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वंदना- दुर्मिल सवैया

तव भक्त पुकार रहा कब से,

अब आय प्रभो! कर शीश धरो।

मन में अँधियार घना बढ़ता,

तम-बंधन काट प्रकाश भरो।।

बस एक सहाय प्रभो! तुम ही,

दुविधा-दुख-संकट धाय हरो।

मम डूब रही नइया मग में,

भवसागर से प्रभु! पार करो।।1।।



मधुसूदन! द्वार परा कब से,

निज दर्शन दे उपकार करो।

तुम दीनन के दुख तारन हो,

दुविधा-दुख मोर अपार हरो।

प्रभु! ज्ञानद-प्रेमद-पुंज तुम्हीं,

उर ज्ञान-प्रभा-चिर-प्रेम भरो।

कमलापति हे! कमला सँग ले,

मन-मन्दिर मोहि सदा… Continue

Added by रामबली गुप्ता on May 27, 2016 at 3:00pm — 5 Comments

कलाधर छंद.....धन्यवाद ज्ञापन

कलाधर छंद............धन्यवाद ज्ञापन

(१)

 

धन्यवाद ज्ञाप  आज आपका विशेष  श्लेष वंदना करूं  यथा प्रणाम राम-राम है.

दूर - दूर से  यहां   पधार के  पवित्रता   सुमित्रता दिया  हमें  अवाम राम-राम है.

शब्द भाव भक्ति ज्ञान दे रहे सुवृत्ति मान सत्य सूर्य-चंद्र मस्त श्याम राम-राम है.

आपके सुयोग से   रचे गये सुपंथ मंत्र   भव्य का प्रणाम   ब्रह्म- धाम राम-राम है.

 

(२)

धन्य-धन्य भाग्य है कि धन्य है सुभारती कि धन्य स्थान काल दिव्य आरती…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 27, 2016 at 9:00am — 8 Comments

अपनी क़बा में .....

अपनी क़बा में .....

अहसासों की कभी

हदें नहीं होती

नफ़स और नफ़स के दरमियाँ

ये ज़िंदा रहते हैं

ये तुम्हारा वहम है कि

तुम मुझसे दूर हो

तुम जहां भी हो

मेरी साँसों की हद में हो

तुम कस्तूरी से

मेरी रूह में बसे हो

हर शब मैं तुम्हारी महक से लिपट

परिंदा बन जाती हूँ

तुम से मिलने की

इक अज़ीब सी ज़िद कर जाती हूँ

बंद पलकों में

तुम्हारे ख़्वाबों की दस्तक से

रूह जिस्मानी क़बा से

बाहर आ…

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Added by Sushil Sarna on May 26, 2016 at 8:14pm — 2 Comments

भैंस का शाप - (हास्य कविता )

ब्रेकिंग समाचार

भैंस ने दूधिये कों मारी लात

दूध देने से किया इनकार

भ्रस्टाचार अब सहन नही

भैंस संघ का पलट वार

भैंस बोली सुनो ओ दूधिये

भ्रष्टाचार से तेरा गहरा नाता

देती मैं तुझको दूध खालिस

तू जी भर उसमे पानी मिलाता

चकित दूधिया पलट कर बोला

ये तों मेरा जन्म सिद्ध अधिकार

जानो वंशागत तेरी मेरी गति

सुन दूध देना तेरा है संस्कार

खालिस दूध कोई हजम न कर पाए

पी भी गया तों शीघ्र डाक्टर बुलवाए

दूधिया बोला सुन तू काली…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 26, 2016 at 12:00pm — 2 Comments

संघर्ष - डॉo विजय शंकर

कभी यूं भी हुआ ,
मैं हारा ,
कोई गम नहीं।
हौसला कितनों का टूटा ,
किसी ने गिना नहीं।
--------
लोग दंग थे ,
जो जीता ,
उसे भी ,
कुछ मिला नहीं ।
--------
मैं हार कर भी खुश था ,
कुछ गया नहीं।
वो जीत कर भी ,
रोया , हाय , कुछ ,
कुछ भी , मिला नहीं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on May 26, 2016 at 11:00am — 6 Comments

