For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,161)

इंतज़ार – लघुकथा -

  इंतज़ार  – लघुकथा  -

 "नीरू बिटिया, आजा मेरी बच्ची, क्यों दरवाजे पर टकटकी लगाये बैठी है। रज्जन अब कभी नहीं लौट कर आनेवाला" स्वर्गीय रज्जन की अम्मा ने अपनी पुत्र वधू निर्मला को साँत्वना देने के लहज़े में पुकारा |

"अम्मा, यह बात तो हम भी जानते हैं। बार बार क्यों दोहराते हो? वह जब फ़ौज़ में गया था तभी हम अपना मन पक्का कर लिये थे। पर ऐसे उसका अंत होगा कि मृत शरीर भी देखने को नहीं मिलेगा , यह कभी नहीं सोचा था"।

"बिटिया, आतंकियों ने बम से चिथड़े  चिथड़े कर दिये मेरे बच्चे के। शायद…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on September 30, 2017 at 2:41pm — 4 Comments

रावण का चेहरा (लघुकथा)

हर साल की तरह इस साल भी वह रावण का पुतला बना रहा था। विशेष रंगों का प्रयोग कर उसने उस पुतले के चेहरे को जीवंत जैसा कर दिया था। लगभग पूरा बन चुके पुतले को निहारते हुए उसके चेहरे पर हल्की सी दर्द भरी मुस्कान आ गयी और उसने उस पुतले की बांह टटोलते हुए कहा, "इतनी मेहनत से तुझे ज़िन्दा करता हूँ... ताकि दो दिनों बाद तू जल कर खत्म हो जाये! कुछ ही क्षणों की जिंदगी है तेरी..." 

कहकर वह मुड़ने ही वाला था कि उसके कान बजने लगे, आवाज़ आई,

"कुछ क्षण?"

वह एक भारी स्वर था जो उसके कान में…

Continue

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on September 30, 2017 at 12:30pm — 4 Comments

पाओगे वही जो चाहोगे -- डॉo विजय शंकर

सच बोलू ,
सुन पाओगे ?
सत्य-मार्ग है ,
चल पाओगे ?
विजय-पथ है ,
लड़ पाओगे ?
प्रेम है ,
ले पाओगे ?
मित्रता है ,
निभा पाओगे ?
थोड़ा मीठा है ,
खा लोगे ?
नमक तेज है ,
खा लोगे ?
मुद्दा है ,
सुलझाओगे ?
या भुनाओगे ?
हर समस्या का
हल है ,
हल चाहोगे ?
बात ये है कि
पाओगे वही
जो चाहोगे।


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on September 30, 2017 at 10:45am — 10 Comments

पाओगे वही जो चाहोगे -- डॉo विजय शंकर

सच बोलू ,
सुन पाओगे ?
सत्य-मार्ग है ,
चल पाओगे ?
विजय-पथ है ,
लड़ पाओगे ?
प्रेम है ,
ले पाओगे ?
मित्रता है ,
निभा पाओगे ?
थोड़ा मीठा है ,
खा लोगे ?
नमक तेज है ,
खा लोगे ?
मुद्दा है ,
सुलझाओगे ?
या भुनाओगे ?
हर समस्या का
हल है ,
हल चाहोगे ?
बात ये है कि
पाओगे वही
जो चाहोगे।


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on September 30, 2017 at 10:44am — No Comments

रानी (लघुकथा )जानकी बिष्ट वाही

"बेचारी ?"

सामने वाली झुग्गी में इस नई ब्याही को।पति रोज काम पर जाते बाहर से ताला ठोक जाता है जैसे उसकी दिल की रानी को कोई चोर न ले जाय पीछे से।

छुटकी, बड़की को देख फिस्स से हँस दी।

" उसकी नज़र से देखा जाय तो ये मेहरारू ही उसका धन है।गज़ब की सुंदर जो है ।"

बड़की ने हँसी में साथ दिया।



वे दोनों रोज उसकी खूबसूरत पनीली बड़ी-बड़ी आँखें छुपकर देखने का मोह नहीं छोड़ पाती हैं ।जब से वह आई है उनका नीरस जीवन सरस हो उठा है। वर्ना सारा दिन यूहीं निकल जाता है जब से पढ़ाई… Continue

Added by Janki wahie on September 30, 2017 at 1:04am — 4 Comments

रानी (लघुकथा )जानकी बिष्ट वाही

"बेचारी ?"

