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फ़िक्र--

" हेलो , पापा , आप समय से अपनी दवा खा लेना "| बेटी के शब्द सुनकर उन्होंने सुकून की सांस ली | अभी कल ही उसने फोन नहीं किया तो एकदम परेशान हो गए और वापस आते ही पूरा लेक्चर दे डाला |
आज भी हड़बड़ी में वो भूल ही गयी थी पर एक बुज़ुर्ग को सामने देखते ही याद आ गया | पता तो उसको भी है और पापा को भी है , फोन तो सिर्फ बहाना है ये बताने के लिए कि आज भी वो सकुशल पहुँच गयी है |
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 18, 2015 at 2:04am — 20 Comments

मन का गुबार (लघुकथा) // --शुभ्रांशु

 “हैलो माँ ! कैसी हो ? खाना खा लिया ? भाभी का क्या हाल है?” माला ने फ़ोन पर अपनी माँ से सवालों की झड़ी लगा दी.

“कहाँ खाया है बेटा? एक तू है जो रोज़ फ़ोन करके आधा-एक घंटा बात कर मन हल्का कर देती है. वर्ना तेरी भाभी को तो हमसे कोई मतलब ही नहीं. बस लगी रहती है अपने कमरे में.. फ़ोन पर.. जब खाना बन जायेगा तो खा ही लूँगी..”, माँ का शिकायत भरे लहजे में जबाब आया.

“ऐसे थोडे ही चलेगा, माँ !“

तभी अन्दर के कमरे से माला की सास की आवाज आयी, “ बहूऽऽ, दोपहर होने को आयी, सुबह का नाश्ता भी…

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Added by Shubhranshu Pandey on May 17, 2015 at 11:30pm — 27 Comments

ग़ज़ल -- मुझको सुकून-ए-दिल किसी दर पर नहीं मिला ( बराए इस्लाह )

२२१-२१२१-१२२१-२१२



दिल जिस से आशना हो वो मन्ज़र नहीं मिला

मैं तिश्नालब ही रह गया, सागर नहीं मिला



पथरीले रास्तों पे ही चलता रहा हूँ मैं

सफ़रे हयात में मुझे रहबर नहीं मिला



अपनी बुराइयों से यूँ अन्जान हूँ अभी

मैं खुद से एक बार भी खुलकर नहीं मिला



बुझते दियों को शब्दों से रोशन जो कर सके

महफ़िल में ऐसा कोई सुखनवर नहीं मिला



साहिल पे ही तू बैठ के क्या सोचे ए बशर

मेहनत बिना किसी को भी गौहर नहीं मिला



इसकी तलाश में… Continue

Added by दिनेश कुमार on May 17, 2015 at 9:34pm — 22 Comments

पहचान लघुकथा

पहचान

"दादू दादू क्या कर रहे हो ।"

"कुछ नही बेटा झंडा सिल रहा हूँ।"

इतने सारे ?

"हाँ बेटा परसो 15 अगस्त है न सिलकर देना है।"

"क्यों दादू? इतने झंडे का क्या करेंगे वो !"

" बेटा !!स्कूल कॉलेज और सभी जगह लहराएंगे ।"

ओह !"और ये काला निशान क्या है?"

ओहो !!"बेटा बैठ मेरे पास सब बताता हूँ ।"

"ये हरा कपड़ा है न, इसका मतलब होता है हरयाली ,दूसरा है सफ़ेद इसका मतलब है पवित्रता, तीसरा है केसरिया इसका मतलब है शौर्य, और ये काला निशान अशोक चक्र है।यह झंडा भारत की… Continue

Added by babita choubey shakti on May 17, 2015 at 5:54pm — 3 Comments

ग़ज़ल -नूर : ये दुआ है फ़क़त दुआ निकले

२१२२/१२१२/२२ (११२)



जब भी लफ़्ज़ों का काफ़िला निकले

ये दुआ है, फ़कत दुआ निकले.

.

कोई ऐसा भी फ़लसफ़ा निकले

ख़ामुशी का भी तर्जुमा निकले.

.

सुब’ह ने फिर से खोल ली आँखें  

देखिये आज क्या नया निकले.

.

हम कि मंज़िल जिसे समझते हैं  

क्या पता वो भी रास्ता निकले.

