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लधुकथा

"बेमेल रिश्ता"
_______________________

सुशील के लेखन में निहित नकारात्मक सोच ने सुमन को आज फिर दुविधा में डाल दिया।
जब लेखन में इतना कठोर तो वास्तव जीवन में .....!!!!

उसने तय कर लिया मुझे भविष्य की रूदाली नहीं बनना ।

"तुम्हारा लेखन महिला विरोधी और मैं महिला सम्मान की पुजारी । हमारा मेल नामुमकिन है सुशील जी । "
एक म्यान में दो तलवार भला कैसे रह सकती है।



नीता कसार
जबलपुर

मौलिकअप्रकाशीत

Added by Nita Kasar on May 24, 2015 at 4:10pm — 6 Comments

ग़ज़ल -नूर - कुछ और मुझ में जीने की हसरत बढ़ा गया

गागा ल/गा लगा/लल गागा/ लगा लगा   



कुछ और मुझ में जीने की हसरत बढ़ा गया

वादा किया था आने का, सचमुच में आ गया.

.

इक रोज़ मुझ से कहते हुए “ख़ूब लगते हो”

वो अपनी आँख का मुझे काजल लगा गया.

.

काफ़िर अगर जो मैं न बनूँ  और क्या बनूँ ?

दिल के हरम को छोड़ के मेरा ख़ुदा गया.

.

उट्ठा मैं हडबड़ा के टटोला इधर उधर,

ख़्वाबों में कौन आया, जगाया, चला गया. 

.

पत्ते झडे जो पक के करे उन का सोग कौन  

अफ़सोस है खिज़ा को... कि पत्ता हरा…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 24, 2015 at 1:30pm — 22 Comments

तू कितनी अजीज है(कविता)

तू कितनी अजीज है!(ककिता)
कैसे कहें ये दास्ताँ कि तू कितनी अजीज़ है
क्या पता कबआया दिल आजाने की चीज है
उड़ने लगीं हवाएँ जब तेरी जुल्फों से टकरा
तब लगा हर शय तुम्हारे सामने नाचीज है।
दिल को रहें सँभालते दिललगी से डर जिन्हें
लगता हर बंदा जहाँ में हुश्न का मरीज है।
कितनी कलाएँ चाँद की तेरे मुखड़े की बला,
चूमती हो गैर को,देख मुझको तो खीज है।
गड़ गयीं नजरें जहाँ की देख तेरी हर लहर,
भीड़ से रौंदा गया मैं,फट गयी कमीज है।
'मौलिक व अप्रकाशित'

Added by Manan Kumar singh on May 24, 2015 at 11:00am — 3 Comments

एकान्त की काकी....

एकाकीपन

उदासियां--!

मन के कोनो अतरों में जीती

सुबह -दोपहर-सायं

एकान्त की काकी, एकाकी

क्यों ? न पालती अपने नौलिहाल

रस-छन्द-अलंकारों को

अलसाई तन्द्रा

इन्द्रधनुषी रंग में रॅगती- कोरी चुनरी

ईर्षा,-द्वेष, छल-कपट से टॉकती

अहं के चमकते सितारे

अति निष्ठुर ।

हथेली की उॅगलियों में फॅसी ध्रुम द-िण्डका

रह-रह कर जलती- बुझती.....कुढ़ती

आवारा काले बादलों सा उगलती ....धुआँं

कलेजों के टुकड़ाें की धौंकनी बढ़ जाती…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 24, 2015 at 9:30am — 5 Comments

अनुभव (दोहे)

जीवन के जिस राग  का अनुभव में था ताप l  

बिन उसके जीवन वृथा, धन-वैभव या शाप ll 

 

भय वश मैं झिझका रहा प्रेम न फटका पास l 

गहरी नदिया पास थी अमिट और भी प्यास ll

 

मैं क्या जानूं उसे जो,   छिप कर करता वार  l

जीवन-रस अमृत सही,  छलक रहा हो सार  ll

 

कुछ तो फूटा है यहाँ, फैला है अनुराग l

बिन बदली भीगा बदन, ठंढी-ठंढी आग ll

 

