वह ऑटो से उतरा, पैसे दिए और जल्दी से पीछे हट गया ,उसे डर था कि अभी ऑटो खूब ढेर सा धुंआ उसके सामने उगल कर चला जाएगा , पर ऐसा हुआ नहीं , ऑटो लहरा कर निकल गया, उसने गौर से देखा ऑटो सी एन जी वाला था। चारों तरफ फैले धुएं धुएं से उसे घुटन सी हो रही थी. जेब से कार्ड निकाल कर उसने पास खड़े कुछ एडजूकेटेड लोगों की और बढ़ कर पता पूछा , उन्होंने बड़ी शालीनता से उसी समझाया, वो जो ऊपर पांच चिमनियां देख रहें हैं , वो जिनसे काला काला धुअाँ निकल रहा है, हाँ, वही. उसने सर उठा कर देखा दूर दूर तक आसमान स्लेटी…
ContinueAdded by Dr. Vijai Shanker on June 3, 2015 at 3:00pm — 20 Comments
१२१२/११२२/१२१२/११२
नया सफ़र भी पुराना रहा, नया न हुआ
मैं आदमी न हुआ और वो ख़ुदा न हुआ.
.
सहर मलेगी अभी मुँह पे, रात के कालिख़
वो आफ़्ताब उछालूँगा जो हवा न हुआ.
.
अजीब जात हूँ जो टूटकर पनपता हूँ
वगर्ना टूट के पत्ता कोई हरा न हुआ.
.
ये कायनात कहाँ और ऐ बशर तू कहाँ
बड़ा समझने से ख़ुद को…
Added by Nilesh Shevgaonkar on June 3, 2015 at 9:10am — 28 Comments
Added by दिनेश कुमार on June 2, 2015 at 11:30pm — 18 Comments
कोई मांग रहा,
कोई छीन रहा।
तेरा मेरा करता मानव,
सब पा कर भी क्यों दीन रहा।
पत्थर युग से,
मंगल युग तक।
सूरत बदली मूरत बदली,
मन से फिर भी हीन रहा।
छू ले चांद,
कई बार भले।
पर धरती की अनदेखी है,
जहां बचपन कूड़ा बीन रहा।
क्षण भर 'देवी',
फिर खेल खिलौना।
धरा गगन को रोना आया,
तू ईश होकर भी,
समाधि में ही लीन रहा।
जीत लिया जग,
बना सिकंदर।
जाते जाते अपने दो क्षण,
विश्व विजेता मुर्दो…
Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 2, 2015 at 7:00pm — 17 Comments
"अरे ताऊ इलेक्शन आ गए हैं, इस बार वोट किस को दे रहे हो ?"
"अरे हमें तो अभी ये ही नहीं पता कि इस बार ससुरा खड़ा कौन कौन है।"
"एक तो वही कुर्सी पार्टी वाला है।"
"अरे वो चोर ? छोडो, साले पूरा देश लूट कर खा गये।"
"नई पार्टी वाला भी खड़ा है।"
"कौन ? वो जो आपस में लोगों को लड़ाता फिरता है? दफ़ा करो उसको।"
"एक नीली पार्टी वाली भी है न।"
"उसको वोट दे दिया तो पीछे वाली बस्ती सर पर मूतेगी हमारे।"
"तो फिर कामरेडों को वोट किया जाए?"