.

लुत्फ़ जीने का कुछ रहा ही नहीं

क्या हो गर मौत बे-मज़ा निकले?     

.

रोज़ चलता हूँ मैं, मेरी जानिब

रोज़ ख़ुद से ही फ़ासला निकले.

.

गर है कामिल^,…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 17, 2015 at 5:42pm — 25 Comments

तृषा जीवन की …

न स्याम भई न श्वेत भयी …


न स्याम भई न श्वेत भयी
जब काया मिट के रेत भयी
लौ मिली जब ईश की लौ से
भौतिक आशा निस्तेज भयी
यूँ रंग बिरंगे सारे रिश्ते
जीवन में सौ बार मिले
मोल जीव ने तब समझा
जब सुख छाया निर्मूल भयी
सब थे साथी इस काया के
पर मन बृंदाबन सूना था
अंश मिला जब अपने अंश से
तब तृषा जीवन की तृप्त भयी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 17, 2015 at 12:30pm — 16 Comments

ख़ुद ही देखी है किसी को न दिखाई मैंने

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन/फ़इलुन



ख़ुद ही देखी है किसी को न दिखाई मैंने

तेरी तस्वीर तसव्वुर से बनाई मैंने



ख़ाक पड़ जाएगी कितने ही हसीं चहरों पर

आईने से जो कभी गर्द हटाई मैंने



मुझको पाबंदियाँ ओरों की गवारा ही नहीं

ख़ुद ही अपने लिये ज़ंजीर बनाई मैंने



अपनी ग़ज़लों से संवारूँगा ये बज़्म-ए-हस्ती

उम्र सारी इसी चक्कर में गँवाई मैंने



अर्श हिलता है ,ज़मीं काँपने लगती है,यही

आह-ए-मज़लूम की तासीर बताई मैंने



वो भी बैज़ार नज़र… Continue

Added by Samar kabeer on May 17, 2015 at 11:19am — 39 Comments

ग्राहक सेवा--

" साहब , पइसा जमा करना है , पर्ची नाहीं दिखत है | मिल ज़ात त बड़ा मेहरबानी होत ", डरते डरते उसने कहा |

" अब केतना पर्ची छपवायें हम लोग , पता नाहीं कहा चुरा ले जाते हैं सब ", बड़बड़ाते और घूरते हुए हरिराम स्टेशनरी रूम में घुसे | थोड़ी देर बाद जमा पर्ची लाकर उसके सामने पटक दिया और बोले " बस एक ही लेना , कुछ भी नहीं छोड़ते लोग यहाँ "|

पूरे गाँव को पता था , हरिराम के व्यवहार के बारे में लेकिन सब झेल जाते थे | एक ही तो शाखा थी बैंक की वहां और सबको वहीँ जाना होता था | एकाध ने मैनेजर से शिकायत की…

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Added by विनय कुमार on May 17, 2015 at 2:48am — 15 Comments

अधूरे गीत(कहन)______________मनोज कुमार अहसास

मन के सारे गीत अधूरे,फिर से तुझ को अर्पण है

तुझको मन की बात कहूँ मैं,ऐसा अब फिरसे मन है



मर्यादा का एक महल है जिसमे विरह का आँगन है

ख़ामोशी की एक चिता है पल पल जलता जीवन है



संबंधो में प्रेम कहाँ है प्रेम की अब वो रीत कहाँ

मित्र नयन से जुदा है काजल और तरसता दर्पण है



दुःख,पीड़ा,अवसाद,तपस्या,करुणा,संयम और साहस

उस जीवन में नैसर्गिक है इस जीवन में आयोजन है



टूट गयी है डोर विरह की कैसे कहन का रूप सजे

जीवन की इस भाग दौड़ में बस बेकार का… Continue

Added by मनोज अहसास on May 16, 2015 at 11:30pm — 8 Comments

प्रकृति की पड़ी मार सबने सहा

हमें ईश से ढेर सारे गिले |

नहीं अब सहारा कहीं पे मिले |

प्रभो शक्ति जितना हमें है दिया |

बड़ी मुश्किलों से सहारा किया ||

 

प्रकृति की पड़ी मार सबने सहा |

महल स्वप्न का देखते ही ढहा |

छिना छत्र माता पिता का कहाँ ?