सामने वाली झुग्गी में इस नई ब्याही को।पति रोज काम पर जाते बाहर से ताला ठोक जाता है जैसे उसकी दिल की रानी को कोई चोर न ले जाय पीछे से।

छुटकी, बड़की को देख फिस्स से हँस दी।

" उसकी नज़र से देखा जाय तो ये मेहरारू ही उसका धन है।गज़ब की सुंदर जो है ।"

बड़की ने हँसी में साथ दिया।



वे दोनों रोज उसकी खूबसूरत पनीली बड़ी-बड़ी आँखें छुपकर देखने का मोह नहीं छोड़ पाती हैं ।जब से वह आई है उनका नीरस जीवन सरस हो उठा है। वर्ना सारा दिन यूहीं निकल जाता है जब से पढ़ाई… Continue

Added by Janki wahie on September 30, 2017 at 1:04am — No Comments

तुम चली आना ...

तुम चली आना   ... 



जब 

दिन भर का

शेष

थोड़ा सा

उजाला हो

थोड़ी सी

सांझ हो

मेरे प्रतीक्षा द्वार पर

निस्संकोच

तुम चली आना

जब

थके हारे विहग

अंधकार में

विलीन होती

सांझ के डर से

अपने अपने

तृण निर्मित घोंसलों में

अपनी

चहचहाट के साथ

लौट आएं

तब

मेरी आशाओं के घरौंदों में

अपनी प्रीत का

दीप जलाने

निस्संकोच

तुम चली आना

जब…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 29, 2017 at 8:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल....कितने घावों को सिल डाला शब्दों के पैबंदों से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

622 22 22 22 22 22 22 2

भावों के धागे चुन चुन कर अरमानों के बंधों से

कितने घावों को सिल डाला शब्दों के पैबंदों से



साँसों से जीवन जैसा फूलों से तितली का रिश्ता

कुछ ऐसा ही नाता अपना कविता गीतों छंदों से



जन्मों जन्मों का बंधन है डरना क्या इनसे बन्धू

दुख चलते हैं बनके साथी इनसे हैं अनुबंधों से



अक्सर सच की नीलामी भी चौराहों पे होती है

उसकी हालत बद से बदतर लूले बहरे अंधों से



मजहब को जीने वाले वो मजहब को ही खाते हैं

कोने में… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 29, 2017 at 5:30pm — 7 Comments

फटी आंखें (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"तुम अपने काम संभालो! अपने काम निपटा कर मैं आता हूं।" रोज़ाना की तरह आज भी वह शायद वहीं गया था, जहां शंका थी। लक्ष्मी उसकी राह देख रही थी। कितना हंसमुख, सुंदर, ख़ुशमिज़ाज और हृष्ट-पुष्ट भाई है उसका। हम ग़रीबों के पास ये ही तो प्रभु के उपहार हैं। लेकिन रईस हमारी इन नियामतों पर भी डाका डाल देते हैं। लक्ष्मी बड़े भाई के बारे में सोच-सोच कर परेशान हो रही थी।



"भैया, मैं भी अब जवान हो रही हूं। मां-बाप की मज़बूरियां तो समझती हूं, लेकिन कम से कम तुम तो मेरे बारे में सोचो! उस रईस मेम साहब के… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 29, 2017 at 12:09pm — 6 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

वो न देगा दान मन्दिर के लिये

कुछ नहीं रब एक काफ़िर के लिये



लोग जिसकी शान में दिल से झुकें

ताज ऐसा चाहिए सिर के लिये



हौसला जिंदा रहे दिल में अगर

मुश्किलें क्या हैं मुसाफ़िर के लिये



इक पहेली बन गया है ऐ सनम

अक्स तेरा हर मुसव्विर के लिये



जाम,साकी,फूल ,तितली भूल जा

कुछ तो लिख तू दौरे हाज़िर के लिये



जिस्म ही वो चाहता है,दिल नहीं

प्यार है इक खेल शातिर के लिये



ज़ीस्त में कुछ तो कमा ले नेकियां

एक… Continue

Added by AMIT on September 28, 2017 at 6:45pm — 1 Comment

अवशेष ...

अवशेष ...

