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All Blog Posts

मन...

मन ही सवालों से उलझता है !
मन ही सवालों से कतराता है !
मन ही दर-बदर भटकता है!
मन ही भूलने की बात करता है !
झगड़ता है, चिल्लाता है , कोसता है!
यह मन ही तो है जो रोता है !
अनुभव है ,सच नहीं है,
जाने भी दो, जिंदगी है ,
समझकर सबकुछ खुद को ,
समझाने की कोशिश करता है !
कुछ पल तो शांत बैठता है
और फिर अचानक -
मन ही मन कह उठता है
आह! खट्टे अंगूर !

अन्वेषा

Added by Anwesha Anjushree on December 14, 2012 at 3:30pm — 9 Comments

तुम्हें चुप रहना है

तुम्हें चुप रहना है

सीं के रखने हैं होंठ अपने

तालू से चिपकाए रखना है जीभ

लहराना नहीं है उसे

और तलवे बनाए रखना है मखमल के

इन तलवों के नीचे नहीं पहननी कोई पनहियाँ

और न चप्पल

ना ही जीभ के सिरे तक पहुँचने देनी है सूरज की रौशनी

सुन लो ओ हरिया! ओ होरी! ओ हल्कू!

या कलुआ, मुलुआ, लल्लू जो भी हो!

चुप रहना है तुम्हें

जब तक नहीं जान जाते तुम

कि इस गोल दुनिया के कई दूसरे कोनों में

नहीं है ज्यादा फर्क कलम-मगज़ और तन घिसने वालों को…

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Added by Dipak Mashal on December 14, 2012 at 3:03pm — 13 Comments

आग

आग 
------

आरक्षण की नेता तुमने

ये कैसी आग लगाई 
मिल जुल संग जो  साथ रहे
दुश्मन हो गए भाई 
प्यारा कितना  देश था भारत 
सारा  जग करता था आरत 
सत्ता की खातिर  देश को बांटा 
जो मिला उसे एक दूजे ने काटा 
भाइयों में खूब जंग करायी 
आरक्षण की नेता तुमने 
ये कैसी आग…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 14, 2012 at 2:39pm — 8 Comments

वर्ना फिर पछताय

अंधी जीवन दौड़ में, व्यथा करो न होड़        
ज्यादा धन की दौड़ में,है तनाव का मौड़ ।
 
लूट लूट कर घर भरा, जोड़े लाख करोड़,
साथ न वह ले जा सका,गया यही पर छोड़
  

घातक तनाव जो करे,…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 14, 2012 at 12:30pm — 4 Comments

एक्सचेंज मेला

एक्सचेंज मेला

                                                          दीपावली में खरीददारी की मची हुई थी जंग

खरीददारी करने गए हम बीबी के संग

बदला पुराना टीबी नया टीबी ले आये

दिल में कई बिचार आये

काश बीबी एक्सचेंज का कोई ऑफर पायें

नई नबेली…

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Added by Dr.Ajay Khare on December 14, 2012 at 12:00pm — 10 Comments

बूढ़े बाबा की दीवानी

मोटी - मोटी चादर तानी,

फिर भी भीतर घुसकर मानी,

जाड़े की जारी मनमानी,

बूढ़े बाबा की दीवानी,

दादा - दादी,…

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Added by अरुन 'अनन्त' on December 14, 2012 at 11:24am — 16 Comments

आओ वालमार्ट

आओ वालमार्ट 

स्वागत है आपका

अपनी कमज़ोर हो रही 

अर्थव्यवस्था को

मज़बूत करने

आओ

हमारी मज़बूत होती

अर्थव्यवस्था को

कमज़ोर करने

आओ

 

हमने आपके हथियार नहीं लिए

इस नुक्सान की भरपायी के लिए

नयी संभावनाओं को तलाशने

आओ

किसानों के पसीने निचोड़ने

गरीब जनता का ख़ून चूसने

आओ वालमार्ट

 

यूनियन कार्बाइड की याद

धुंधली पड़ चुकी है

तुम नयी यादें देने…

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Added by नादिर ख़ान on December 14, 2012 at 11:00am — 3 Comments

हैं मोड़ बहुत सारे यूँ तो ...

