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ऐतराज (लघुकथा)

“माँ! तुम कह रही थी न,  शादी कर ले ! सोचता हूँ, कर ही लूँ।“

“कोई पसंद है क्या ? बता दे ?”

“हाँ पसंद तो है । मेरे साथ काम करती है। तुम्हें और पिता जी को ऐतराज तो नहीं होगा ?“

“हमें क्यों ऐतराज होगा भला ! तेरी खुशी में ही हमारी खुशी है। पर हाँ! लड़की मांगलिक नही होनी चाहिए!, अपने से छोटी जाति की भी नहीं , और स्वागत में कोई कमी भी न हो !“

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by MAHIMA SHREE on April 29, 2015 at 6:30pm — 20 Comments

माँ का टोटका

बचपन में
हजार बुरी बलाओं पर 
पर भारी था
मेरी माँ का टोटका
माँ के हाथों से
माथे पर छोटा सा
काला टीका लगते ही
भयमुक्त हो जाता था 
एक असीम ताकत 
दे जाता था मन को
वो ममता में लिपटा 
माँ का टोटका
अब तो मैंने कैसे कैसे 
कृत्यों से कर लिया है
पूरा मुँह काला
मगर फिर भी 
भय से व्याप्त मन 
हमेशा व्याकुल रहता है

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा



Added by umesh katara on April 29, 2015 at 6:28pm — 16 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
रे पथिक, रुक जा! ठहर जा!....................एक गीत (डॉ० प्राची)

रे पथिक, रुक जा! ठहर जा! आज कर कुछ आकलन

बाँच गठरी कर्म की औ’ झाँक अपना संचयन

 

हैं यहाँ साथी बहुत जो संग में तेरे चले

स्वप्न बन सुन्दर सलोने कोर में दृग की पले,

प्रीतिमय उल्लास ले सम्बन्ध संजोता रहा  

या कपट,छल,तंज से निर्मल हृदय तूने छले ?

 

ऊर्ध्वरेता बन चला क्या मुस्कुराहट बाँटता ?

छोड़ आया ग्रंथियों में या सिसकता सा रुदन ?.......रे पथिक..

 

कर्मपथ होता कठिन, तप साधता क्या तू रहा ?

या नियतिवश संग…

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Added by Dr.Prachi Singh on April 29, 2015 at 5:00pm — 22 Comments

कुछ चाँद मेरे

उसकी सासें गातीं हैं सरगम

अौर रात रक़्स करती है/

मैं चाँद की डफली बजाता हूँ,

मगर ये गीत जाने कौन गाता है!



हमने चाँद को चिकुटी काटी /

शरारत सूझी/

उसे प्यार आया, फिर सहलाया /

और,

दे गया चाँदनी रात भर के लिये.



उसे चाँद दे दिया

और ख़ुद चाँदनी ले ली.

ठग लिया यूँ आसमाँ को आज हमने.

सुना है,

आसमां सितारों से शिकायत करता है.



रात की मिट्टी में,

तेरी यादों की एक डाली रोपी

जज्बात से सींचा उसे,

फिर,…

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Added by shree suneel on April 29, 2015 at 4:00pm — 16 Comments

इस जिंदगी का क्या भरोसा ये मुद्दा है गौर का |

२२१२ २२१२ २२१२ २२१२ - रजज मुसम्मन सालिम
कोई दबा घर में कहीं      आशा लगाये और का |
इस  जिंदगी का क्या भरोसा ये मुद्दा है गौर का |
बारिश कहीं आँधी कहीं आकर गिराये घर नगर …
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Added by Shyam Narain Verma on April 29, 2015 at 3:01pm — 11 Comments

पापा तुम बहुत याद आते हो ...

पापा तुम बहुत याद आते हो ..

समय की बेलगाम रफ़्तार ने 

पापा आपकी छत्रछाया से 

साँसों के प्रवाह से 

आपको मुक्त कर दिया 

दुनिया कहती हैं कि ईश्वर है कहाँ ?