ग़ज़ल - बदलना भी ज़रूरी है सदा अच्छा नही रहता

1222-1222-1222-1222

ग़ज़ल

बदलना भी ज़रूरी है सदा अच्छा नही रहता

खुदा से प्यार करते हो तो फिर पर्दा नही रहता

हमारे सामने देखो बना अफसर से वो माली

दिनों का फेर है साहिब सदा पैसा नहीं रहता

बने गद्दारहै जो घूमें करें हैं देश से धोखा

उन्हें फिर मौत मिलती है निशां उनका नहीं रहता

जमीं तिड्की हलक प्यासे तडपते है परिंदे भी

लगाये पेड़ जो होते तो फिर सूखा नही रहता

ये नफरत की हैं दीवारें इन्हें तुम तोड़ दो वरना…

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Added by munish tanha on May 26, 2016 at 9:30am — 3 Comments

ग़ज़ल :शिकस्ता दिल है...

1222×4



शिकस्ता दिल है, रंजोग़म से ये क्योंकर उबर जाए

जज़ा ये है अब आँखों में ज़रा ख़ूँ भी उतर जाए.



हम एेसे सच्चे दिल का हैं ख़तावार आज ऐ यारो

कि चलने भी न संगे राह दे, तल्वीम कर जाए.



कहाँ कुछ बदले हैं हालात मेरे चंद सालों में

लकीरे दस्त पे कोई मेरे भीतर विफर जाए.



कदम इन कुर्सियों पे बैठ कर बस धुन हीं लेता हूँ

ये पा ए पीर क्या निकले भी घर से और घर जाए.



बहुत दिन एक से हालात में गुज़री ह़यात,अब तो

कोई लम्हा तसल्ली… Continue

Added by shree suneel on May 26, 2016 at 12:32am — 6 Comments

देश को आगे बढ़ाओ नौजवानों बढ़ चलो तुम |

२१२२       २१२२     २१२२         २१२२
देश को आगे बढ़ाओ  नौजवानों बढ़   चलो तुम   |
सो रहे जो आलसी बन…
Continue

Added by Shyam Narain Verma on May 25, 2016 at 5:21pm — 4 Comments

शिकवा - डॉ उषा साहनी

कितनी बंदिशें ज़िन्दगी में,
कितनी रुकावटें,
दिल नाशाद
दिमाग में रंजिशें।
बेपरवाह होके जीना,
इक गुनाह
घुट घुट के जीना,
इक सज़ा
न यह सही है न यह ग़लत
तिसपर भी ज़िन्दगी के हैं उसूल
औ नियम ,...... अनगिनत।
चाहा तो बहुत था
सब रहे सलामत
पर कब, कैसे बिगड़ गया,
याद भी नहीं रह गया
अब ये आलम है कि..... क्या है ,
क्या नहीं ,
पड़ता कहीं कोई फ़र्क़ नहीं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha on May 25, 2016 at 5:01pm — 10 Comments

उदास चेहरा ...

उदास चेहरा ...

तुम आये

और मैं तुम्हें

बंद पलकों से

निहारती रही

तुम्हारी हर आहट को

मैं अपने अंदर समेटती रही

वो चुप सा

तुम्हारा उदास चेहरा

मेरी मजबूरी को कचोटता रहा

तुम्हारे हाथों के गुलाब की

इक इक पंखुड़ी

अश्कों में भीगी

मुझपर गिरती रही

मैं तुम्हारे अश्कों की आतिश में

इक शमा सी पिघलती रही

तुम ज़मीं तक

मुझपर झुकते चले गए

बेबस पुकार मुझसे टकराकर

कहीं खला में खो गयी

तुम मेरी लहद में

आ…

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Added by Sushil Sarna on May 25, 2016 at 1:49pm — 12 Comments

भुजंगप्रयात छन्द

भुजंगप्रयात छन्द

दिलों में सदा प्रेम ही हो हमारे।
डिगे ना कभी पाँव देखो तुम्हारे।।
भले सामने हो घना सा अँधेरा।
निराशा न थामो मिलेगा सवेरा।१।

