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आउट आफ़ सिलेबस

“पापा, मुझे ज्वाइंट और न्युक्लियर फ़ैमिली के मेरिट्स-डिमेरिट्स के बारे में पढ़ना है.”  राजू ने अपने पापा से कहा.

फिर, चहकते हुये पूछा, "पापा, ज्वाइंट फ़ैमिली में बडा मजा आता होगा न.. सब एक साथ रहते होंगे. खेलने को बाहर भी नहीं जाना पड़ता होगा”, 

“हाँ, बेटा मजा तो बहुत आता था. तेरे दादा-दादी, चाचा-चाची, हमसभी एक साथ रहते थे.. हरतरह से सुख-दुःख में एक साथ.. पर तेरे जन्म के बाद से हम भी न्युक्लियर फ़ैमिली हो गये.”

तभी किचेन से राजू की…

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Added by Shubhranshu Pandey on May 14, 2015 at 10:30pm — 23 Comments

यूँ ही

यूँही दिन तमाम गुजर गए, यूँही शामें ख़ाली निकल गयी

तेरे फैसले ना बदल सके, मेरी आरज़ू ही बदल गयी



कभी बदगुमानी ने डस लिया,कभी बेबसी ने तबाह किया

कभी फ़र्ज़ ओ रिश्तों की बंदिशे,मेरी ख्वाइशो को कुचल गयी



यहाँ कुछ नहीं है वफ़ा हया,ये हवस का भूख का सिलसिला

तेरे साथ मैंने जो की कभी,मुझे नेकियां वो निगल गयी



मेरे झुकते कांधे भी मुझमेँ है,तेरे हौसलो का जुनून भी

कोई बात शेरों में ढल गयी,कोई बात आँखों में जल गयी



यही फैसला ना हुआ कभी,के वो कल था सच… Continue

Added by मनोज अहसास on May 14, 2015 at 6:00pm — 5 Comments

ईश्वर तुम हो क्या ?

ईश्वर तुम हो कि नहीं हो

इस विवाद में मन उलझाये बैठी हूँ

‘हाँ’ ‘ना’ के दो पाटों के बीच पिसी

कुछ प्रश्न उठाए बैठी हूँ

कि अगर तुम हो तो इतने

अगम, अगोचर और अकथ्य क्यों हो

विचारों के पार मस्तिष्क से परे

‘पुहुप बास तै पातरे’ क्यों हो

तुम्हें खोजने की विकलता ने

जब प्राप्य ज्ञान खँगाला 

तो द्वैत, अद्वैत और द्वैताद्वैत ने

मुझको पूरा उलझा डाला

तुम सुनते हो यदि

या कि मुझे तुम सुन पाओ

एक प्रार्थना…

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Added by Tanuja Upreti on May 14, 2015 at 4:35pm — 9 Comments

तमाम मोती हैं सागर में मगर मुझको क्या

१२१२    ११२२   ११२२   २२ 

तमाम मोती हैं सागर में मगर मुझको क्या 

घिरा जो तम में मेरा घर तो सहर मुझको क्या 

हमें वो हीन कहें दींन  कहें या मुफलिस 

बशर तमाम जुदा सब कि नजर मुझको क्या 

बहार आयी चमन में है ये तो तुम देखो

खिजाँ नसीब है; मैं हूँ वो शजर, मुझको क्या 

जो नंगे पाँव ही चलना है मुकद्दर मेरा 

बिछे हों गुल या हो खारों की डगर मुझको क्या 

मेरा नसीब तो फुटपाथ जमाने से रहे 

नसीब उन को महल हैं…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 14, 2015 at 3:33pm — 10 Comments

रूतबा मंत्रालय का ( लघुकथा )

"समीर जी , क्या रूतबा है भई आपका ...!!! जहाँ भी जाते हो ..यार , छा जाते हो ! " --- अजय को गर्व था अपने दोस्त पर । समीर का जलवा तो उसके हर अंदाज़ से ही झलकता था। उसकी बातों से ही मंत्रालय में उसकी पद प्रतिष्ठा का अनुमान चल जाता है। जब साले साहब को मंत्रालय में जरूरी काम करवाने की जरूरत आन पडी तो अजय बडे गर्वित हो साले साहब के साथ मंत्रालय की ओर निकल लिए ।आजतक मंत्रालय के दर्शन भी नही किये थे उसने । दोस्त की मेहरबानी से यहाँ तक आने का अवसर भी प्राप्त हुआ । मन गदगद हुआ जा रहा था । मंत्रालय के…