शायद दुनिया पागल हैं 

पर पापा आप ही तो ईश्वर का रूप हो 

मुझसे पूछे ये दुनिया, जब पिता नहीं होते 

तो ईश्वर के नाम से जाने जाते है 

आपके जाने के बाद 

तमाम कोशिशों के बावजूद 

सामने की दीवार पे 

आपकी तस्वीर नहीं लगा…

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Added by sunita dohare on April 29, 2015 at 1:30pm — 14 Comments

"संस्कार" एक लघुकथा

में अपने छोटे बेटे के साथ शहर में रहता हुI और मेरी घरवाली गाव में बड़े बेटे के साथ रहती हैI समय के अनुसार जायदाद के साथ साथ हमारा भी बंटवारा हो गयाI आज उसकी बहुत याद आ रही थीI फ़ोन में रिचार्ज खत्म होने की वजह से कई दिनों से उस से बात नहीं हो पाईI पिछले तीन दिनों से बेटे को बोल रहा थाI पर बेटे को ऑफिस में टाइम नहीं मिलने की वजह से रिचार्ज नहीं करवा पायाI आज भी में बेटे को ऑफिस जाते समय रिचार्ज याद दिला रहा थाI तभी बहु की पीछे से आवाज आई, बावजी - आप को कितनी बार बोला…

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Added by harikishan ojha on April 29, 2015 at 12:40pm — 19 Comments

ग़ज़ल :- कहीं थे बाज़ू कहीं बदन था

बह्र :- फ़ऊल फ़ैलुन फ़ऊल फ़ैलुन



कहीं थे बाज़ू कहीं बदन था

हिजाब आलूद पैरहन था



निगाह ख़ंजर बनी हुई थी

नज़र हटाई तो गुलबदन था



कहाँ तलक उससे बच के चलते

वो डाली डाली चमन चमन था



समझ के गुलशन की बात की थी

मुराद मेरी तिरा बदन था



सालीक़ा लाओगे वो कहाँ से

सुना है फ़रहाद कोहकन था



हर एक मंज़िल पे देखा जाकर

वही सितारा वही गगन था



भला सा लगता था उन दिनों में

तिरी अदा में जो बांकपन था



अभी "समर" की… Continue

Added by Samar kabeer on April 29, 2015 at 10:43am — 29 Comments

ग़ज़ल-नूर ज़ुल्फों को जंजीर लिखेगा,

22/22/22/22 (सभी संभावित कॉम्बिनेशन्स)

ज़ुल्फों को जंजीर लिखेगा, 

तो कैसे तकदीर लिखेगा.

.

जंग पे जाता हुआ सिपाही,

हुस्न नहीं शमशीर लिखेगा.

.

राज सभा में मर्द थे कितने,  

पांचाली का चीर लिखेगा. 

.

ईमां आज बिका है उसका,

अब वो छाछ को खीर लिखेगा.

.

कोई राँझा अपनें खूँ से, 

जब भी लिखेगा, हीर लिखेगा.

.

शेर कहे हैं जिसने कुल दो,

वो भी खुद को मीर लिखेगा.

.

नहीं जलेगा वो ख़त तुझसे, 

जो आँखों का…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 29, 2015 at 9:04am — 24 Comments

नया तूफ़ान ........इंतज़ार

जिंदगी में कोई

क्यूँ नहीं मिलता

एक नया तूफ़ान

क्यूँ नहीं खिलता

मैं भी देख लूँ जी के

ऊँचे टीलों पे

क्या होते हैं एहसास

इन कबीलों के !

मैं भी उड़ लूँ

तूफ़ानी फिज़ाओं में

जानता हूँ एक दिन

तूफ़ान थम जायेंगे

फिर खुशिओं के

उत्सव ढल जायेंगे

और बेवफाईओं के

ख़ामोश पल आयेंगे !

