For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,158)

ग़ज़ल - बेख़ुदी की बात कर

(2212 2212)



या बेख़ुदी की बात कर।

या दिल्लगी की बात कर। 



तू ये बता क्या हाल है?

अपनी ख़ुशी की बात कर। 



अब उस सदी की बात क्यूँ?

तू इस सदी की बात कर। 



जो याद करता हो तुझे,

तू भी उसी की बात कर। 



या तो ख़ुदा का नाम ले,

या बंदगी की बात कर। 



जो कान में रस घोल दे,

उस बांसुरी की बात कर। 



है क्या रखा इस जंग में?

कुछ आशिक़ी की बात कर। 



जो भेंट ज्वाला की चढ़ी,

उस…

Continue

Added by Zaif on May 28, 2014 at 9:30am — 16 Comments

तांका

सुन री सखी

दो शब्द भी प्रेम के

नही लिखती

चीखें,दर्द कराहें

लिखती हूँ प्रेम से
|



उनकी बात

कम नही सजा से

तुम्हारे साथ

बिताये हुए पल

सखी कैसे कहूँ मै
|



जीवन मेला

लिए रिश्तों का रेला

जाना था दूर

रह गया अकेला

नयनो में अन्धेरा
|…

Continue

Added by Meena Pathak on May 27, 2014 at 11:00pm — 15 Comments

समर्पण....सॉनेट महर्षि अरविन्द

ऐ प्रकृति,सूक्ष्म आत्मा तुम रहती हो मुझमे

मैं गेह मात्र हूँ,तुम ही इसकी सत वासी

नश्वर अस्तित्व हमारा मिलने दो खुद में;

बन जाने दो मुझे अलौकिक दैवी राशी।

मन तुझे दिया,अपने मन का तुम पथ गढ़ना

सभी समर्पित इच्छाएं,ये तेरी हो जावें

पीछे कोई अंश हमारा नहीं छोड़ना

अद्भुत,नीरव सा मिलन हमारा हो जावे।

तेरा प्रेम,जग-प्राण,मेरा उर उसी संग

स्पन्दित होगा,और मेद, मेदनी हित।

नसों शिराओं में होगी…

Continue

Added by Vindu Babu on May 27, 2014 at 11:00pm — 16 Comments

जिन्‍दगी में हमने जिनको वफा सिखाया था

2122      1222      1212   211

जिन्दगी भर जिसे हमने इश्क सिखाया था

बेवफा हम नहीं हमने उसे बताया था

दिल दुखाया नहीं हमने कभी न माने वो

आग में जल पड़े दुश्मन गले लगाया था

बात भी प्‍यार से वाे अब कभी नही करते

चाँदनी रात में जिसने कभी बुलाया था

हम मनाते रहे कसमे जिसे सभी देकर

मौत की नीद भी हमको वही सुलाया था

जल रहा…

Continue

Added by Akhand Gahmari on May 27, 2014 at 9:30pm — 6 Comments

एक नवजात के नाम - (रवि प्रकाश)

कौन है तू, मौन मेरा या मुखर संगीत है,

शब्द है कोई मधुर या भाव शब्दातीत है।

रंग है या रेख केवल,चित्र है या तूलिका,

शेर है मेरी ग़ज़ल का,नज़्म या नवगीत है॥

.

कुछ पुरानी भंगिमाएँ,कुछ नई मुस्कान है,

सिसकियों में सुर सजे हैं,आह में भी गान है।

खोजते हैं लोग मेरा अक्स तेरी आँख में,

तू जहां से और तुझ से ये जहां हैरान है॥

.

नर्म उजली धूप का उबटन लगे जब गुनगुना,

देवदारों में हवा का बज रहा हो झुनझुना।

मौसमों की करवटों में दास्तानें पढ़ सके,…

Continue

Added by Ravi Prakash on May 27, 2014 at 7:00pm — 16 Comments

खामोश दरिया

एक ---



मेरे, उसके बीच

बहता है

एक खामोश दरिया

जिस पे कोई पुल नहीं है

चाहूँ तो

शब्दों के खम्बो

वादों के फट्टों का

पुल खड़ा कर सकता हूँ

मगर

मुझे अच्छा लगता है

दरिया में

उतारना खामोशी से

और फिर

डूबते उतरते

उतर जाना उस पार



दो ----



अनवरत

चल रहा हूँ

नापता

शब्दों की सड़क

ताकि पहुंच सकूँ

अंतिम छोर तक

कूद जाने के लिए

एक खामोश समंदर में

हमेशा हमेशा के…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on May 27, 2014 at 5:30pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल

212 1222 212 1222

हर अदा, हवाओं की शोखियाँ समझती हैं

बेखबर नहीं सबकुछ पत्तियाँ समझती हैं

 

