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दुर्मिल सवैया

दुर्मिल सवैया.

 

 

बदली - बदली मुख फेर लिया जब सूरज लालमलाल हुआ,

वन शुष्क हुआ हर एक हरा सच शुष्क भरा हर ताल हुआ,

तन शुष्क हुआ मन शुष्क हुआ हर ओर भयंकर हाल हुआ,

जब घाम बढ़ा तब सत्य कहूँ यह हाल बड़ा विकराल हुआ ||

 

 

तन ताप लिए तन आग लिए सब व्याकुल हैं तन प्यास लिए,  

दिन मानव के खग के वन के पशु के कटते बस आस लिए,

सब सोच रहे अब ग्रीष्म टले बरसे बदली मृदु भास लिए,  

निकले फिरसे बरसात लिए दिन सावन भादव मास लिए…

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Added by Ashok Kumar Raktale on May 22, 2016 at 3:40pm — 6 Comments

नज़्म - मेरी परी

हाँ वो ख्वाब हैं 

वो ख्वाब ही हैं जब तुम 

तख़य्युल के परों से उड़ते 

चाँद का नूर चुरा लाती हो 

और तोड़ कर बादलों के रेशमी टुकड़े 

गूंध कर उनको चांदनी में फिर 

किसी अनजान ज़मीं पर उसके 

महल तामीर किये हैं तुमने 

और उन महलों में बसा रखें हैं वो सारे मंज़र 

जो हक़ीक़त में बदल जाएं तो 

दर्द दुनिया से चले जाएं हमेशा के लिए

हाँ वो ख्वाब हैं जब तुम 

चेहरे पे हवाओं की शोखियाँ…

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Added by saalim sheikh on May 22, 2016 at 11:37am — 3 Comments

इक जान हो जाएगी ....

इक जान हो जाएगी ....

बड़ा अज़ीब मंज़र होगा

जब बहार आएगी

हर गुलशन

गुलों की महक से

लबरेज़ होगा

सब कुछ नया नया होगा

हर गुल में

तू मेरा अक्स ढूंढेगी

हर पंखुड़ी में कसमसाती

मैं तेरी उठान देखूँगा

कितना सुखद अहसास होगा

जब मेरी नज़रों के लम्स

तेरे जिस्म से गुफ़्तगू करेंगे

तेरा हिज़ाब

तुझसे अदावत करेगा

तेरे लबों पे

तिलभर हंसी की जुम्बिश…

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Added by Sushil Sarna on May 21, 2016 at 10:00pm — 4 Comments

नूरानी चेहरे ( लघुकथा) _शेख़ शहज़ाद उस्मानी

दंगों और भगदड़ से पीड़ित लोगों को मस्जिद में पनाह देने के बाद मौलवी साहब की आंखें यह देखकर फटी जा रहीं थीं कि औरतों ने स्वयं ही बच्चों की अलग पंक्ति बना दी थी और स्वयं पृथक पंक्तिबद्ध शांतिपूर्वक बैठ गईं थीं। पुरुष भी थोड़ा फासला रखकर पंक्तियों में ऐसे बैठ गए थे जैसे कि मानो नमाज़ अदा कर रहे हों। महिलाओं ने भी मुस्लिम औरतों की तरह पल्लू सिर व छाती पर लेकर वैसी ही मुद्रा बना ली थी। सभी अपने धार्मिक मंत्रोच्चारण कर रहे थे। पंडित जी यह सब देख कर मुस्करा रहे थे। उनको संतोष था कि अब सब ठीक है। मौलवी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 21, 2016 at 9:50am — 13 Comments

प्यास

पानी नहीं है , प्यास लगी है 

मुन्ने को देखो प्यास लगी है 

घर के सारे  घड़े खाली पड़े है 

बाहर के नल भी सूखे पड़े है 

मुन्ने को मैं कैसे समझाऊं

प्यास उसकी मैं कैसे बुझाऊं 

गर्मी भी तो बढ़ रही है 

बस्तियां जैसे जैसे गढ़  रहीं है 

वन उपवन हमने काट दिए है 

और जाने कितने विनाश किये है 

अब भुगत रहे मासूम यह बच्चे 

कौन समझें यह तो अक्ल के कच्चे 

अक्ल वाले सब कहाँ गए…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 20, 2016 at 11:00pm — 1 Comment

