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हमें क्या हो गया है-- छोटी सी कहानी

उसके सब्र की इन्तेहाँ हो रही थी, लगभग दो घंटे बीत चुके थे उसे पार्क में आये हुए. घर में सुबह ही उसे पता चल गया था कि परी अपनी माँ के साथ आ रही है. छह महीने तो बीत ही चुके थे उसे परी को देखे लेकिन कोई रास्ता भी नहीं था उसके पास जिससे वह परी को एक नजर देख भी सके. पत्र लिखने की हिम्मत कहाँ से आती जबकि उसे खुद पता नहीं था कि परी उसके लिए क्या सोचती है. 

साथ पढ़ते थे दोनों और एक ही मोहल्ले में रहते थे, उस समय आने जाने के लिए बहुत हुआ तो एक साइकिल मिल जाती थी, वर्ना पैदल ही स्कूल जाना और…

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Added by विनय कुमार on February 8, 2022 at 4:42pm — 1 Comment

दोहावली.... स्वागत करो बसंत का....

स्वागत करो बसंत का, अब.. अनंग दरवेश। 

बदन..सुलगने ..हैं लगे, खिल उठा परिवेश ।।

रथ सवार सूरज हुआ,  बढ़ती ..आँगन ..धूप। 

मकरंद  बसा प्राण में,  प्रतिपल प्रिया अनूप ।।

अलसाया सी डाल पर, उतर ..पड़ी  है.. धूप। 

कलियाँ  मुस्काने लगीं, जगमग गाँव अनूप ।।

गंधायी ..अब है ..हवा,  खिलने.. लगे.. प्रसून। 

गश्त बढ़ गई भ्रमर की, कली लाल सी खून ।।

मौलिक व अप्रकाशित 

प्रोफ. चेतन प्रकाश…

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Added by Chetan Prakash on February 8, 2022 at 9:22am — No Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
बासंती दोहे // सौरभ

आहट की संभावना, करवट का आभास,
पुलक देह ने भर छुअन, लिया मुग्ध उच्छ्वास

नस-नस झंकृत राग-लय, तन-तन लहर गुँजार
बासंती मनमुग्ध को, प्यार प्यार बस प्यार !

पता नहीं किस ठौर से, आयी अल्हड़ भोर
तन मन से बेसुध मगर, मुग्ध नयन की कोर

तन्वंंगी अल्हड़ लता, बैठी उचक मुँडेर
खेल रही है धूप में, बासंती सुर टेर ।
***

सौरभ
(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Saurabh Pandey on February 5, 2022 at 12:00pm — 11 Comments

वसंत के दोहे

शुक्ल पंचमी माघ  की,  लायी  यह संदेश

सजधज साथ बसंत के, बदलेगा परिवेश।।

*

कुहरे  की  चादर  हटा, लगी  निखरने  धूप

दुल्हन जैसा खिल रहा, अब धरती का रूप।।

*

डाल नये परिधान अब, दिखे नयी हर डाल

हर्षित इस से सज  रही, भँवरों  की चौपाल।।

*

तरुण हुईं हैं डालियाँ, कोंपल हुई किशोर

उपवन में उल्लास  है, अब  तो चारो ओर।।

*

गुनगुन भँवरों  ने  कहे, स्नेह  भरे जब बोल

मार ठहाका हँस पड़ी, कलियाँ घूँघट खोल।।

*

नहीं  उदासी  से …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 5, 2022 at 9:00am — 8 Comments

ग़ज़ल......अब आदमी में जोश का ज़ज्बा नहीं रहा !

221     2121     1221     212

अब आदमी में जोश का ज़ज्बा नहीं रहा

मौसम  बहार का  वो सुहाना नहीं रहा 

हमको  तुम्हारा  तो सहारा  नहीं  रहा

वो  दर्द  ज़िन्दगी का अपना नहीं रहा

उम्मीद कब रही हमें इस ज़ीस्त से कभी

मंज़िल का जाँ कभी भी वो चहरा नहीं रहा

कोशिश बहुत की कोई हमदम कहाँ हुआ

इक दोस्त न मिला कभी साया नहीं रहा 

धोका मिला जहाँ हमें वुसअत के नाम पर 

सुन दोस्त ज़िन्दगी  का निशाना नहीं…

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Added by Chetan Prakash on February 3, 2022 at 7:00pm — 1 Comment

तेरे मेरे दोहे ..

