हीरा - क्या ज़माना आ गया , लोगों को बताना पड़ता है , मैं हीरा हूँ , हीरा। बड़ा महंगा होता ही हीरा।
मेरी चमक दूर दूर तक जाती है. कभी राज के राज तबाह हो जाते थे हमारे लिए.
एक नज़र हमें देख कर लोग अपने नसीब को सराहते थे।
रानी - राजकुमारियों को हमारे हार ही सुहाते थे।
( आह भर कर ) अब तो जैसे कोई हमें चाहता ही नहीं। पहचानता भी नहीं.
कोयला - हाँ भाई , बात तो सही है, पर मेरे भाई , वक़्त वक़्त की बात होती है,…
ContinueAdded by Dr. Vijai Shanker on June 5, 2015 at 7:30pm — 18 Comments
“अरे गुप्ता जी, ये क्या कर रहे हैं आप ?”
“बेटे के स्कूल में पर्यावरण दिवस पर एक नाटक है.. और उसको एक पेड़ बनना है.. इसीलिये ये डालियाँ काट-काट कर उसे दे रहा हूँ.”
“आपने तो इसे पूरा ही काट डाला.. अब तो ये कायदे का पेड़ बनने से रहा. अभी-अभी तो वन विभाग वालों ने इसे लगाया था..”
“भाईजी, सामने से घर का लुक भी खराब कर रहा था, इसी बहाने इसका काम तमाम करूँ..” - बुदबुदाते हुये गुप्ता जी के हाथ और तेज चलने लगे.
(मौलिक और अप्रकाशित)
Added by Shubhranshu Pandey on June 5, 2015 at 6:57pm — 19 Comments
२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२
वक़्त ये चलता है चलते हुए सूरज की तरह
तन मेरा जलता है जलते हुए सूरज की तरह
रोशनी इल्म की दुनिया में तभी बिखरेगी
तम को निगलोगे निगलते हुए सूरज की तरह
जुल्फ की छांव तले शाम गुजारो अपनी
अब्र में छुप के बहलते हुए सूरज की तरह
राह मुश्किल है जवानी की संभलकर चलना
कितने फिसले हैं फिसलते हुए सूरज की तरह
अब्र की छांव में हर रोज छुपाकर खुद को
इक कमर ने छला…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on June 5, 2015 at 10:49am — 15 Comments
२२ / २२ / २२ / २२ / २२ / २२ / २२ / २२ / २२
मुद्दत से जिसने दुनिया वालों से मेरा नाम छुपा रक्खा है
जलने वालों ने ज़माने में उसका ही नाम बेवफा रक्खा है
**
रातों-रातों उठ उठ कर हमने आँसू बोयें हैं दिल की जमीं पर
तुम क्या जानोंगे कैसे हमने बाग़-ए-इश्क ये हरा रक्खा है
**
वो मेहरबां है तो कुछ और न सुनाई दे,गर हो जाय खफा तो
चूड़ी ,कंगन, पायल, बादल..कासिद कायनात को बना…
ContinueAdded by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 5, 2015 at 10:30am — 25 Comments
2122 2122 2122 2122
जब कहेगी तब करेंगे नाम तेरे जिंदगी री।
कब रहेगी जो चलेगी साथ घेरे जिंदगी री?
माँगता हूँ मैं हमेशा जिंदगी से जिंदगी पर,
दे कहाँ पायी अभी जो बात टेरे जिंदगी री।
आ गयी थीं तब सलोनी ऊँघती कैसी घटाएँ,
दे गयी थी देख तब भी उष्ण फेरे जिंदगी री।
बैठकर मैं शांत कैसा देखता था बूँद जल का
आग जैसा फिर जलाया रे घनेरे जिंदगी री।
कब लगी मैं सोचता हूँ रे लगी कैसे भला…
Added by Manan Kumar singh on June 5, 2015 at 10:00am — 2 Comments
2122 2122 2122 212
है कोई क्या इस जहाँ में जो कभी हारा नहीं
"सिर्फ़ पाया हो यहाँ पर और कुछ खोया नहीं"
पत्थरों के बीच रह के मै भी पत्थर की तरह
दर्द की बस्ती में रह कर, देखिये रोया नहीं
ख़्वाब की बातें कहूँ क्या, नींद जब दुश्मन हुई
माँ का साया जब से रूठा , तब से मैं सोया नहीं
बादलों में खेमा बन्दी भी हुई क्या ? आज कल
क्यों मेरे घर से गुज़रते वक़्त वो बरसा नहीं
मरहले के और पहले थक गया था काफिला
आबला पा था…
Added by गिरिराज भंडारी on June 5, 2015 at 9:30am — 32 Comments
मेरे जीवन में तुम आके बरसो
आसमानी बादल बन के ना बरसो
पास आ सैलाब बन के बरसो
पुरवाई का झोंका बन के ना बरसो
प्यार की अंगार बन के बरसो
मिलन की आस बन के ना बरसो
बोसों की बौछार बनके बरसो
चांदनी बन के ना बरसो
चकोरी की प्यास बन के बरसो
उमंगों के आकाश से
एहसासों की बारात बन के बरसो
तनहाइयाँ बहुत हुईं
एक मिलन की रात बन के बरसो
अब जैसे भी बरसो ....