"कौन वो ज़िंदाबाद मुर्दाबाद…
Added by योगराज प्रभाकर on June 2, 2015 at 12:25pm — 20 Comments
2122 1212 112/22
सर्द है आज मेरी आह बहुत
फिर उठी दिल में तेरी चाह बहुत
खुदनुमाई से बाज़ आ नादाँ
तेज़ है दुनिया की निगाह बहुत
तोड़ना दिल किसी का क्या मुश्किल
हाँ कठिन इश्क़ की है राह बहुत
सोच उनकी है साइलों जैसी
पर बने फिरते हैं वो शाह बहुत
हश्र के रोज़ देख लेना तुम्हें
याद आयेगा हर गुनाह बहुत
मौलिक,अप्रकाशित
Added by शिज्जु "शकूर" on June 2, 2015 at 11:30am — 7 Comments
1212 1212 1212 1212
बशर तमाम भीड़ में मुकाम ढूंढते रहे
जमी पे हैं मगर फलक पे नाम ढूंढते रहे
हुनर तराशने की उम्र मस्ती में ही काटकर
बिना हुनर मियां कहाँ पे काम ढूंढते रहे
कभी भी बीज आम के चमन में बोये जब नहीं
तो फिर चमन में क्यूँ यूं आप आम ढूंढते रहे
जो रिंद हैं उन्हें तो मयकशी ही रास आयेगी
वो मयकदे तलाशते हैं जाम ढूंढते रहे
जतन तमाम ही किये पढ़ाने लाडले को जब
तभी से मन ही मन वो…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on June 2, 2015 at 11:30am — 24 Comments
पल्लू लहरा देते हैं वो हवा का रूख़ देख कर
बीमार हो जाते हैं हम भी हसीं दवा देख कर !
यूँ तो हम तुम्हारे सिवा किसी और पे मरते नहीं
महफ़िल हसीनाओं की हो तो शिरकत से डरते नहीं !
तूने अगर दिल में अपने मुझे घर दिया होता
तन्हाईओं की बारिशों से मैं ना गल गया होता !
सुना है मिजाज़ गर्म और नज़र तिरछी है उनकी
'इंतज़ार' हम कहाँ मरते हैं हसीं बद दुआओं से उनकी !
तुम बिन ख़त्म हो जायेगी तिलस्मी दुनियाँ मेरी
अधभरे पन्नों में…
Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on June 2, 2015 at 11:30am — 19 Comments
अब चुनावों की आती बारात देखिये,
लुटता है कौन अब इस रात देखिये।
जात-पाँत की चर्चा जोरों की होगी,
पहले देखी,फिर से यह बात देखिये।
क्या होगा,न होगा, है सब गाछ पर,
है नमूनों की बनती जमात देखिये।
सहेजने में लगे हैं छितराई छतरी,
बातों की तो इनकी बिसात देखिये।
कन्हुआ-कन्हुआ गिनते सब कुर्सी,
दिखा रहे, इनकी औकात देखिये।…
Added by Manan Kumar singh on June 2, 2015 at 10:00am — 4 Comments
"पहले तो हमें नौकरी ही नहीं मिलती। अगर मिल भी जाए तो सालों साल रगड़ते रहो, कोई प्रमोशन नहीं। और एक ये हैं ?"
"और लो जन्म ऊँची जात में।"
पिघले हुए सीसे की तरह ये शब्द उसके कानों में उतर रहे थे ।
मौलिक एवम अप्रकाशित
Added by विनय कुमार on June 2, 2015 at 1:00am — 17 Comments
मैं नहीं लिखता ;
कोई मुझसे लिखाता है !
कौन है जो भाव बन ;
उर में समाता है !
....................................
कौंध जाती बुद्धि- नभ में
विचार -श्रृंखला दामिनी ,
तब रची जाती है कोई
रम्य-रचना कामिनी ,
प्रेरणा बन कर कोई
ये सब कराता है !
मैं नहीं लिखता ;
कोई मुझसे लिखता है !
.........................................................
जब कलम धागा बनी ;
शब्द-मोती को पिरोती ,
कैसे भाव व्यक्त हो ?
स्वयं ही शब्द…
Added by shikha kaushik on June 1, 2015 at 11:00pm — 11 Comments
१२२२ १२२२ १२२२ १२
तेरी तहरीर में हर्फ़े वफ़ा है क्या नहीं
कहीं दिल में मेरी कोई जगा (जगह )है क्या नहीं
पँहुचते ही नहीं मुझ तक कभी तेरे ख़ुतूत
लिखा उन पर मेरे घर…
ContinueAdded by rajesh kumari on June 1, 2015 at 9:30pm — 21 Comments
Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on June 1, 2015 at 6:51pm — 10 Comments
मैं यहां पर रहूँ या वहां पर रहूँ
ऐ खुदा तू बता मैं कहां पर रहूँ ?