तेरे मेरे दोहे :

दंतहीन मुख पोपला, हुए दृष्टि से सूर ।

शक्तिहीन काया हुई, चलने से मजबूर ।।

दंतहीन मुख पोपला, दृष्टि से लाचार ।

देख -देख मिष्ठान को, मुख से टपके लार ।।

लघु शंका बस में नहीं, मुख से टपके लार ।

बदला सा लगने लगा , अपनों का व्यवहार ।।

काया का सूरज ढला, ढली श्वास की शाम ।

दूर क्षितिज पर साँझ की, लाली करे प्रणाम ।।

काया साँसों से चले ,चले कर्म से नाम ।

चंचल मन के अश्व की, वश में रखो…

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Added by Sushil Sarna on February 3, 2022 at 3:00pm — 10 Comments

झूठ बोले हैं न जाने कितने.......ग़ज़ल- सालिक गणवीर

2122-1122-22/112

झूठ बोले हैं न जाने कितने

उसको आते हैं बहाने कितने (1)

मैं किसी से भी तो नाराज नहीं

आ गए लोग मनाने कितने (2)

अब भी लोगों के नई दुनिया में

हैं ख़यालात पुराने कितने (3)

एक भी लफ़्ज मुझे याद नहीं

याद आते हैं वो गाने कितने (4)

घर जला कोई बुझाने न गया

आ गए आग लगाने कितने (5)

साथ आया न निभाने कोई

रस्म आएंँगे निभाने कितने (6)

अब कहीं पर तू ठहर जा…

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Added by सालिक गणवीर on February 3, 2022 at 9:33am — 4 Comments

दोहा - छक्का

उम्र  गँवा  दी  लोमड़ी, उछल- कूद  वनवास। 

 ईश  साधना की नहीं, भजन हुआ सन्यास।।

दोहा  कवि को  साध्य है, मूर्ख सदैव असाध्य। 

लंगड़ी  जब  भी  मारता, गिरता ठोकर खाय।।

काव्य - धर्म है साधना, प्राण बसे मम आग ।

साधू - संगति  चाहिए , तुलसी सम अनुराग।।

काव्य - कर्म जागृति जगत, हास्य-व्यंग्य है राग।

कविता  -  गंगा   है    सदा, नवरस का अनुराग।।

काव्यशास्त्र  विलास  कवि, पंडित को ही साध्य। 

तप - काव्य विरल भाव…

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Added by Chetan Prakash on February 1, 2022 at 6:30pm — 5 Comments

विश्वास

आज भी भैया-भाभी उसे मनाने आ गए।

बिन्नी चार महीने पूर्व ही ब्याही गई थी। मात्र चार दिन ही साथ रह पाई कि बुलावा आ गया था। मेंहदी का रंग फीका न हुआ था, पाँवों का महावर भी टुह-टुह लाल था, उसने पति के भाल पर लाल तिलक लगा फ्रंट पर भेजा था।

उनके जाने के बाद घर उसका, वह घर की होकर रह गई थी।

फौजी की बेहद कर्मठ ब्याहता उसकी बाँसुरी को हर समय साथ रखती। बाँसुरी दोनों के बीच एक डोर की तरह थी।

"इसे कभी न छोड़ना। जहाँ भी रहूँगा, मैं तेरा रहूँगा। और तू मेरी। है न? रहेगी न?"

"चल…

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Added by Anita Rashmi on January 31, 2022 at 7:00pm — No Comments

ग़ज़ल - वज़्न -2122"2122"22/112

वज़्न -2122"2122"22/112



हर सहारा बे-सहारा निकला

जो मिला हमको बिचारा निकला (१)



हमसफर मेरा ख़ुदारा निकला

कौन कहता है नकारा निकला (२)



अब किसे अपना ख़ुदा समझें हम

ये ख़ुदा भी तो तुम्हारा निकला (३)



सज गयी है मौत की ये महफ़िल

दम जो निकला तो हमारा निकला (४)



कब हुई है इख़्तियारी जाँ पर

ज़ीस्त का हर पल मदारा निकला (५)



अश्क़ आँखों से बहाते हो क्यों

जाने वाला तो हमारा निकला (६)



हैं सितारे आसमाँ में… Continue

Added by Hiren Arvind Joshi on January 31, 2022 at 8:29am — No Comments

कविता ...अतुकांत

हार का हाहाकार .....