गोली
बारूद
धुंआ
चीत्कार
रक्तरंजित
गर्द में
डूबा
अन्धकार
शून्यता
इस पार
शून्यता
उस पार
बिछ गयी लाशें
हदों के
इस पार
हदों के
उस पार
बस
रहे शेष
अनुत्तरित प्रश्नों को
बंद पलकों में समेटे
क्षत-विक्षित
शवों के
ख़ामोश
अवशेष

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on September 28, 2017 at 5:10pm — 6 Comments

लंपा(लघुकथा)राहिला

पिताजी चाहे सही करें या गलत, बड़की बुआ के लिए तो वह हमेशा सीधे सच्चे और साधु ही थे ।मज़ाल कि एक शब्द भी उनके खिलाफ सुन लें।

"ऐसा है कुसुम कुमारी!पिछले जनम में मोती दान किये होंगे ,तभई छुटके जैसन पति मिला।ये फिजूल का रोना- धोना करके छुटके की छवि मटियामेट करवे की कोशिश ना करो ।कछु समझी का नहीं?"

पिताजी का इस तरह पक्ष लेने पर सब्जी काटती सुगंधा अंदर तक सुलग गयी।

"जिज्जी मैं कब किसी से कुछ कह रही हूं?"उसने पल्लू से नीला पड़ा बाजू ढँकते हुए कहा।

"मेरे सामने बनो मत !खूब जान…

Continue

Added by Rahila on September 27, 2017 at 9:16pm — 14 Comments

अपने ग़म को मैं........संतोष

अरकान-फ़ाइलातून मफ़ाइलुन फेलुन

अपने ग़म को मैं छुपा लेता हूँ
सबकी ख़ुशियों का मज़ा लेता हूँ

दिल में जब याद का उठे तूफ़ां
तेरी तस्वीर बना लेता हूँ

सामने जब वो मेरे आता है
अपने सर को मैं झुका लेता हूँ

जब भी होता है वो ख़फ़ा मुझसे
प्यार से उसको मना लेता हूँ

दिल में जब टीस मेरे उठती है
अश्क मैं छुप के बहा लेता हूँ
#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by santosh khirwadkar on September 27, 2017 at 8:00pm — 16 Comments

मेरा गांव मेरा परिवार

गाँव की चंचल हवा को देखो,मस्त मौली इस फिजा को देखो

इसमें है चाहत के गीत,निश्छल प्रेम विश्वास और प्रीत |

इसमें है चाहत की नैया , बातो में विश्वाश है भैया |

सबके साथ है सबकी मैया ,अपना भी परिवार है भैया|

नाना नानी बड़े सलोने,मामी भी है इन्ही घरो में |

चाची जी का प्यार तो देखो,भाभी का तकरार तो देखो|

बड़ी माँ भी बड़ी सलोनी,प्यार से देती खाना पानी|

छोटी बहाना भी है संग में, उसका प्यार है अपने रंग में|

सुबह को झगडा शाम को प्यार,खिल उठता अपना संसार|

अभी बने हम… Continue

Added by Pankaj sagar on September 27, 2017 at 11:12am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तरही ग़ज़ल - "ये वो क़िस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ ‘ ( गिरिराज भंडारी )

2122/1122   1122  1122   22 /112

जीभ ख़ुद की है तो दांतों से दबा भी न सकूँ

कैसे खामोश रहे इस को सिखा भी न सकूँ 

 

उनका वादा है कि ख़्वाबों में मिलेंगे मुझसे

मुंतज़िर चश्म को अफसोस सुला भी न सकूँ

 

तश्नगी देख मेरी आज समन्दर ने कहा

कितना बदबख़्त हूँ मैं प्यास बुझा भी न सकूँ



मेरे रस्ते में जो रखना तो यूँ पत्थर रखना

कोशिशें लाख करूँ यार हिला भी न सकूँ 

 

यहाँ तो सिर्फ अँधेरों के तरफदार बचे

छिपा रक्खा है,…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on September 27, 2017 at 9:00am — 31 Comments

दर्द का एहसास--

"मैडम, इस तरह कैसे चलेगा, बिना छुट्टी लिए आप गायब हो जाती हैं| यह ऑफिस है, ध्यान रखिये, पहले भी आप ऐसा कर चुकी हैं", जैसे ही वह ऑफिस में घुसी, बॉस ने बुलाकर उसे झाड़ दिया| उसने एक बार नजर उठाकर बॉस को देखा, उसकी निगाहों में गुस्सा कम, व्यंग्य ज्यादा नजर आ रहा था| बगल में बैठी बॉस की सेक्रेटरी को देखकर उसको उबकाई सी आ गयी|

लगभग तीन महीने हो रहे थे उसको इस ऑफिस में, पूरी मेहनत से और बिना किसी से लल्लो चप्पो किये वह अपना काम करती थी| ऑफिस में कुछ महिलाएं भी थीं जिनके साथ वह रोज लंच करती थी…