हमेशा चलो सत्य की राह पे ही।।
जलाओ दिए नेह के नेह से ही।।
चलो आज सौगन्ध लेके कहेंगे।
सदा दूसरों की भलाई करेंगे।२।

✍ डॉ पवन मिश्र

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by डॉ पवन मिश्र on May 25, 2016 at 12:12am — 11 Comments

हमारी दिल्ली में- बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

अरकान - 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2

 

पैसों का व्यापार हमारी दिल्ली में|   

गुंडों की सरकार हमारी दिल्ली में|

 

साँप–सपोले जब से संसद जा पहुंचे ,

ज़हरों का व्यापार हमारी दिल्ली में|

 

लूट रहे है अस्मत मिलकर सब देखो,

हैं भारत माँ लाचार हमारी दिल्ली में|

 

जाति-धरम के नाम पे मिलती नौकरियाँ

हम जैसे बेकार हमारी दिल्ली में |

 

लालकिला, जंतर-मंतर सब रोते हैं,

अब गुल ना गुलज़ार हमारी दिल्ली…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on May 24, 2016 at 6:00pm — 7 Comments

ग़रीबों की विरासत (लघुकथा) शेख़ शहज़ाद उस्मानी

नई सदी, विरासत और सत्ता के बीच कुछ मुद्दों पर बहस छिड़ गई थी। सत्ता विरासत से संतुष्ट और प्रसन्न थी, उसे विरासत में ही अपना भविष्य नज़र आ रहा था। नई सदी विरासत को बोझ समझ कर उसे समस्याओं का जनक मान रही थी। विरासत अपनी प्रासंगिकता और महत्व की पुष्टि कर रही थी।



"केवल विज्ञान की विरासत सदैव मेरे लिए सार्थक और लाभदायक रही है, बाक़ी सभी ने ढेर सारी समस्याएँ और दुविधायें हम पर थोपीं हैं। एक ही लकीर पीटते रहने से मौलिक नवीन सृजन बाधित हुआ है। लोग आलसी, निकम्मे पराधीन और आश्रित हो रहे हैं… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 24, 2016 at 2:30pm — 10 Comments

विस्मित वो बिंदा थी / कविता

तुफानों से लड़ कर ,चूर - चूर हो जिंदा थी

बेकल ,चंचल, निर्जन ,निष्प्राण वो बिंदा थी

किसके लिये अखिल व्योम से मोती चुराये

आई थी मधु छाया आस मधुमास लिये

लहरों पर चलने वाली अहम से हारी थी

साहिल की निठुरता बेबस से टकराई थी

अंतर्मन में सुलगती , भटकती भ्रान्त- सी

औचित्यहीन कामनायें ज्वलित कान्त - सी

हरियाली छाहों तले स्पंदित वो जिंदा थी

इतराई सागर पर बौराई विस्मित वो बिंदा…

Continue

Added by kanta roy on May 24, 2016 at 11:22am — 6 Comments

राहें (सुरेश कुमार ' कल्याण ')

कंटीली राहों से
सीखा है जीना मैंने,
रात की गहराईयों से
सीखा है पीना मैंने।
बात करता हूं मैं
गुजरे वक्त की,
पत्थरों के पथ पर
पाया है नगीना मैंने।
पत्थरों से टकराकर
पत्थरों पे सिर झुकाया है मैंने।
अपनी विनम्रता की आंच से
पत्थरों को पिघलाया है मैंने।
वो हीरे मिले हों
या वो लोहा था,
सागर की लहरों के बीच
मोतियों को पाया है मैंने।

मौलिक व अप्रकाशित
सुरेश कुमार ' कल्याण '

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 24, 2016 at 7:56am — 6 Comments

वो धूप [ अतुकांत ]

