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लघु कथा - लिहाज (शुभ्रा शर्मा 'शुभ ')

राधे श्याम जी पान की दूकान पर हाथ में सिगरेट छुपाये खड़े थे | तभी आठ -नौ साल का लड़का राजा दूकान से गुटखा खरीद खा कर चल दिया |

एक महोदय दुकानदार से -जब अठारह साल से कम उम्र के लोगों को तंबाकू पदार्थ ना देने का बोर्ड लगाये हैं फिर भी आपने क्यों दे दिया ?

दुकानदार -मुझे क्या मालूम की ये अपने लिए ले रहा है या घर के बड़ों के लिए | और यदि जान भी जाएँ कि ये खुद खायेगा तब भी मैं नहीं दूंगा तो किसी और दूकान से ले लेगा , मैं नुकसान में क्यों रहूँ ,खीं -खीं करते हुए बोला…

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Added by shubhra sharma on September 5, 2013 at 12:12pm — 8 Comments

चिंगारियाँ

चिंगारियाँ

 

बूंद-बूंद टपकती

घबराती  बेचैनी,

बेचैन ख़यालों के भीतरी अहाते --

जहाँ कहीं से आती थी याद तुम्हारी

बंद कर दिए थे उन कमरों के दरवाज़े,

पर समय की धारा-गति कुछ ऐसी

दरवाज़े यह समाप्त नहीं होते,

गहरे में उतर-उतर आती है अकुलाहट

कई दरवाज़ों के पीछे से आती है जब

सुनसान आवाज़, तुम्हारी करुण पुकार,

तुम थी नहीं वहाँ, हाँ मैं था

और था मेरा कांपता आसमान

टूटते तारे-सा गिरने का जिसका…

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Added by vijay nikore on September 5, 2013 at 11:30am — 24 Comments

शिक्षक दिवस पर - लक्ष्मण लडीवाला

शिक्षक दिवस पर ओ बी ओ के सभी सुधि प्रबुद्ध गुरुजनों को जिनसे छंद विधा और सत-साहित्य ज्ञान की वृद्धि कर पाया, उन्हें सादर प्रणाम करते हुए महान शिक्षक की जयंती पर प्रस्तुत है - 
 
 
डॉ राधा कृष्णन जैसे शिक्षक से ही बनता देश महान है
अचकन पायजामा पगड़ी उनकी सांस्कृतिक पहचान है 
दर्शन शास्त्र के ज्ञाता जगत को दे गये  अनूठा ज्ञान है 
शिक्षक दिवस पर नतमस्तक हो करते हम सम्मान है 
 
"सेतु" दर्शन के निर्माता वे…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 5, 2013 at 10:30am — 18 Comments

रविकर कैसा मोह, नहीं दे पाऊँ झिड़की

मन की खिड़की पर जमा, छली कुल-जमा एक |
तीनों पाली में छले, बरबस रस्ता छेंक |


बरबस रस्ता छेंक, आह-उच्छ्वास छोड़ती |
पाऊँ कष्ट अनेक, व्यस्त हर कष्ट जोड़ती |


रविकर कैसा मोह, नहीं दे पाऊँ झिड़की |
चिदानन्द सन्दोह, बंद कर मन की खिड़की ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 5, 2013 at 9:33am — 9 Comments

श्रांत मन का एक कोना शांत मधुवन छाँव माँगे...

श्रांत मन का एक कोना शांत मधुवन-छाँव मांगे।



सरल मन की देहरी पर

हुये पाहुन सजल सपने,

प्रीति सुंदर रूप धरती,

दोस्त-दुश्मन सभी अपने,

भ्रमित है मन, झूठ-जग में सहज पथ के गाँव माँगे।



कई मौसम, रंग देखे

घटा, सावन, धूप, छाया,

कड़ी दुपहर, कृष्ण-रातें,

दुख-घनेरे, भोग, माया।

क्लांत है जीवन-पथिक यह, राह तरुवर-छाँव मांगे।



भोर का यह आस-पंछी

सांझ होते खो न जाये,

किलकता जीवन कहीं फिर

रैन-शैया सो न जाये।

घेर…

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Added by Manoshi Chatterjee on September 5, 2013 at 6:53am — 21 Comments

हमारी हिन्दी

करें हम

मान अब इतना

सजा लें

माथ पर बिन्दी।

बहे फिर

लहर कुछ ऐसी

बढ़े इस

विश्व में हिन्दी।।

 

गंग सी

पुण्य यह धारा

यमुन सा

रंग हर गहरा

सुबह की

सुखद बेला सी

धरे है

रूप यह हिन्दी।।

 

मधुरता

शब्द आखर में

सरसता

भाव भाषण में

रसों की

धार छलके तो

करे मन

तृप्त यह हिन्दी।।

 

तोड़कर

बॅंध दासता के

सभी…

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Added by बृजेश नीरज on September 4, 2013 at 10:30pm — 32 Comments

कुछ हाइकू सा

राजनीतिज्ञ,

कुशल अभिनेता,

मूक दर्शक।



कुटनीतिज्ञ

कुशल राजनेता

मित्र ही शत्रु



शकुनी नेता

लोकतंत्र चैसर

बिसात लोग



लोकराज है

लोभ मोह में लोग

यही तो रोग



अपनत्व है ?