बची फ़िक्र भूखी बहन का यहाँ ||

 

अभी गति हमारी बड़ी दीन है |

बिना नीर जैसे दिखे मीन है |

प्रकृति के कहर से बहन भी डरी |

बड़ी मुश्किलों से डगर है भरी ||

 

मौलिक व…

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Added by SHARAD SINGH "VINOD" on May 16, 2015 at 7:47pm — 2 Comments

कहानी : नफ़रत

(१)

दो पहाड़ियों को सिर्फ़ पुल ही नहीं जोड़ते

खाई भी जोड़ती है

-   गीत चतुर्वेदी

 

कोई किसी से कितनी नफ़रत कर सकता है? जब नफ़रत ज़्यादा बढ़ जाती है तो आदमी अपने दुश्मन को मरने भी नहीं देता क्योंकि मौत तो दुश्मन को ख़त्म करने का सबसे आसान विकल्प है। शुरू शुरू में जब मेरी नफ़रत इस स्तर तक नहीं पहुँची थी, मैं अक्सर उसकी मृत्यु की कामना करता था। मंगलवार को मैं नियमित रूप से पिताजी के साथ हनुमान मंदिर में प्रसाद चढ़ाने जाता था। प्रसाद पुजारी को देने के…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 16, 2015 at 6:29pm — 14 Comments

उतरान ........इंतज़ार

तुम चढ़ान हो जीवन की

मैं उतरान पे आ गया हूँ

चलो मिलकर समतल बना लें

हर अनुभूति

हर तत्व की

मिलकर औसत निकालें

कहीं तुम में उछाल होगा

कहीं मुझमें गहन बहाव होगा

चलो जीवन के चिंतन को

मिलकर माध्य सार बनालें

कभी तुम पर्वत शिखर पर हिम होगी

मैं ढलता सूरज होकर भी

तुम्हें जल जल कर जाऊँगा

चलो मिलकर जीवन को

अमृत धार बनालें

कभी तुम भैरवी सा राग होगी

मैं तुम्हारे सुर के पृष्ठाधार में ताल दूंगा 

चलो मिलकर जीवन काया को

समझौतों का एक मधुर…

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Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 16, 2015 at 5:50pm — 6 Comments

चुने कंट........

चुने कंट............शक्ति छंद

दिये से दिये को जलाते चलें।

बढी आग दिल की बुझाते चलें।।

रहे प्रेम का जोश-जज्बा सदा।

चुने कंट सत्यम गहें सर्वदा।।1



नहीं दीन कोई न मजबूर हों।

सभी शाह मन के बड़े शूर हों।।

न कामी न मत्सर सहज प्यार हो।

बहन-भ्रात जैसा मिलन सार हो।।2



यहां सिंधु भव का बड़ा क्रूर है।

लिए तेज सूरज मगर सूर है।। 

यहाँ तम मिटा कर खड़ा नूर जो।

बुलाता उन्हे पास,  हैं दूर जो।।3



भिगोते रहे अश्रु…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 16, 2015 at 5:00pm — 2 Comments

गम नही मुझको............'जान' गोरखपुरी

   २१२  २१२२   १२२२

गम नही मुझको तो फ़र्द होने पर               (फ़र्द = अकेला)

दिल का पर क्या करूं मर्ज होने पर

 

उनको है नाज गर बर्क होने पर

मुझको भी है गुमां गर्द होने पर

चारगर तुम नहीं ना सही माना

जह्र ही दो पिला दर्द होने पर

 

अपनी हस्ती में है गम शराबाना

जायगा जिस्म के सर्द होने पर

 

डायरी दिल की ना रख खुली हरदम

शेर लिख जाऊँगा तर्ज होने पर

 

तान रक्खी है जिसने तेरी…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 16, 2015 at 10:30am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - लगी धूप सी मुझे ज़िन्दगी ( गिरिराज भंडारी )

11212   11212  11212   11212 

 

कभी इक तवील सी राह में लगी धूप सी  मुझे ज़िन्दगी

कभी शबनमी सी मिली सहर जिसे देख के मिली ताज़गी

 

कभी शब मिली सजी चाँदनी , रहा चाँद का भी उजास,  पर  

कभी एक बेवा की ज़िन्दगी सी रही है रात में सादगी

 

कभी हसरतों के महल बने, कभी ख़ंडरों का था सिलसिला  

कभी मंज़िलें मिली सामने , कभी चार सू मिली ख़स्तगी

 

कभी यार भी लगे गैर से , कभी दुश्मनों से वफ़ा मिली

कभी रोशनी चुभी बे क़दर , तो दवा बनी…

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Added by गिरिराज भंडारी on May 16, 2015 at 9:30am — 17 Comments

सिंदूर की लालिमा (अंतिम भाग )...