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Added by kanta roy on May 14, 2015 at 12:30pm — 20 Comments

घूँघट

“सुन री छोटी ! सीख कुछ मुझसे. जब देखो मुंह उघारे घूमती रहे है, घूँघट काढ़ा कर |” “ना जीजी हम नही बन सके तुम्हारे जैसे पर्देदार ! देखी हैं हम तुम्हारी नजर.. घूँघट के पीछे से घूरे है छुटके देवर जी का शरीर जब देखो तब |” “का फायदा ऐसे घूँघट का..?” देवरानी ने पलट जवाब दे मारा जेठानी पर |

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sudhir Dwivedi on May 14, 2015 at 11:39am — 19 Comments

पछतावा (लघुकथा )

"बाबा आप अकेले यहाँ क्यों बैठे हैं, चलिए आपको आपके घर छोड़ दूँ | "

बुजुर्ग बोले:

"बेटा जुग जुग जियो तुम्हारे माँ -बाप का समय बड़ा अच्छा जायेगा | और तुम्हारा समय तो बड़ा सुखमय होगा |"

"आप ज्योतिषी हैं क्या बाबा |"

हंसते हुय बाबा बोले - "समय ज्योतिषी बना देता हैं | गैरों के लिय जो इतनी चिंता रखे वह संस्कारी व्यक्ति दुखित कभी नही होता | " आशीष में दोनों हाथ उठ गये |

"मतलब बाबा ? मैं समझा नहीं | "

"मतलब बेटा मेरा समय आ गया | अपने माँ बाप के समय में मैं समझा नहीं कि…

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Added by savitamishra on May 14, 2015 at 11:30am — 20 Comments

ग़ज़ल -नूर हमनें ये जिस्म पाप का गट्ठर बना दिया.

गागा लगा लगा/ लल/ गागा लगा लगा

आवारगी ने मुझ को क़लन्दर बना दिया

कुछ आईनों ने धोखे से पत्थर बना दिया.

.

जो लज़्ज़तें थीं हार में जाती रहीं सभी  

सब जीतने की लत ने सिकंदर बना दिया.

.

नाज़ुक से उसने हाथ रखे धडकनों पे जब  

तपता सा रेगज़ार समुन्दर बना दिया.

.

एहसास सब समेट लिए रुख्सती के वक़्त

दीवानगी-ए-शौक़ ने शायर बना दिया. 

.

जो उस की राह पे चले मंज़िल उन्हें मिले  

बाक़ी तो बस सफ़र ही…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 14, 2015 at 11:29am — 35 Comments

अपना खून....(लघुकथा)

“ मैंने यह सब कुछ अपनी मजबूरी में किया है, जज साहब. मृतक मेरा सगा भाई ही था, उसने मेरा जीना हराम कर दिया था. धोखे से मेरी जमीन हड़प ली और मैं अपने पत्नी और बच्चों के साथ सड़क पर आ गया था. भूखों मरने की नौबत आ गई थी, साहब..” उसने अपने भाई की हत्या का गुनाह कुबूल करते हुए अदालत में अपना बयान दिया

“ लेकिन, पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार तुमने अपने भाई को सुबह ५ बजे ही खेत पर, गला घोंटकर मार डाला फिर तुम दोपहर में उस लाश को खीचकर कहा ले जा रहे थे..” सरकारी वकील ने कटघरे में खड़े,…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on May 14, 2015 at 10:18am — 36 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गीत -- पूछता है अब विधाता - ( गिरिराज भंडारी )

रोक नदिया

तोड़ पर्वत

तू धरा को क्या बनाता

पूछता है , अब विधाता

 

देख कुल्हाड़ी चलाता 

कौन अपने पाँव में ही

कंटकों के बीज बोता

रास्तों में , गाँव मे ही

व्यर्थ सपनों के लिये क्यों आज के सच को  गवांता

तू धरा को क्या बनाता , पूछता है अब विधाता

 

इक नियम ब्रम्हाण्ड का है

ग्रह सभी जिसमें चले हैं

है धरा की गोद माँ की

खेल जिसमे सब पले हैं

माँ पहनती उस वसन में , आग कोई है लगाता 

तू धरा…

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Added by गिरिराज भंडारी on May 14, 2015 at 9:21am — 21 Comments