देश से सरोकार ?

फिर बेकार ।



सपना क्या था ?

शहीद सपूतो का

मिले आजादी ?



आजादी कैसी

विचार परतंत्र

वाह रे तंत्र



गांधी विचार

कैसे भरे संस्कार

कहां है खादी ?



विकास गढ़े…

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Added by रमेश कुमार चौहान on September 4, 2013 at 9:30pm — 9 Comments

"अकाल मृत्यु"

कई साल बाद लौटा
बहुत कुछ बदला लगा
विकास ही विकास
कस्बा अब शहर हो चुका है

अरे ये क्या ?
जहाँ पेड़ों का एक झुण्ड था
वहाँ बड़ी बड़ी इमारतें
सीना ताने खड़ीं है
मृत पेड़ों की देह पर
ठहाके मारती

कोई दुःख नहीं 
पेड़ों की
अकाल मृत्यु पर 

विकास रुपी राक्षस को बलि देकर

खुश थे लोग

******************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on September 4, 2013 at 8:27pm — 30 Comments

मैं भक्त सुदामा वाला हूँ

मौलिक एवं अप्रकाशित

तुम में ही लीन प्रान मेरे , प्राणों में मेरे प्रियवर हो 

इसलिये विलग होकर भी तुम, मुझमे ही सदा निवासित हो 

अलके पलकें भी रो रोकर , दो चार अश्रु ही चढ़ा रही

मेरे भगवन मेरे प्रियतम,  बस राह धूल ही हटा रही

---

खुद के अन्दर तुम तक जाना, चरणोदक पीकर जी जाना 

इस धूल धूसरित मन से ही , अपने प्रियतम में लग जाना   

आकुल व्याकुल इस साधक पर, कुछ प्रेम सुधा बरसा…

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Added by Ashish Srivastava on September 4, 2013 at 8:00pm — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
नव गीत --आ चल फिर बच्चे हो जायें ( गिरिराज भंडारी )

नव गीत

*******

आ चल फिर बच्चे हो जायें

खेलें कूदे मौज मनायें

बिन कारण ही,

रोयें गायें , हँसे  हँसायें,

आ चल फिर बच्चे हो जायें !

 

मेरी कमीज़ है गन्दी…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 4, 2013 at 6:00pm — 30 Comments

रविकर रह चैतन्य, अन्यथा उघड़े बखिया-

बखियाने से साड़ियाँ, बने टिकाऊ माल |
लेकिन खोंचा मार के, कर दे दुष्ट बवाल |

कर दे दुष्ट बवाल, भूख नहिं देखे जूठा |
सोवे टूटी खाट, नींद का नियम अनूठा |

खोंच नींद तन भूख, कभी भी देगा लतिया |
रविकर रह चैतन्य, अन्यथा उघड़े बखिया ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 4, 2013 at 4:25pm — 7 Comments

हास्य कॆ,,,,, दॊहॆ :-

हास्य कॆ,,,,,दॊहॆ :- ---------------------

=======================

करियॆ साजन आज सॆ, सब्जी लाना बन्द ।

दिन-दिन दुर्लभ हॊ रहीं, जैसॆ मात्रिक छंद ॥१॥

परवल पीली पड़ गई, मिर्ची गई  सुखाय ।

बहुमत पाया प्याज नॆं,शासन रही चलाय ॥२॥

शपथ ग्रहण मॆंथी करॆ, मंत्री पद की आज ।

आलू कॆ सहयॊग सॆ, सिद्ध हुयॆ सब काज ॥३॥

लौकी कॊ तॊ चाहियॆ, रॆल प्रशासन हाँथ ।

कुँदरू गाजर घॆवड़ा, बावन संसद साथ ॥४॥

पालक खड़ी विपक्ष…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on September 4, 2013 at 3:30pm — 22 Comments

ठिठक गए

पाँव मेरे वहीं पर ठिठक से गए

जिस जगह तुम गए थे मुझे छोड़कर

मैं वहीं पर खड़ा ये ही देखा किया

कैसे जाता है कोई मुँह मोड़कर

 

कितने वादे किए थे तुमने मगर

इन कलियों को खिलना कहाँ था लिखा

इन शाखों पर चिड़िया चहकती नहीं

कब पेड़ों से पतझड़ हुआ था विदा

अब बहारें उधर से गुजरती नहीं

जो राहें तुम तन्हा गए छोड़कर

 

अश्क तो आँख से अब छलकते नहीं

सब घटा बन तुम्हारी तरफ हैं गए

चाँदनी मेरी छत पर ठहरती…

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Added by बृजेश नीरज on September 4, 2013 at 3:00pm — 25 Comments

