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ग़ज़ल - कुछ तेरे होने तलक थी, कुछ तुम्हारे बाद है

कुछ मुझी में प्यार मेरा, इस कदर आबाद है,

कैद में दुनिया है मेरी, दिल मेरा आज़ाद है।



पाँव थमते ही नहीं, अब मंजिलों पर भी मेरे,

ये मेरी आवारगी, शायद मेरी हमजाद है।



कुछ दिनों से चाय की प्याली नहीं खनकी यहाँ,

बिन तेरे बिखरी रसोई, क्या कहाँ, कब याद है।



है जवानी भूलती इस बात को ना जाने क्यूँ,

इक बुढ़ापे ने ही इस घर की रखी बुनियाद है।



दिल को मेरे है शिकायत जाने…
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Added by Arvind Kumar on November 8, 2012 at 8:39pm — 7 Comments

पिए रविकर विष खारा-

सकारात्मक पक्ष से, कभी नहीं हो पीर |
नकारात्मक छोड़िये, रखिये मन में धीर |

रखिये मन में धीर, जलधि-मन मंथन करके |
देह नहीं जल जाय, मिले घट अमृत भरके |

करलो प्यारे पान, पिए रविकर विष खारा |
हो जग का कल्याण, सही सिद्धांत सकारा ||

Added by रविकर on November 8, 2012 at 6:35pm — 7 Comments

मेरा बेटा (2)

मेरा बेटा

अभी बच्चा है

अक़्ल से कच्चा है

चीज़ों का महत्व

नहीं जानता

और न ही

बड़ी बातें करना जानता है

उसकी खुशियाँ भी

छोटी-छोटी हैं

चॉकलेट, खिलौनों से ख़ुश

पेट भर जाए तो ख़ुश

पर लालची नहीं है वो

उतना ही खाएगा

जितनी भूख़ है

कल के लिए नहीं सोचता

आज की फिक्र करता है

चीज़ें ज़्यादा हो जायें

दोस्तों में बाँट देगा

छोटा है न

कुछ समझता नहीं

लोग समझाते हैं

बाद के लिए रख लो

पर नहीं समझता…

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Added by नादिर ख़ान on November 8, 2012 at 6:00pm — 4 Comments

मँझा माफिया रोज, भूमि का करे कलेवा-

 

अय्यासी में हैं रमे, रोम रोम में काम ।
बनी सियासी सोच अब, बने बिगड़ते नाम ।

बने बिगड़ते नाम, मातृ-भू देती मेवा ।
मँझा माफिया रोज, भूमि का करे कलेवा ।

बेंच कोयला खनिक, बनिक बालू की राशी ।
काशी में क्यूँ मरे, स्वार्गिक जब अय्यासी ।।

Added by रविकर on November 8, 2012 at 12:30pm — 8 Comments

दुर्मिल सवैया छंद

अधरों बिच बात छुपाय रही इनसे न कही उनसे न कही
पिय प्यार दुलार निहार सखी नयनो बिच धार हमार बही
सब राज कहें नयना पिय से अधरों बिच बात छुपी न रही
यह प्रीतहि रीत अनूठि सखी सब हारहि जीतहि एक सही

चिदानन्द शुक्ल "संदोह "

Added by Chidanand Shukla on November 8, 2012 at 11:30am — 2 Comments

जीवन की शुरुआत

नये जीवन की शुरुआत करें हम

मृत्यु से ना कभी डरे हम

कर्मभूमि बना धरा को              

स्थापित प्रमाण अपने करें हम

गीता उपदेश को ध्यान रख

समाहित धर्म कर्म को कर

ज्ञान बीज की उपज करें हम

कर्म को पूजा मान के अपनी

चेतना वृक्ष तैयार करें हम

आओ नए जीवन की शुरुआत करें हम

 

आसक्त ना हो भौतिक जगत से

अपने अंतर्मन से ध्यान धरे हम

कौन हूँ मैं, कहा से आया

किस मनसा से जग में आया  

क्या खोया, और…

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Added by PHOOL SINGH on November 8, 2012 at 10:37am — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ह्रदय से काला नेता (कुंडलिया )

नेता खुद करते फिरें, इधर उधर की ऐश

दीवाली पर ना मिले, तेल, कोयला,  गैस

तेल, कोयला,  गैस, चूल्हा जलेगा कैसे 

रंक भाड़ में जाय, भरलो  बैंक में पैसे 

वोट दियो पछताय, मनुज अब जाकर चेता 

उजले हैं परिधान, ह्रदय से काले नेता

*********************************

Added by rajesh kumari on November 7, 2012 at 8:30pm — 11 Comments

आग का दरिया

आग का दरिया नंगो पैरों करना पार कहाँ  तक अच्छा 

तन्हाई में सिसकी भरकर रोना यार कहाँ तक अच्छा 
 
माना पुराने पन्नों पर ख्वाहिश ने नयी तारीखें लिख दी 
लेकिन पढना फिर फिर बासी वो अखबार कहाँ तक अच्छा 
 