सिंदूर की लालिमा (अंतिम भाग )........                                         गतांक से आगे.......

मेरा मन सिर्फ मनु को सोचता था हर पल सिर्फ मनु की ख़ुशी देखता था हर घड़ी अन्जान थी मैं उन दर्द की राहों से जिन राहों से मेरा प्यार चलकर मुझ तक आया था ! मेरे लिये तो मनु का प्यार और मेरा मनु पर अटूट विस्वास ही कभी भोर की निद्रा, साँझ का आलस और रात्रि का सूरज, तो कभी एक नायिका का प्रेमी, जो उसे हँसाता है, रिझाता है और इश्क़ फरमाता है, कभी दुनियाभर की समझदारी की बातें कर दुनिया को अपने…

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Added by sunita dohare on May 16, 2015 at 1:30am — 2 Comments

भगवान की तलाश :लघु कथा: हरि प्रकाश दुबे

“वो देख सामने जहां सूरज निकल रहा है , वहीँ अपना घर है, बेकार में भटका मैं दर –दर, सबने कितना समझाया था, मां - पिता और पत्नी कितना रोई थी, पर मुझे तो भगवान की तलाश करनी थी, पर कहीं नहीं मिला बल्कि लोगों ने कभी भिखारी तो कभी ढोंगी समझा, अरे भगवान् कहीं होगा तो घर में भी मिल जाएगा, अब चल वहीँ काम और ध्यान करेंगे ,चल बेटा अब घर चलें ,तूने भी बड़ा साथ निभाया , वो देख सामने नाव भी आ रही है चल तेज़ चल, और आज ही ये गेरुआ वस्त्र इसी गंगा माँ को समर्पित कर दूंगा !”

“इतना सुनते ही उस साधु का…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on May 15, 2015 at 9:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल ; यकायक चराग़ों को क्या हो गया है

122 122 122 122

यकायक चराग़ों को क्या हो गया है
बुझे थे, जले फिर, ये किसकी दुआ है.

चलो और दिन तो है बाकी, रूकें क्यों
शजर पे अभी नूर देखो झुका है.

इसी आरज़ू में कटी ज़िन्दगी ये
पता तो चले क्या हमारा हुआ है.

अभी छू नहीं सर्द हांथों से ऐ शब
अभी तो मुझे उसने मन से छुअा है.

मुहब्बत किसे रास आई है इसमें
अमीरी, ग़रीबी, ज़माना, जुआ है.

- श्री सुनील

मौलिक व अप्रकाशित

Added by shree suneel on May 15, 2015 at 5:02pm — 35 Comments

प्यासी देह .....

प्यासी देह .....

मन की कंदराओं में किसने .......

अभिलाषाओं को स्वर दे डाले .......

किसकी सुधि ने रक्ताभ अधरों को ......

प्रणय कंपन के सुर दे डाले//

मधुर पलों का मुख मंडल पर ........

मधुर स्पंदन होने लगा .........

मधुर पलों के सुधीपाश में ........

मन चन्दन वन होने लगा//

नयन घटों के जल पर किसकी .......

स्मृति से हलचल होने लगी ........

भाव समर्पण का लेकर काया .......

मधु क्षणों में खोने लगी//

किसको…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 15, 2015 at 9:53am — 26 Comments

आ दुआ करें (कविता)

आ दुआ करें 

आ दुआ करें मिलजुल,

निःस्वार्थ हो बिलकुल,

प्रभु!रचना तेरी चुलबुल,

हँसने दे अभी खुलखुल।…

Continue

Added by Manan Kumar singh on May 15, 2015 at 8:30am — 3 Comments

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