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All Blog Posts (19,153)

फिर से जन्म लेकर आऊंगा !

हुए न लक्ष्य पूर्ण किन्तु

मृत्यु द्वार आ गयी ,

देखकर मृत्यु को हाय !

ज़िंदगी घबरा गयी ,

हूँ नहीं विचलित मगर मैं ,

मृत्यु से टकराउँगा !

लक्ष्य पूरे करने फिर से

जन्म लेकर आऊंगा !

.....................................

छोड़ दूंगा प्राण पर

प्रण नहीं तोड़ूँगा मैं ,

अपनी लक्ष्य-प्राप्ति से

मुंह नहीं मोड़ूँगा मैं ,

है विवशता देह की

त्याग दूंगा मैं अभी ,

पर नहीं झुक पाउँगा

मृत्यु के आगे कभी ,

मैं पुनः नई देह…

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Added by shikha kaushik on May 27, 2015 at 12:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल -नूर -कितनी सादा-दिली से मिलता है

२१२२/१२१२/२२ 

कितनी सादा-दिली से मिलता है

जब समुन्दर नदी से मिलता है.

.

इक नयी कायनात पनपेगी    

कोई भौंरा कली से मिलता है.  

.

रब्त इस बात पर टिके हैं अब

कोई कितना किसी से मिलता है.

.

हर किसी से यही वो कहते हैं

दिल मेरा आप ही से मिलता है. 

.

अब सुमंदर में भी है बे-चैनी

क़तरा अपनी ख़ुदी से मिलता है.

.

सुब’ह से पहले जुगनू यूँ चमका

गोया लम्हा सदी से मिलता है.



मौत से क्या पता…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 26, 2015 at 9:21pm — 34 Comments

भविष्य - लघुकथा

"वकील साहब! जो चाहे करो लेकिन मेरे बेटे को सजा नही होनी चाहिये।" कहते हुये काली बाबू ने चेक बुक सामने रख दी।

"काली बाबू। मीडीया और 'एविडेन्स' भी तुम्हारे बेटे के खिलाफ है। अब तो एक ही रास्ता है 'पीड़िता' से आपके बेटे की शादी और उसकी तरफ से केस वापसी की दरख्वास्त।" वकील साहब ने ठंडी साँस भर कर हथियार डाल दिये।......................................



"लोगो की सवालिया नजरे, परिवार का मान और तुम्हारी बेटी का भविष्य। इन सबको देखा जाये तो मेरी इस 'आफर' से बेहतर कोई रास्ता नही है।"…

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Added by VIRENDER VEER MEHTA on May 26, 2015 at 8:30pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
किसी के चश्मे नम से गुज़री हैं राहें बलन्दी की

1222/ 1222/ 1222/ 1222

किसी की चश्मे नम से गुज़री हैं राहें बलन्दी की

गरीबों के शिकम* से गुज़री हैं राहें बलन्दी की                       *पेट

 

जिन्हें तू अपने पीछे यूँ तड़पता छोड़ जाता है

ये वो हैं जिनके दम से गुज़री हैं राहें बलन्दी की

 

न जाने नींद कैसे आती है ऐ बेरहम तुझको

तेरे कारे सितम से गुज़री हैं राहें बलन्दी की

 

कोई ये देख पाता काश कुछ भी कहने से पहले

कि कितने पेचो-खम* से गुज़री हैं राहें बलन्दी…

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Added by शिज्जु "शकूर" on May 26, 2015 at 8:00pm — 20 Comments