मौत आ जाये बेधड़क

तूफ़ान के बवंडर में

न होने से तो

कुछ होना अच्छा होगा

प्यार ना मिलने से तो

मिलकर खोना अच्छा…

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Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 29, 2015 at 7:35am — 12 Comments

"प्रायश्चित" (कहानी )

      उन दिनों जमशेद पुर में फैक्ट्री में फोर्जिंग प्लांट पर मेरी ड्यूटी थी  फोर्जिंग  प्लांट अत्यंत व्यस्त हो चुके थे। मार्च के महीने में टार्गेट पूरा करने प्रेशर जोरो पर था । बिजली के हलके फुल्के फाल्ट को नजर अंदाज इसलिए कर दिया जाता था क्यों कि सिट डाउन लेने का मतलब था उत्पादन कार्य को बाधित करना जिसे बास कभी भी बर्दास्त नहीं कर सकते थे । फिर कौन जाए बिल्ली के गले में घण्टी बाँधने । जैसा चल रहा है चलने दो बाद में देखा जायेगा । सेक्शन में लाइटिंग की सप्लाई की केबल्स को बन्दरों ने उछल कूद…

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Added by Naveen Mani Tripathi on April 28, 2015 at 5:30pm — 4 Comments

छटपटाहट

हर तरफ है छटपटाहट बोलता कोई नहीं
या हमारी मुश्किलो को जानता कोई नहीं
वो बहुत मज़बूर है या देने की नियत नहीं
या हमारी ख्वाहिशो की इंतहा कोई नहीं
वो अपनी मिट्ठी ज़ुबा से फिर तसल्ली दे गया
और हमारे दर्द की यारो ज़ुबा कोई नहीं
अपने जी का दर्द हम किस्से कहे तू ये बता
अपना तो तेरे शहर में तेरे सिवा कोई नहीं
उसने एक फहरिसित् दी है अपने रिस्तेदारो की
नाम मेरा भी लिखा आगे लिखा कोई नहीं




मौलिक और अप्रकाशित

Added by मनोज अहसास on April 28, 2015 at 5:17pm — 3 Comments

माँ लोट रही-चीखें क्रंदन बस यहां वहां

एक जोर बड़ी आवाज हुयी

जैसे विमान बादल गरजा

आया चक्कर मष्तिष्क उलझन

घुमरी-चक्कर जैसे वचपन

----------------------------------

अब प्राण घिरे लगता संकट

पग भाग चले इत उत झटपट

कुछ ईंट गिरी गिरते पत्थर

कुछ भवन धूल उड़ता चंदन

-------------------------------

माटी से माटी मिलने को

आतुर सबको झकझोर दिया

कुछ गले मिले कुछ रोते जो

साँसे-दिल जैसे दफन किया

------------------------------

चीखें क्रंदन बस यहां…

Continue

Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 28, 2015 at 4:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल ;आसान राहों पे...

2212 2212 2212

आसान राहों पे ले आती है मुझे
उसकी दुआ है, लग हीं जाती है मुझे.

ये शोर दिन का चैन लूटे है मेरा
औ' रात की चुप्पी जगाती है मुझे.

किस किस को रोकूं कौन सुनता है मेरी
ये भीङ पागल जो बताती है मुझे.

कूचे में जो मज्कूर है उस्से अलग
दहलीज़ तो कुछ औ' सुनाती है मुझे.

पहलू में मेरे बैठी है मुँह मोङ कर
ये ज़िन्दगी यूँ आजमाती है मुझे.

मौलिक व अप्रकाशित

Added by shree suneel on April 28, 2015 at 3:36pm — 24 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अतुकांत - दवा स्वाद में मीठी जो है ( गिरिराज भंडारी )

अतुकांत - दवा स्वाद में मीठी जो है

********************************* 

मोमबत्तियाँ उजाला देतीं है

अगर एक साथ जलाईं जायें बहुत सी

तो , आनुपातिक ज़ियादा उजाला देतीं हैं

कभी इतना कि आपकी सूरत भी दिखाई देने लगे

दुनिया को

 

लेकिन आपको ये जानना चाहिये कि ,

इस उजाले की पहुँच बाहरी है

किसी के अन्दर फैले अन्धेरों तक पहुँच नही है इनकी

भ्रम में न रहें

 

कानून अगर सही सही पाले जायें

तो, ये व्यवस्था देते…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on April 28, 2015 at 11:30am — 27 Comments

कब सोचा था यूँ भी होगा // रवि प्रकाश

कब सोचा था यूँ भी होगा-

जिनको मैंने ये कह कर दुत्कारा था-

-"जाओ,तुम हो एक पराजित मन के हित निर्मित

केवल छलना और भुलावा,

कुछ भी तो तुम में सार नहीं है;

मेरा जीवन है अभियान सकल

दिग्विजयी स्वभाव से ही

अश्व नहीं रुकता मेरा छोटे-छोटे घाटों पर

विश्वविजय से पहले इसमें हार नहीं है..."