हैं मोड़ बहुत सारे यूँ तो

पर दिशा मुझे तय करनी है,

पर मैं ही अकेला पथिक नहीं

आशा सच हो ये परखनी है

सुनता ही नहीं कोई मन की

अब खुद से खुद को सुनना है

संयम गर अपना साथी हो

फिर मंजिल पे ही मिलना है

कुछ ख्वाब नहीं सोने देते

हर पल बस करते हैं बातें

शुरुआत लक्छ्य की आज अभी

सूरज की बात ना तकनी है,

वो आता है हर सुबह…

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Added by SUMAN MISHRA on December 14, 2012 at 1:30am — 9 Comments

लघु कथा : परिवर्तन

ये लो महारानी जी आज नदारद हो गयीं , इन लोगों के मिजाज का कोई ठिकाना ही नहीं है..सुबह सुबह "गौरम्मा" के ना आने से मन खिन्न हो गया , गौरम्मा हमारी काम वाली 

हमेशा तो कह कर जाती थी , माँ ( दछिन भारत में येही संबोधन आदर में देते हैं ) हम कल नहीं आ पायेगा , मगर आज सुबह के ११ बज रहे हैं कोई खबर ही नहीं . दो तीन दिन से मैं उसे कुछ बुझी बुझी देख रही थी , मगर मेहमानों की…

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Added by SUMAN MISHRA on December 14, 2012 at 1:00am — 15 Comments

दूरियों की दूरी

मंज़िल की ओर बढ़ने से सदैव

दूरियों की दूरी ...

कम नहीं होती।

 

बात जब कमज़ोर कुम्हलाय रिश्तों की हो तो

किसी "एक" के पास आने से,

नम्रता से, मित्रता का हाथ बढ़ाने से,

या फिर भीतर ही भीतर चुप-चाप…

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Added by vijay nikore on December 14, 2012 at 12:00am — 4 Comments

आज मसले खत्म सारे हो गए

आज मसले खत्म सारे हो गए 
हम तुम्हारे तुम हमारे हो गए (1)
दोस्ती पे नाज़ था जिनकी हमें 
लो वही दुश्मन हमारे हो गए (2)
 
मुझको तनहा छोड़कर मझधार में 
धीरे धीरे सब किनारे हो गए  (3)
 
ले लिया जबसे  सहारा आपने मुझसे मेरा  
लग रहा हम बे-सहारे हो गए  (4)  
था यकीं इतना उन्हें मेरी वफ़ा…
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Added by ajay sharma on December 13, 2012 at 10:30pm — 5 Comments

उन्मुक्त

हसरते, अरमान

तिरस्कार, अपमान

इन्हें लक्ष्मण रेखा को न पार करने दो

या फिर इन्हें कैद करो ऐसे

यह सांस भी न ले पाए जैसे

और चाबी ऐसे दफनाओ

के खुद भी न ढुंढ पाओ

फिर उड़ो ,पंख फैलाओ…

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Added by Anwesha Anjushree on December 13, 2012 at 10:00pm — 6 Comments

ऐतबार नहीं है

दुश्मन न सही काबिल-ए -ऐतबार नहीं है 
कोई भी हो वतन से जिसे प्यार नहीं है 
-------------------------------------------
गैरों से भी अपनों से भी खाता है ठोकरें 
वो शख्स जिसे खुद पे अख्तियार नहीं है 
--------------------------------------------
ज़ालिम वही गुनाह जो करता नहीं कुबूल 
पाता सजा वही जो गुनाहगार…
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Added by ajay sharma on December 13, 2012 at 10:00pm — 3 Comments

या फिर सागर मंथन होगा ???

या फिर सागर मंथन होगा ???

बात सत्य लगती खारी जब 
गरल उगलते नर नारी तब 
छुप कर बैठे विष धारी सब 

इस पर शिव से चिंतन होगा
या फिर सागर मंथन होगा ???

कितना किसको तुमने बांटा
सुख की माला दुःख का काँटा
नमक दाल और चावल आटा

पास किसी के अंकन होगा
या फिर सागर मंथन होगा ???..................