ऐसा क्यों हो कि मेरी हार हो

लाख सच की मनुहार  हो

आँखें बंद  कर लूँ  न  ?

कह दूँ  यह बहार नहीं

चाहे खूब हाहाकार हो....!

पर मेरी जय जयकार  हो  !

कह दूँ, वो मेरी माँ नहीं है

मैं उसका जाया नहीं हूँ, 

बाप को पहले ही मार चुका हूँ

सच का हिसाब चुकता  कर चुका हूँ

हरकारे एक नहीं कई, मेरे पास हैं ही.....

होने दो हल्ला....खूब खाओ गल्ला...

पर नाहक सच मत बोलो यार

झूठा हूँ…

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Added by Chetan Prakash on January 30, 2022 at 5:00pm — No Comments

सलाह. . . . लघुकथा

सलाह ...(लघुकथा )

"बाबू जी, बाबू जी । बच्चा भूखा है । कुछ दे दो ।"

 एक भिखारिन अपने 5-6 माह के बच्चे को अस्त-व्यस्त से कपड़ों में दूध पिलाते हुए गिड़गिराई ।

" क्या है ,  काम क्यों नहीं करती । भीख मांगते हुए शर्म नहीं आती क्या । जब बच्चे पाले नहीं जाते तो पैदा क्यों करते हो ।" राहुल भिखारिन को डाँटते हुए बोला ।

"आती है साहब बहुत आती है भीख मांगने में नहीं बल्कि काम करने में आती है ।" भिखारिन ने कहा ।

"क्यों  ?" राहुल ने पूछा ।

"साहब ,आप जैसे ही…

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Added by Sushil Sarna on January 30, 2022 at 4:39pm — 6 Comments

गज़ल

गज़ल

2122 2122 2122 212

आजकल हर बात पर लड़ने लगा है आदमी,

क्रोध के साये तले पलने लगा है आदमी।

चाह झूठी शान की अब बढ़ गई है बहुत ही,

इस लिये बेचैन सा रहने लगा है आदमी।

आग हिंसा की बहुत झुलसा रही है देश को,

खूब धोखा दल बदल करने लगा है आदमी।

धन कमाया पर बचाया कुछ नहीं अपने लिये,

अब बुढ़ापे में छटपटाने लगा है आदमी।

जिन्दगी भर झगड़ने से क्या मिला इंसान को,

देख ’’मेठानी‘‘ बहुत रोने लगा है आदमी।

मौलिक…

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Added by Dayaram Methani on January 30, 2022 at 12:16pm — 2 Comments

गीत

गीत

बहर - बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम



।। तुझे भूल जाना ।।

न आसान होगा, तुझे भूल जाना

कहीं दूर जाना, निगाहें चुराना



न होगी मुहब्बत, न होगी वफ़ाएँ

मुझे छोड़ दो तुम, यही हैं जफ़ाएँ

नहीं होश अब है, नहीं है ठिकाना

न आया जताना, न आँसू छिपाना



कहीं दूर जाना.. तुझे भूल जाना..



तुम्हीं ने कहा था, न होंगे जुदा हम

मुहब्बत हमारी, न होगी कभी कम

सदा साथ होंगे, हो वैरी ज़माना

कहेंगी फ़िज़ाएँ, हमारा फ़साना



कहीं दूर जाना..… Continue

Added by Hiren Arvind Joshi on January 29, 2022 at 10:00pm — No Comments

दोहा सप्तक -७( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

मन्थन कर के सिन्धु का, बँटवारे में कन्त

राजनीति को क्यों दिए, बहुत विषैले दन्त।१।

*

दुख को तो विस्तार है, सुख में लगा हलन्त

ऐसी हम से भूल क्या, कुछ तो बोलो कन्त।२।

*

वैसे कुछ तो बाल भी, कहते सत्य भदन्त

मन छोटी  सी  कोठरी, बातें  रखे अनन्त।३।

*

आया है उत्कर्ष का, यहाँ न एक बसन्त

केवल पतझड़ में जिये, यूँ जीवन पर्यन्त।५।

*

सुख तो मुर्दा देह सा, केवल दुख जीवन्त

जाने किस दिन आ स्वयं, ईश करेंगे अन्त।४।

*

कहलाने की होड़ में,ओछे लोग…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 27, 2022 at 8:43pm — 2 Comments

