00pm — 4 Comments
खुशियों में , गम के साये में
जीना सीखना होगा
प्यार में , नफरत के साये में
संभल कर खुद को ही चलना होगा
इज़हार ख़ुशी का न गम की नुमाईश
एक साथ दोनों को पीना होगा
भ्रम बनकर सतायेंगी गर यह
इस चक्र से निकल कर आगे बढ़ना होगा
जीवन को समझकर बढ़ना होगा
सोच कर हर कदम रखना होगा |
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 2, 2016 at 5:30pm — 3 Comments
दिल-ऐ-बिस्मिल में ...
कुछ भी तो नहीं बदला
नसीम-ऐ-सहर
आज भी मेरे अहसासों को
कुरेद जाती है
मेरी पलकों पे
तेरी नमनाक नज़रों की
नमी छोड़ जाती है
कहाँ बदलता है कुछ
किसी के जाने से
बस दर्द मिलता है
गुजरे हुए लम्हात की मरकदों पे
यादों के चराग़ जलाने में
और लगता है वक्त
लम्हा लम्हा मिली
अनगिनित खराशों को
ज़िस्म-ऐ-ज़हन से मिटाने में
अपनी ज़फा से तुमने
वफ़ा के पैरहन को
तार तार कर दिया
आरज़ू के हर अब्र…
Added by Sushil Sarna on June 2, 2016 at 1:55pm — 6 Comments
Added by आशीष यादव on June 2, 2016 at 11:21am — 6 Comments
क़ुरैशी साहब की रचनाएँ संभाग से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं थीं, लेकिन दूसरे साथी लेखकों की प्रकाशित रचनाओं, संग्रहों और उनको मिलने वाले छोटे-बड़े सम्मानों से वे बहुत विचलित रहा करते थे। प्रकाशन की भूख उन्हें बहुत सताया करती थी, पर क्या करें न तो आर्थिक स्थिति अच्छी थी और न ही कोई सहारा। बहुत से सम्पादकों से मधुर संबंध होने के बावजूद जब कभी उनकी रचनाएँ अस्वीकृत हो जातीं, तो उनकी नींद हराम हो जाती थी। इस बार तो एक पत्रिका के संपादक…
ContinueAdded by Sheikh Shahzad Usmani on June 2, 2016 at 6:00am — 16 Comments
बहर -1222 1222 1212 2222
सदा ही ख्वाब में आऊ सदा जगाऊ मैं तुमको
खुले जब आँख लूँ जब नाम पास पाऊ मैं तुमको
तेरी जब गोद में रखकर के सर गजल मैं पढता था
मेरा अरमान है इक बार फिर सुनाऊ मैं तुमको
गये जब से अकेला छोड़ हम तभी से रोते हैं
नहीं हसरत मेरी रोऊँ नहीं रुलाऊ मैं तुमको
भटकता दर-ब-दर हूँ फिर रहा कहाँ हो बोलो ना
सहा क्या क्या गवायाँ क्या मिलो गिनाऊ मैं तुमको
सहा जाता न अब हमसे विरह भरा मेरा जीवन
मेरी बाहें खुली आओ गले लगाऊ मैं…
Added by maharshi tripathi on June 1, 2016 at 11:10pm — No Comments
(22 22 22)
छोटी छोटी बातें
छोटी छोटी रातें
.
छोटे छोटे लम्हे
जीवन की सौगातें
.
भीगा भीगा मौसम
गुन गुन करती रातें
.
दिल में आग लगायें
रिमझिम सी बरसातें
.
तेरे मेरे सपने
दिल से दिल की बातें
.
आंसू आंसू शिकवा
आंसू आंसू बातें
.
याद रही खामोशी
भूले न मुलाकातें
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on June 1, 2016 at 1:30pm — 4 Comments
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