संदीप पटेल "दीप"

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 13, 2012 at 6:02pm — 4 Comments

शब्द दर शब्द बोलती हैं कुछ खामोश चीखें

शब्द दर शब्द बोलती हैं कुछ खामोश चीखें  



मैंने माना कोई नहीं अपना 

तोड़ डाला है आज हर सपना

रखे गैरत मिला है क्या मुझको

सोच में इसकी भला क्यूँ खपना 



सुन लूँ बिसरी हुई सी ऊँघती बेहोश चीखें

शब्द दर शब्द बोलती हैं कुछ खामोश…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 13, 2012 at 3:45pm — 4 Comments

खुदगर्जी

खुदगर्जी



मेरा जन्म, हर्सौल्लास, जलसा

मां बाबू जी मुराद पूरी, खुशियाँ, चर्मोत्कर्ष

लालन पालन, उत्कर्ष

हर ख़ुशी, मुहैया

हट पूरी ,हर हाल में

मां कई रातें जागी, में सोया

मां सोते से जागी, में रोया

बाबू जी नई स्फूर्ति, उत्साह से ओतप्रोत

में प्रेरणास्रोत

सने सने मेरी बढती काया, बुद्धि,सोच…

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Added by Dr.Ajay Khare on December 13, 2012 at 1:00pm — No Comments

लघुकथा : राष्ट्रीय वन निगम

(पूर्णतया काल्पनिक, वास्तविकता से समानता केवल संयोग)

बहुत समय पहले की बात है। जंगल में शेर, लोमड़ी, गधे और कुत्ते ने मिलकर एक कंपनी खोली, जिसका नाम सर्वसम्मति से ‘राष्ट्रीय वन निगम’ रखा गया । गधा दिन भर बोझ ढोता। शाम को अपनी गलतियों के लिए शेर की डाँट और सूखी घास खाकर जमीन पर सो जाता।  कुत्ता दरवाजे के बाहर दिन भर भौंक भौंक कर कंपनी की रखवाली करता और शाम को बाहर फेंकी हड्डियाँ खाकर कागजों के ढेर पर सो जाता। लोमड़ी दिन भर हिसाब किताब देखती। हिसाब में थोड़ा बहुत इधर उधर करके…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 13, 2012 at 12:13pm — 16 Comments

लघुकथा : संवेदनहीन

सड़क पर पड़े, उस दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति को अपनी गाड़ी में लेकर रमेश अभी-अभी अस्पताल पहुंचा था ! उससे नहीं देखा गया कि हजारों की भीड़ में से एक आदमी भी उस तड़पते व्यक्ति के लिए आगे नही आ रहा है ! वो समझ नही पा रहा था कि लोग इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं ? और बस इसीलिए वो उस व्यक्ति को अपनी कार में डालकर अस्पताल ले आया था ! अभी उस व्यक्ति का ऑपरेशन चल रहा था ! कुछ देर बाद....! ओटी के बाहर जलता बल्ब बंद हुवा और डॉक्टर बाहर निकले !

“क्या हुवा डॉक्टर? सब ठीक तो है न ?” रमेश ने पूछा…

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Added by पीयूष द्विवेदी भारत on December 13, 2012 at 8:30am — 18 Comments

अब हाथ उनका थाम लें

बचपन की देहरी लांघ कर

सच्चे हुए जज्बात जब

रस्ते जो थे अनजान तब

अब मंजिलों का नाम दें

अब हाथ उनका थाम लें .

जिनकी वजह जीवन मिला

इश्वर तुम्हारा शुक्रिया

अब कर्म की दुनिया में हम

अपना भी योगदान दें

अब हाथ उनका थाम लें

थोड़ी हंसी मासूम सी

मेरी वजह रंगीन सी

माँ से थी जिद्द थोड़ी सुलह

जीवन के मसले हल करें

अब हाथ…

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Added by SUMAN MISHRA on December 13, 2012 at 1:30am — 9 Comments

लघु कथा : "घमंडी"

शानू उठो, देखो पापा शहर से आ गए हैं,,मगर नीद थी की उसे उठने ही नहीं दे रही थी , आज उसे गाँव आये हुए १५ दिन हो गए थे, नंगे पाँव बागों में फिरना कच्चे, अधपके आमों की लालच में , धुल मिटटी से गंदी हुयी फ्रॉक की कोई परवाह नहीं , पूरी आजादी, और फ़िक्र हो भी क्यों उसने अपना इम्तिहान बहुत मन लगाकर दिया था, प्रथम आयी तो ठीक मगर उस सुरेश को नहीं आने देना है , येही मलाल लिए गर्मी की…

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Added by SUMAN MISHRA on December 12, 2012 at 7:00pm — 13 Comments

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