कलाधर छंद............धन्यवाद ज्ञापन
(१)
धन्यवाद ज्ञाप आज आपका विशेष श्लेष वंदना करूं यथा प्रणाम राम-राम है.
दूर - दूर से यहां पधार के पवित्रता सुमित्रता दिया हमें अवाम राम-राम है.
शब्द भाव भक्ति ज्ञान दे रहे सुवृत्ति मान सत्य सूर्य-चंद्र मस्त श्याम राम-राम है.
आपके सुयोग से रचे गये सुपंथ मंत्र भव्य का प्रणाम ब्रह्म- धाम राम-राम है.
(२)
धन्य-धन्य भाग्य है कि धन्य है सुभारती कि धन्य स्थान काल दिव्य आरती…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 27, 2016 at 9:00am — 8 Comments
अपनी क़बा में .....
अहसासों की कभी
हदें नहीं होती
नफ़स और नफ़स के दरमियाँ
ये ज़िंदा रहते हैं
ये तुम्हारा वहम है कि
तुम मुझसे दूर हो
तुम जहां भी हो
मेरी साँसों की हद में हो
तुम कस्तूरी से
मेरी रूह में बसे हो
हर शब मैं तुम्हारी महक से लिपट
परिंदा बन जाती हूँ
तुम से मिलने की
इक अज़ीब सी ज़िद कर जाती हूँ
बंद पलकों में
तुम्हारे ख़्वाबों की दस्तक से
रूह जिस्मानी क़बा से
बाहर आ…
Added by Sushil Sarna on May 26, 2016 at 8:14pm — 2 Comments
ब्रेकिंग समाचार
भैंस ने दूधिये कों मारी लात
दूध देने से किया इनकार
भ्रस्टाचार अब सहन नही
भैंस संघ का पलट वार
भैंस बोली सुनो ओ दूधिये
भ्रष्टाचार से तेरा गहरा नाता
देती मैं तुझको दूध खालिस
तू जी भर उसमे पानी मिलाता
चकित दूधिया पलट कर बोला
ये तों मेरा जन्म सिद्ध अधिकार
जानो वंशागत तेरी मेरी गति
सुन दूध देना तेरा है संस्कार
खालिस दूध कोई हजम न कर पाए
पी भी गया तों शीघ्र डाक्टर बुलवाए
दूधिया बोला सुन तू काली…
Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 26, 2016 at 12:00pm — 2 Comments
कभी यूं भी हुआ ,
मैं हारा ,
कोई गम नहीं।
हौसला कितनों का टूटा ,
किसी ने गिना नहीं।
--------
लोग दंग थे ,
जो जीता ,
उसे भी ,
कुछ मिला नहीं ।
--------
मैं हार कर भी खुश था ,
कुछ गया नहीं।
वो जीत कर भी ,
रोया , हाय , कुछ ,
कुछ भी , मिला नहीं।
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Dr. Vijai Shanker on May 26, 2016 at 11:00am — 6 Comments
1222-1222-1222-1222
ग़ज़ल
बदलना भी ज़रूरी है सदा अच्छा नही रहता
खुदा से प्यार करते हो तो फिर पर्दा नही रहता
हमारे सामने देखो बना अफसर से वो माली
दिनों का फेर है साहिब सदा पैसा नहीं रहता
बने गद्दारहै जो घूमें करें हैं देश से धोखा
उन्हें फिर मौत मिलती है निशां उनका नहीं रहता
जमीं तिड्की हलक प्यासे तडपते है परिंदे भी
लगाये पेड़ जो होते तो फिर सूखा नही रहता
ये नफरत की हैं दीवारें इन्हें तुम तोड़ दो वरना…
Added by munish tanha on May 26, 2016 at 9:30am — 3 Comments
Added by shree suneel on May 26, 2016 at 12:32am — 6 Comments
Added by Shyam Narain Verma on May 25, 2016 at 5:21pm — 4 Comments
कितनी बंदिशें ज़िन्दगी में,
कितनी रुकावटें,
दिल नाशाद
दिमाग में रंजिशें।
बेपरवाह होके जीना,
इक गुनाह
घुट घुट के जीना,
इक सज़ा
न यह सही है न यह ग़लत
तिसपर भी ज़िन्दगी के हैं उसूल
औ नियम ,...... अनगिनत।
चाहा तो बहुत था
सब रहे सलामत
पर कब, कैसे बिगड़ गया,
याद भी नहीं रह गया
अब ये आलम है कि..... क्या है ,
क्या नहीं ,
पड़ता कहीं कोई फ़र्क़ नहीं।
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Usha on May 25, 2016 at 5:01pm — 10 Comments
उदास चेहरा ...
