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लुभाये मन गोविंदा

कुण्डलिया छंद

गोविंदा की टोलियाँ, निकल पड़ी चहुँ ओर।

दधि माखन की खोज में, बनकर माखन चोर।।

बनकर माखन चोर, करें लीला बहु न्यारी।

फोड़ें मटकी श्याम, बचाओ गगरी प्यारी।।…

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Added by Satyanarayan Singh on August 28, 2013 at 10:30pm — 14 Comments

हे कृष्ण बनू तेरा अनुगामी!

शिशु रूप में प्रकट हुए तुम,

अंधकारमयी कारा गृह में,

दिव्यज्योति से हुए प्रदीपित,

अतिशय मोहक अतिशय शोभित,

अर्धरात्रि को पूर्ण चन्द्र से

जग को शीतल करने वाले

संतापों को हरने वाले,

अवतरित हुए तुम, अंतर्यामी!

हे कृष्ण बनू तेरा अनुगामी!

किन्तु देवकी के ललाट पर,

कृष्ण! तुम्हे खोने का था डर,

तब तेरे ही दिव्य तेज से

चेतनाशून्य हुए सब प्रहरी,

चट चट टूट गयी सब बेडी

मानो बजती हो रण भेरी,

धर कर तुम्हे शीश पर…

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Added by Aditya Kumar on August 28, 2013 at 9:00pm — 17 Comments

जिज्ञासा (लघु कहानी)

वजीरे आला आप भारी विरोध के चलते धैर्य रख इतने समय से शासन कर रहे है । आपके अधिकाँश मंत्रियों पर घोटाले सहित कई प्रकार के आरोप लग रहे है । कई मंत्रियों को तो स्तीफा भी देना पड़ा है । यहाँ तक की कई मामलो में तो न्यायालय ने भी तल्ख़ टिप्पणियाँ तक की है । तिरस्कार पूर्ण वचन बहुत दारुण होता है ।  यह कहते हुए युवराज ने राजनीति के गुर सीखने हेतु जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा- फिर भी आप यह सब सहन कारते हुए मौन एवं धैर्य रख कैसे शासन कर रहे है ?

वजीरे आला यह सब सुनकर कुछ देर मौन रहे ।…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 28, 2013 at 7:00pm — 17 Comments

तान्या : दो प्रेम कविताएँ

एक

चाँद झाँका

बादलों की ओट से ,

चाँदनी चुपके से आ

खिड़की के रस्ते,

बिछ गई बिस्तर पे मेरे/ 

और 

हवा  का एक झोंका,

सोंधी सी खुश्बू लिए

छू कर गया गालों को मेरे /

यूँ लगा मुझको कि

तुम सोई हो मेरे पास ,

मेरी बाहों के घेरे में /

लेकर होठों पर

एक इंद्रधनुषी मुस्कुराहट

तृप्त |

दो

सपने, तान्या

एक दम छोटे से बच्चे 

जैसे होते हैं/

अपने मे खोए…

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Added by ARVIND BHATNAGAR on August 28, 2013 at 5:30pm — 14 Comments

मत्त सवैया - दो छंद

बादल भी है नुचा हुआ सा, वसुधा भी है टुकड़े टुकड़े 

शर्म हया भी बिकी हुई है, भारत के है चिथड़े चिथड़े 
भीष्म पितामह शर शय्या पर, सुत मा या में द्रोण पड़े है 
शीश गिराते कौरव देखो , शस्त्र यहाँ पर मौन पड़े हैं 
_______________________________________
सीमा तो अब नहीं देश में , शत्रु घुसा है किसी जेब में 
रुपया तो बीमार वेश में , बाढ़ घुसी है ग्राम केश में 
रोटी फेंक फेंक हम…
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Added by Ashish Srivastava on August 28, 2013 at 2:00pm — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
फंस गए नन्द लाल (तोमर छंद)

तोमर छंद, प्रत्येक चरण में १२ मात्राएँ तुकान्त चरणान्त गुरु लघु से अंत )

.

चोरी का बुना  जाल  ,फंस गए नन्द लाल

देख दधि मटकी  हाल , हुई मैया  बेहाल

पड़  गया उल्टा दांव,  जब पकड़ा दबे पाँव,

ढूंढें नहि मिली ठांव, जा…

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Added by rajesh kumari on August 28, 2013 at 2:00pm — 17 Comments

कृष्ण जन्माष्टमी

कृष्ण जन्माष्टमी की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

 

१.

माखन चोर

गिरधर गोपाला

नन्द का लाला

   

२.

राधा-औ-कृष्णा

गोपियों संग रास

बंसी ले हाथ

 

३.

सहज जियो

जीवन है उत्सव

कृष्ण सन्देश

४.

हँस के जियो

जिंदगी प्रेम रस

छक के पियो

 

५.

आनंददायी

कृष्णवृत्ति जो फ़ैले

दुनिया…

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Added by vijayashree on August 28, 2013 at 12:30pm — 9 Comments

!!! यही ‘सत्यम’ शिवम् सुन्दर हुआ है !!!

