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ग़ज़ल - सबके चेहरों को देखते आये

आज बस में खड़े खड़े आये
सबके चेहरों को देखते आये ।

पिछली यादें तलाश करते हुए
हम तेरे शहर में चले आये ।

और कुछ काम भी नहीं मुझको,
आज मिलने ही आपसे आये ।

जैसे कुछ खो गया था मेरा यहाँ
हर गली मोड़ देखते आये ।

मेरी औक़ात क्या महब्बत में
इस जहाँ में बड़े बड़े आये ।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सूबे सिंह सुजान on March 28, 2016 at 11:00pm — 5 Comments

कौन सी कौम उसे फिर से दुशाला देगी - ग़ज़ल

212         2112          2112     222



सोच अच्छी हो तो मस्जिद या शिवाला देगी

तंग  हो  और अगर  खून का  प्याला देगी।1।



लाख  अनमोल  कहो  यार  ये हीरे लेकिन

पर हकीकत  है कि मिट्टी  ही निवाला देगी।2।



जब हमें भोर में आँखों ने दिया है धोखा

कौन कंदील जो  पावों  को  उजाला देगी।3।



आशिकी यार तबायफ की करोगे गर जो

स्वर्ग से घर में नरक सा ही बवाला देगी।4।



आप हम खूब लडे़ खून बहाना मकसद

राहेरौशन तो जमाने  को  मलाला देगी।5।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 28, 2016 at 3:00pm — 3 Comments

पद्य-शृंगारिक एवं कृष्ण-स्तुति

(1)

चंद्रमुखी! हे मृगनयनी! क्या यौवन-रूप सजाया है।
ओष्ठ-अरुण मधुरस के प्याले, सुंदर कंचन-काया है।
लोच कमरिया-इंद्रधनुष, लट-केश घटा की छाया है।
कटि गगरी धर जाने वाली, तूने हृदय चुराया है।

(2)

मुरलीधर धर मुरली अधरन, ग्वालिंन को नचावत हो।
विश्वम्भर भर प्रेम हृदय में, राधा को रिझावत हो।
चक्रपाणि पाणि चक्र धर, अधर्म को मिटावत हो।
दामोदर दर-दर भटकूँ मैं, क्यों न मोहि उबारत हो?

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on March 28, 2016 at 3:00pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
भ्रम भुला दो तुम ज़रा...ग़ज़ल// डॉ. प्राची

2122,2122,2122,212



ताज है या एक सूली ये बता दो तुम ज़रा।

इश्क के हर राज़ से पर्दा उठा दो तुम ज़रा।



होश में हूँ अब तलक इस बात पर हैराँ हो क्यों?

इश्क है गर नीँद तो मुझको सुला दो तुम ज़रा।



फूल की हर सेज पर तो चल चुके अब तक बहुत,

है चुभन गर इश्क तो, काँटे बिछा दो तुम ज़रा।



मेरी हस्ती आज भी मुझमें बची ज़िंदा कहीं,

इश्क है मिटना अगर, मुझको मिटा दो तुम ज़रा।



मेरी इन वीरानियों में चित्र कोई बन सके,

ख्वाब कुछ रंगीन पलकों पर सजा दो… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 28, 2016 at 1:26pm — 6 Comments

जहाँ हो मुहब्बत वहीं डूब जाना (ग़ज़ल)

१२२ १२२ १२२ १२२

 

मेरी नाव का बस यही है फ़साना

जहाँ हो मुहब्बत वहीं डूब जाना

 

सनम को जिताना तो आसान है पर

बड़ा ही कठिन है स्वयं को हराना

 

न दिल चाहता नाचना तो सुनो जी

था मुश्किल मुझे उँगलियों पर नचाना

 

बढ़ा ताप दुनिया का पहले ही काफ़ी

न तुम अपने चेहरे से जुल्फ़ें हटाना

 

कहीं तोड़ लाऊँ न सचमुच सितारे

सनम इश्क़ मेरा न तुम आजमाना

 

ये बेहतर बनाने की तरकीब उसकी

बनाकर मिटाना…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 28, 2016 at 9:49am — 16 Comments

अमासी रात मेरे घर के तारे ..

