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गिड़गिड़ाने से बची कब लाज तेरी द्रोपदी-ग़ज़ल

2122    2122    2122    212

***

शब्द   अबला  तीर  में  अब  नार  ढलना  चाहिए

हर दुशासन का कफन  खुद तू ने  सिलना चाहिए

***

लूटता  हो  जब  तुम्हारी  लाज  कोई  उस समय

अश्क  आँखों   से  नहीं  शोला  निकलना  चाहिए

***

गिड़गिड़ाने   से   बची   कब   लाज  तेरी  द्रोपदी

वक्त पर उसको सबक कुछ ठोस मिलना चाहिए

**

हर समय तो आ नहीं सकता कन्हैया तुझ तलक

काली बन खुद  रक्त  बीजों  को  कुचलना चाहिए

**

फूल बनकर  दे महक  उपवन को  यूँ तो  रोज तू…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 6, 2014 at 12:47pm — 31 Comments

इस अन्धकार में कितनी सदियाँ और बिताना बाकी है ?

"चीख चीख कर पूछ रहा है ,ये उद्वेलित मन मेरा मुझसे ,

इस अन्धकार में कितनी सदियाँ और बिताना बाकी है ?

चूड़ियाँ पहने पड़ी इस सुषुप्त व्यवस्था को धिक्कारने में

अब भी यूँ ही कितनी मोमबत्तियाँ और जलाना बाकी है ?

इस कुण्ठित दानवता के कुकृत्यों से लज्जित ,

आज मानवता कितनी बेबस पानी पानी है ?

मोड़ मोड़ पर खड़े ये दुर्योधन और दु:शासन ,

दुर्गा पूजती सभ्यता की क्या यही निशानी है ?

कोरे कागज़ी कानूनों के फूल चढ़ाये ,यूँ अर्थियाँ उठाते,

कितने…

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Added by Kedia Chhirag on June 6, 2014 at 9:30am — 4 Comments

"नूर" की ग़ज़ल -देख तेरा जो हाल है प्यारे

२१२२ १२१२ २२/११ २  

.

देख तेरा जो हाल है प्यारे

ज़िन्दगी का सवाल है प्यारे.

.

लोग मुर्दा पड़े हैं बस्ती में,

बस तुझी में उबाल है प्यारे.

.

आम कहता है ख़ुद को जो इंसाँ,

उसकी रंगत तो लाल है प्यारे.

.

उसकी थाली में मुझ से ज़्यादा घी,

बस यही इक मलाल है प्यारे. 

.

हम ने अपना लहू भी वार दिया,

सबको लगता गुलाल है प्यारे.   

.

ख़ाक ही ख़ाक बस उड़ेगी अब,

ये हवाओं की चाल है प्यारे. 

.

अब तो…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 5, 2014 at 9:30pm — 21 Comments

मेंह बाबा मै तुम्हे रिझाऊं

विरह तुम्हारा सह न पाऊंकैसे मै मन को समझाऊ

तुमसे ही मै जीवन पाऊंतुमबिन न स्वागत कर पाऊं

बिछे ह्रदय में पलक-पाँवड़े,मेंह बाबा मै तुम्हे रिझाऊं 

ताल तलैया जग के सूखे,स्वर्ग लोक से…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 5, 2014 at 6:00pm — 16 Comments

अपने मौसम को ………

अपने मौसम को ………

तुम ही तो थे

मेरे नेत्रों के वातायन से

असमय विरह पीर को

बरसाने वाले

मुझे अपने बाहुपाश में

प्रेम के अलौकिक सुख का

परिचय कराने वाले

मेरी झोली में विरह पलों को डालने वाले

क्या आलिंगन के वो मधुपल भ्रम थे

पर्दे के पीछे मेरी विरह वेदना को

सिसकियों में पिघलते

मूक बन कर देखते रहे

क्यों एक बार भी हाथ बढ़ा कर

मेरे व्यथित हृदय को

ढाढस…

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Added by Sushil Sarna on June 5, 2014 at 4:56pm — 16 Comments