यह सुगंध अनुराग की बढ़ा रही है चाह…

Continue

Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on May 24, 2015 at 6:00am — 8 Comments

दाँव--

गाँव में एक नयी बीमारी का प्रकोप फैला और लगातार कुछ बच्चों की मौत हो गयी । एक तरफ जहाँ लोग भयभीत थे वहीँ दूसरी तरफ ठाकुर के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी ।
अगले दिन उसके कोठी के पास अपनी कोठरी में रहने वाली अकेली विधवा को लोगों के हुजूम ने डायन कह कर गाँव से बाहर खदेड़ दिया ।
बच्चों की मौत का सिलसिला तो नहीं रुका लेकिन वो ज़मीन अब ठाकुर की थी ।
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 24, 2015 at 2:34am — 12 Comments

चेहरे

'''''''''''''''''चेहरे '''''''''''''''

गिरगिट का रंग का पहचानना.......

बिलकुल कठिन नहीं.....................

समंदर की गहरे नापना ...............

उसकी हलचल जान पाना ............

बड़ा ही सरल है यह सब................

बादलों की रंगत को...........................

उठने वाले तूफ़ान को.........................

आकलन कर लेना भी सरल है.............

पर कठिन है तो

किसी के चेहरे को पहचान पाना...........

उसे पढ़ पाना...............

उसे जान… Continue

Added by Sahil verma on May 23, 2015 at 11:40pm — 2 Comments

मां सरस्वती - वन्दना...

गीतिका छंद......गीतिका छ्न्द में 14-12 के क्रम में कुल 26 मात्राएं होती हैं.  इस छंद की प्रत्येक पंक्ति की तीसरी, दसवीं, सत्रहवीं व चौबिसवी मात्राएं अनिवार्य रूप से लघु ही होती हैंं.

मां सरस्वती - वन्दना

शारदे मां वर्ण-व्यंजन में प्रचुर आसक्ति दो।

शब्द-भावों में सहज रस-भक्ति की अभिव्यक्ति दो।।

प्रेम का उपहार नित संवेदना से सिक्त हो।

हर व्यथा-संघर्ष में भी क्रोध मन से रिक्त हो।।1

वृक्ष सा जीवन हमारा हो नदी की भावना।

तृप्त ही…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 23, 2015 at 11:00pm — 4 Comments