वही नयन दो मतवाले

मन्वंतर के बाद सही लेकिन

ले कर वही पुरानी सज-धज,ठाठ वही

दसों दिशाओं से घेरे मुझको

दर्प-गर्व और अक्खड़पन से पूछ रही हैं-

"लेकर अपने… Continue

Added by Ravi Prakash on April 28, 2015 at 11:30am — 10 Comments

और कितने नाम हैं..अतुकांत/ छन्दमुक्त रचना -नूर

कोई झील बे-चैन सी,

कोई प्यास बे-खुद सी,

कोई शोखी बे-नज़ीर सी,

तेरी आँखों के और कितने नाम है.....

 

कोई ख़्याल बे-शक्ल सा, 

कोई सितारा बे-नूर सा,

कोई बादल बे-आब सा,

मेरे अरमानों के और कितने नाम है.....

 

कोई रात बे-पर्दा सी,

कोई बिजली बे-तरतीब सी,

कोई अंगडाई बे-करार सी,

तेरी अदाओं के और कितने नाम है ....

 

कोई पत्थर बे-दाम सा,

कोई झरना बे-ताब सा,

कोई मुसाफिर बे-घर…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on April 28, 2015 at 9:08am — 27 Comments

स्वार्थ ........इंतज़ार

धरती के सीने में

अमृत छलकता है

धरती के ऊपर पानी है

अन्दर भी पानी है

ये धरती की मेहेरबानी है

कि बादल में पानी है

बादल तरसते हैं

तो धरती अपना पानी

नभ तक पहुंचा

उनकी प्यास बुझाती है

बादल बरस कर

एहसान नहीं करते

सिर्फ़ बिन सूद

कर्ज चुकाते हैं

क्यूंकि पानी तो वो

धरती से ही पाते हैं

फिर भी धरती पर गरजते हैं

बिजली गिराते हैं

जहाँ से जीवन पाते हैं

उसी को सताते हैं

जननी का हाल

कुछ ऐसा ही बताया था

परमार्थ का बीज बोया…

Continue

Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 28, 2015 at 7:59am — 14 Comments

...जागते रहो

....जागते रहो

शहर के उस कोने में बजबजाता

एक बड़ा सा बाजार

जहॉ बिखरे पड़े हैं सामान

असहजता के शोरगुल में

तोल-मोल करते लोग

कुछ सुनाई नहीं देता

बस!  दिखाई देता है,  एक गन्दा तालाब

उसमें कोई पत्थर नहीं फेंकता

उसमे तैरती हैं...मछलियां, बत्तखें और

बेखौफ पेंढुकी भी

वे जानती है, और सब समझतीं भी हैं...

इस संसार में सब कुछ बिकाऊ हैं-

कुछ पैसे लेकर और कुछ पैसे देकर

यहां शरीर से लेकर आस्था तक, .....सब!

तालाब की मिट्टी में सने ...देव…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 27, 2015 at 9:42pm — 14 Comments

"यादें"

याद आते हैं

अक्सर

पुराने जमाने ,

बैलों की गाड़ी

वो भूजे के दाने ,

दादी माँ की कहानी

उन्हीं की जुबानी,

भूले से भी न भूले  

वो पुरवट का पानी |

अक्सर ही बागों में

घंटों टहलना

पके आमों पे

मुन्नी का मचलना

गुलेलों की बाज़ी

गोलियों का वो खेला

सुबह शाम जमघट पे

लगे मानो मेला

वो मुर्गे की बांग पे

भैया का उठना

रट्टा लगाके

दो दूना पढ़ना

कपडे के झूले पे

करेजऊ का झुलना

छोटी-छोटी…

Continue

Added by Chhaya Shukla on April 27, 2015 at 9:30pm — 8 Comments

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