नज़्म - शहीद की आरज़ू

2122 - 2122 - 2122 - 212

मुझको पहलू में सुला लेना मेरे प्यारे वतन

अपने आँचल की हवा देना मेरे प्यारे वतन 

आ रहा हूँ तुझसे मिलने जंग के मैदान से 

अपनी बाहों में उठा लेना मेरे प्यारे वतन 

आ मिलूंगा जब तुझे मैं बाज़ुओं में लेके तू

मुझको झूला भी झुला देना मेरे प्यारे वतन

प्यार करना माँ के जैसे चूमकर माथा मेरा    

मुझको सीने से लगा लेना मेरे प्यारे वतन 

ख़ाक अपनी तेरे क़दमों छोड़ जाता हूँ…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on January 27, 2022 at 4:40pm — 2 Comments

अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास

2122     2122      2122      212

वक्त इतना भी कठिन कब है,ज़रा महसूस कर।

एक रोशन दिन की ये शब है,ज़रा महसूस कर।

खुद को तन्हा कहना तेरी भूल है, इतना समझ

हर कदम साथी तेरा रब है,ज़रा महसूस कर।

मिल ही जाएगी तेरी मंज़िल अगर चलता रहा

रास्ता थोड़ा सा ही अब है,ज़रा महसूस कर।

तू नहीं पहला बशर है ठोकरों की चोट में,

सालों से चलने का ये ढब है ज़रा महसूस कर।

बेबसी, मायूसियाँ,नाक़ामियाँ, रुसवाईयाँ,

जिंदगी की ये ही तो…

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Added by मनोज अहसास on January 26, 2022 at 11:00pm — 2 Comments

गणतंत्र दिवस गीत

जय भारत के लोगों की 

जय भारत देश महान की 

जय जय जय गणतंत्र दिवस की

जय जय संविधान की

जय जय जय जय हिंद

अपनी धुनें बनाई हमने अपना राग बनाया था 

जिसमें समता, न्याय, आजादी का संकल्प समाया था 

एक अखंडित राष्ट्र के लिए गरिमा भाईचारा से 

हमने अपने गीत लिखे थे हमने खुद को गाया था 

जय लिक्खी संप्रभुता की जय लोकतंत्र कल्याण की 

जय जय जय गणतंत्र दिवस की

जय जय संविधान की

जय जय जय जय हिंद 

सूत कातते…

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Added by आशीष यादव on January 25, 2022 at 11:15pm — 3 Comments

ऐ सरहद पर मिटने वाले...(मुसल्सल ग़ज़ल)

22 22 - 22 22 - 22 22 - 22 2

ऐ  सरहद पर  मिटने वाले  तुझ में  जान  हमारी है        

इक तेरी  जाँ-बाज़ी  उनकी  सौ जानों  पर भारी है 

अपने वतन की मिट्टी हमको यारो जान से प्यारी है

ख़ाक-ए-वतन बेजान नहीं ये इस में जान हमारी है

एक …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on January 25, 2022 at 4:37pm — 6 Comments

साल पचहत्तर बाद

कैसे अपने देश की
नाव लगेगी पार?
पढ़ा रहे हैं जब सबक़
राजनीति के घाघ

जिनके हाथ भविष्य की
नाव और पतवार
वे युवजन हैं सीखते
गाली के अम्बार

अपने को कविवर समझ
वाणी में विष घोल
मानें बुध वह स्वयं को
उनके बिगड़े बोल

वेद , पुराण, उपनिषद
सत्य सनातन भाष्य
समझ सके न आज भी

साल पचहत्तर बाद

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on January 24, 2022 at 10:18am — 4 Comments

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