मैं,वह और तुम (अतुकांत कविता)

*मैं वह और तुम*

मैं पुरुष हूँ,

वह स्त्री,

तुम तुम हो--

श्रोता,पाठक, निर्णायक

सबकुछ।

मैंने उसे अपने को कहने

यानी लिखने के लिए 

प्रेरित करना चाहा,

अपना युग-धर्म निबाहा,

बोली-मुझे हिंदी में लिखना

नहीं आता,है मुझे सीखना।

'सीखा दूँगा सब', मैंने कहा,

मामला बस वहीं तक रहा।

एक दिन एक कथा आयी-

'मेरी सहेली ने ड्राइविंग

सीखना चाहा,

उसके बॉस ने हामी भर दी,

कहा, 'सीखा दूँगा सब',

फिर ड्राइविंग शुरू होती

कि…

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Added by Manan Kumar singh on May 14, 2015 at 8:47am — 6 Comments

प्यार ........इंतज़ार

सुनो ...प्यार बड़ी चीज़ है

सबके काम आता है ये

डूबतों का तिनका

दुखियों का सहारा है ये

रोते हुओं के आँसू पोंछ

टूटे हुए दिलों को जोड़ जाता है ये

रूठों को मना लाता है

रिश्तों को शहद बनाता है ये

'इंतज़ार' कम ही लोगों को

करना आता है ये

इसकी तहज़ीब सीख लीजिये

वर्ना सोने वालों की

नीद उड़ा ले जाता है ये

उमंगों को भड़का

ज़िंदगी का मकसद बन जाता है ये

सुनो ...एहसासों का बुलबुला है ये

कांटा लगा ......तो

हवा हो जाता है ये…

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Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 14, 2015 at 7:18am — 14 Comments

सिन्दूर की लालिमा ( पहला हिस्सा )

मेरी कल्पनाये हर पल सोचतीं है, व्यथित हो विचरतीं हैं

बैचेन हो बदलतीं हैं, दम घुटने तक तेरी बाट जोहती हैं 

लेकिन फिर ना जाने क्यूँ, तुझ तक पहुँच विलीन हो जातीं है

सारी आशाएं पल भर में सिमट के, दूर क्षितिज में समा जातीं है

एक नारी मन की भावनाएं उसकी कल्पनाओं में सजती और संवरती है और उन कपोल कल्पित बातों को एक कवि ही अपनी रचना में व्यक्त कर सकता है मेरे कवी मन ने भी कुछ ऐसा ही लिखने की सोची और फिर शुरू हुई कलम और कल्पना की सुरमई ताल ! लेकिन मन ना लगा तो मैं बाहर निकल आई…

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Added by sunita dohare on May 14, 2015 at 12:30am — 7 Comments