थरथराने लगती हैं इक ज़रा छुअन से ही

बागबाँ है या भँवरे डालियाँ समझती हैं

 

दर्द कितना है कैसा लग रहा है मुझको ये

मेरे ज़ख़्म से लिपटी पट्टियाँ समझती हैं

 

आजकल निगाहों को क्या हुआ ज़माने की

तज़्रिबे को चेहरे की झुर्रियाँ समझती हैं

 

हसरतें हदों को ही भूलने लगी हैं आज

फिक्र को बड़ों की वो बेड़ियाँ…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on May 27, 2014 at 4:00pm — 18 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

उन फाका मस्त फकीरों की हस्ती ऐसी थी

माल पुवे फीके थे उनकी मस्ती ऐसी थी

 

राग द्वेष नफ़रत के शहरों में जले फैले

प्यार बढ़ाती थी नानक की बस्ती ऐसी थी

 

जीवन की सोन चिरैया है हवस में अब

ढाई आखर सीखे ना ख़ुदपरस्ती ऐसी…

Continue

Added by gumnaam pithoragarhi on May 27, 2014 at 8:30am — 4 Comments

काल-धारा ...(विजय निकोर)

काल-धारा

मेरा स्नेह तुम्हारी ज़िन्दगी के पन्ने पर देर तक

स्वयं-सिद्ध, अनुबद्ध

हलके-से हाशिये-सा रहा यह ज़ाहिर है

ज़ाहिर यह भी कि जब कभी

अपने ही अनुभवों के भावों के घावों को

विषमतायों से विवश तुम चाह कर भी

छिपा न सकी

हाशिये को मिटा न सकी

मिटाने के असफ़ल प्रयास में तुम

घुल-घुल कर, मिट-मिट कर

ऐंठन में हर-बार कुछ और

स्वयं ही टूटती-सी गई

 

टूटने और मिटने के इस क्रम…

Continue

Added by vijay nikore on May 27, 2014 at 6:57am — 33 Comments

जाने खोयी कहाँ दिवानी

२२२  ११२    १२२   

 

नानी अब न कहे कहानी

राजा खोये नहीं वो रानी  

 

रेतीली वो नदी पुरानी

गुम पैरों कि मगर निशानी

 

बोली तुतली हिरन सी आँखे

जाने खोयी कहाँ दिवानी

 

बचपन बीत गया है पल में

 

मुरझाई सी लगे जवानी

 

देखेंजब भी जहर हवा में

बहता आँख से मेरी पानी

 

भूली सजनी किये थे वादे

उंगली में है पडी निशानी

 

बिसरा पाये कभी नहीं हम

गांवों वाली…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on May 26, 2014 at 2:54pm — 12 Comments

बीच राह श्मशान बना दो

बीच राह श्मशान बना दो

इंसानों को यह समझा दो |

जीवन नश्वर है यह जानें

मृत्यु सत्य है उसको मानें

नफरत छोड़ प्यार सिखला दो

इंसानों को यह .......

रूप बड़ा ही सुन्दर पाया

काया ने कब साथ निभाया

साँच बुढ़ापे का दिखला दो

इंसानों को यह .......

यह जग एक मुसाफिरखाना

इसका राज नहीं जो जाना

राज यही उसको बतला दो

इंसानों को यह .......

रिश्ते सारे अजब अनूठे

पाश मोह ममता के झूठे …

Continue

Added by Sarita Bhatia on May 26, 2014 at 2:00pm — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - मन को छूती नहीं हवायें अब ( गिरिराज भंडारी )

2122       1212    22

ज़िन्दगी यूँ लगी भली, फिर भी  

बात खुशियों की है चली, फिर भी 

 

देखिये सच कहाँ पहुँचता है

यूँ है चरचा गली गली, फिर भी 

 

क्या करूँ हक़ में कुछ नहीं मेरे

रूह तक तो मेरी जली, फिर भी 

 

क्यों अँधेरा घिरा सा लगता है  

साँझ अब तक नहीं ढली फिर भी 

 

आप दहशत को और कुछ कह लें

डर गई हर कली कली फिर भी 

 

अश्क रुक तो गये हैं आखों के

दिल में बाक़ी है बेकली फिर…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 26, 2014 at 12:00pm — 20 Comments

नवगीत : कब सीखा पीपल ने भेदभाव करना

धर्म-कर्म दुनिया में

प्राणवायु भरना

कब सीखा पीपल ने

भेदभाव करना?

फल हों रसदार या

सुगंधित हों फूल

आम साथ…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 26, 2014 at 11:00am — 20 Comments

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो

जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे

और तुम …..

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो...

केशुओं से झांकते तेरे नैन दोनों

प्याले मदिरा के उफनते लग रहे

काया-कंचन ज्यों कमलदल फिसलन भरे

नैन-अमृत-मद ये तेरा छक पियें

बदहवाशी मूक दर्शक मै खड़ा

तुम इशारों से ठिठोली कर रही हो

जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे

और तुम ..