!!! यही ‘सत्यम’ शिवम् सुन्दर हुआ है !!!

बह्र- 1222 1222 122

सकल दुनिया दिखाता जा रहा हूं।

कयामत का सफर सुलझा रहा हूं।।

मेरे मौला मैं तुझको क्या बताऊं,

रूहानी पीर के जैसा रहा हूं।

तेरी चौखट सदा मुझको लुभाती,

कभी तीखा कभी मीठा रहा हूं।

जहां में और भी गम हैं कहूं क्या?

जहां मेला वहीं तन्हा रहा हूं।

मेरी मां ने कहा था सुब्ह उठकर,

पिलाना आब, वो दरिया रहा हूं।

अमीरी छोड़ कर मुफलिस…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 28, 2013 at 10:13am — 19 Comments

जन्माष्टमी

कृष्ण का जीवन दर्शन बहुत गहरा और अद्भुत है , और समझने जैसा है । कृष्ण माखन चोरी करते हैं ,

रास रचाते हैं , राजनीति भी करते हैं , प्रतिज्ञा भी तोड़ते हैं , फिर भी हमने उन्हें भगवान् कहा है पूर्णावतार

कहा है उन्होंने जो भी किया हमने उसे लीला कहा है और बिलकुल जब कोई इतना प्रेमपूर्ण व्यक्ति कुछ भी करता

है तो वो लीला हो ही जाता है ।

कृष्ण का जन्म भी बड़े अद्भुत ढंग से हुआ इसे भी समझ लेना चाहिए कृष्ण का जन्म साधारण गर्भ

से नही हो पाता , और वासुदेव देवकी द्वारा भूमि तैयार…

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Added by Neeraj Nishchal on August 28, 2013 at 9:00am — 5 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
हमसफ़र ....... डॉ० प्राची

सितार के

सुरमई तारों की झंकार से

गूँज उठी

स्वप्न नगरी..

समय के धुँधलके आवरण से

शनैः शनैः

प्रस्फुटित हो उठी

एक आकृति

अजनबी

अनजान..

स्वप्नीली पलकें

संतृप्त मुस्कान

प्राण-प्राण अर्थ

निःशब्द..

निःस्पर्श स्पंदन

कण-कण नर्तन

क्षण विलक्षण

मन प्राण समर्पण

सखा-साथी-प्रिय-प्रियतम-प्रियवर

अनकहे वायदे, गठबंध परस्पर - हमसफ़र !

 

Added by Dr.Prachi Singh on August 27, 2013 at 7:00pm — 23 Comments

रूह भर कर दे

मेरा वजूद बस इक बार बेखबर कर दे

पनाह दे तो असातीन मोतबर कर दे

 

चमन कहीं भी रहे और गुल कहीं भी हो  

मेरे अवाम को बस खुशबुओं से तर कर दे

 

कोई निगाह तगाफुल करे न गैर को भी

सदा उठे जो बियाबाँ से चश्मे-तर कर दे

 

कहाँ-कहाँ न गया हूँ मैं ख्वाब को ढोकर 

मेरा ये बोझ जरा कुछ तो मुक्तसर कर दे

 

तमाम रात अंधेरों से भागता ही रहा

तमाम उम्र उजाला तो रूह भर कर दे

 

तगाफुल= उपेक्षा; असातीन= खम्भा ;…

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Added by Dr Lalit Kumar Singh on August 27, 2013 at 5:51pm — 15 Comments

जन्माष्टमी दोहे

आई है जन्माष्टमी , धूम मची चहुँ ओर

जन्मदिन मनाओ सखी, मनवा नाचे मोर ||

विष्णु जी बाद आठवें ,कृष्ण हुए अवतार

ब्रज भूमि अवतरित हुए, दिया कंस को मार ||

जन्मोत्सव की आज तो, मची हुई है धूम

गोकुलवासी हैं सभी, रहे ख़ुशी से झूम ||

पूत देवकी वासु के ,यशोदा लिया पाल

तारे सबकी आँख के,गोकुल के हैं लाल ||

आतताई खत्म किया,छाया ब्रज उल्लास

चमत्कार कर नित नए,बढ़ा रहे विश्वास ||

राधा अदभुत प्रीत की ,दे रही…

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Added by Sarita Bhatia on August 27, 2013 at 2:30pm — 9 Comments

हाँ मै चोर हूँ [लघु कथा ]

फैक्ट्री के आफिस के सामने एक लम्बी सी कार  आ कर रुकी और भुवेश बाबू आँखों पर काला चश्मा चढ़ा कर आफिस में अपना काला बैग रख कर वह किसी मीटिग के लिए चले गए, जब वह वापिस आये तो उनके बैग में से किसी ने पचास हजार रूपये निकाल लिए थे। आफिस के सारे कर्मचारियों को पूछताछ के लिए बुलाया गया, सबकी नजरें सफाई कर्मचारी राजू पर टिक गई क्योकि उसे ही भुवेश बाबू के कमरे से बाहर आते हुए देखा गया था। अपनी निगाहें नीची किये हुए राजू के अपना गुनाह कबूल कर लिया और मान लिया कि वह ही चोर है, पुलिस आई और राजू को पकड़…

