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जय..जय..ओ बी ओ !

जय...जय...जय...ओ बी ओ l

यहाँ शरण में जो भी आया
ओ बी ओ ने गले लगाया l

इस मंदिर में जो भी आवे
रचना नई-नई लिखि लावे l

जो भी इसकी स्तुति गावे
नई विधा सीखन को पावे l

संपादक जी यहाँ पुजारी
उनकी महिमा भी है न्यारी l

जिसकी रचना प्यारी लागे
पुरूस्कार में वह हो आगे l

प्रबंधकों की अनुपम माया
भार प्रबंधन खूब उठाया l

जय...जय...जय..ओ बी ओ l

-शन्नो अग्रवाल 

Added by Shanno Aggarwal on April 5, 2012 at 2:00am — 14 Comments

मुक्तिका -- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका

संजीव 'सलिल'

*

लिखा रहा वह, हम लिखते हैं.

अधिक देखते कम लिखते हैं..



तुमने जिसको पूजा, उसको-

गले लगा हमदम लिखते हैं..



जग लिखता है हँसी ठहाके.

जो हैं चुप वे गम लिखते हैं..



तुम भूले सावन औ' कजरी

हम फागुन पुरनम लिखते हैं..



पूनम की चाँदनी लुटाकर

हँस 'मावस का तम लिखते हैं..



स्वेद-बिंदु से श्रम-अर्चन कर

संकल्पी परचम लिखते हैं..



शुभ विवाह की रजत जयन्ती

मने- ज़ुल्फ़  का ख़म…

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Added by sanjiv verma 'salil' on April 4, 2012 at 8:30pm — 8 Comments

जय ओ.बी.ओ.

(ओ.बी.ओ. का अपना बैज है. ये रचना ओ.बी.ओ. गीत हेतु तैयार की है.)

भटकता फिर रहा था न जाने कब से भीड़ में एक आस लिए 

मुट्ठी  भर  पा  जाऊं धरा औ  ज्ञान की एक  बूँद  का विश्वास  लिए 

मिली जानकारी जब  कि ओ.बी.ओ. एक ऐसा आधार है 

गुनी जनों के सानिध्य मिले तो अवश्य तेरा बेडा पार है

गजल  छन्द  और  कई  भाषाओँ   के हैं  विधान  यहाँ  ,

कहानी  और  कविता  का  मिलता  है ऐसा  ज्ञान कहाँ   

नए  पुराने  और  धर्म जाति का  न  कोई  भेद  यहाँ 

वो जगह बताएं…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 4, 2012 at 6:00pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक मायावी शब्द

तीन वर्ण और 

एक मायावी शब्द ,

जिसके कर्णपटल में प्रवेश करते ही 
एक मासूम नन्हा बालक 
जो अपने जीवन का
पहला कदम रख रहा है, 
उत्साहित और रोमांचित हो उठता है 
कैसा अद्दभुत  रिश्ता है इस शब्द का 
मन मस्तिष्क की तंत्रिकाओं  से 
जिसके तिलस्मी प्रभाव से 
चार सीढियां चढ़ता हुआ 
इंसान आठ सीढियां चढ़ जाता है |
और एक दिन अम्बर छूने में 
कामयाब…
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Added by rajesh kumari on April 4, 2012 at 10:31am — 10 Comments

एक प्रयास

पुनः लुंठन हो रहा चुपचाप हैं हम|

अक्षमाला पर मरण के जाप हैं हम|

 

चिर विकेन्द्रीकृत हुई केन्द्रीय सत्ता,

नव्य युग, प्राचीनता के सांप हैं हम|

 …

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Added by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on April 4, 2012 at 10:30am — 10 Comments

ऐसा तो न सोचा था

यह क्या

ऐसा तो न सोचा था

यह तो धोखा हो गया

बच्चा समझ के बहलाया नानी ने

दूर एक ग्रह को बनाया था मामा

रोज रात में बताती थी मुझे

देखो आसमां में जो चमक रहा है

वह हैं सबका प्यारा चंदामामा

धीरे-धीरे अक्ल आने लगी

नानी का झूठ समझ आने लगा

क्यों बोला झूठ उन्होंने

बच्चा जान बहलाया मुझे

लेकिन कहते है

प्यार में होता है सब जायज

यह बात भी समझ आती है

जब बचाना होता है गृह अपना

तब लेता हूं झूठ का सहारा

और कहता हूं अपनी…

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Added by Harish Bhatt on April 4, 2012 at 2:52am — 2 Comments