मंजिल

मित्रों-सहयोगियो, तुम
रूको तो सही,
भागते हो किधर? कुछ
सुनो तो सही।

आसमां के तारों को,
तुम देखो तो सही।
चांद नजर आएगा,
तुम पहचानो तो सही।

चांद ही मेरी मंजिल है,
कदम बढाओ तो सही।
मंजिल मिल जाएगी हमें,
हिम्मत जुटाओ तो सही।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 19, 2016 at 5:12pm — 14 Comments

दिल पे दस्तक

दिल पे दस्तक जो दूँ तो बुला लिजिए

दूर रहने की अब ना सजा दिजिए

मेरे नयनो की आप रोशनी हो बनी

आप बिन कुछ ना देखूँ है खुद से ठनी

ज्योति को यूँ ना दृग से जुदा किजिए

दिल पे दस्तक .......

मद में ही मै भटकता रहा दर-बदर

रास आई तन्हाई मुझे इस कदर

इस तन्हाई को अपना पता दिजिए

दिल पे दस्तक .......

दिल में दर्दे हिज्र की अब तामीर हो रही

ख्वाब में आपके मेरा जिक्र भी नही

दश्ते-बेकसी से अब तो फना किजिए

दिल पे दस्तक…

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Added by Pawan Kumar on May 19, 2016 at 11:30am — 8 Comments

भूख (लघु कथा )

ठाकुर सरकार,  माफ़ कर दें . मेरी बिटिया अभी नासमझ है .तीन दिन से चूल्हा नहीं जला सरकार .’

‘क्यों चूल्हे को क्या हुआ ?’

‘सरकार, उनका पुलिस चोरी के शक में पकड़ ले गयी , वही कुछ कमा कर लाते थे, घर् में कुछ था ही नहीं तो चूल्हा कैसे जलता?’

‘और---- तेरी बिटिया ने भी तो चोरी ही की है , तुम सब घर भर चोर हो तो माफी कैसी ?’

‘नहीं सरकार, उन्होंने चोरी नहीं की, पुलिस साबित नहीं कर पायी ‘

‘मगर तुम्हारी बेटी तो चोरी करती पकड़ी गयी .’

’हाँ सरकार मगर-----‘

‘अब…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 18, 2016 at 9:30pm — 28 Comments

ग़ज़ल -- पाँव के नीचे से धरती सर से छप्पर ले गया। ( दिनेश कुमार )

2122--2122--2122--212



पाँव के नीचे से धरती सर से छप्पर ले गया

ज़लज़ला कुछ बेबसों के सारे गौहर ले गया



ज़िन्दगी के खुशनुमा लम्हों से वो महरूम है

शाम को जो साथ अपने घर में दफ़्तर ले गया



हौसला, हिम्मत, ज़वानी, ख़्वाहिशें, बे-फिक्र दिल

वक़्त का दरिया मेरा सब कुछ बहा कर ले गया



सारी दुनिया जीत कर भी हाथ खाली ही रहे

वक़्त-ए-रुख़सत इस जहाँ से क्या सिकन्दर ले गया



छु न पाये हाथ उसके जब मेरी दस्तार को

तैश में आकर वो काँधे से…

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Added by दिनेश कुमार on May 18, 2016 at 5:30pm — 29 Comments

इंतज़ार ....

इंतज़ार ....

