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गीतों से दिल की बातें, कैसे तुम्हें सुनाऊं ..

गीतों से दिल की बातें, कैसे तुम्हें सुनाऊं  .

बेबस नयन की बोली, कैसे तुम्हें दिखाऊ.

दिल कुमुदनी सा देखो, प्रियतम मेरी तुम्हारा ,

चन्द्र चन्द्रिका से दिल की, कैसे इसे खिलाऊं .

दर्पण से दिल में जो भी ,संजोये तुमनें सपने ,

दर्पण में अक्स दिल का , कैसे तुम्हें दिखाऊ.

काज़ल ने है बचाया, नज़र से ज़माने की ,

वो ख्वाब तुम्हारे हैं, ज़माने से मैं छिपाऊं .

ऋतु बसंत पतझड़ पर, छा गयी गुलिस्ताँ में,

मैं खिल उठा…

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Added by Dr Ajay Kumar Sharma on March 22, 2012 at 4:36pm — 8 Comments

मत जाओ !

मत जाओ ! मत जाओ !

कैसे कहें हम उनसे कि आज, मत…

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Added by Chaatak on March 22, 2012 at 4:22pm — 5 Comments

मतलबी हूं मैं

दुनिया बहुत मतलबी है

एक दोस्त की तलाश में

कदम-कदम पर खाया है धोखा

गिर-गिर कर संभला हूं

कैसे करूं यकीन अब तुझ पर

अब तो खुद से ही लगता है डर

कही मैं भी तो मतलबी नहीं

सोचता हूं जब एकांत में

समझ आता है कुछ-कुछ

मैं भी हूं मतलबी

क्योंकि मतलबी दुनिया में

मैं कोई खुदा तो नहीं

आखिर…

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Added by Harish Bhatt on March 22, 2012 at 2:04pm — 5 Comments

सबकुछ कह जाने दो ..

है बड़ी बात तो बड़ी बात ही रह जाने दो ..

मेरी बातों को मेरी बातों में बह जाने दो ..
लफ्ज़ कितना भी कहें कहते कहाँ हैं सबकुछ ..फिर भी ..
आज लफ्ज़ - ब- लफ्ज़ मुझे सबकुछ कह जाने दो…
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Added by Lata R.Ojha on March 22, 2012 at 1:58pm — 11 Comments

ग़ज़ल.

तोड़ो इन्हें की अब तो मुरझा रहे है फूल.

डाली पे रहते-रहते उकता रहे है फूल.

.

जाते समय तो घर से जुड़े में हंस रहे थे

लौटते कदम है,कुम्हला रहे है फूल.

.

ख़ुशबुओ का लेकर पैगाम साथ-साथ

दोनों दिलो क़े रिश्ते सुलझा रहे है फूल.

.

देने को सब खड़े है बस आखरी सलाम.

मिटटी बनी है देह सुस्ता रहे है फूल.

.

महका रहे थे महफ़िल रातो को देर तक.

घूरे की शान अब तो बढा रहे है फूल.

.

अविनाश…

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Added by AVINASH S BAGDE on March 22, 2012 at 10:30am — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बड़े बेखबर

आज मन में क्यूँ उठी मेरे लहर 

चाँद जाने दे गया कैसी खबर 

चलो घर को अपने करीने से सजा लूँ 

किसको  साथ लाती है मेरी सहर 

बहकी बहकी सी फ़िजा लगती है 

कौन जाने है ये किसका असर 

वो तो समझो  है शाइस्तगी मेरी 

वर्ना हक़ से कहती अभी और ठहर 

आजकल दरवाजे उनके बंद रहते हैं 

चुपचाप ना जाने वो गए किधर 

रुसवाइयों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता 

कसम से हैं वो बड़े बेखबर 

रास्ता शायद वो दरिया भूल गया 

मुड़ गया इस और जो…

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Added by rajesh kumari on March 21, 2012 at 2:09pm — 20 Comments

मैखाना है

ऐसा लगता है की मेरा यों अब गुजरा जमाना है,

बेगाना रुख किये 'साकी'! यहाँ तेरा मैखाना है.