बह्र:-1222-1222-1222-1222

अमासी रात मेरे घर के तारे छीन लेती है।।

तूफानी रात आये तो गुजारे छीन लेती है।।



मैं आँखें बन्द रखता हूँ मेरी यादें छुपा कर के।

खुला पाती है जब भी वो नज़ारे छीन लेती है।।



मेरी किस्मत को ऐ मालिक कभी उम्दा भी लिख्खा कर।

ये हसरत जिन्दगानी के सहारे छीन लेती है।।



नशा जिनको है दौलत का उन्हें कोई ये समझाए।

ये लत हमसे जरुरत में हमारे छीन लेती है।।



नहीं है हमजुबां कोई मेरा इस दौर हाजिर में।

कसक इतनी मेरे… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 27, 2016 at 3:58pm — 10 Comments

गीत-प्रीतम सपने में आये थे

प्रीतम सपने में आये थे।

सखि! मुझको बड़ा सताये थे।।

सुंदर वसन सजा तन पर,

वे मंद-मंद मुस्काये थे।

प्रीतम सपने में आये थे।

स्नेह-सेज पर सोई थी।

यादों मे उनके खोई थी।

नयनों ने पट ज्यों बंद किये।

उनके ही दर्शन पाये थे।

प्रीतम सपने में आये थे।

साँवली सूरत नैन विशाल।

लख छवि सखि! मैं हुई बेहाल।।

मणियों की माला साजे उर।

कंदर्प-रूप धरि आये थे।

प्रीतम सपने में आये थे।

प्यारी-प्यारी बातें कीन्हां।

बाहों में मुझको भर… Continue

Added by रामबली गुप्ता on March 27, 2016 at 2:51pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
उड़नेवाले इक परिंदे का मुकद्दर देखिये- ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

नातवाँ जिस्म और ये बिखरे हुये पर देखिये

उड़ने वाले इक परिन्दे का मुकद्दर देखिये



बीज मैंने बो दिया है हसरतों के खेत में

मुझको कब होती है फ़स्ले गुल मयस्सर देखिये



किस तरफ़ ले जा रहा है आपको ये रास्ता

रुकिये थोड़ा, और नज़रों को घुमाकर देखिये



दिल हुआ जाता है मेरा आइने सा पुरख़ुलूस

फूल मिलते हैं मुझे या कोई पत्थर देखिये



दूसरों में ऐब कोई ढूँढते हैं आप गर

मशविरा है मेरा पहले अपने अंदर देखिये



ये… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on March 27, 2016 at 7:00am — 11 Comments

उफान नहीं होते

दिखा दे आईना मिला दे खुदी से

अब ऐसे कोई इम्तहान नहीं होते ......

मसीहा के घर न उगे ज्यों मसीहा



बेईमान के हमेशा बेईमान नहीं होते.......

गलियों के ज़िम्मे वो मासूम बचपन

जिनके सर निगेहबान नहीं होते ........

किस्से उनके भी कम नहीं होते

जिनके कभी दर्ज़े बयान नहीं होते ......

महलों में ही चलती हैं…

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Added by amita tiwari on March 26, 2016 at 8:04pm — 9 Comments

कुछ गीत सुनाने हैं मुझको .....

कुछ गीत सुनाने हैं मुझको ......

कुछ गीत सुनाने हैं मुझको 

कुछ मीत मनाने हैं मुझको

जो अब तक पूरे हो  न सके 

वो  गीत   बनाने हैं मुझको

कुछ गीत सुनाने हैं मुझको ....

कब मौसम जाने रूठ गया

कब शाख से पत्ता टूट गया

जो रिश्तों में हैं सिसक रहे

वो दर्द अपनाने हैं  मुझको

कुछ गीत सुनाने हैं मुझको ....