ये बादे सबा

आज किसकी सदा लाई है

कुछ कम्पन्न है

कुछ नमी है

कुछ भीगी सी तन्हाई है

शायद ! अधूरे अहसासों ने

ज़हन में करवट ली है

लफ्ज़ लबों की हदों पर

तिश्नगी के अज़ाब में

डूबे नज़र आते हैं

इन साँसों की बेचैनियों में

जाने किस अजनबी का ख़ुलूस

करवटें लेता है

ये मेरी तदब्बुर में

किसके लम्स रक्स करते हैं

कोई तो नाख़ुदा होगा

जो मेरी हयात के सफ़ीने को

साहिल तक ले जाएगा

दबे पाँव आकर

मेरी…

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Added by Sushil Sarna on May 18, 2016 at 4:32pm — 16 Comments

गज़ल - जिन्दगी का सफ़र खूब है

जिन्दगी का सफर खूब है,

मैं हूँ तनहा , मगर खूब है.

 

जिन्दगी कट रही शान से ,

ये सुहाना सफ़र खूब है .

 

क्या कहूँ मैं शबे-वस्ल को,

वो जगा रात भर खूब है.

 

प्यार की इंतिहा हो गई,

बेकरारी उधर खूब है .

 

हर दिशा में चमकता रहा ,

ये गणित का सिफर खूब है.

 

खार के साथ हैं फूल भी, ,

 कंटकों की डगर खूब है

 

मानता हूँ मैं "आभा"तुझे,

वाह! तेरी नज़र खूब…

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Added by Abha saxena Doonwi on May 18, 2016 at 8:30am — 11 Comments

घर

166
लोहा ईंट और कंक्रीट का 
व्यवस्थित संग्रह , या
बाॅंस और मकोर के तने की कमानी पर
सागौन के पत्तों का विग्रह?
संगमर्मर और मोजेक से चमकते फर्श पर 
सजे फर्नीचर, कालीन व अन्य चीजें,
या
पीली मिट्टी  और गोबर से लिपे
समतल, चैकोर या गोल गोल भूमि तल,
कामकाजी वस्तुओं को  बाहों में लिये
आॅंगन के किनारे लगे आम पर गाती कोयल?
केवल रात काटने के लिये एकत्रित…
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Added by Dr T R Sukul on May 17, 2016 at 11:00pm — 10 Comments

आबोहवा (लघुकथा)

बस स्टैंड पर बस से उतरते ही सुखिया का चेहरा खिल उठा। पिताजी टैक्सी वाले से बात करने लगे, तो उसने टोकते हुए कहा- "नहीं बापू, हम पैदल ही चलेंगे, हम शहर घूमते हुए चलेंगे, सामान भी कोई ज़्यादा नहीं है न!"

" न बेटा, टैक्सी वाले ने बताया है कि मानस भवन तो बहुत दूर है! शहर बाद में घुमा देंगे!"-

पिताजी ने कहा।

फिर दोनों टैक्सी पर सवार हो गए। जैसे ही टैक्सी ने रफ़्तार पकड़ी, सुखिया पहले तो सपनों में खो गया, फिर गाड़ियों की आवाज़ों और होर्न के शोरगुल ने उसे बेचैन कर दिया। पिताजी ने उसे…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 17, 2016 at 10:00pm — 16 Comments

कितनी ज़्यादा ख़ुशी पे पाबंदी (ग़ज़ल)

2122 1212 22



क्या लगी मैक़शी पे पाबंदी

यूँ लगे, ज़िन्दगी पे पाबंदी



जो लगा दे तो मर ही जाऊँ मैं

गर कोई शाइरी पे पाबंदी



ग़म की सीमा रही नहीं कोई

कितनी ज़्यादा ख़ुशी पे पाबंदी



वो लगाते ज़ुबान पर ताला

और फिर ख़ामुशी पे पाबंदी



बम-पटाखों पे कोई रोक नहीं

आजकल छुरछुरी पे पाबंदी



खेल लो खेल ख़ूब क़ुदरत से

क्यूँ लगे त्रासदी पे पाबंदी



मेरे दुश्मन हैं इंतज़ार में "जय"

कब लगे दोस्ती पे… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on May 17, 2016 at 6:58pm — 11 Comments

धर्म का ग्राफ / कविता

मन्दिर में मूर्ति का
रंग बदल रहा है
धर्मवर्धन के लिए
कर्म का ग्राफ भी बदल रहा है
धर्मानुयायी अपने - अपने चीथड़े उतार
मंदिर के चारों ओर टाँग कर
धर्म -कांड में लीन हो गये है
अब मटमैले मंदिर में 
पाप की मटियाली छायाएँ
चूने के पानी-सी  बुदबुदाती 
मंदिर के चेहरे से  धीमे - धीमे
उतर रही है ,टप ,टप ,टप .....