फकीरों को कहाँ यारो कभी मिलता ठिकाना है,

बना था आशियाना, आज जो बिसरा मैखाना है!



कभी अपना बना ले पर कभी बेदर्द ठुकरा दे,

सयाना जाम साकी! और आवारा मैखाना है.



तेरी हर एक हंसी पर ही चहक कर के मचल जाना.

हमेशा हुस्न-ए-जलवो पर जहाँ हारा मैखाना है.



तेरी तस्वीर के बिन ही मै पीने आज बैठा हूँ,

ख़ुशी या गम हो जुर्माना मुझे मारा मैखाना है. …

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Added by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 21, 2012 at 9:35am — 14 Comments

ये भारत देश हमार है

शस्य  श्यामला  धरती  अपनी   

भाल    हिमालय  मुकुट  श्रंगार  है 

झर  झर  झरते  झरने  मही  पर

कल  कल  बहती  नदियों  की  बहार  है 

ये   भारत  देश  हमार   है 

 

कई  सम्प्रदायों  से  बसी   ये  धरती…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 20, 2012 at 4:03pm — 19 Comments

चाहत

मेरी चाहत जवां होती है

तेरी हां के इंतजार में

तेरा आना, तेरा जाना

कर देता है बेकरार

मेरी चाहत जवां होती है

तेरी हां के इंतजार में

दिन पर दिन

रात दर रात

गुजरती जा रही

आंखों से नींद

दिल से चैन

गायब हो जाते रहे

अब तो हाल यह है कि

मेरी चाहत भी

मुर्दा होती…

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Added by Harish Bhatt on March 20, 2012 at 11:31am — 3 Comments

प्रतिष्ठा (लघु-कहानी)

जवाहरात व्यवसायी रामकिशन ने अपनी पढ़ी लिखी लड़की सोनाली के लिए अच्छा वर

तलाशने हेतु पांच सितारा होटल में उच्च घर्राने के कई लडके देखने के बाद, आखिरकार  सम्भ्रान्त परिवार के ही डा. राजवंशी के पौत्र एवं योगेश के पुत्र सौरभ के साथ सम्बन्ध तय किया |विवाह में शान-ओ-शौकत में काफी खर्चा किया एवं दहेज़ में भी जेवरात एवं…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 20, 2012 at 10:00am — 1 Comment

नन्ही लेखिका अक्षिता राष्ट्रीय बाल पुरस्कार लेते हुए

 
ढेर सारा प्यार,बधाई और शुभ् कामनाए
   





"दि. २४ नव. २०११. इंटरनेट पर हिन्दी की सबसे नन्ही लेखिका को भारत सरकार ने राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से 
सम्मानित किया है. संभवतः ये पहला मौक़ा है जब भारत सरकार ने किसी प्रतिभा को हिन्दी के चिट्ठे के लिए 
सम्मानित किया है. ये सम्मान…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 20, 2012 at 9:30am — 6 Comments

मेरी जिंदगी

मेरी जिंदगी एक खुली किताब है

हर पन्ने पे तेरा नाम है ।

मैं रहूँ न रहूँ ,परवाह नहीं है

जिंदगी मेरी तुम्हारे नाम है ।

 

जब कभी ख्यालों की आँधी उठेगी

तन्हाई में मेरी आवाज़ गूँजेगी

परछाईं बनकर…

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Added by kavita vikas on March 19, 2012 at 10:00pm — 5 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघु कथा : हाथी के दांत

लघु कथा : हाथी के दांत 

बड़े बाबू आज अपेक्षाकृत कुछ जल्द ही कार्यालय आ गए और सभी सहकर्मियों को रामदीन दफ्तरी के असामयिक निधन की खबर सुना रहे थे. थोड़ी ही देर में सभी सहकर्मियों के साथ साहब के कक्ष में जाकर बड़े बाबू इस दुखद खबर की जानकारी देते है और शोक सभा आयोजित कर कार्यालय आज के लिए बंद करने की घोषणा हो जाती है | सभी कार्यालय कर्मी इस आसमयिक दुःख से व्यथित होकर अपने अपने घर चल पड़ते  है | बड़े बाबू…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 19, 2012 at 9:03pm — 68 Comments