क्यूँ नैन शयन में  बोल उठे

क्यूँ सपन व्यर्थ में डोल उठे

अवगुंठन में तृषित हिया के

अंगार   मिटाने  …

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Added by Sushil Sarna on March 26, 2016 at 6:22pm — 10 Comments

आस

74

आस

===

पलकों भरे प्यार को हम

नित आस लगाये रहे देखते,

मुट्ठी भर आशीष के लिये

कल, कल कहकर रहे तरसते,

कल की जिज्ञासा ले डूबी सारा जीवन

हम हाथ मले बेगार बटोरे रहे तड़पते।।



तिनके ने नजर चुराई ऐंसी,

हम मीलों जल में गये डूबते,

विकराल क्रूर भंवरों में फिर,

बहुविधि क्रंदन कर रहे सिसकते,

सब आस साॅंस में सूख गयी,

हम तमपूरित जलमग्न तहों में रहे भटकते।।



संरक्षण भी जो मिला हमको,

निर्देशों की बौछार लिये,…

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Added by Dr T R Sukul on March 26, 2016 at 3:14pm — 4 Comments

दरार – ( लघुकथा ) -

दरार – ( लघुकथा )    -

 मीरा और मोहन कितने खुश थे जब उनके परिवार वालों ने उनके प्रेम विवाह को  मंज़ूरी दे दी!मीरा के तो पैर ज़मीन पर ही नहीं पड रहे थे! हनीमून के लिये श्रीनगर  गये!दौनों की खुशियां सातवें आसमान पर थीं!

 एक दिन अंतरंग क्षणों में, कसमे वादे के दौर में, मीरा ने मोहन को अपने साथ हुई एक घटना  सुना दी,” वह जब सोलह साल की थी!उसके दूर के रिश्ते के मामाजी ने उसके साथ ज़बरदस्ती की थी! उसने  मॉ को  रो रो कर सारा वाकया सुनाया! वह चाहती थी कि  पुलिस में शिकायत  कर दो! पर मॉ ने…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 26, 2016 at 11:50am — 10 Comments

नशा लघुकथा

नशा

कभी बाएं कभी दायें डोलती सी तेज गति से आती अनियंत्रित गाड़ी मोड पर पलट गई. भीड़ जमा हो गई आसपास किसी तरह से गाड़ी में सवार दोनों युवकों को बाहर निकाला गया. उफ़...ये क्या दोनों नशे में धुत थे..

पुलिसवाला होने के नाते मेरा फ़र्ज़ था कि ड्यूटी पर न होते हुए भी मामले को सुलझाऊ. मैंने दोनों मे से एक के पिता जो प्रोफेसर भी थे, को बुलवाया..

ये क्या वो शर्मिंदा होने के स्थान पर मुझसे ही उलझ गए “न कोई मरा है न किसी को चोट आई है तो एक्सीडेंट कहाँ से हो गया..ले दे कर बात खत्म करो बच्चों को घर… Continue

Added by Seema Singh on March 26, 2016 at 11:29am — 5 Comments

चिप्स पापड़ में ठनी...

गज़ल....बह्र----२१२२, ११२२,  ११२२,  २२

आम के बाग में महुआ से मिलाया उसने.

मस्त पुरवाई हसीं फूल सजाया उसने.

शुद्ध महुआ का प्रखर ज्ञान पिलाया उसने'

संग होली का मज़ा प्रेम सिखाया उसने.

ज़िन्दगी दर्द सही गर्द छिपा कर हॅसती,

चोट गम्भीर भले घाव सिलाया उसने.

ताल-नदियों में अड़ी रेत झगड़ती रहती,

लाज़-पानी के लिये मेघ बुलाया उसने.