मेरी बेटी( दूसरी कविता) मनोज कुमार अहसास

मेरी बेटी

तपता सूरज

जब माथे पर सुलग रहा है

दो बातें अपने सीने की तेरे हिस्से मे रखता हूँ

ये सूरज एक बड़ा परीक्षक

ये सूरज एक बड़ा तपस्वी

ये सूरज एक सत्य अटल है

ये सूरज एक महा अनल है

इस सूरज के संरक्षण मे

जीवन के सब अर्थ खुलेगे

इस सूरज के साथ तू चलना

देख गगन से शब्द मिलेगें

चुपके चुपके....सुलग सुलग कर

चमक में हिस्सा मिल जाता है

तपते रहने से रंग जीवन का

एक ना एक दिन खिल जाता है

तपना जीवन को रंगना है

वरना सब फीका… Continue

Added by मनोज अहसास on May 26, 2015 at 7:16pm — 26 Comments

परित्यक्ता लघुकथा

"रामकली कँहा जा रही है ? "
"अरे !जिज्जी कहूँ नई इताइ आ जा र्इ हो।"
"काय री रामकली जो माथों सुनो तोहरी बिंदी कहा गई री ?और मांग भी सुनी है?"
"अरे सपरो हतो सो गिर गई हुहे"।
" हे राम !जा जिज्जी तो और अबै सबरो भेद खुल जातो ।हम तो पेंशन लाने जो सब कर रहे हते।का होत है दो पल सुहाग छुड़ा के सरकार से पैसा लेबे में।"
और रामकली पति के साथ होते हुए भी सरकारी परित्यक्ता की पेंशन लेने चली जाती है।

बबिता चौबे शक्ति
मौलिक व् अप्रकाशित

Added by babita choubey shakti on May 26, 2015 at 3:00pm — 10 Comments

रद्दी (लघुकथा)/रवि प्रभाकर

‘इन किताबों की जिल्दें उखाड़ कर गत्ता अलग करो, और इन पैक की हुई किताबों को भी खोलो।‘ कबाड़ की दुकान का मालिक अपने नौकरों को आदेश दे रहा था
‘ये इतनी सारी रद्दी कहाँ से ले आए ?’ एक नौकर ने पूछा
‘वो जो पीछे लाल कोठी वाले साहिब हैं न, जो विश्वविद्यालय में साहित्य विभाग के अध्यक्ष हैं, उन्हीं के घर से लाया हूँ।’
(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on May 26, 2015 at 2:57pm — 11 Comments

फासले(कविता,मनन कु सिंह)

दरमियाँ के फासले जाने लगेंगे एक दिन,

आते-आते याद हम आने लगेंगे एक दिन।

जगते-सोते ख्वाब हम सहेजते तेरे अभी

अब तेरे ख्वाब हम आने लगेंगे एक दिन।

अपने दीये जले घर तेरे,ऐसा लगता है,

दीप तेरे अपने घर छाने लगेंगे एक दिन।

तेरी हीधुन को सहेजे गीत पिरोये मैंने जी,

मेरे नगमे तेरे लब आने लगेंगे एक दिन।

चाहतें अपनी मुकम्मल नाम तेरे हो गयीं,

हम तुझको लगताअबभाने लगेंगे एक दिन।

मांगता हूँ जिंदगी,तो भाव खाती जिंदगी,

जिंदगी से भाव हम खाने लगेंगे एक…

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Added by Manan Kumar singh on May 26, 2015 at 10:00am — 5 Comments

अनमोल मोती : (लघुकथा)

" माँ .... काकी माँ ....बेटी ......दीदी ....", ---चारों ओर से पुकारती ये आवाज़ें सुधा के कानों में अमृत घोलती ।

" सुधा .....! ", --अचानक चौंक गई आवाज़ को सुनकर ।

" क्या लेने आए हो अब ? "-- उसको देखते ही सुधा की आँखों में रोष उतर आया था ।

" मैं बहुत शर्मिन्दा हूँ सुधा ... मुझे माफ कर दो । " -- गिड़गिड़ा रहा था रवि ।

" क्यों वो चली गई क्या किसी और के साथ ; जिसके लिए मुझे छोड़ गए थे । "

" प्लीज़ सुधा ; मैं अपराधी हूँ तुम्हारा । घर चलकर जो भी सजा दोगी मंजूर है । "…

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Added by sunanda jha on May 26, 2015 at 6:30am — 10 Comments

-: खींच अहं के मग से डग प्रभु :-

-: खींच अहं के मग से डग प्रभु :-  (संसोधित)

