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कुछ कुण्डलिया छंद

 

[1] 

पूजनीय हैं  माँ-पिता, सदा करो सम्मान ।

जीवन दाता है यही, खुदा यही भगवान ॥

खुदा यही भगवान, धर्म निज खूब निभाते ।

संतानों को पाल - पोस कर नेह लुटाते ॥

मन से दो तुम मान सदा ये बंदनीय है ।

करें  अहेतुक प्यार  हमारे पूजनीय हैं  ॥

[2]

माया छलना मोहती , धारे रूप अनेक ।

केवल माला फेरता,  कैसे हो तू नेक ॥

कैसे हो तू नेक,  फंसाए तुझको माया ।

जाल बिछा हर ओर उलझती जाती काया ॥

मानो …

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Added by annapurna bajpai on June 2, 2014 at 11:30pm — 14 Comments

मैं मूक बन जाती हूँ …।

मैं मूक बन जाती हूँ …।

नहीं, अब मैं इस गहन तम में नभ को न निहारूंगी

अपनी अभिलाषाओं को तम के गहन गर्भ में दबा दूंगी

दर्द की नमी को पलकों में ही दफना दूंगी

अपने गिले -शिकवों का बवंडर अपने दिल के किसी कोने में छुपा लूंगी

कितना विशवास था

तुम तो मेरे हृदय की टीस को पहचानोगे

यौवन की दहलीज़ पर पाँव रखते ही

हर निशा मैं तुम्हें निहारती थी

शशांक मेरे पागलपन पर मुस्कुराता था

पवन मुझे…

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Added by Sushil Sarna on June 2, 2014 at 12:39pm — 18 Comments

ज़िन्दगी.......

ना रंग, ना रूप

ना छाया, ना धूप

ना ख्वाहिश, ना सपने

ना पराये, ना अपने

खाली धरती, सूना आसमाँ

ना चाहत कोई, ना अरमाँ

ना ख़ुशी, ना, कोई गम

ना सब, ना तुम, ना हम

चाबी भरा, एक जिन्दा खिलौना

हँसता मुस्कुराता ख्वाब सलोना 

बोझ सी साँसें, बोझिल आँखें

कुछ सुनी, कुछ अनसुनी बातें

हिलत, डुलती, नाचती चमड़ी

जाला बुनती, वक़्त की मकड़ी

चलता सफ़र थकती साँसें

अश्क़ भरी, मुस्कुराती आँखें

फ़र्ज़ के बंधन, रूह…

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Added by RACHNA JAIN on June 2, 2014 at 11:07am — 3 Comments

एक अच्छी शुरुवात है

कुछ नई सी बात है

आज सुरमई  प्रभात है

उम्मीद नहीं विश्वास है

एक अच्छी शुरुवात है

एक पग आगे बढ़ा

कोटि पग भी बढ़ चले

हाथों से हाथ मिले

दिलों के तार जुड़ते चले

ये भी जज्बात है

एक अच्छी शुरुवात है……….

जैसे छिप गया हो तम

अँधेरे की बौछार से

नवल कोंपलें खिल उठीं

बसंत की पुकार से

 प्रकॄति की सौगात है

एक अच्छी शुरुवात है………….

हौसलों की उड़ान भर

उद्धमी मन थकता नहीं

असंभव को संभव…

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Added by Maheshwari Kaneri on June 1, 2014 at 7:49pm — 12 Comments

क्यूँ न हम जुल्फ हुये सोचकर ये खलता है

२१२२ ११२२ १२१२ २२
इश्क की मौज में जब दिल में कुछ उछलता है
चांदनी रात में शोलों सा तन ये जलता है

राहे मंजिल पे यूं तो गुल तमाम थे लेकिन
आँख जब से लड़ी तन बर्फ सा पिघलता है

बंदिशें तोड़ के कह दे तू इस जमाने से
जलने वाला तो बात बात पे ही जलता है

चूम लेती हैं हसीं रुख को जब कभी जुल्फें
क्यूँ न हम जुल्फ हुये सोचकर ये खलता है

जुल्फ की छांव का अहसास तो किया होता
घर के साए से यकीनन ये दिल बहलता है

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr Ashutosh Mishra on June 1, 2014 at 2:11pm — 19 Comments

आखिर कैसा देश है ये ? --- अरुण श्री

आखिर कैसा देश है ये ?