मगर कुछ ऐसे बरसो
कि बेहिसाब हो के बरसो…
Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on June 5, 2015 at 6:19am — 10 Comments
Added by मनोज अहसास on June 4, 2015 at 11:41pm — 11 Comments
सपनों के झिलमिल से जुगनू पलकों पर पल भर आ ठहरे...
नन्हें पर हैं, पर भोला मन
नभ छू ले करता अभिलाषा,
कंटीले तारों की जकड़न
देगी केवल हाथ हताशा,
अन्धकार नें बरबस नोचे परियों के भी पंख सुनहरे...
सपनों के झिलमिल से जुगनू पलकों पर पल भर आ ठहरे...
सपनों को मंज़ूर हुआ कब
ढुलक आँख से झरझर बहना,
हँसकर स्वीकृत किया उन्होंने
सीपी में मोती बन रहना,
सागर ने अपने सीने में राज़ छुपाए हैं कुछ गहरे...
सपनों के…
ContinueAdded by Dr.Prachi Singh on June 4, 2015 at 9:30pm — 15 Comments
हो न कभी राग रति से, यही लिया व्रत ठान |
कर लूँ कुछ सत्कर्म सृजित , हो मेरा यश गान |
बेधा उर रति-बान ने, दीक्षा पे आघात |
छंदरूप मृदु गात लखि, व्रत है टूटा जात ||
अपलक भए नेत्र मोरे, देखि अनुप रूप को |
वक्ष गिरि, कटि गह्वर, रसद मधुर गात है |
मचलै ना माने हिय लोचन निहार हार |
कबरी पे आँचल फसाए चाली जात है |
कर्ण-कुण्डल कपोल छुए, अधर सोहे मूँगे सा |
नयना कमल हो मानो मुखड़ा प्रभात है |
पाँव से शीश लाइ, समांग…
ContinueAdded by SHARAD SINGH "VINOD" on June 4, 2015 at 7:30pm — 8 Comments
मुलाकात......
आजकल ग़मों में भी
बरसात कहाँ हो पाती है
सब से हो जाती है
पर खुद से बात कहाँ हो पाती है
फुर्सत ही नहीं इस तेज रफ्तार
जिन्दगी की राहों में
कि रुक कर
खुद से चंद लम्हे बात करें
कोई नहीं होता
जब रात के अँधेरे में
कैद से रिहा होते
अँधेरे से सवेरे में
बावजूद अकेला होने के
पलक कहाँ सो पाती है
दिल के निहाँखाने से
कहाँ ख़ुद की रिहाई हो पाती है
धीरे धीरे ज़िंदगी
कहीं गर्द में खो जाती है
बंद होते…
Added by Sushil Sarna on June 4, 2015 at 6:41pm — 10 Comments
महीना जून का पावन मुझे तो खूब है भाता
मगर इसका मुझे है ग़म हमेशा ये नही आता
बला बीबी टले इस माह नइहर वो चली जाती
सुबह से शाम तक करती परेशा सर वही खाती
यही ये माह है ऐसा खुशी जो साथ्ा में लाता
मगर इसका मुझे है ग़म हमेशा ये नही आता
महीना जून का पावन मुझे तो खूब है भाता
लड़ाता जाम विस्की के ऩज़र रखता पडोसन पे
न खाना मैं बनाता हूँ मगाता रोज होटल से
पिटाई भी नही होती जली रोटी नहीं खाता
मगर इसका मुझे है गम…
ContinueAdded by Akhand Gahmari on June 4, 2015 at 6:00pm — 4 Comments
एक वृक्ष की दो संताने तू गुलाब मैं काँटा
जो तुझको फुसलाता है मैं धर देता हूँ चाँटा
तितली भ्रमर और मधुमक्खी सब मुझसे थर्राते
मेरे डर से पास तुम्हारे आने में भय खाते
वन-कानन का पशु भी कोई परस नहीं कर पाता
मणिधर भी तेरी सुगंध को लेने …
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 4, 2015 at 5:30pm — 22 Comments
" डॉक्टर साहब , बच्चा बच तो जायेगा न ", उसके दोनों हाँथ जुड़े थे ।
" देखो हम लोग पूरी कोशिश करेंगे , आगे ऊपरवाले की मर्ज़ी । बस पैसों का इंतज़ाम कर लेना "।
सुबह जूनियर डॉक्टर ने फोन किया " सर , स्पेशलिस्ट का फोन आया था कि वो नहीं आ पाएंगे | इसको डिस्चार्ज कर देते हैं , कहीं और करवा लेगा ऑपरेशन "।
" क्यों , ऑपरेशन क्या असफ़ल नहीं होते ", डॉक्टर साहब ने समझाया । ऑपरेशन की तैयारियाँ होने लगीं ।