खुदा से जंग

हर पल एक जंग के जैसी होती है ज़िन्दगी
कभी रंगीन तो कभी बेरंग होती हे ज़िन्दगी
कभी मामूली तो कभी संगीन होती है ज़िन्दगी 
कभी ग़मगीन तो कभी खुशियों में लीन होती है ज़िन्दगी 


लेकिन यहाँ कुछ अलग ही हिसाब है
खुदा जनाब हमसे इतने नाराज़…
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Added by Rohit Dubey "योद्धा " on April 4, 2012 at 12:00am — 2 Comments

परिवर्तन

कालबाह्य हो गयी अचानक सिर से वंचित चोटी है|

अब तो सारी ही रचनाएं कंप्यूटर पर होती है||

मृतिका पात्रों का सोंधापन,

स्नेहपूर्ण परसन,प्रक्षालन|

मधुमय मंगल गीतों…

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Added by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on April 3, 2012 at 10:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल - मुस्करा के वेबजह ना मेहरबानी कीजिये

खेलिए ज़ज़्बात से मत  खौफ़ तारी कीजिये 
मुस्करा के वेबजह ना  मेहरबानी  कीजिये 
.
छेडिये इक जंग ग़ुरबत को मिटाने के लिए 
घोषणा मत खोखली या मुँह जबानी कीजिये 
.
कौन है जो चांदनी का नूर फैलाता है अब
सोचिये कुछ सोचिये कुछ मगजमारी कीजिये 
.
आईए करिए मनौव्वर इस जहां को इल्म से  -
बात खुलकर हर किसी से प्यारी-प्यारी कीजिए

.
बैठे - बैठे प्यास का मसअला होगा…
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Added by Ravindra Prabhat on April 3, 2012 at 7:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल

सदा आती है ये अक्सर तड़प के मेरे सीने से 

तेरे क़दमों में दे दूं जां जुदा रहकर के जीने से
                        मोहब्बत के मुसाफिर को कभी मंजिल नहीं मिलती
                        जिसे  साहिल  की हसरत  है  उतर जाए  सफीने  से    
मोहब्बत जो भी करते हैं बड़ी तकदीर वाले  हैं 
चमक जाती हैं तकदीरें  मोहब्बत के नगीने से 
                        तेरी यादों के  जुगनू  हैं…
Continue

Added by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on April 3, 2012 at 5:00pm — 4 Comments

अंधे रास्ते..

अंधे रास्ते

 


ये वो रास्ते है

जो अंधे हैं

ये कर देते हैं

मजबूर पथिक को

रुकने को कभी

तो कभी लौटने को.

करते हैं जो हिम्मत

बढ़ने की आगे,

लडखड़ा जाते हैं वो भी

कुछ कदम पर ही .

आखिर क्यों ?

चांदनी सा बदन

दिलों का मिलन 

कसमें वादे  

मज़बूत इरादे 

दुनिया से बगावत

डेटिंग व दावत

माँ -बाप, मित्र अपने

मखमली -रुपहले सपने 

हो जाते हैं धूमिल 

इन अंधे रास्तों में  ..

मेरे महबूब  

नहीं…

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Added by Dr Ajay Kumar Sharma on April 3, 2012 at 4:10pm — 4 Comments

स्वप्न सुधा

       (चतुष्क-अष्टक पर आघृत)

पदपदांकुलक छंद (१६ मात्रा अंत में गुरू)

***********************************************************************************************************

सपनों पर जीत उसी की है,

जिसके मन में अभिलाषा है.

वह क्या जीतेंगे समर कभी,

जिनके मन घोर निराशा है ..

 

चींटी का सहज कर्म देखो,

चढ़ती है फिर गिर जाती है.

अपनें प्रयास के बल पर ही,

मंजिल वह अपनी पाती है..

 

 स्वप्न की उन्नत…

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 3, 2012 at 3:00pm — 24 Comments

नई शुरुआत

उसमे थी उच्छृंखलता,तुम शांति के करीब हो

वो थी सिर्फ एक घटना, शायद तुम मेरा नसीब हो

उसमे थी, पाने की चाहत तुम त्याग को प्यार कहते हो

उसकी बातें थी अविश्वसनीय,तुम विश्वास को आधार कहते हो

उसकी बातें हंसते हुए थी रुलाती,भरती थी मन में निराशा

तुम भी आशावादी,आस दिलाती तुम्हारे प्यार की भाषा

वो थी मेरी सबसे बङी भूल ,तुम सुधार बनके आऐ हो

वो था एक आकर्षण,तुम जिंदगी में प्यार बनके आऐ हो

जितना आसां है उसे भूल के जीना,उतना ही मुश्किल…

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Added by minu jha on April 3, 2012 at 11:36am — 8 Comments