मन ने सुना

धीरे से कहा जो तुमने,

वो मेरे मन ने सुन लिया।

तुम नहीं थे समीप मेरे,

फिर भी मैंने तुम्हें देख लिया।

अधरों पर थी बात ही और,

जिसका अर्थ हृदय ने समझ लिया।

तुम भूले नहीं थे मुझे,फिर भी

तुमने भूलने का-सा अभिनय किया।

है निवास हृदय में मेरा ही,

किन्तु कुछ और ही दिखला दिया।

सोचा करते हो केवल मुझे,

पर काम कुछ और बता दिया।

कहते हो कि कुछ भी नहीं,

पर अधिकार अपना जता दिया।

मेरी समीपता से ही होते हो

विचलित,स्वभाव इसे…

Continue

Added by Savitri Rathore on May 23, 2015 at 7:30pm — 3 Comments

कविता

नव - स्पंदन

____________





मृगतृष्णा कैसी यह

कौन सी चाह है

दिनमान हैै जलता हुआ

ये कौन सी राह है



चल रही हूँ मै यहाँ

एक छाँह की तलाश में

मरू पंथ में यहाँ

कौन सी तलाश है



बाग वन स्वप्न सरीखे

कलियाँ कहाँ कैसी भूले

मन की तलहटी में

प्रिय का निवास है



सुरम्य वादी है वहां

छुपी हुई एक आस है

मुँद कर पलकों को

प्रिय दर्शन की आस है



प्राण की सुधी ग्रंथी में

आजतक हो बसे

जलती रही… Continue

Added by kanta roy on May 23, 2015 at 6:36pm — 15 Comments

कोशिश______मनोज कुमार अहसास

122 122 122 122









हक़ीक़त नहीं मैं धुँआ चाहता हूँ

तिरी ओर से बस दगा चाहता हूँ



तु मुझको सफ़र में कही छोड़ देना

फकत दो कदम को सना चाहता हूँ



जहाँ तक मुझे तोड़ देगा ज़माना

वहीँ तक सदा की हवा चाहता हूँ



नहीं साथ तेरा अगर ज़िन्दगी में

तिरी रहगुजर में कज़ा चाहता हूँ



ज़रा तोड़कर ये परत बेबसी की

कहीं दूर अब मै उड़ा चाहता हूँ



फ़क़ीरी मेरी वो कदम से लगा लें

अमीरी का उनकी नशा चाहता हूँ



बहुत… Continue

Added by मनोज अहसास on May 23, 2015 at 4:30pm — 3 Comments

ठूंठ होते गांव - लघुकथा

"ठीक है पिताजी। मान लो आप कि मैं नास्तिक हूँ और रीति रिवाज नही मानता।" बेटे ने सजल आँखो से कहा।

"बेटा। एक तुम्हारे ना मानने से समाज के रिवाज खत्म नही हो जायेगें।" व्यथित मन से पिता ने जवाब दिया।

"जानता हूँ नही खत्म होगें। लेकिन इस कठोर परम्परा के लिए हर दिन पेड़ो से काटी जाने वाली लकड़ी के कारण ठूंठ होते गांव में एक नई परम्परा की शुरूआत तो हो सकती है।" कहते हुये बेटे ने रूंधे लेकिन कड़े मन से गांव में पहली बार मगांयी गयी बिजली शव दाह घर की गाडी में अपनी पत्नि के शव को ले जाने की तैयारी…

Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on May 23, 2015 at 4:18pm — 3 Comments

पगली बदली चाँद को ही खा गयी

2122 2122 212

चाँदनी बदली को इतना भा गयी 

पगली बदली चाँद को ही खा गयी 

जिसको रोता देख हमने की मदद

वो ही बिपदा बन मेरे सर आ गयी 

हक़ की मैंने की यहाँ है बात जब 

गोली इक बन्दूक की दहला गयी 

जिस घड़ी लव पे हँसी आयी मेरे 

वो उसी पल अश्क से नहला गयी 

जान से मारा मगर जब बच गया 

आ मेरे घावों को वो सहला गयी 

Added by Dr Ashutosh Mishra on May 23, 2015 at 1:43pm — 12 Comments

" प्यार " - लघु कथा

"नही! मैं नही करती तुमसे प्यार।" यही कहा था मैंने उस दिन इसी जगह पर, ऐसी ही किसी शाम में।

"करने लगोगी, शादी के बाद।" तुम हॅस पड़े थे।

और फिर चंद हफ्तो बाद ही मैं दुल्हन बनी तुम्हारे घर आ गयी। उसके बाद जब भी तुमने ये सवाल किया मैं चुप रही, अब मन की बात नही बोल सकती थी न। और फिर एक दिन निकल गयी तुम्हारे जीवन से। 'उसी के' साथ जिससे 'मैं' प्यार करती थी।............

..........जल्दी ही लौट आयी थी मैं, उसके प्यार का जहर पीकर पर देर हो चुकी थी उसने मुझसे 'मनचाहा' पा कर मुझे छोड़ दिया…

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Added by VIRENDER VEER MEHTA on May 23, 2015 at 10:00am — 10 Comments

मजबूरी (लघुकथा )

"एइ जे ! हाजरा मोड़ जाएगा ? "

"हाँ साहेब, जाएँगे ।"

"किराया कितना ?"

"बीस टाका !"

"गला काटता है रे ...!! "

"नहीं साहेब , ऑटो तो पचास टाका लेगा ।"

"ओ ले शकता है, पेट्रोल से जो चलता है ना ।"

"ठीक है साहेब ...जो मर्जी दे दीजिएगा ।" पेट्रोल का कीमत सब को पता है, खून का कीमत? सोचता रिक्शा खींचने लगा ।

"बस बस ...! यहीं रोको ...!" दस रूपये रख कर चलता बना ।

जेब से दिन भर की कमाई निकाल कर हिसाब लगा रहा था बुधिया... रिक्शा का किराया देने…

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Added by sunanda jha on May 23, 2015 at 9:30am — 10 Comments