- कि राजधानी का कवि संसद की ओर पीठ किए बैठा है ,

सोती हुई अदालतों की आँख में कोंच देना चाहता है अपनी कलम !

गैरकानूनी घोषित होने से ठीक पहले असामाजिक हुआ कवि -

कविताओं को खंखार सा मुँह में छुपाए उतर जाता है राजमार्ग की सीढियाँ ,

कि सरकारी सड़कों पर थूकना मना है ,कच्चे रास्तों पर तख्तियां नहीं होतीं !

पर साहित्यिक थूक से कच्ची, अनपढ़ गलियों को कोई फर्क नहीं पड़ता !

एक कवि के लिए गैरकानूनी होने से अधिक पीड़ादायक है गैरजरुरी होना…

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Added by Arun Sri on June 1, 2014 at 1:00pm — 23 Comments

कुहरा धना है गजल तरही गजल

2122 2122 2122

मत कहो आकाश में कुहरा धना है

जाल धुमते बादलो ने बस बुना है



धूप की चादर अभी फैली फिजा में

चाँदनी को चाँद से मिलना मना है



भूल से भी हम न तड़़पाये तुझे थे

दे गवाही आज वो तेरा अना है



फूल भी रोने लगे तब से चमन में

रौद देगा माली ही जब से सुना है



नींद भी तब से नहीं आती किसी को

आदमी शैतान ही जब से बना है



आज ये सुन  शर्म खुद रोने लगा क्‍यों

औरतो ने राह पर  बच्‍चा जना है



मौलिक एवं…

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Added by Akhand Gahmari on June 1, 2014 at 1:00am — 13 Comments

गजल दिल जलाते है

1222   1222   1222  1222

कहाँ से अजनबी दिल के हमारे पास आते है/

हमारे दिल में बस कर वो हमारा दिल चुराते है



हमारी‍ जिन्‍दगी भी तो अमानत होे गई जिनकी

वही अब जिन्‍दगी में आग जाने क्‍यों लगाते है





जहर खाना नहीं जीवन बड़ा अनमोल सुन लो तुम



न खाये हम जहर तो क्‍या करें वो दिल जलाते है





हमारे सपनो को अपना कभी वो समझते ले‍किन

न जाने क्‍यों…

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Added by Akhand Gahmari on May 31, 2014 at 10:00pm — 7 Comments

तुम और मैं

तुम और मैं कितनी सदियों से

हाँ, कितने जन्मों से,

कितने चेहरे और रूप लिये

कभी भूले से, कभी अंजाने से.

एक युग में कभी तृण बन के

अमृत जल से बरसे कहीं,

नभ में तारे बन के चमके कभी

कितनी कहानियाँ सुनी अनसुनी रहीं.

किसका सफ़र था जो हवा बन के

गुज़र रहा था पात पात

एक गुलाब खिला था वन में

कुछ महक थी बसी मकरंद में.

एक एहसास था मन के कोने में

वह ढूँढ़ रहा था एक ठाँव,

कितने बसेरे मिले थे…

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Added by coontee mukerji on May 31, 2014 at 1:00pm — 9 Comments

जिसका वो अंश है ……

जिसका वो अंश है ……

कौन है ज़िंदा ?