सेनानी

बचपन बीता खेलों में 
माँ के सुन्दर सुन्दर गीतों में 
मन मयूर  मचलता फिरता  गलियन में 
भौंरा बन मंडराता छुप जाता  कलियन में 
गावों की नागिन सी  पग डंडियाँ 
बलखाती जा मिली जब हसीं शहरों से 
प्रेम रंग में डूब गया जा टकराया लहरों से 
कुछ मीत यहाँ कुछ मीत वहां 
कुछ साथ रहे  कुछ बिछड  गए 
हमने देखा  उसने पहचाना 
वादा था जीवन साथ निभाना 
वादे करते वो आईने…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 18, 2012 at 10:00pm — 15 Comments

इश्क़

इश्क़ की बात चली

रात आँखों में जली

————

मौजूदगी तेरी हर लम्हा मौजूद रहे

तू साथ हो न हो, साथ बावजूद रहे

ख़यालों में गुज़रा ये दिन सारा

शाम यादों में ढली

इश्क़ की बात चली..

————…

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Added by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 18, 2012 at 5:57pm — 22 Comments

कविता- डाक्टर

डाक्टर 

 

मरीजों की भीड़ को-

डाक्टर झट-पट ऐसे निपटाता रहा,

बगैर गर्दन उठाये-

मरीज का हांल-चाल कुछ सुनता रहा

मरीज दर्द से कराहता रहा-…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 18, 2012 at 3:00pm — 5 Comments

बेबसी

रात्रि का अंतिम प्रहर घूम रहा तनहा कहाँ

थी ये वो जगह आना न चाहे कोई यहाँ

हर तरफ छाया मौत का अजीब सा मंजर हुआ

घनघोर तम देख साँसे थमी हर तरफ था फैला धुआं

नजर पड़ी देखा पड़ा मासूम शिशु शव था

हुआ जो अब पराया वो अपना कब था

कौंधती बिजलियाँ सावन सी थी लगी झड़ी

कौन है किसका लाल है देख लूं दिल की धड़कन बढ़ी

देखा तनहा उसे सर झुकाए समझ गया कि उसकी दुनिया लुटी

जल रही थी चिताएं आस पास ले रही थी वो सिसकियाँ घुटी घुटी

देती कफ़न क्या कैसे…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 17, 2012 at 10:00pm — 26 Comments

गजल

वो खुद में इतना सिमटे-सिमटे थे
जैसे वो दिल को पकड़े-पकड़े थे |


उनको देख हुए थे बेसुध हम तो
क्या बात करें अब मुखड़े, मुखड़े थे |…
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Added by dilbag virk on March 17, 2012 at 7:28pm — 12 Comments

जिंदगी ले के चली

जिंदगी ले के चली, एक ऐसी डगर,

राह के उस पार, चलते हैं हम सफ़र. 



रात और दिन, मील के पत्थर जैसे हैं,

मोड़ बन जाते कभी, हैं चारों पहर.

  

फादना पड़ता है, दीवारें अनवरत,

ढूँढना चाहूँ मै, 'उसको' जब भी अगर.

 

शख्शियत में नये, बदलता हूँ धीरे से,

नये चेहरे मिले और, नये से राही जिधर.



द्वार-मंदिर मिले न मिले, पर चाहतें,

बांहों में ही भींचे रहती हैं, ता-उमर.



जिंदगी में लेने आता, एक बार पर-

बैठती हूँ रोज, 'बस्तीवी'…

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Added by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 17, 2012 at 9:07am — 13 Comments

मन का चन्दन

मन का चन्दन महक उठता है…

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Added by RAJEEV KUMAR JHA on March 17, 2012 at 9:00am — 9 Comments

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