थोड़-थोडा(कविता)

थोड़ा-थोड़ा तुझसे अटकने लगा हूँ,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं भटकने लगा हूँ।

छोटी-छोटी बातें न समझा कभी,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं समझने लगा हूँ।

गरजा हूँ बहुत पहले बातों पे  मैं,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं सरसने लगा हूँ।

बदली वह लदी  कब से ढोये चला ,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं बरसने लगा हूँ।

शुकूं में था प्यासा,नजर तेरी पी के ,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं तरसने लगा हूँ।

कहाँ-कहाँ अबतक अटकता रहा था,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं झटकने लगा हूँ।

भटकता फिरा हूँ मैं ,तेरी नजर में

थोड़ा-थोड़ा अब मैं…

Continue

Added by Manan Kumar singh on May 23, 2015 at 7:00am — 3 Comments

बड़प्पन--

" मैंने तो बिना पैसे दिए ही शॉपिंग कर ली | वो बाजार में एक छोटी सी किराने की दुकान है न , आज वहां चली गयी थी | सामान लेने के बाद उसने पैसे लेने से इंकार कर दिया, बोला कि वो आपको जानता है और इसलिए पैसे नहीं लेगा "|
वो सोच में पड़ गया , अपने गाँव का छोटी जात का दुकानदार , जिसकी बेटी की शादी में १०१ रुपये देकर उसने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली थी |
आज वो अपने आप को बहुत छोटा महसूस कर रहा था |
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 22, 2015 at 9:48pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अतुकांत - वार्तायें कैसी हों ( गिरिराज भंडारी )

वार्तायें ,

किसी सर्व समावेशी बिन्दु की तलाश में

अपने अपने वैचारिक खूँटे से बंधे बंधे क्या सँभव है ?

आँतरिक वैचारिक कठोरता

क्या किसी को विचारों के स्वतंत्र आकाश में उड़ने देता है ?

सोचने जैसी बात है

 

वार्तायें अपने अपने सच को एन केन प्रकारेण स्थापित करने के लिये नहीं होतीं

न ही लोट लोट के किसी भी बिन्दु को स्वीकार कर लेने लिये ही होती हैं

 

वार्तायें होतीं है

अब तक के अर्जित सब के ज्ञान को मिला के एक ऐसा मिश्रण…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 22, 2015 at 4:36pm — 6 Comments

टपकती टोंटियाँ (लघु कथा)// शुभ्रांशु पाण्डेय

चटक धूप. आसमान में उड़ते-उड़ते गला सूख गया था. पानी की एक बूँद कहीं नजर नहीं आ रही थी. पानी या तो बोतलों में बन्द था या  वहाँ स्वीमिंग पूल में था , लेकिन स्वीमिंग पूल के ऊपर लगी जाली के कारण पाना सम्भव नहीं था.

इस प्रचंड गर्मी में सजे-धजे साफ़-सूथरे शहर में प्यास से व्याकुल चिडियों को खसर-खसर करते वो चापाकल, उनके किनारे की खुली नालियाँ, लगातार टपकती म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की टोटियों की बहुत याद आ रहीं थी.

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Shubhranshu Pandey on May 22, 2015 at 3:00pm — 14 Comments

आसमां ____मनोज कुमार अहसास

जैसी ज़मीन हो गयी वैसा ही वो हुआ

दूरी से नहीं बेरुखी से आसमां हुआ



पत्थर का शहर हाथ में खंज़र लिए हुए

रोता था मेरी याद में सर नोचता हुआ



ऐसी भी भरी भीड़ न देखी कभी दिलबर

एक ज़िन्दगी में दर्द का मेला लगा हुआ



वैसे तो तुझे भूल भी जाऊ मै जिंदगी

लेकिन ये तेरी याद का जीवन बना हुआ



उस पार का भी गम मेरी आँखों में है मगर

लेकिन ये कफ़न वक़्तका मुझपर पड़ा हुआ



जाता नहीं है आँख से मंज़र कभी भी वो

मै ख़त जला रहा था उसी का लिखा… Continue

Added by मनोज अहसास on May 22, 2015 at 5:30am — 4 Comments

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