मौलिक और अप्रकाशित

Added by kanta roy on May 17, 2016 at 4:57pm — 8 Comments

चोचले (लघुकथा )राहिला

"देख जरा कैसी मशहूर होकर देश-विदेश में चर्चा का विषय बन गई अपनी शादी । और तो और पूरे दो लाख खर्च किये मालिक ने हमारी शादी पर।"

"हूंहsss...।"उसने बुरा सा मुंह बनाया ।

"क्यूं तुझे खुशी ना हो रही?तू टी.व्ही. पर आयेगी,अखबार में छपेगी ।"

"देखो..,अगर तुम ये सोचकर खुश हो रहे हो कि हमारी शादी हो जायेगी और मैं हमेशा के लिये खूंटा गाड़ कर सिर्फ तुमसे बंधी रहूंगी तो ये ख्याल अपने दिलोदिमाग से निकाल दो ।मैं इन इंसानो के चोचलों में अपनी आजादी, अपना जन्म सिद्ध अधिकार नहीं खो सकती ।… Continue

Added by Rahila on May 17, 2016 at 3:53pm — 13 Comments

ग़ज़ल~मुहब्बत की राहों में

(122 122 122 122)

ये सोचा है समझा है परखा बहुत है।
मुहब्बत की राहों में धोखा बहुत है

ये मदमस्त तेरी निगाहें कसम से
तिलिस्म इनमें कोई तो रक्खा बहुत है।

जो छिपता है मुझसे उसे क्या है मालूम?
उसे मैंने छिप छिपके देखा बहुत है

न जन्नत की बातें न दैर-ओ-हरम ही
दिवानों को तेरा झरोखा बहुत है।

किसी रोज मिलने कभी तुम भी आओ
तेरे शहर ने मुझको देखा बहुत है।

(मौलिक व् अप्रकाशित)

Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 17, 2016 at 12:42pm — 14 Comments

ग़ज़ल 212 – 212 – 212 – 212

212 – 212 – 212 – 212 ग़ज़ल

किस तरह आप से मैं कहूं प्यार है

जिक्र से ही हुआ दिल जो गुलज़ार है

आपका साथ है और क्या चाहिए

आप ही का बना दिल तलबगार है

जान लो तुम  मुहब्बत तो  है इक बला

इस से बचना बड़ा ही तो दुशवार है

रोग उसको अचानक ही समझो लगा

अब बना घूमता वो तो अख़बार है

जब हकीकत समझ आई तो देर थी

जो हुआ सो हुआ अब तो इकरार है

हुस्न ने लूट लाखों लिए सोच कर

हो गया इक नया जख्म सरकार है

मुनीश…

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Added by munish tanha on May 17, 2016 at 10:30am — 6 Comments

युग है , उसी को समर्पित -क्षणिकाएँ- डॉo विजय शंकर

1 .

भगवान है ,

कैसे भी पूजो

चलता है ,

ये तो शैतान है

जिसको

पूजने के तरीके

निराले है।



2 .

झूठ है ,

सब जानते हैं

झूठ का सच

सब जानते हैं

फिर भी किस कदर

अनजान बनते हैं ..............



3 .

आदमी आज का

कल पुर्जों सा ,

जीवन उसका , यांत्रिक ,

संवेदनशीलता से मुक्त ,

मशीनें बेहद सेंसिटिव,

सम्भाल के , कलयुग है …………



4 .

वफ़ा के प्रतीक कुत्ते

गली गली मिल जाते… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on May 17, 2016 at 10:20am — 14 Comments

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