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Added by Rekha Joshi on August 27, 2013 at 1:00pm — 19 Comments

हाकी काकी सी सरस, क्रिकेट बुआ हमार-

मौलिक / अप्रकाशित

हाकी काकी सी सरस, क्रिकेट बुआ हमार |
राखी भैया-द्वीज पर, पा विशेष उपहार |


पा विशेष उपहार, हार हीरों का पाई |
जाए हीरो हार, करोड़ों किन्तु कमाई |


काकी का कर्तव्य, करे नित सेवा माँ की |
लेडी मेवा खाय, खूब चीयर हा हा की ||

Added by रविकर on August 27, 2013 at 12:00pm — 6 Comments

बन्दगी अस्तित्व की

जो मै हूँ वही है तू , नही गर मै नही है तू ।

नही कुछ तू तू सबकुछ है , तू अंबर है ज़मी है तू ।

हवा भी तू घटा भी तू , तू ही बारिश की रिमझिम है ।

तू ही खिलता है फूलों में , सितारों की तू टिम टिम है ।

जो ना जानू कहीं ना तू , जो जानू तो यही है तू ।

परिंदों के मधुर स्वर में , तू ही नदियों की कल कल में ।

वक्त गुज़रे न गुज़रे तू , तेरा तो वास पल पल में ।

ये जीवन तुझसे पूरा है , तो इसकी हर कमी है तू ।

छुपाकर खुद को परदे में,…

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Added by Neeraj Nishchal on August 27, 2013 at 10:56am — 7 Comments

घोटाले

घोटाले कर कर हुई, भ्रष्ट आज सरकार

जनता डर डर रह रही, संसद भी बीमार

संसद भी बीमार, मिलै नहि मोहे चैना  

जुल्मी है सरकार, बड़ा मुश्किल है रहना 

कह सागर सुमनाय, काम तो इनके काले  

खाना बांटे मुफ्त, करे नित नए घोटाले 

आशीष श्रीवास्तव - सागर सुमन
मौलिक एवं अप्रकाशि

Added by Ashish Srivastava on August 27, 2013 at 7:30am — 15 Comments

सच कहूँ तो

सच कहूँ

तो मुझे कभी समझ में नही आया

कि जीवन में वह कौन सा क्षण था

जब पहली बार मिले थे तुम ...

लगे थे मित्र से भी कुछ अधिक वल्लभ ,

भाई से भी कुछ अधिक अपने ,

सखा से भी कुछ अधिक स्नेही,

पिता से भी कुछ अधिक पवित्र !

यों तो सबके दुलारे हो

पर मुझे कुछ अधिक प्यारे हो

जो नहीं आता मुझे

सब सिखलाते हो

रास्ता दिखाते हो मेरी

नादानियों पर मुस्कुराते हो

आशीष बरसाते हो

हे…

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Added by Vasundhara pandey on August 27, 2013 at 7:30am — 2 Comments

लघुकथा-- लौटना

लघुकथा-लौटना

मन के कोने में कुछ विचार उथल-पुथल मचा रहे थे। कि मनुष्य को जब आगे कुछ दिखाई दे रहा हो तो वह आगे बढ कर उसे समेट लेने की सोचता है जबकि जिस जगह वह खडा होता है  वह वहां तक उसी रास्ते से आया है। जिस रास्ते को वह आगे देखते हुय़े भूल जाता है। सोचते-सोचते सागर अपनी यादों में खो जाता है और बिल्कुल अकेला हो जाता है वह याद करता है कि किस तरह उसकी प्रयेसी कुसुम उसके आफिस में उससे दुनिया से अलग हट कर प्यार करने की बातें करती थी। और प्यार जताती भी थी, जब उसका तबादला हो गया तो वह…

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Added by सूबे सिंह सुजान on August 27, 2013 at 7:30am — 9 Comments

बाड़े

बहुत बरस पहले एक राजा था एक रात उसने एक सपना देखा कि सूरज भरी दोपहर में अपना सुनहरा पीला रंग छोड़ कर लाल हो रहा था एकदम सुर्ख लाल  |  राजा अनजाने भय से काँप उठा  सुबह उसने अपनी बिरादरी के लोगों से इस सपने का जिक्र किया पता लगा उन्होंने भी ऐसा ही सपना देखा है |  

मंत्रियों पंडितों से विचार विमर्श कर पाया कि यह किसी परिवर्तन का संकेत है |

 

ओह !तब तो जल्द ही कुछ सोचना होगा राजा  परेशान हो उठा  | सलाह मशविरा किया तो पता लगा राज्य में कुछ लोगों का जीवन स्तर सामान्य…

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Added by vandana on August 27, 2013 at 7:30am — 10 Comments

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