कच्चे रंगों से मिटटी के घर आँगन रंग कर सोच रहा 
बरसाती मौसम में जिद का ये…
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Added by ajay sharma on November 7, 2012 at 7:00pm — 1 Comment

'' हुज़ूर इस नाचीज़ की गुस्ताखी माफ़ हो ''

हुज़ूर इस नाचीज़ की गुस्ताखी माफ़ हो ,

आज मुंह खोलूँगी हर गुस्ताखी माफ़ हो !



दूँगी सबूत आपको पाकीज़गी का मैं ,

पर पहले करें साबित आप पाक़-साफ़ हो !



मुझ पर लगायें बंदिशें जितनी भी आप चाहें ,

खुद पर लगाये जाने के भी ना खिलाफ हो !



मुझको सिखाना इल्म लियाकत का शबोरोज़ ,

पर पहले याद इसका खुद अलिफ़-काफ़ हो !



खुद को खुदा बनना 'नूतन' का छोड़ दो ,

जल्द दूर आपकी जाबिर ये जाफ़ हो !

            …

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Added by shikha kaushik on November 7, 2012 at 1:00pm — 5 Comments

तय करना है

चाँद-सितारे ,बादल ,सूरज

आँख मिचौली खेल रहें हैं ।

धरती खुश है ,

झूम रही है ।

झूम रहा है प्रहरी कवि-मन ।

समय आ गया नए सृजन का ।

 

खून सनी सड़कों पर-

काँटे उग आएं हैं ।

जीवन भाग रहा है नंगेपांव –

मगर बचना मुश्किल है ।

सन्नाटों का गठबंधन-

अब चीखों से है ।

 

हृदयों के श्रृंगारिक पल में

छत पर चाँद उतर आता है ।

कवि के कन्धे पर सर रखकर

मुस्काता है ।

नीम द्वार का गा उठता…

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Added by Arun Sri on November 7, 2012 at 11:24am — 16 Comments

इश्क का ज्वार

खींचा-खींची कर रहे, इक दूजे की चीज ।

सोम सँभाले स्वयं सब, भूमि रही है खीज ।

भूमि रही है खीज, सभी को रखे पकड़ के ।

पर वारिधि सुत वारि, लफंगा बढ़ा अकड़ के ।

चाह चाँदनी चूम, हरकतें बेहद नीची ।

रत्नाकर आवेश, रोज हो खींचा खींची ।।

Added by रविकर on November 7, 2012 at 9:14am — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
कुछ कह मुकरियाँ

जब वो आते धूम मचाते

मन अंतर पर वो छा जाते

खुशियों के लाते उपहार,

क्या सखी साजन? नहीं त्यौहार.

 

 

रंग गेहुआ कड़कदार वो

बच्चों बूढों सबका यार वो

भटके, फिर भी वो गली गली

क्या सखी साजन? नहीं मूंगफली.

 

 

घुले हवा जब उसकी खुशबू

रहे नहीं तब मन पर काबू

दिल पर छाए उसका जलवा

क्या सखी साजन? नहीं सखी हलवा.

Added by Dr.Prachi Singh on November 6, 2012 at 6:58pm — 22 Comments

पाजी शहजादा | मुश्किल में काजी ।।

आभार आदरणीय सौरभ जी -

2 2 2 2 2

हारे हो बाजी ।

छोड़ो लफ्फाजी ।|

होती है गायब -

वो कविताबाजी ।।

पल में मर जाती

रचनाएं ताज़ी ।।

दिल्ली से लौटे -

होते हैं हाजी ।।

पाजी शहजादा

मुश्किल में काजी ।।

रिश्वत पर आधी ।

रविकर भी राजी ।।

Added by रविकर on November 6, 2012 at 6:52pm — 1 Comment

अभी बच्चा है,देश का भविष्य है

सात साल का मेरा पोता-

 है अभी छोटा 
जिसे चाहिए खिलौना 
नित नया, 
खोलकर या तोड़कर 
देखने को, 
क्या है उसमे नया ।
कंप्यूटर पर जब मै 
थक जाता, पर 
कनेक्ट नहीं कर पाता, 
तो पोता कहता, 
कहता ही क्या- 
झट कनेक्ट कर जाता ।
उसकी टीचर से…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 6, 2012 at 6:24pm — 10 Comments

