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महंगाई और मंत्री जी!

चीनी के दाम बढने पर

पत्रकारों ने खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री से सवाल पूछा.-

मंत्री जी ने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया.

चीनी कम खाइए, डायबिटीज को दूर भगाइए.

मैं तो चाय भी बिना चीनी के पीता हूँ,

कहिये तो आपलोगों के लिए भी मँगा दूँ.

पत्रकारों का अगला सवाल था -

सर, दाल बहुत महंगा है,

मंत्री जी फिर बोले,

आपने सुना नहीं, अमरीका ने क्या कहा है?

वे कहते हैं, भारतीय दाल ज्यादा खाते हैं,

इसीलिये गाल भी ज्यादा बजाते हैं.

अब मेरी सलाह मानिए,

गरम पानी में…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on April 8, 2012 at 6:31am — 8 Comments

वाणी वंदना

वाणी वंदना

\

रसना पर अम्ब निवास करो,

माँ हंसवाहिनी नमन करूँ.

सेवक चरणों का बना रहूँ,

नित उठ बस तेरा ध्यान धरूँ.

 

छंदों का नवल स्वरुप लिखूँ,

लेखनी मातु रसधार बने.

हो प्रबल काव्य उर वास करो,

हर छंद मेरा असिधार बने.

 

मन…

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 7, 2012 at 11:00pm — 12 Comments

अहसास

 अहसास

श्वेत वसन में लिपटा जीवन

जन गण का सम्मान लिए !

चूसें रक्त सदा वे विचरें

कानून न उन पर हाथ धरे !!

 

भले दीखते ऊपर ही चंगे

जब मन को साफ रखे ना !…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 6, 2012 at 10:00pm — 12 Comments

खाली हाथ

आज वह (मानव )
पंचभूत में विलीन हो गया
कुछ भी तो नहीं ले जा सका
सबकुछ
जहाँ का तहां विद्यमान हैं
जब जीवन था
तब उसे फुर्सत था कहाँ ?
न संतुष्टि थी
न खुशिया
नित नए खोज में उलझे
वह प्राणी
भाग रहा था
परन्तु आज सबकुछ
ख़त्म हो गया
खाली हाथ आया था
खाली हाथ ही चला गया l

Added by Rita Singh 'Sarjana" on April 6, 2012 at 9:30pm — 20 Comments

मन मंथन

(गणबद्ध)                  मोतिया दाम छंद

सूत्र = चार जगण (१६ मात्रा) यानि  जगण-जगण-जगण-जगण (१२१ १२१ १२१ १२१)

************************************************************************************

दिखी  जब  देश  विदेश  अरीत.

दिखा शिशु भी हमको भयभीत .

तजें हम  द्वैष  बनें  मनमीत.

लिखूँ कुछ काव्य अमोघ…

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 6, 2012 at 5:30pm — 12 Comments

अब यहाँ कोई नहीं कोई नहीं आयेगा..

मसीहा मर गया कब का लटक के सूली पे ,
कि छूटी जान इस जहाँ के चालबाजों से,
कोई पागल नहीं है वो कि फिर से आयेगा  ,
कम अज़ कम कब्र में तो चैन से सोने दो उसे ...
.…
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Added by Sarita Sinha on April 6, 2012 at 2:30pm — 9 Comments

'हनुमान जयन्ती पर विशेष'

“हनुमान जयन्ती पर विशेष”

'दोहे'

 

खिली…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on April 6, 2012 at 1:13pm — 14 Comments

परिदृश्य

परिदृश्य

  

(1)

फर्क 

दो लड़कियां दोनों ही सुन्दर , 

उम्र थी सत्रह से…

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Added by Mukesh Kumar Saxena on April 6, 2012 at 1:00pm — 8 Comments

कितना अच्छा लगता है

कितना अच्छा लगता है

यूँ अनायास मिलना

दुनियाँ के गलियारों में

साथ-साथ फिरना…

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Added by RAJEEV KUMAR JHA on April 6, 2012 at 10:30am — 16 Comments

हम पंछी एक डाल के

हम पंछी एक डाल के

Disclaimer:यह कहानी किसी भी धर्म या जाती को उंचा या नीचा दिखाने के लिए नहीं लिखी है, यह बस विषम परिस्थितियों में मानवी भूलों एवं संदेहों को उजागर करने के उद्देश्य से लिखा है. धन्यवाद.…

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Added by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on April 6, 2012 at 10:00am — 19 Comments

ये झुग्गियां ......!

ये झुग्गियां

बांस और फूस से बनी,

चटाई से घिरी

गंदे स्थान पर,

शहर के कोढ़ की तरह

दिखती हैं.

ये झुग्गियां

बड़ी अट्टालिकाओं के

आजू-बाजू,

जैसे ये

उनका मुंह चिढ़ा रही हों!