खींच अहं के मग से डग प्रभु,

रख लें अपने चरणों में ||

है परम कांति अरु चरम शांति जो,

और किसी ना शरणों में |

सजा हुआ मद की बेड़ी मे,

जड़ा हुआ हूँ कहीं सिखा पर,

तोड़ एकांकी अहं का आसन,

मिला लें पद रज-कणों में |

खींच अहं के मग से डग प्रभु,

रख लें अपने चरणों में ||

यह राह नहीं है सीधा-सादा ;

मैं निकल पड़ा जिसपर |

रसहीन…

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Added by SHARAD SINGH "VINOD" on May 25, 2015 at 8:00pm — 12 Comments

बदलती गंध--

भागते हुए किसी तरह सबको चढ़ाकर वो ट्रेन में घुसे और अपनी फूली हुई साँसों को क़ाबू में करने की चेष्टा करने लगे। पत्नी और बच्चे उस भीड़ में घुस गए थे और बैठने की जगह तलाश रहे थे। गर्मी के दिन , छुटियों का समय , आरक्षण मिलना लगभग नामुमकिन था इसलिए आज ऐसी यात्रा करनी पड़ रही थी उनको।

सांसें सामान्य हुईं तो अजीब सी दुर्गन्ध महसूस होने लगी , लोगों के पसीने और सांसों की गंध। अब उनको बेचैनी महसूस होने लगी , फिर ध्यान आया कि परिवार को जगह मिली की नहीं, और थोड़ा अंदर घुसे। पत्नी और बच्चे किसी तरह सीट…

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Added by विनय कुमार on May 25, 2015 at 1:49pm — 20 Comments

गुलदस्ता - .......३ मुक्तक

गुलदस्ता - ........३ मुक्तक

हर लम्हा ....



जब भी  ये  दिल उदास होता है

जाने कौन  आस  पास  होता है

मेरी तन्हाई को  साँसे देने वाले

हर लम्हा तेरा अहसास होता है

..............................................

तमाम सांसें .....

आपकी हर अदा  को  सलाम करते हैं

अपनी मुहब्बत .आपके नाम करते हैं

वजह बन गए हैं जो हमारे ख़्वाबों की

तमाम सांसें .हम उनके नाम करते…

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Added by Sushil Sarna on May 25, 2015 at 1:30pm — 17 Comments

कविता : अमन

मेरा मज़हब सच्चा है

अमन सिखाता है

खूंरेजी से नफरत है हमें

और नाज़ है मुझे अपने मज़हब पर

कुछ लोग फैलाते हैं झूठी सच्ची कहानियां

कि हम दुश्मन हैं अमन के

कि हम नफरतें बांटते हैं

कि हमें क़द्र नहीं इंसानी जानों की

क़सम है मुझे अपने पुर अम्न मज़हब की

जो मुझे मिल जाएँ वो लोग जो फैलातें हैं ये…

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Added by saalim sheikh on May 25, 2015 at 11:51am — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल - गीत कविता ग़ज़ल रुबाई क्या ? // --सौरभ

२१२२ १२१२ २२

साफ़ कहने में है सफ़ाई क्या ?

कौन समझे पहाड़-राई क्या ?



चाँद-सूरज कभी हुए हमदम ?

ये तिज़ारत है, ’भाई-भाई’ क्या ?



सब यहाँ जी रहे हैं मतलब से

मैं…

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Added by Saurabh Pandey on May 25, 2015 at 11:00am — 52 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- एक प्रयास (मिथिलेश वामनकर)

मुफ़तइलुन / मफ़ाइलुन/  मुफ़तइलुन / मफ़ाइलुन  (इस्लाही ग़ज़ल)

2 1 1 2 /  1 2 1 2 /  2 1 1 2 /  1 2 1 2

 

गम दे, ख़ुशी दे ज़िन्दगी, कितनी किसे हिसाब क्या              

दरिया फ़ना हयात का,   मुझसा वहां हुबाब क्या                    …

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Added by मिथिलेश वामनकर on May 25, 2015 at 9:30am — 39 Comments