जिंदगी

जिंदगी इतनी खूबसूरत होगी,

जिंदगी में इतने रंग होंगे,

जिंदगी इतनी खुशहाल होगी,

जिंदगी में इतना प्यार होगा,

ऐसा कभी सोचा न था ।



जिंदगी निस्ठुर भी होगी,

जिंदगी थपेड़े भी मारेगी,

जिंदगी हम पर हँसेगी,

जिंदगी भँवर में फँसायेगी,

ऐसा कभी सोचा न था ।



जिंदगी कर्म का पाठ पढ़ाएगी,

जिंदगी कटु सत्य बताएगी,

जिंदगी सही रास्ता दिखायेगी,

जिंदगी विजय पथ भी बताएगी,

ऐसा कभी सोचा न था ।



जिंदगी में कोमलता होगी,

जिंदगी इतनी नाजुक…

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Added by akhilesh mishra on November 6, 2012 at 4:30pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जिंदगी ने उसे छ्ला होगा

गैस होगी न कोयला होगा

चूल्हा ग़मजदा मिला होगा



पेट रोटी टटोलता हो जब

थाल में अश्रु झिलमिला होगा



भूख की कैंचियों से कटने पर

सिसकियों से उदर सिला होगा



चाँद होगा न चांदनी होगी

ख़्वाब में भी तिमिर मिला होगा



भोर होगी न रौशनी होगी

जिंदगी से बड़ा गिला होगा



लग रहा क्यूँ हुजूम अब सोचूँ

मौत का कोई काफिला होगा



बेबसी की बनी किसी कब्र पर

नफरतों का पुहुप खिला होगा



अब बता "राज"दोष है किस…

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Added by rajesh kumari on November 6, 2012 at 2:00pm — 20 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
जो कर सके तो कर अभी.. . // -- सौरभ

शिथिल मनस पे वार कर, जो कर सके तो कर अभी..

प्रहार बार-बार कर, जो कर सके तो कर अभी.. !



अजस्र श्रोत-विन्दु था मनस कभी बहार का

यही हृदय उदाहरण व पुंज था दुलार का

प्रवाह किंतु रुद्ध अब, विदीर्ण-त्रस्त स्वर…

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Added by Saurabh Pandey on November 6, 2012 at 1:24pm — 25 Comments

ईश्वरल्लाह...

अजब सा शोर है…

मंदिर की घंटियों में भी

मस्ज़िद की अजानों में

मुझको रब नहीं दीखता

धर्म के इन दुकानों में



दिल में बचैनीं हैं...

क्या ख़ाक मिले सुकूं

गीता में कुरानों में

आब हूँ हवा में मिल जाऊँगा

मुझे ना दफनाना तुम

ना जलाना शमशानों में



नहीं जाता किसी दर पर...

खुदा जो है तो मुझसे मिले

कभी मेरे मकानों में

मैं मंदिर में बैठ के पियूँगा

वो तो हर जगह है

पैमानों में मयखानों में



उसे क्या ढूंढते हो तुम…

ज़िन्दगी…

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Added by Ranveer Pratap Singh on November 5, 2012 at 11:30pm — 8 Comments

मेरा बेटा

मेरा बेटा

छोटा है

महज़ छ: साल का

मगर

खिलौने इकट्ठे करने में

माहिर है

और खिलौने भी क्या ?

दिवाली के बुझे हुये दिये

अलग-अलग किस्म की

पिचकारियाँ

हाँ कई रंग भी है

उसके मैंजिक बॉक्स में

लाल, हरे, पीले

मगर रंगों मे फर्क

नहीं जानता

बच्चा है न

नासमझ है

होली में

पूछेगा नहीं

आपको कौन सा रंग पसंद है

बस लगा देगा

बच्चा है न

नासमझ है

हरे और पीले का फर्क

अभी नहीं जानता

उसे तो ये भी नहीं पता

होली का…

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Added by नादिर ख़ान on November 5, 2012 at 3:30pm — 7 Comments

जिन्दगी का सच-विरह

विरह की बेला चुप सी आती

कर्मभूमि और गृहस्ती में

होले होले कदम बढाती

सुख समृधि को, मिटा

अंतर्मन में भेद करा

मन की शांति, भंग कर जाती

काल चक्र सा एक रचा

रह रह कर

भ्रम जाल में हमें फंसाती

ढंग बेढंग के करतब करा

इन्सान से हमको,

पशु बनाती

वक़्त की नजाकत को समझ

नट बना, इंसान नचाती

ऐसा अपना रंग दिखाती

जब तक समझ में

आता कुछ भी

तब तक सब कुछ

धुल में सब कुछ ये मिलाती

पल भर में ये नेत्र भिगो

हमारे अस्तिव का बोध कराती

लहर…

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Added by PHOOL SINGH on November 5, 2012 at 2:30pm — 1 Comment

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