इन झुग्गियों में रहने वाले

मिहनत-कश इंसान होते हैं

महलों को बनाने वाले

कारीगर होते हैं

सपनो के बाजीगर होते हैं

ये सजाते है

सेहरे, डोलियाँ,सेज

ये सजाते हैं

मंच, आयोजन स्थल, प्रवचनशाला

ये बिखेरते है खुशबू, फूलों की

करते है इत्र से…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on April 6, 2012 at 8:37am — 16 Comments

कैसी गंगा?अब अवजल है|

कुछ नहीं बिगाड़ सकी,

मेरा,

सिकंदर की तलवार|

हाँ,झेला है मैंने –

सेल्युकस की रार|

नादिरशाही तलवारों की…

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Added by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on April 5, 2012 at 9:30pm — 9 Comments

स्वार्थ

(मात्रिक छंद)

उल्लाला = १५,१३ मात्रा

(मैथिली शरण गुप्त जी ने इस छंद पर कई रचनाएँ लिखी है)

(तुम सुनौ सदैव समीप है,जो अपना आराध्य है.)

*******************************************************

नहीं बड़ा परमार्थ से अब , धर्म …

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 5, 2012 at 9:00pm — 29 Comments

मेरे गीतों को होठों से छू लो जरा

 

ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.

वक़्त बे वक़्त यूँ ना लो अंगड़ाइयां, देखने वाला बेमौत मर जायेगा.

                     होंठ तेरे गुलाबी ,शराबी नयन.

                    संगमरमर सा उजला है , तेरा बदन.

रूप यूँ ना सजाया - संवारा करो, टूट कर आईना भी बिखर जायेगा.

ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.

                     सारी दुनिया ही तुम पर, मेहरबान है.

                      देख तुमको…

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Added by satish mapatpuri on April 5, 2012 at 6:58pm — 13 Comments

"दो कोशिशें"

ओ बी ओ मंच के सुधिजनों पिछले दिनों एक रचना पोस्ट की थी जिसे दुर्भाग्यवश मुझे डिलीट करना पड़ गया था| उसी रचना को आधार मान कर एक और रचना की है उन दोनों को ही यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ दोनों एक ही बह्र और एक ही काफ़िये पर आधारित हैं| पहली रचना कुछ दिन पूर्व ओ बी ओ पर ही प्रकाशित की थी दूसरी अभी हाल में ही लिखी है| मैं नहीं जानता कि ये दोनों ग़ज़ल की कसौटी पर खरी उतरती हैं या नहीं| मंच पर उपस्थित विद्वतजनों से आग्रह है कि वे मुझे मेरी त्रुटियों से अवगत कराएँ और मार्गदर्शन करें| विशेष तौर पर प्रधान…

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Added by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 5, 2012 at 2:30pm — 41 Comments

मानव

खोलो मन की सांकल को ,

जरा हवा तो आने दो ,,

निकलो घर से बाहर तुम ,

शोख घटा को छाने दो ,,…

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Added by अश्विनी कुमार on April 5, 2012 at 2:11pm — 24 Comments

प्रेम

प्रेम

 
प्रेम तो नयनो में ही बसते है
 

प्रेम नयनो से ही बरसता है 


नयनो नयनों में प्रेम होता है…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 5, 2012 at 12:28pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
खौफनाक चेहरे

हर मजहब के दुःख -दर्द एक सामान होते हैं

फिर क्यूँ पराई पीर से हम अनजान होते हैं

क्यूँ फेंकते पत्थरों को हम उनके घरों पर

जब खुद के भी तो शीशों के मकान होते हैं

उन लोगों की कम सोच का क्या करियेगा

जिनकी वजह से रिश्ते कुछ बेजान होते हैं

बन जाते हैं वो सफ़र में मुसीबतों के सबब

कई दफह जब रास्ते बेहद सुनसान होते हैं

मत छूना कभी जो लावारिस पड़े हैं राह में

मुमकिन हैं छुपे मौत का वो सामान होते हैं

मिलके गले वो घोंप दे खंजर ये क्या पता…

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Added by rajesh kumari on April 5, 2012 at 11:30am — 16 Comments

ओ.बी.ओ. गीत

जय जय ओ.बी.ओ.  जय जय ओ.बी.ओ. 

आओ हम सब मिलकर गायें 
ओ.बी.ओ. महान है 
भटकते फिरते जो ज्ञान की खातिर 
उनके लिए वरदान है 
जय जय ओ.बी.ओ.  जय जय ओ.बी.ओ.  ..२ बार 
गजल छन्द कई भाषाओँ के  उपलब्ध  विधान…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 5, 2012 at 11:30am — 10 Comments

जिस गंगा की

जिस गंगा की 


हिमालय से कल-कल करती -
निरंतर बहती निर्मल  धारा
पवित्र गंगा-जल, वह मुक्ति धारा
मिलती कृषक को जिससे पवन माटी
जो गंगा मृतक अस्थियाँ भी…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 5, 2012 at 10:52am — 5 Comments

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