वक्त की खार हवा घात अकड़ पतझड़ सब,

होलिका खार की हर बार जलाया…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 26, 2016 at 12:30am — 4 Comments

निःशब्द

कल सोते सोते

मेरी बांह को अश्रू से भिगोते
मेरे लाल ने जगा दिया
सकते में ला…
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Added by amita tiwari on March 25, 2016 at 8:30pm — 2 Comments

प्यास होंठों पे निगाहों में उदासी रह गई

ग़ज़ल



जबसे उनसे मिलने की चाहत अधूरी रह गई

प्यास होंठों पे निगाहों में उदासी रह गई



बैठकर धीरे से लम्बी कार में वो चल दिए

बैलगाड़ी प्यार की पीछे हमारी रह गई



फूल गुलदस्ते किताबें ख़त जला डाले सभी

फिर भी उनके प्यार की दिल में निशानी रह गई



दिन महीने साल बीते जाम आँखों से पिए

मुद्दतों के बाद भी मुझमें ख़ुमारी रह गई



हम मिले मिलके चले कुछ दूर राहे इश्क़ में

मिल गई मंज़िल मगर कुछ बेक़रारी रह गई



बेचकर सबकुछ भी दे… Continue

Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on March 25, 2016 at 12:30pm — 1 Comment

होलिका दबंग है

कलाधर छंद......होलिका दबंग है

विधान---गुरु लघु की पंद्रह आवृति और एक गुरु रखने का प्राविधान है. अर्थात २, १ गुणे १५  तत्पश्चात एक गुरु रखकर इस छंद की रचना की जाती है.   इस प्रकार इसमें इकतीस वर्ण होते हैं.  संदर्भ अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद की पुस्तक " छंद माला के काव्य-सौष्ठव"  में ऐसे अनेकानेक सुंदर छंद विद्यमान हैं..

यथा----…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 25, 2016 at 12:00pm — 4 Comments

इससे अच्छा है मर जाना (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २२

 

जीवन भर ख़ुद को दुहराना

इससे अच्छा है मर जाना

 

मैं मदिरा में खेल रहा हूँ

टूट गया जब से पैमाना

 

भीड़ उसे नायक समझेगी

जिसको आता हो चिल्लाना

 

यादों के विषधर डस लेंगे

मत खोलो दिल का तहखाना

 

सीने में दिल रखना ‘सज्जन’

अपना हो या हो बेगाना

---------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 24, 2016 at 10:19pm — 10 Comments

गीतिका(मनन)

राम-राम,सलाम संग होली का पैगाम:

#गीतिका#

30 मात्राएँ, 16 14 पर यति

मापनी 2*8 2*7

***

छौंरा-छौंरी खेले होली खिसिआये हैं काकाजी

अपने-काकी के लफड़े रिसिआये हैं काकाजी।

आयी है होली हुड़दंगी हैं रंगे रामू-रजनी

काकी रंगों से कतराती बिखिआये हैं काकाजी।

पकवानों से मन भरता कब मीठा-मीठा हो जाता

कुछ तीखी नमकीनी खातिर रिरिआये हैं काकाजी।

काकी कहती खुद को देखो देखा करते काकी को

मटका करती भर आँगन सज दिठिआये हैं काकाजी।

काकी कहती छोड़ो बूढ़े! अब तो… Continue

Added by Manan Kumar singh on March 24, 2016 at 8:11am — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
होली मनाना आपका.....ग़ज़ल // डॉ. प्राची

है अदा या फिर सितम होली मनाना आपका।

रात के बारह बजे जी भर सताना आपका।



रंग ले आना छिपाकर नित नई तरकीब से

हाय! चालों में उलझ हल्ला मचाना आपका।



टैग तय कर टोलियों में, बालटी के ड्रम लिए

क्या गज़ब अंदाज़ है, टोली में जाना आपका।



जीन्स टी-शर्टों की कतरन काट करना चीथड़े

बन लफंडर साथ फिर ऊधम मचाना आपका।



हम भला कोरे रहें ये आपको मंज़ूर कब

पर कहो अच्छा है क्या हमको भिगाना आपका?



बन के बन्दर लौटकर दर्पण में खुद को देखकर

साल के… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 23, 2016 at 3:00pm — 8 Comments

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