वो मैं,जो सांसें लेता है

जिसका प्रतिबिम्ब दर्पण में नज़र आता है

जो झूठे दम्भ के आवरण में जीवन जीता है

या

वो मैं जो अदृश्य हो कर भी सबमें समाया है

न जिसकी कोई काया है

न जिसका कोई साया है

कितना विचित्र विधि का विधान है

एक मैं, नश्वरता से नेह करता है

एक मैं, अमरत्व के लिए मरता है

मैं के परिधान में जो मैं ज़िंदा है

वही प्रभु का सच्चा परिंदा है …

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Added by Sushil Sarna on May 31, 2014 at 12:30pm — 14 Comments

कुंडलिया छंद-लक्ष्मण लडीवाला

महाराणा प्रताप की जयंती पर समर्पित -कुंडलिया छंद

रचते है इतिहास ही,राणा जैसे वीर

माँ वसुधा के लाल ये,ये ही असली पीर 

ये ही असली पीर, युद्ध से जिनका नाता 

दुश्मन को दे…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 31, 2014 at 11:00am — 14 Comments

खुद रूठूँ और खुद मन जाऊं ……

खुद रूठूँ और खुद मन जाऊं ……

खुद रूठूँ और खुद मन जाऊं

प्रीतम तुझ को कैसे बुलाऊँ

पल-पल ..तेरी राह निहारूं

एकांत पलों में तुझे पुकारूं

जीने की कोई आस बता दे

किस मूरत से .नेह लगाऊं

खुद रूठूँ और खुद मन जाऊं

प्रीतम तुझ को .कैसे बुलाऊँ

भोर व्यर्थ मेरी .साँझ व्यर्थ है

तुझ बिन मेरी प्यास व्यर्थ है

अंबर के घन .कुछ तो कह तू

कैसे नयन का ...नीर…

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Added by Sushil Sarna on May 30, 2014 at 3:07pm — 12 Comments

वो बरगद आरियों का निशाना हो गया है

1222  122  1222  122

वो बरगद आरियों का निशाना हो गया है

परिन्दा दर ब दर बेसहारा हो गया है

 

हवस दुनिया की बरबाद कर देती उसे भी

चलो मुफ़लिस की बेटी का रिश्ता हो गया है

 

गरीबी थी कि मजबूरी थी बच्चे की कोई…

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Added by gumnaam pithoragarhi on May 29, 2014 at 8:30pm — 15 Comments

आये अज़ल जिस गोद में ……

आये अजल जिस गोद में  ……

कितने निर्दयी हो तुम

दबे पाँव आते हो

मेरे खामोश लम्हों को

अपनी यादों से झंकृत कर जाते हो

झील की लहरों पे चाँद

लहर लहर मुस्कुराता है

मेरी बेबसी को गुनगुनाता है

सबा मेरे गेसुओं से लिपट

मेरी ख़्वाहिशों को बार बार ज़िंदा कर जाती है

तुम्हारे मुहब्बत में डूबे लम्स

मेरे लबों पे कसमसाते हैं

मगर तड़प के इन अहसासों को तुम न समझोगे

तुम क्यों नहीं समझते

मेरे तमाम…

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Added by Sushil Sarna on May 29, 2014 at 1:00pm — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
‘’हमारे रिश्ते‘ -अतुकांत (गिरिराज भंडारी)

‘’ हमारे रिश्ते ‘’

*****************

अगर रिश्ते सच में हैं , तो

मीलों की दूरियाँ

कमज़ोर नही करती रिश्तों की मज़बूती

मिलन की प्यास बढाती ज़रूर है

 

रिश्ते , मृग मरीचिका नहीं होते

कि , पास पहुँचें तो नज़र न आयें

भावनायें प्यासी रह जायें

 

रिश्ते

रेत मे लिखे इबारत भी नही होते

कि ,सफल हो जायें, जिसे मिटाने में

समय के समुद्र में उठती गिरती कमज़ोर लहरें भी

रिश्ते

शिला लेख की तरह…

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Added by गिरिराज भंडारी on May 28, 2014 at 9:30pm — 33 Comments