आज मैं सर को झुकाने आया हूँ

पुष्प भावों के चढाने आया 

आज मैं सर को झुकाने आया 

बस रही है आप की ही तो कृपा 

बात ये दिल की जताने आया 

कर्ज में डूबा है कतरा कतरा 

कर्ज किंचित वो चुकाने आया 

एक रिश्ता है गुरु चेले में 

आज वो रिश्ता निभाने आया 

ज्ञान दाता हो बिधाता सम  तुम 

दीप दिल का मैं जलाने आया 

ज्ञान रग रग में समाहित जिनका 

उनको कुछ दिल की सुनाने आया 

जग में  महती है जो रिश्ता…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on September 4, 2013 at 12:30pm — 14 Comments

घर ही उजाड़ दिया

घर ही उजाड़ दिया

------------------------

मतलब की दुनिया है

मतलब के रिश्ते हैं

कौन कहे मेले में

आज कहीं अपने हैं

-----------------------

छोटे से पौधे को

बड़ा किया  प्यार दिया

सींचा सम्हाल दिया

फूल दिया फल दिया

तूफ़ान आया जो

घर ही उजाड़ दिया

-----------------------

बिच्छू  के बच्चों ने

बिच्छू को खा लिया

इधर – उधर,  डंक लिये

'खा' लो सिखा…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 4, 2013 at 11:00am — 12 Comments

संत लीला ( छ्न्द का प्रथम प्रयास )

संत लीला

******************

वेद पुराण वाचते करते गीता पाठ ।

बाबाजी के देखिये शाही ठाठ बाठ । 

शाही ठाठवाठ मे, कोई कमी न आये  ।

वैरागी बन के बाबा, दौलत खूब कमाये । 1।

 

चार बार चन्दन घिसे, छिडके गंगा नीर ।

देख के नारी मोहनी, बाबा भये अधीर ।

बाबा भये अधीर के, भूले दुनियादारी ।

मोहमाया के…

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Added by बसंत नेमा on September 4, 2013 at 11:00am — 17 Comments

कुण्डलियाँ

कुण्डलियाँ लिखने का प्रयास! (कृपया गुण दोष निकालें)

1.

मनमोहन को देखिये, बोल रहे हैं बैन

सोना नाहि खरीदिये, जाए दिल का चैन

जाए दिल का चैन, लम्पट लूट ले जाए

पैदल चलिए खूब, राखिये तेल बचाए.

विकट घड़ी में देश, पूरे विश्व में मन्दन

मन में रखिये धैर्य, स्वयम कहते मनमोहन!

2.

मेरा उनका आपका, भेद नहीं मिट पाय.

मन में संशय ही रहे, दूरी नित्य बढ़ाय..

दूरी नित्य बढ़ाय, मनुज मन अंतर लाये

झगड़ा रगडा होय,चैन मानव नहि पाए

कहे जवाहर…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on September 4, 2013 at 9:08am — 13 Comments

अपने को आफ़ताब समझने लगे हैं आप

मुझको अब एक ख़्वाब समझने लगे हैं आप।

सूखा हुआ गुलाब समझने लगे हैं आप॥

 

यूं लखनऊ में रहके गुजारे जो चार दिन,

अपने को अब नवाब समझने लगे हैं आप॥

 

तस्वीर पर ज़रा सी जो तारीफ़ हो गयी,

अपने को माहताब समझने लगे हैं आप॥

 

दो चार जुगनुओं से ज़रा दोस्ती हुई,

अपने को आफ़ताब समझने लगे हैं आप॥

 

घर से निकल के आप जो सड़कों पे आ गए,

उसको ही इंकलाब समझने लगे हैं आप॥

 

दो चार ज़िंदगी में ग़लत लोग क्या…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on September 4, 2013 at 1:00am — 10 Comments

घुट-घुट के जीना सीख लिया

रिश्तों की मर्यादा में हमने घुट-घुट के जीना सीख लिया,

औरों को खुशियाँ देने को, छुप-छुप के रोना सीख लिया।

 

ताने उलाहने सुन कर हम बने रहे हर बार अंजान,

वो यूं ही सताते रहे हमे समझा न कभी हमे इंसान।

मेरी आंखो के सागर का बूंद-बूंद तक लूट लिया और,

रिश्तों की मर्यादा में हमने घुट-घुट के जीना सीख लिया।

 

मेरे मन की गहराई मे अब उलझनों का घेरा हैं

हर रात बीते रुसवाई मे, बेबस हर सवेरा है।

मौसम की कड़ी तपन मे घावों को सीना सीख लिया…

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Added by Vasudha Nigam on September 3, 2013 at 9:51pm — 17 Comments

गज़ल

है हंसी रात बस चले आओ 

बहके जज़्बात बस चले आओ !

        

उसने वादा किया वफ़ा देंगे

दे रहा घात बस चले आओ !

ज़िन्दगी हो गई है आवारा

क्या सवालात बस चले आओ !

ठन्डे पानी मे भी बदन जलता

क्या ये बरसात बस चले आओ !

"म“ञ्जरी" अब सहा नही जाता 

अरज़े हालात बस चले आओ !

अप्रकाशित एवम मौलिक रचना  !

Added by mrs manjari pandey on September 3, 2013 at 8:30pm — 16 Comments

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