गज़ल - जिन्हें डर है खुदा का

उन्हें हक है कि मुझको आजमाएं

मगर  पहले  मुझे अपना बनाएं

 

खुदा  पर है यकीं तनकर चलूँगा

जिन्हें डर है खुदा का सर झुकाएं

 

जुदा होना है कल तो मुस्कुराकर

चलो   बैठे   कहीं  आँसू   बहाएं

 

तुम्हारे  आफताबों  की वज़ह से

अभी  कुछ  सर्द  है  बाहर हवाएं

 

तिरा  दरबार  है मुंसिफ भी  तेरे

कहूँ  किससे  यहाँ  तेरी  खताएं

 

खता उल्फत की करने जा रहा हूँ

कहो  अय्याम  से  पत्थर…

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Added by Arun Sri on April 3, 2012 at 11:00am — 20 Comments

कुछ दोहे.

कुछ दोहे.
१- संस्कारित माँ-बाप की,मिलती जिनको सीख.
   नहीं  मांगते  चंदा  वो,  नहीं   मांगते   भीख.
**
२- बांध सकी ना डोर से,कभी न कोई प्रीत.
    आया है तो जायेगा,जीवन की ये रीत.
**
३- लय  से ही संसार है, लय का  नाम  ह्रदय.
    लय का छूटा साथ जो, लय के बिना प्रलय.
**
अविनाश बागडे...नागपुर.

Added by AVINASH S BAGDE on April 3, 2012 at 9:59am — 10 Comments

दास्तान शर्मा परिवार की!

शर्मा जी, आजकल बड़े उद्विग्न से दिखने लगे हैं! ....वैसे वे हमेशा शांतचित्त रहते, किसी से भी मुस्कुराकर मिलते और जो भी उनके पास आता, उनसे जो मदद हो सकता था, अवश्य करते.

पर, आज कल दफ्तर में काम का अत्यधिक बोझ, बॉस का दबाव और बीच बीच में झिड़की, सहकर्मी की ब्यंग्यबान, बाजार की महंगाई, सीमित वेतन में बच्चों की पढ़ाई लिखाई, उनकी आकाँक्षाओं की पूर्ति, पत्नी के अरमान.... सबकुछ सीमित वेतन में कैसे पूरा करें....... वेतन समझौता भी एक साल से बकाया है. अभी तक कोई सुगबुगाहट नहीं सुनाई पड़ रही है. हर…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on April 3, 2012 at 7:34am — 13 Comments

बंजारा

बंजारा लोगो की कैसी भी हो किस्मत 

 देखी  है उनमे, गजब की हिम्मत  |
बेदखल महाराणा के काल से बनजारा 
घूमता ही  रहा है शहर शहर बेसहारा |
देख  सपरिवार बेसहारा - 
भरी सर्दी में भी, 
बच्चे रहते  नंगे…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 2, 2012 at 10:30pm — 4 Comments

दीनो धरम

दीनो धरम,ईमान के हाइल हैं यहाँ पर|

मैं इल्म किसे दूँ,सभी जाहिल हैं यहाँ पर|

.

नादान बशर रो रहा जिस शख्स के आगे,

वह शख्स कहीं और है,गाफिल है यहाँ…

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Added by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on April 2, 2012 at 10:30pm — 14 Comments

मेरा देश ( चोका )

देश मेरे में

अजूबे ही अजूबे

करें नमन

लोग पैर छूकर ।

           …

Continue

Added by dilbag virk on April 2, 2012 at 9:00pm — 5 Comments

सीधा लड़का

मेरे बचपन के एक मित्र के बड़े भैया पढ़ने में बड़े तेज़ थे, और पूरे मोहल्ले में अपनी आज्ञाकारिता और गंभीरता के लिए प्रसिद्ध थे. भैया हम लोगो से करीब 5 साल बड़े थे तो हमारे लिए उनका व्यक्तित्व एक मिसाल था, और जब भी हमारी बदमाशियो के कारण खिचाई होती थी तो उनका उदहारण सामने जरूर लाया जाता था.  सभी माएं अपने बच्चो से कहती थी की कितना 'सीधा लड़का' है. माँ बाप की हर बात मानता है. कभी उसे भी पिक्चर जाते हुए देखा है?

मेधावी तो थे ही, एक बार में ही रूरकी विश्वविद्यालय में इन्जिनेअरिंग में…

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Added by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on April 2, 2012 at 12:30pm — 18 Comments

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