विवाह(कविता)

जरुरी है क्या कि प्रेम हो तो विवाह भी हो?
गर कहीं हो जाये तो आगे निर्वाह भी हो?
आज का प्रेम है,पुरखों की बात पुरानी हुई,
जरुरी है क्या सबके मन में उछाह भी हो?
साथ का सिलसिला चलता रहेगा आगे भी,
जरुरी है क्या तेरे लिए मन में कराह भी हो?
जरूरतों का कुछ भी तो नाम होना चाहिए,
ढेर-सारी जरूरतों के आगे तो विवाह भीहो!
प्रेम हो,फिर विवाह,चाहे विवाह हो तब प्रेम,
प्रेमपूर्ण हो,फिर वही विवाह तो विवाहभी हो!
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

Added by Manan Kumar singh on May 25, 2015 at 6:59am — 7 Comments

ग़ज़ल

रफ्ता रफ्ता जिंदगी की आरजू जाती रही ।

दरमियाँ तन्हाइयों के मौत कुछ गाती रही ।।



मत कहो वो बेवफा थी आसनाई में मिरे।

वो खयालो में मेरे यूँ रात भर आती रही।।





बारिशें मुमकिन कहाँ जो भीग जाते हम कभी ।

बनके सावन की घटा ता उम्र वो छाती रही ।।





रोज़ रुसवाई की चर्चा फ़िक्र का अपना शबाब।

मैं जलूँगी ख़ाक होने तक कसम खाती रही ।।





फिर समंदर ने गुजारिश की है लहरो से यहां।

साहिलों की तश्नगी पर जुल्म क्यों ढाती रही ।।…



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Added by Naveen Mani Tripathi on May 25, 2015 at 1:30am — 15 Comments

स्वप्न-भाव

             स्वप्न-भाव

मुझको सपने याद नहीं रहते

दर्द की कोख से जन्मे एक सपने के सिवा

आत्मीय पहचान का गहरापन ओढ़े

बार-बार लौट आता है वह

पलकों के पीछे के अंधेरों से धीरे-धीरे

जीवन के अंगारी तथ्यों की…

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Added by vijay nikore on May 24, 2015 at 8:30pm — 16 Comments

औरत(कविता)

मजदूर कह औरत की तौहीन मत कर,
गम हैं बहुत उसे,और गमगीन मत कर।
उसके आँसू लबरेज हैं तीखी कथाओं से,
अब उन्हें देख,ज्यादा नमकीन मत कर।
खूब धुली अबतक कलम उसकी धार में,
लेखनी को देख,ज्यादा हसीन मत कर।
अर्थ की माफिक उसकी हकीकत कब ?
अर्थ वह खुद, खुद को जहीन मत कर।
नूर बख्शती रही वह ज़माने को कबसे,
छोड़ फिकरे,फिर पर्दानशीन मत कर।
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन(01/05/2015)

Added by Manan Kumar singh on May 24, 2015 at 8:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल बतौर-ए-ख़ास ओबीओ की नज़्र

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन



कहूँ,ओबीओ से में क्या चाहता हूँ

ग़ज़ल की सुहानी फ़ज़ा चाहता हूँ



यही आरज़ू लेके आया हूँ यारो

मैं इस मंच को लूटना चाहता हूँ



ये समझो मुझे कुछ भी आता नहीं है

मैं सब कुछ यहाँ सीखना चाहता हूँ



जुड़े भाई'मिथिलेश' ही सब से पहले 

मैं उनसे ग़ज़ल की अदा चाहता हूँ



ये'गिरिराज' तो मेरे हम अस्र ठहरे

मैं उनसे भी लेना दुआ चाहता हूँ



बहुत कुछ मुझे उनसे करना है साझा

मैं 'सौरभ' से इक दिन मिला चाहता…

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Added by Samar kabeer on May 24, 2015 at 6:30pm — 67 Comments

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