ऐसा घर बनातें हैं

इन कंक्रीटों के जंगल में नहीं लगता है मन अपना

जमीं भी हो गगन भी हो ऐसा घर बनातें हैं

ना ही रोशनी आये ना खुशबु ही बिखर पाये

हालात देखकर घर की पक्षी भी लजातें हैं

दीबारें ही दीवारें नजर आये घरों में क्यों

पड़ोसी से मिले नजरें तो कैसे मुहँ बनाते हैं

मिलने का चलन यारों ना जानें कब से गुम अब है

टी बी और नेट से ही समय अपना बिताते हैं

ना दिल में ही जगह यारों ना घर में ही जगह यारों

भूले से भी मेहमाँ को ना नहीं घर में टिकाते हैं

अब…

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Added by Madan Mohan saxena on June 5, 2014 at 3:09pm — 9 Comments

बेटी

छप्पय छंद
बेटी होना पाप, त्रास में जीवन सारा ।
जन्म पूर्व ही घात, उसे कितनों ने मारा ।।
कंपित होती सांस, वायु है दूषित सारी ।
छेड़ छाड़ हर पाद, नगर गांव बलात्कारी ।।
गली गली में भेडि़या, नोचें बेटी मांस को ।
जीवित होकर लाश हैं, बेटी सह  इस त्रास को ।।
.................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on June 5, 2014 at 3:00pm — 14 Comments

जिया जरे दिन रात हे पीऊ

जिया जरे दिन रात हे पीऊ

तड़प के रात बिताऊं

----------------------------------

भोर उठूँ जब बिस्तर खाली

गहरी सांस ले मन समझाऊँ

दुल्हन जब कमरे से झाँकू

पल-पल नैन मिलाती

अब हर आहट बाहर धाती

'शून्य' ताक बस नैन भिगोती

फफक -फफक मै रो पड़ती पिय !

फिर जी को समझाती

जी की शक्ति आधी होती

दुर्बल काया कैसे दिवस बिताऊं ?

जिया जरे दिन रात हे पीऊ

तड़प के रात…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 5, 2014 at 1:30pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मैं कभी तुझसे बिछड़ने का न मंजर देखूँ

2122   2122  2122  22

मैं कभी तुझसे बिछुड़ने का न मंजर देखूँ

मछलियों से ना कभी ख़ाली समंदर देखूँ

 

कब जमीं आकाश दोनों इस जहाँ में मिलते

मैं ये  संगम तो सदा दिल के ही अन्दर देखूँ

 

हर सितारा  तेरी किस्मत का बुलंदी पर हो

 मैं  न कोई हार से टूटा सिकंदर देखूँ

 

झेल लूँ मैं वार  खुद तेरी परेशानी के  

जीस्त में गड़ता हुआ ग़म का न खंजर देखूँ

 

जिंदगी में काश कोई दिन न आये…

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Added by rajesh kumari on June 5, 2014 at 10:58am — 29 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल

जिन्होंने रास्तों पर खुद कभी चलकर नहीं देखा

वही कहते हैं हमने मील का पत्थर नहीं देखा

.

मिलाकर हाँथ अक्सर मुस्कुराते हैं सियासतदाँ

छिपा क्या मुस्कराहट के कभी भीतर नहीं देखा

.

उन्हें गर्मी का अब होने लगवा अहसास शायद कुछ

कई दिन हो गए उनको लिए मफलर नहीं देखा

.

सड़क पर आ गई थी पूरी दिल्ली एक दिन लेकिन

बदायूं को तो अब तक मैंने सड़कों पर नहीं देखा

.