Continue

Added by विनय कुमार on September 27, 2017 at 1:00am — 12 Comments

सब कुछ उपलब्ध है दुकानों में (ग़ज़ल)

2122 1212 22



सब हैं मसरूफ़ अब उड़ानों में

देखिये भीड़ आसमानों में



प्यार? ईमान? दोस्ती? जी हाँ

सब कुछ उपलब्ध है दुकानों में



भुखमरी,बालश्रम,अशिक्षा..सब

मिट चुके हैं फ़क़त बयानों में



पत्थरों से उन्हीं की यारी है

जो हैं शीशे-जड़े मकानों में



सच्चे हीरे की है तलाश अगर

जा! भटक कोयले की खानों में



बच्चे लड़-भिड़ के खेलने भी लगे

गुफ़्तगू बंद है सयानों में



फ़र्श से अर्श पर मैं जा पहुँचा

कितनी ताक़त है देखो… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on September 26, 2017 at 8:06pm — 14 Comments

सपना (हास्य व्यंग्य)

क्या दिन थे आनन्द भरे वे, हरपल रहता था उल्लास|

आगे जीवन ऊबड़ खाबड़, तनिक न था इसका आभास||

बीबी बच्चों के चक्कर में, स्वप्न हुए अब तो इतिहास|

आफत आन पड़ी है मुझपर, दोस्त उड़ाते हैं उपहास||



कभी उड़ा था नील गगन में, मैं भी अपने पंख पसार|

पंख लगाकर समय उड़ा वो, हुआ बिना पर मैं लाचार||

जीवन अपना शुष्क धरा सा, मस्ती का उजड़ा संसार|

ऐसा चिर पतझड़ आएगा, कभी नहीं था किया विचार||



जाने कौन घड़ी थी वो भी, जब शादी का किया ख़याल|

किस्मत ऐसी फूटी भइया,… Continue

Added by नाथ सोनांचली on September 26, 2017 at 7:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

जीवन का मक़सद देखेगी

दुनिया तेरा कद देखेगी



खादी पहने इन गुंडों को

कब तक ये संसद देखेगी



फिरकापरस्ती बदनज़रों से

मस्जिद का गुम्बद देखेगी



सूखी धरती उम्मीदों से

बारिश की आमद देखेगी



तू हो चाहे जितना अच्छा

दुनिया तुझको बद देखेगी



दुनिया तेरी सब यादों को

मुझसे ही बरामद देखेगी



खून जवानों का यूँ बहते

कब तक ये सरहद देखेगी



गाँव अगर जाऊँ तो आँख

फिर सूखा बरगद देखेगी



करने… Continue

Added by AMIT on September 26, 2017 at 6:58pm — 8 Comments

हुआ क्या आपको जो आप कहती बढ़ गयी धड़कन

अजब सी है जलन दिल में ये कैसी है मुझे तड़पन

उसे अहसास तो होगा बढ़ेगी दिल की जब धड़कन'

दिखा है जबसे उसकी आँखों में वीरान इक सहरा

मुझे क्या हो गया जाने कहीं लगता नहीं है मन

गले को घेर बाँहों से बदन करती कमाँ जब वो'

मुझे भी दर्द सा रहता मेरा भी टूटता है तन

वो रो लेती पिघल जाता हिमालय जैसा उसका गम

मगर सूरज के जैसे जलता रहता है मेरा तन मन

'नज़र मिलते ही मुझसे वो झुका लेते हैं यूँ गर्दन

ये मंज़र देख उठती है लहर…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on September 26, 2017 at 4:30pm — 14 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"ग़ज़ल   बह्र ए मीर लगता था दिन रात सुनेगा सब के दिल की बात सुनेगा अपने जैसा लगता था…"
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे…See More
5 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
" दोहा मुक्तक :  हिम्मत यदि करके कहूँ, उनसे दिल की बात  कि आज चौदह फरवरी, करो प्यार…"
6 hours ago
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"दोहा एकादश. . . . . दिल दिल से दिल की कीजिये, दिल वाली वो बात । बीत न जाए व्यर्थ के, संवादों में…"
8 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"गजल*****करता है कौन दिल से भला दिल की बात अबबनती कहाँ है दिल की दवा दिल की बात अब।१।*इक दौर वो…"
17 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"सादर अभिवादन।"
17 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"स्वागतम"
22 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"  आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी सादर नमस्कार, रास्तो पर तीरगी...ये वही रास्ते हैं जिन…"
yesterday
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Feb 8

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service