तुम आये
और मैं तुम्हें
बंद पलकों से
निहारती रही
तुम्हारी हर आहट को
मैं अपने अंदर समेटती रही
वो चुप सा
तुम्हारा उदास चेहरा
मेरी मजबूरी को कचोटता रहा
तुम्हारे हाथों के गुलाब की
इक इक पंखुड़ी
अश्कों में भीगी
मुझपर गिरती रही
मैं तुम्हारे अश्कों की आतिश में
इक शमा सी पिघलती रही
तुम ज़मीं तक
मुझपर झुकते चले गए
बेबस पुकार मुझसे टकराकर
कहीं खला में खो गयी
तुम मेरी लहद में
आ…
Added by Sushil Sarna on May 25, 2016 at 1:49pm — 12 Comments
Added by डॉ पवन मिश्र on May 25, 2016 at 12:12am — 11 Comments
अरकान - 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2
पैसों का व्यापार हमारी दिल्ली में|
गुंडों की सरकार हमारी दिल्ली में|
साँप–सपोले जब से संसद जा पहुंचे ,
ज़हरों का व्यापार हमारी दिल्ली में|
लूट रहे है अस्मत मिलकर सब देखो,
हैं भारत माँ लाचार हमारी दिल्ली में|
जाति-धरम के नाम पे मिलती नौकरियाँ
हम जैसे बेकार हमारी दिल्ली में |
लालकिला, जंतर-मंतर सब रोते हैं,
अब गुल ना गुलज़ार हमारी दिल्ली…
ContinueAdded by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on May 24, 2016 at 6:00pm — 7 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 24, 2016 at 2:30pm — 10 Comments
तुफानों से लड़ कर ,चूर - चूर हो जिंदा थी
बेकल ,चंचल, निर्जन ,निष्प्राण वो बिंदा थी
किसके लिये अखिल व्योम से मोती चुराये
आई थी मधु छाया आस मधुमास लिये
लहरों पर चलने वाली अहम से हारी थी
साहिल की निठुरता बेबस से टकराई थी
अंतर्मन में सुलगती , भटकती भ्रान्त- सी
औचित्यहीन कामनायें ज्वलित कान्त - सी
हरियाली छाहों तले स्पंदित वो जिंदा थी
इतराई सागर पर बौराई विस्मित वो बिंदा…
ContinueAdded by kanta roy on May 24, 2016 at 11:22am — 6 Comments
Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 24, 2016 at 7:56am — 6 Comments
चलो तलाशें
तुम्हारे मेरे बीच की
गुम हो गई धूप
कितनी कुनमुनी खिली खिली
और बातून थी वो
बोलती रहती थी
या कहूँ कि बस
वो ही बोलती थी
किसी भी सूरज की
नहीं थी मोहताज़
पसरी पड़ी रहती थी
हमारे बीच वो डीठ
जिद्दी इतनी कि
हर जगह चलती थी साथ
कभी आँखों में चढ़कर
तो कभी गालों पर
बारिश कोहरे को चीर
चमकती थी बेख़ौफ़
सर्द ठण्ड में गर्म बिछौना
और गर्मी…
ContinueAdded by pratibha pande on May 23, 2016 at 7:30pm — 10 Comments
2122-2122-212
ग़ज़ल
इस तरह सब पे इनायत कीजिए
बोल कर मीठा इबादत कीजिए
यूँ न दुनिया से बगावत कीजिए
दिल मिला सब से मुहब्बत कीजिए
चाँद छत पे आ गया तुम को नज़र
पेश अपनी अब शराफत कीजिए
नफरतें सारी ये मिटटी में मिलें
प्यार को ऐसी इमारत कीजिए
बोल भारत की जमीं तुमसे रही
माँ समझ कर कुछ तो इज्जत कीजिए
मुनीश “तन्हा” नादौन 9882892447 (मौलिक…
ContinueAdded by munish tanha on May 23, 2016 at 7:17pm — 4 Comments
शहर के इस जाम में
पत्नी को बाइक पे टांग के
मैं जा रहा था काम से
तभी अचानक एक विक्रेता
बोला सीना तान के
छांट बीनकर माल खरीदो
बेंचू मैं कम दाम में
मैंने बोला भीड़ बहुत है
फिर आऊंगा आराम से
बोला दीदी कितनी सुंदर
उनके कुछ अरमान रे
तुम तो भइया बहुत काइयां
लगते कुछ शैतान रे
पहले बोलो क्यूं हो खोले
शॉप बीच मैदान में
हंसकर बोला खाकी वर्दी
साथ निभाए शान से
गाउन, मैक्सी,पर्स खरीदो
करते क्यूं परेशान रे
तभी…
Added by NEERAJ KHARE on May 23, 2016 at 3:30pm — 5 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 23, 2016 at 1:22pm — 2 Comments
सज़दे में सर झुकता है मेरा
राह चलते जहाँभी दरगाह मिली
तुम्हारे मन भी तो इज़्ज़त है
मेरे शंकर और मेरे राम की
जब उर्स होता है तो मैं भी
आती हूँ चादर चढ़ाने को
दशहरे में तुम भी जाते हो
रावण जलाने को
हमें कहाँ हर वक्त याद रहता है
मज़हब अपना
हाँ सियासत नहीं भूलती
मैं हिन्दू तू मुसलमान है
अब ये अलग बात है कि
मैं अगर इज़्ज़त हूँ
अपने भारत की
तो तू भी
हिन्द का सम्मान है ।
तनूजा उप्रेती
मौलिक व अप्रकाशित
Added by Tanuja Upreti on May 23, 2016 at 1:10pm — 2 Comments
मैले-कुचले कपड़ो में सड़के के किनारे प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी,उसे तो समझ में भी नहीं आ रहा था कि उसके शरीर में परिर्वतन क्यों आया, क्यों हो रही है ये पीड़ा उसे,क्यों बढ़ा है उसके उदर आकार, मगर प्रकृति ने जो मानव जीवन के नियम बना दिये जो क्रिया बना दिया वह होगा जाने या अंजाने, अमीर या गरीब, मानसिक परिपक्त या अर्ध विक्षिप्त , तभी एक जीव उसके शरीर से बाहर आया एक उसी के तरह के उस छोटे जीव को देख कर आश्चर्य चकित रह गयी। उसे क्या पता था कि समाज में कुछ ऐसे…
ContinueAdded by Akhand Gahmari on May 22, 2016 at 9:41pm — 2 Comments
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