फ़क़त सुनकर तआर्रुफ़ हो गया कितना परेशां वो

अभी तो उसने मेरा कोई भी तेवर नहीं…

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Added by Rana Pratap Singh on June 5, 2014 at 10:26am — 19 Comments

प्रदूषित जीवन

{विश्व पर्यावरण दिवस पर सादर प्रस्तुत ]



एक कहावत है जो हिंदी आधारित लगभग सभी आंचलिक भाषाओँ में प्रचलित है , “ जेई डाढ बैसी ,ओकरे काटी |” , जब विद्योत्तमा से परास्त विद्वानों ने एक महामूर्ख ढूंढने की चेष्टा कियी तो उन्हें सबसे मूर्ख वही लगा था जो उसी डाल को काट रहा था जिसपर बैठा था |कभी सोचा है कि हम सभी प्रदुषण की दृष्टि से कुछ इसी श्रेणी के बनते जा रहे हैं |

यह तो परिपाक है कि हमारा शरीर प्रकृति के पांच तत्वों से निर्मित है – आकाश , हवा, आग, पानी और धरती , जो हमारे पांच… Continue

Added by विजय मिश्र on June 5, 2014 at 9:51am — 25 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल

2122 1212 22/112

मुल्क़ में किस्सा इक नया तो हो

अब अज़ीयत की इंतिहा तो हो                अज़ीयत =यातना

 

ग़म से किसको मिली नजात यहाँ

मर्ज़ कहते हो फिर दवा तो हो

 

जी उठेगा फिर अपनी राख से पर

वो मुकम्मल अभी जला तो हो

 

दीनो-ईमाँ की बात करते हैं

हो हरम दिल में बुतकदा तो हो                      हरम =मस्जिद,  बुतकदा =मंदिर

 

ज़ह्र अपनी ज़बान से छूकर

कह रहे हैं कि तज़्रिबा तो…

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Added by शिज्जु "शकूर" on June 4, 2014 at 9:32pm — 24 Comments

दो हाथ की दुनियां

लकीरें  गहरी हो गयी है ,

बुधुआ मांझी के माथे की .

स्याह तल पर उभर आये कई खारे झील .

सिमट गया  है आकाश का सारा विस्तार

उसके आस पास. 

दुनियां हो गयी है दो हाथ की.

 

मिट्टी का घर, छोटे बच्चे, बैल, बकरियां और

खेत का छोटा सा टुकड़ा

इससे आगे है एक मोटी दीवार

बिना खेत और घर के कैसे जियेगा?

इससे जुदा क्या दुनियां हो सकती है ?

  

उनकी जमीन के नीचे ही क्यों निकलता है कोयला ?

पर  वह  किस पर करे…

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Added by Neeraj Neer on June 4, 2014 at 7:57pm — 16 Comments

गा कोयल...

गा कोयल गा...

गीत प्रेम के

गा कोयल.....



मन के सुप्त तारों को जगा.

प्रकृति के वक्ष के आर-पार

अनु विस्फ़ोटक के सप्त स्वर में

अपनी गायन शक्ति भर

तीव्र सुर में गा कोयल......

ग्रीष्म की तपती धूप है

कर बादलों का आह्वान

बादल कुछ ऐसा बरसे

तरल हो धरती का कण-कण

निकले सीप से मोती

सुख-समृद्धि की बरसात हो

गा कोयल.....

बनी रहे आम्रतरु की जड़ें

वसंत में मंजरी खिली रहे

मिटे घर घर से मौत की…

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Added by coontee mukerji on June 4, 2014 at 6:08pm — 10 Comments

नदी

         

वो नदी जो गिरि

कन्दराओं से निकल

पत्थरों के बीच से

बनाती राह

 

कितनो की मैल धोते

कितने शव आँचल मे लपेटे

अन्दर कोलाहल समेटे

अपने पथ पर,

 

कोई पत्थर मार

सीना चीर देता 

कोई भारी चप्पुओं से

छाती पर करता प्रहार

लगातार,

 

सब सहती हुई

राह दिखाती राही को

तृप्त करती तृषा सब की

अग्रसर रहती अनवरत

तब तक, जब तक खो न…

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Added by Meena Pathak on June 4, 2014 at 12:58pm — 22 Comments

अजन्मी उम्मीदें --- अरुण श्री

समय के पाँव भारी हैं इन दिनों !

 

संसद चाहती है -

कि अजन्मी उम्मीदों पर लगा दी जाय बंटवारे की कानूनी मुहर !