मौलिक एवम अप्रकाशित
Added by विनय कुमार on June 4, 2015 at 4:35pm — 20 Comments
एक तवील ख़ामोशी
ज़हन के दरीचे में
ख़ामोशी ज़बाँ की नहीं
ख़ामोशी ख्यालों की
ज़हन में जो उठते थे
उन सभी सवालों की
सवाल कुछ हैं दुनिया से
जवाब जिनके मिलने की
उम्मीद छोड़ दी मैंने
सवाल कुछ है अपनों से
जवाब जिनके मालुम हैं
पर उन्ही से सुनने हैं
सवाल कुछ हैं खुद से भी
सवाल हर एक लम्हे का
ज़िन्दगी के सफ्हे पर
जो गुज़र गया पहले
या गुजरने वाला है
क्या वो दे गया मुझको
बजुज़ चंद और सवालों के
जवाब जिनके मिलने तक…
ContinueAdded by saalim sheikh on June 4, 2015 at 1:40pm — 11 Comments
“मिस मिस ! नीरज इस टॉकिंग इन हिंदी अगेन”.मनीष ने चुगली लगाते हुए टीचर से कहा .... चटाक !!!! और शिक्षाविभाग के मंत्री नीरज श्रीवास्तव जी का हाथ अचानक गाल पर पँहुचा फिर वर्तमान के धरातल पर लौट कर सामान्य होते हुए तेवरी स्वर में बोले
“कई बार चेतावनी देने के बाद आँकड़ों के अनुसार तुम्हारे विभाग में कुल २० प्रतिशत हिंदी में काम होता है मनीष जी,आय एम् टॉकिंग अगेन इन हिंदी... तुम्हारे निलंबन के आदेश दो दिन में पँहुच जायेंगे” मनीष का कद मानो यकायक छोटा हो गया.
(मौलिक एवं…
ContinueAdded by rajesh kumari on June 4, 2015 at 10:00am — 22 Comments
Added by Samar kabeer on June 3, 2015 at 11:04pm — 25 Comments
1212 1122 1212 112/22
वो मेरे सामने आने पे मुस्कुरा न सके
नज़र झुकाई जो इक बार तो उठा न सके
हज़ार कोशिशें की रश्क़ तो छुपा न सके
मगर हँसी में मेरी बात भी उड़ा न सके
उन्होंने जिक्र मेरा छेड़ तो दिया सरे बज़्म
वही बातें मेरे होते वो दोहरा न सके
हर एक सम्त से नज़रें उठीं हमारी तरफ
कि कहते कहते भी वो हालेदिल सुना न सके
बस एक रोज़ की थी ज़िन्दगानी फूलों की
वो बदनसीब रहे जो चमन सजा न…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on June 3, 2015 at 6:25pm — 16 Comments
क्या कहूँ सच का हाल इस दौर में मित्रों
मैंने अपनों से सच कहने की सजा पायी है
अब तो हद है जुल्मों सितम गरीबों पर
आम को इमली न कहने की सजा पायी है
अब तो जुर्म करने वाले भी बेबाक घूमते हैं
कईयों ने तो जुर्म सहने की सजा पायी है
बक्शा नही प्रभु ने मेरे आलिन्द गिरा दिए
मैंने माँ को बेघर करने की सजा पायी है
टूटा है दिल मेरा आँखों में सिर्फ पानी है
हाँ मैंने इश्क़ करने की सजा पायी है
कैद हैं पिजड़े में, माँ संग नीड में रहने…
ContinueAdded by maharshi tripathi on June 3, 2015 at 6:01pm — 11 Comments
पाठ्य पुस्तक में अपनी कविता देखकर कविता बहुत खुश हुई।पर यह क्या,कवयित्री की जगह तो नाम किसी कामिनी देवी का था।उसने कामिनी देवी का पता नोट किया,पता करने पर पता चला कि कामिनी एक बहुत ही लब्ध-प्रतिष्ठ हिंदी साहित्यकार के खानदान से है,जो अब इस दुनिया में नहीं हैं।कविता कामिनी से मिलने पहुँच गयी,बोली-
'तुमसे ऐसी उम्मीद न थी ।तूने मेरी कविता अपने नाम से पाठ्य क्रम में शामिल करा लिया।'
- 'ऐसी उम्मीद तो तुमसे मुझे नहीं थी,तू मेरी कविता को अपनी कह रही।'
-'अच्छा,चोरी और सीनाजोरी?'…
Added by Manan Kumar singh on June 3, 2015 at 5:00pm — 14 Comments
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