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो

इस सरोवर में कमल से खेलती

चूमती चिकने दलों ज्यों…

Continue

Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 25, 2014 at 4:00pm — 12 Comments

ज़हनो-दिल ख़ामोश है औ’ हर नज़र दीवार पर

दोस्तों चुनाव के दौरान की ग़ज़ल है, विलम्ब से पोस्ट कर रहा हूँ

ज़हनो-दिल ख़ामोश है  औ’ हर नज़र दीवार पर 

क्या इलेक्शन चीज़ है उतरा नगर दीवार पर

या कोई हो आला लीडर या गली का शेर खां 

हर किसी  दिख रही अपनी लहर दीवार पर

इस  इलेक्शन में खड़ा है ऐसा भी उम्मीदवार

जिसने लटकाया कई सर काटकर दीवार पर

भोंकने लगता है 'शेरू' क्या पता किस बात पर

देखते ही मोहतरम का पोस्टर दीवार पर

बस चुनावी रंग में रंगे हैं ये…

Continue

Added by Sushil Thakur on May 24, 2014 at 10:00pm — 6 Comments

उम्मीदों का जन आदेश

उम्मीदों का जन आदेश

 

उम्मीदों का जन आदेश, करे उजागर मन आवेश।

 मतदाता के मन की राज, बूझ रहे हैं पंडित आज।१।

 

घोषित होते ही परिणाम, दिग्गज आज हुए गुमनाम।…

Continue

Added by Satyanarayan Singh on May 24, 2014 at 10:00pm — 12 Comments

नीले नीले नयनो पर पलकों का पहरा

2122  2122   2122

नीले नीले नयनो पर पलकों का पहरा

जैसे  चिलमन झील पे कोई  हो पसरा

 

दिल तेरा बेचैन है मुझको भी मालुम

बाँध लूं कैसे मैं लेकिन सर पे सहरा

 

झीने बस्त्रों में तेरा मादक सा ये तन  

जैसे बैठा चाँद कोई ओढ़े कुहरा  

 

सुध में उसकी होश मेरे जब भी उड़ते

जग को लगता जैसे मैं कोई हूँ बहरा

 

उसकी बातें ज्यों हो कोयल कूके कोई

उतरे बन अहसास कोई दिल पे गहरा 

मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Dr Ashutosh Mishra on May 23, 2014 at 4:25pm — 15 Comments

कुंडलिया छंद - लक्ष्मण लडीवाला

गांधी जी की कल्पना, हो सकती साकार, 

राम राज्य इस देश में, ले सकता आकार |

ले सकता आकार, करे सब मिल तैयारी

मन में हो संकल्प,नहीं फिर मुश्किल भारी

लक्ष्मण कर विश्वास,चले अब ऐसी आंधी

भ्रष्ट तंत्र हो नष्ट, तभी खुश होंगे गांधी ||…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 23, 2014 at 10:00am — 15 Comments

बहेलिया और जंगल में आग .. :नीरज

जब जब जागी उम्मीदें ,

अरमानों ने पसारे पंख.

देखा बहेलियों का झुंड, 

आसपास ही मंडराते हुए,

समेट  लिया खुद को

झुरमुटों के पीछे.

अँधेरा ही भाग्य बना रहा.

हमारे ही लोग,

हमारे जैसे शक्लों वाले,

हमारे ही जैसे विश्वास वाले,

करते रहे बहेलियों का गुण गान.

उन्हें बताते रहे हमारी कमजोरियों के बारे में

बहेलिये भी हराए जा सकते हैं.

कभी सोचा ही नहीं .

उनकी शक्ति प्रतीत होती थी अमोघ.

जंगल में लगी आग में…

Continue

Added by Neeraj Neer on May 23, 2014 at 9:36am — 23 Comments

हे मन कर कल्पना....

हे मन कर कल्पना

बना फिर अल्पना

खोल कर द्वार

सोच के कर पुनः संरचना

हे मन कर कल्पना

 

क्यूँ मौन तू हो गया

किस भय से तू डर गया

खड़ा हो चल कदम बढ़ा

करनी है तुझे कर्म अर्चना   

हे मन कर कल्पना

 

छोड़ उसे जो बीत गया

भूल उसे जो रीत गया

निश्चय कर दम भर ज़रा

सुना समय को अपनी गर्जना

हे मन कर कल्पना

 

पथ है खुला तू देख तो

नैनो को मीच खोल तो 

ऊंचाई पर ही फल मीठा…

Continue

Added by Priyanka singh on May 22, 2014 at 6:18pm — 16 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
1 hour ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन ।फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
11 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
14 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
17 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
21 hours ago
Sushil Sarna posted blog posts
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
yesterday
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service