चलो तलाशें 

तुम्हारे मेरे बीच की 

गुम हो गई धूप

कितनी कुनमुनी खिली खिली 

और बातून थी वो 

बोलती रहती थी 

या कहूँ कि बस 

वो ही बोलती थी 

किसी भी सूरज की 

नहीं  थी मोहताज़  

पसरी पड़ी रहती थी 

हमारे बीच  वो  डीठ   

जिद्दी इतनी कि

हर जगह चलती थी साथ 

कभी आँखों में चढ़कर 

तो कभी गालों पर 

बारिश कोहरे को चीर 

चमकती थी बेख़ौफ़ 

सर्द ठण्ड में गर्म बिछौना

और गर्मी…

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Added by pratibha pande on May 23, 2016 at 7:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल

2122-2122-212

                 ग़ज़ल   

इस तरह सब पे इनायत कीजिए

बोल कर मीठा इबादत कीजिए    

 

यूँ न दुनिया से बगावत कीजिए

दिल मिला सब से मुहब्बत कीजिए

 

चाँद छत पे आ गया तुम को नज़र

पेश अपनी अब शराफत कीजिए

 

नफरतें सारी ये मिटटी में मिलें

प्यार को ऐसी इमारत कीजिए

 

बोल भारत की जमीं तुमसे रही

माँ समझ कर कुछ तो इज्जत कीजिए 

मुनीश “तन्हा” नादौन 9882892447  (मौलिक…

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Added by munish tanha on May 23, 2016 at 7:17pm — 4 Comments

जाम रे (व्यंग कविता)

शहर के इस जाम में

पत्नी को बाइक पे टांग के

मैं जा रहा था काम से

तभी अचानक एक विक्रेता

बोला सीना तान के

छांट बीनकर माल खरीदो

बेंचू मैं कम दाम में

मैंने बोला भीड़ बहुत है

फिर आऊंगा आराम से

बोला दीदी कितनी सुंदर

उनके कुछ अरमान रे

तुम तो भइया बहुत काइयां

लगते कुछ शैतान रे

पहले बोलो क्यूं हो खोले

शॉप बीच मैदान में

हंसकर बोला खाकी वर्दी

साथ निभाए शान से

गाउन, मैक्सी,पर्स खरीदो

करते क्यूं परेशान रे

तभी…

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Added by NEERAJ KHARE on May 23, 2016 at 3:30pm — 5 Comments

नालायकी (लघुकथा)

"अब मुँह लटकाये क्यों बैठी हो? पहले ही कहा था कि हवा में न उड़ो, न उड़वाओ बेटे को!"



"........."



"कुछ कह रहा हूँ, सुना कि नहीं? कितना समझाया था कि ज़्यादा लाड़-दुलार ठीक नहीं। फ़रमाईशें पूरी करके उसे बिगाड़ो नहीं! झूठी तारीफ़ें कर उसे हवा में उड़ना मत सिखाओ! मान का ताप ऐसे नहीं बढ़ाओ, पसीने छूट जाएंगे! मान झूठी शान से नहीं मिलता, अच्छे काम से मिलता है समझीं। फैशन परस्ती, आडम्बर से नहीं!"



पति देव चिल्लाये जा रहे थे, पत्नी सिर झुकाये सुनती जा रही… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 23, 2016 at 1:22pm — 2 Comments

हमें कहाँ हर वक्त याद रहता है मज़हब अपना

सज़दे में सर झुकता है मेरा
राह चलते जहाँभी दरगाह मिली
तुम्हारे मन भी तो इज़्ज़त है
मेरे शंकर और मेरे राम की
जब उर्स होता है तो मैं भी
आती हूँ चादर चढ़ाने को
दशहरे में तुम भी जाते हो
रावण जलाने को
हमें कहाँ हर वक्त याद रहता है
मज़हब अपना
हाँ सियासत नहीं भूलती
मैं हिन्दू तू मुसलमान है
अब ये अलग बात है कि
मैं अगर इज़्ज़त हूँ
अपने भारत की
तो तू भी 
हिन्द का सम्मान है ।
तनूजा उप्रेती

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Tanuja Upreti on May 23, 2016 at 1:10pm — 2 Comments

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