फ़रिश्ता हूँ न कोई देवता हूँ

फ़रिश्ता हूँ न कोई देवता हूँ
खिलौना हूँ मैं मिट्टी से बना हूँ

दग़ा खाने में तू रहता है आगे
दिले-नादान मैं तुझसे ख़फ़ा हूँ

सिला मुझको भलाई का भला दे
ज़ियादा कुछ नहीं मैं माँगता हूँ

मैं जबसे लौटा हूँ दैरो-हरम से
पता सबसे ख़ुदा का पूछता हूँ

मेरा चेहरा किताबे-ज़िन्दगी है
ज़ुबां से मैं कहाँ कुछ बोलता हूँ

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Sushil Thakur on May 28, 2014 at 8:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल - हमारी बात उन्हें इतनी नागवार लगी

१२१२      ११२२      १२१२     ११२  

हमारी बात उन्हें इतनी नागवार लगी

गुलों की बात छिड़ी और उनको खार लगी

बहुत संभाल के हमने रखे थे पाँव मगर

जहां थे जख्म वहीं चोट बार-बार लगी

कदम कदम पे हिदायत मिली सफर में हमें

कदम कदम पे हमें ज़िंदगी उधार लगी

नहीं थी कद्र कभी मेरी हसरतों की उसे

ये और बात कि अब वो भी बेकरार लगी

मदद का हाथ नहीं एक भी उठा था मगर

अजीब दौर कि बस भीड़ बेशुमार…

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Added by sanju shabdita on May 28, 2014 at 7:14pm — 58 Comments

हर ग़ज़ल अच्छी बनेगी ये जरूरी तो नहीं

२१२२ २१२२ २१२२ २१२

हर ग़ज़ल अच्छी बनेगी ये जरूरी तो नहीं

दुनिया मुझको ही पढेगी ये जरूरी तो नहीं

फ़ौज सरहद पे खडी हो चाहे दुश्मन की तरह

कोई गोली भी चलेगी ये जरूरी तो नहीं

आज सागर हाथ में माना कि मेरे दोस्तों

प्यास पर मेरी बुझेगी ये जरूरी तो नहीं

इन चिरागों में भरा हो तेल कितना भी भले

रात भर बाती जलेगी ये जरूरी तो नहीं

आज उसकी ही खता है खूब है उसको पता

मांग पर माफी वो लेगी ये जरूरी तो नहीं

जोड़ लो दुनिया की दौलत जीत लो हर जंग…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 28, 2014 at 12:15pm — 31 Comments

बस जा तू

गीत

मेरे ख्‍वाबो में बस जा तू तेरे हम साथ चल देगे

तेरा सूना पड़ा जीवन प्‍यार मे हम तो बदल देगे



तेरे तो साथ चलने को मेरा यह दिल तड़पता है

वि़ऱह की अाग जो जलती रही उसमें ये सुलगता है

कभी तुम पास आ देखो तुम्‍हे़ हम प्‍यारा कल देगे

मेरे ख्‍वा़बो में बस जा तू तेरे हम साथ चल देगे



खुली आँखो से देखे थे कभी हम सपनो जो तेरे

सनम तू आके बन जाना हकीकत सपनो के मेरे

तुझे छुअेगे  कभी काँटे हम काँटो को मसल देगे

मेरे ख्‍वाबो में बस जा तू तेरे हम…

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Added by Akhand Gahmari on May 28, 2014 at 10:36am — 12 Comments

बेमजा यार सफर रोज नई राहों का

2122     112 2     1122    22

**

खार  हूँ  एक  ये  सोचा   है  सभी  ने मुझको

फूल के साथ  जो  देखा  है  सभी  ने  मुझको

**

बंद सदियों  से  पड़ा  था  मैं  किसी  कोने में

खत तेरा जान के  खोला  है सभी ने मुझको

**

भोर सा रास  तुझे  आज   मगर  आया क्यूँ

तम भरी  रात जो बोला  है  सभी ने मुझको

**

दाद  वैसे  तो   मिली  बात  बुरी भी  कह दी

बस तेरी  बात  पे  कोसा  है सभी ने मुझको

**

रूह  की  बात  किसे   यार  लगी  सौदों …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 28, 2014 at 10:30am — 25 Comments

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