स्त्री-पुरुष अनुपात, मनुस्मृति और संविधान का विश्लेषण करते -

जीभ और जूते सा हो गया है समर्थन और विरोध के बीच का अंतर !

बढती जनसँख्या जहाँ वोट है , पेट नहीं !

पेट ,वोट ,लिंग, जाति का अंतिम हल आरक्षण ही निकलेगा अंततः !

 

हासिए पर पड़ा लोकतंत्र अपनी ऊब के लिए क्रांति खोजता है

अस्वीकार करता है -

कि मदारी की जादुई…

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Added by Arun Sri on June 4, 2014 at 10:30am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - - दर्द मै अपना दबा भी लूँ - ( गिरिराज भंडारी )

2122      2122      2

दिन टपक के सूख जाता है

हाथ में कुछ भी न आता है

 

मै पराया , वो पराया है

कौन किसमें अब समाता है ?

 

ग़म हक़ीक़ी भी मजाज़ी भी

देख किसको कौन भाता है  

 

दर्द मै अपना दबा भी लूँ

ग़म तुम्हारा पर रुलाता है

 

खार चुभते जो रिसा था ख़ूँ

रास्ता वो अब दिखाता है

 

सूर्य तो ख़ुद जल रहा यारों

वो किसी को कब जलाता है

 

ख़्वाबों में आ आ के शिद्दत…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 4, 2014 at 9:39am — 22 Comments

ग़ज़ल- तुझे अपना किये बग़ैर (ज़ैफ़)

(221 2121 1221 212/1)



जब कर लिया है इश्क़ भी, सोचा किये बग़ैर।

मैं दम न लूँगा अब तुझे अपना किये बग़ैर।



ये दिल की लेन-देन है, नुकसान हो गया तो?

ये सौदा मत ही करना, भरोसा किये बग़ैर।



यूँ काम कीजिये कि सलामत रहे अना* भी,

हर काम कीजे अपने को 'छोटा' किये बग़ैर।

(*ego)



उन चाहतों का घोंट दे ऐ दिल गला, कि जिनका

चलता नहीं है काम, तमाशा किये बग़ैर।



मजबूरियाँ अजब हैं तवायफ़ की, क्या करे वो?

खाना नहीं हो पाता है धंधा किये… Continue

Added by Zaif on June 3, 2014 at 9:01pm — 8 Comments

एक गजल

दरिया रहा कश्ती रही लेकिन सफर तन्हा रहा

हम भी वहीं तुम भी वहीं झगड़ा मगर चलता रहा

साहिल मिला मंजिल मिली खुशियां मनीं लेकिन अलग

खामोश हम खामोश तुम फिर भी बड़ा जलसा रहा

सोचा तो था हमने, न आयेंगे फरेबे इश्क में

बेइश्क दिल जब तक रहा इस अक्ल पर परदा रहा

शिकवे हुए दिल भी दुखा दूरी हुई दोनों में पर

हर बात में हो जिक्र उसका ये बड़ा चस्का रहा

छाया नशा जब इश्क का 'चर्चित' हुए कु्छ इस कदर

गर ख्वाब में…

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Added by VISHAAL CHARCHCHIT on June 3, 2014 at 2:30pm — 13 Comments

ग़ज़ल -निलेश "नूर"

२१२२, २१२२,२१२२, २१२२  



क्या सुनाऊं दोस्त तुझको ज़िन्दगानी की कहानी,

चार सू तूफ़ान हैं और अपनी कश्ती बादबानी.

***

जब मिले पहले पहल तुम, ख्व़ाब थे रंगीन सारे,

सुर्ख आँखें हैं मेरी उस दौर की ज़िन्दा निशानी.

***

याद की इन आँधियों में दिल बिखर जाता है ऐसे,   

जिल्द फटने पर बिखरती डायरी जैसे पुरानी.

***

देर तक रोता रहा क़ातिल मेरा, मैंने कहा जब, 

जान तू ले ले मेरी तो होगी तेरी मेहरबानी.

***

खो गए है हर्फ़ सारे, बुझ गए…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 3, 2014 at 11:00am — 31 Comments

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