एक साया मुझे आपका जो मिले
फ़िक्र क्या फिर कहाँ किस मकां पर रहूँ I
जिन्दगी आज तो है तिजारत हुयी
फर्क ये है कि मैं किस दुकां पर रहूँ I
हो रहम मालिकों की मयस्सर मुझे
पंचवक्ता तेरी मैं अजां पर रहूँ I
याद तेरी करूं …
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 1, 2015 at 11:00am — 24 Comments
Added by Samar kabeer on June 1, 2015 at 11:00am — 29 Comments
" अरे छोटका क माई , देख तो तनिख । काम भर का पत्तल बन गया है न की अउर बनायें "। मुसहराने का दुखिया बहुत खुश था , आखिरकार गाँव में शादी थी और पत्तल उसी के यहाँ से जाती थी ।
" काल तनिक अउर पत्तल बना लेना , कहीं कम न पड़ जाये । याद है न पिछले बियाह में घट गया था पत्तल , केतना गाली सुनाये थे हमको अउर पइसो पूरा नहीं मिला था "। दुखिया ने हामी में सर हिलाया , कइसे भुला सकता था उसको ।
अगले दिन भिन्सहरे ही वो लग गया अउर पत्तल बनाने में , इस बार कम न पड़े । छोटका भी लगा हुआ था उसके साथ और…
ContinueAdded by विनय कुमार on June 1, 2015 at 10:30am — 18 Comments
२१२२/१२१२/२२ (११२)
या ख़ुदा ऐसी ला-मकानी दे
अब ख़लाओं की मेज़बानी दे.
.
कितना आवारा हो गया हूँ मैं
ज़िन्दगी को कोई मआनी दे.
.
यूँ न भटका मुझे सराबों में
अपने होने की कुछ निशानी दे.
.
सच मेरा कोई मानता ही नहीं
सच लगे ऐसी इक कहानी दे.
.
मेरी ग़ज़लों की क्यारी सूख गयी
मेरी ग़ज़लों को थोडा पानी दे.
.
“नूर” को फ़िक्र दे नई मौला
पर नज़र उस को तू पुरानी दे.
.
निलेश "नूर"
मौलिक / अप्रकाशित
Added by Nilesh Shevgaonkar on May 31, 2015 at 9:30pm — 27 Comments
एकदम उसके ज़बान पर चढ़ गया था ये शब्द " काना ", हंसी मज़ाक में किसी को भी बोल देता था वो ।
आज भी वही हुआ जब बचपन का एक मित्र आया और उसके साथ मज़ाक चल रहा था । अचानक किसी बात पर उसने बोल दिया " क्या यार काने हो क्या , इतना भी नहीं दिखता "।
और फिर वो एकदम से खामोश हो गया , दरअसल उसका बचपन का दोस्त वास्तव में काना था । उसे उस शब्द की पीड़ा का एहसास हो गया था ।
मौलिक एवम अप्रकाशित
Added by विनय कुमार on May 31, 2015 at 6:46pm — 10 Comments
बेचारा ...बेबस... लाचार दिल
आँखों से कितनी दूर है
जो बस गए हैं सपने
उन्हें सच समझने को मजबूर है
आँखों की कहानी अपनी है
जो देखा बस वोही खीर पकनी है
छल फ़रेब की चाल रोज़ बदलनी है
क्या करे दिल की दुनियाँ का
वहाँ तो सिर्फ़ दिल की ही दाल गलनी है
हाँ ....बंद आंखें दिल को देखती हैं
मगर आँखों को
बंद आँखों से देखने पर भरोसा ही नहीं
क्यूंकि वो जानती हैं कि दिल मजबूर है
और सच्चाई सपनों से कितनी दूर है
यूँ हर किसी का दिल आँखों से दूर…
Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 31, 2015 at 2:36pm — 9 Comments
Added by babita choubey shakti on May 30, 2015 at 11:56am — 8 Comments
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