ग़ज़ल :-गले प रख के वो तलवार बोले

बह्र :- मफ़ाइलुन मफ़ाइलुन फ़ऊलुन



गले प रख के वो तलवार बोले

वही कहना जो ये सरकार बोले



हमें बर्बाद कर देगा तिरा सच

मिरी बस्ती के इज़्ज़तदार बोले



हमारा ख़ानदानी वस्फ़ है ये

हमेशा जानिब-ए-हक़दार बोले



कई नामों से हमको जानते हैं

कोई तूफ़ाँ,कोई मंझधार बोले



बुराई पीठ के पीछे करेगा

मिरे मुँह पर ज़रा इक बार बोले



है मुझ को आरज़ू उस हमसफ़र की

जो वीरानों को भी गुलज़ार बोले



क़ुसूर इन शाईरों का भी नहीं जी

वही… Continue

Added by Samar kabeer on May 13, 2015 at 10:44pm — 22 Comments

एक ताज़ा ग़ज़ल: निर्मल नदीम

ज़िन्दगी की राह में इसके सिवा कुछ भी नहीं।

आदमी को सूझता अच्छा बुरा कुछ भी नहीं।



वो नुमाइश का चला है दौर जिसके सामने

अहल ए दिल कुछ भी नहीं अहले वफ़ा कुछ भी नहीं।



वक़्त यूँ खामोशियों की तर्जुमानी कर गया,

उसने सब कुछ सुन लिया मैंने कहा कुछ भी नहीं।



बेरुखी की हद से आगे की थी उसकी बेरुखी

मैंने पूछा- क्या हुआ, उसने कहा- कुछ भी नहीं।



हर क़दम पर तुमने मेरे इश्क़ को रुस्वा किया

फिर भी मेरे दिल में है शिक़वा गिला कुछ भी… Continue

Added by Nirmal Nadeem on May 13, 2015 at 7:45pm — 13 Comments

चुस्की

चुस्की

मैं आँखे पोंछता हुआ अस्पताल से बाहर आया |कुछ दूर ढूंढने पर मुझे चुस्की वाला दिखा |पर जैसे ही मैं चुस्की लेकर वार्ड में दाखिल हुआ |वो ठंडा पड़ चुका था |मैंने देखा की चुस्की के रंग-बिरंगे शरबत पिघलती बर्फ में घुलकर कुछ अलग ही रंग के हो गए थे |मैंने चुस्की की कुछ बूंदे उसके मुँह में डाली और एक चम्मच अपने मुँह में उसके बाद मैं फूट-फुटकर रो पड़ा |वार्डब्वाय ने उसके शांत-सफ़ेद चेहरे पर साफ़ सफ़ेद चादर डाल दी मानों बर्फ की सफ़ेद सिल्ली पड़ी हो |

लगभग एक सप्ताह पहले

“तुम मुझे पसंद करते… Continue

Added by somesh kumar on May 13, 2015 at 4:44pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शक्ति छंद (नेपाल भूकंप )

शक्ति छंद (नेपाल भूकंप )

  

अभी फूल पूरे खिले भी न थे

नई जिंदगी से मिले भी न थे

चली बेरहम वक़्त की आरियाँ

कटे शीश धड़ से मिटी क्यारियाँ

 

कहर बन फटी थरथराती जमी

जहाँ सांस आई वहीँ पे थमी

दिखाई अजब काल ने क्रूरता

फिरा क्रुद्ध यमराज यूँ घूरता

 

निवाले कई काल के हैं बने

दबे हर जगह जिस्म खूँ से सने

बचा जो यहाँ ढूँढता आसरा

सहारा बना एक का दूसरा

 

बचे काल से एक भाई बहन

सिसकते…

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Added by rajesh kumari on May 13, 2015 at 8:53am — 24 Comments

मुक्ति (लघुकथा)/रवि प्रभाकर

‘आज तो लाला ने भी और मोहलत देने से साफ मना कर दिया । समझ नहीं आ रहा अब क्या होगा? बैंक की किश्तें, अगले महीने छोटी की शादी... इस बेमौसमी बरसात ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा ।’ साहूकार की दुकान से बाहर निकलते हुए परेशानी के आलम में वो अपने साथी से बोला
‘सब्र से काम लो भाई ! अब जो भगवान को मंजूर ... अरे ! उधर क्या करने जा रहे हो ... उस तरफ तो बाजार है ?’
‘एक रस्सी लेने...।’

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on May 13, 2015 at 8:18am — 23 Comments

वक़्त मुसाफिरी का है ,गुजार ले-- डॉo विजय शंकर

ये तू , ये मैं ,

ये साथ , ये अकेलापन,

सब यहीं है ,

यहीं का है,

एक बार यहां से गए ,

तो तू कौन,

मैं कौन,

एक नाम ही है,

सब यहीं रह जाएगा ,

बहती हवा में बह जाएगा ,

द्रव्य, दृश्य,शब्द, स्मृतियाँ, सब,

कुछ मिटटी में , कुछ

वायु में विलीन हो जाएगा ,

नष्ट नहीं होगा ,

पर साथ नहीं जाएगा ,



ये तू, ये मैं , ये साथ ,

ये रिश्ते , ये बंधन ,

ये सब यहीं के हैं ,

यहीं तक हैं ,

यहीं रह जाएंगे ,

समय में खो जाएंगे… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on May 13, 2015 at 7:04am — 24 Comments

विसंगति--

" अरे रामू , तुम वापस कब आये , फिर से घर का काम करोगे "?
" क्या करता साहब , बेटा तो अपनी नौकरी पर चला जाता था और रात देर से लौटता था "।
" तो क्या , आराम से घर पर रहते , बहू और बच्चों के साथ समय बिताते "।
" अब क्या कहूँ साहब , आप कम से कम हमें नौकरों जैसा तो समझते हो , पर बहू तो .."!

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 13, 2015 at 3:00am — 14 Comments

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