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गजल(मनन)

2122 2122 2122 212

सैर करना हो रहा हावी बला की वार पर

चौखटें कब लाँघती वह बिलबिलाती द्वार पर।1



ध्यान केंद्रित कीजिये आचार फिर आहार पर

शर्करा कम लीजिये नजरें रखें जी खार पर।2



तेल-घी कुछ कम चपोड़ें सादगी सबसे भली

दाल-रोटी सब्जियाँ फल बात बनती चार पर।3



रात को बिस्तर लगाना जल्द होना चाहिए

ध्यान रहना चाहिए रोजी तथा व्यापार पर।4



त्यागिये बिस्तर सबेरे ताजगी देती हवा

भागिये मैदान में कर रोग- बाधा द्वार पर।5

मौलिक व… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 15, 2016 at 7:00pm — 6 Comments

मिलन / गद्यगीत पर एक प्रयास

जैसे ही धरती को छूने आकाश नीचे सरक कर आया कि अपने में सिमटती धरती घुटनों पर झुक गई।

ऊँचे - ऊँचे पहाड़ों में ,निस्पंद- सा देवदार अपने ही साये में सिमटकर खड़ा रहा। पहाड़ों को भी अब अपनी अलंध्यता गलत साबित हो रही थी । उल्लासमय वातावरण में

मायावी संगीत-सी , अलग - अलग ताल ,अलग - अलग रंगों में सपने ,एक अविस्मृत अद्भुत मायाजाल -सी फैला गई । मोह - पाश का बँधन और मुक्ती की यातनामय चाहना , धूप के संग -संग पल -छिन उजालों के रंगों का भी बदलना , मन की अतल गहराईयों से निकलकर उगते चाँद पर सिन्दूरी रंग… Continue

Added by kanta roy on May 15, 2016 at 11:39am — 9 Comments

लौट आओ साजन सावन के पहले - (अरुणेन्द्र मिश्र)

वो लम्हे विरह गीत न बन जाये

लौट आओ साजन सावन के पहले

पपिहा पीऊ पीऊ आवाज लगाये

पेडो पर पड गये झुले

कजरी लागे मोहे सौतन

बदरा की बुन्दे जलये तन मन

लगी है प्रित मेरी अब अशुअन से

लौट आओ साजन सावन के पहले

 

जोगन न बन जाये कही ये बिरहन

लौट आओ साजन सावन के पहले

 

 

मुख मलिन , जैसे काली बदरिया

पनघट पे ना रिझाये कोइ सवरिया

सुनी सुनी पडी है पुरी डगरिया

आंगन सुना, सुना भयॊ मेरे मन का…

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Added by arunendra mishra on May 14, 2016 at 7:30pm — 3 Comments

मॉ की दवा – ( लघुकथा )

"राजू बेटा, क्या कर रहा है! मेरी दवा खत्म हो गयी है! मेरी डायरी ले जा और मेरी दवाइंयॉ ले आ"!

"मॉ, आज क्लब में हम लोग मदर्स डे मना रहे हैं! मुझे क्लब का सैक्रेटरी होने के नाते मदर्स डे के ऊपर एक भाषण देना है! अपनी सोसाइटी में काम करने वाली बाइयों एवम अन्य महिला कर्मचारियों को वस्त्र, मिठाईयां और दबाईयां वितरण करनी हैं! अतःउसी की रूप रेखा तैयार कर रहा हूं! आज तो बहुत मुश्किल है! "!

“तो बेटा ऐसा कर कि उसी महिलाओं की लिस्ट में मेरा भी नाम लिख ले”!

मौलिक व अप्रकाशित

Added by TEJ VEER SINGH on May 14, 2016 at 1:00pm — 12 Comments

रोशनी

अंधेरे में रोशनी,

जीवन का सहारा ।

शाम को बिछड़ती,   

जब सुबह निहारा ।

इधर जब पौ फटी,  

तो देखो लो नजारा।  

क्या जानवर, पक्षी,

सब दिखे बे सहारा।

कोई रहम न करता ,

क्या कानून निराला ।

भूखे इंसान की रोटी,

बेटी हजम कर डाला। 

रोशनी की आस दिखती,

परंपरा का डर दे डाला ।

तन मन पर हजारों पीड़ा,  

सहन करके भी जी लेता ।  

अपनों का पेट भरता ,

अतीत को भूल जाता ।

मानवता को कलंकित…

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Added by Ram Ashery on May 14, 2016 at 1:00pm — 3 Comments

दुख की धूप हमें दे रक्खो सुख की सारी छाँव घनी - ( गजल) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2222    2222    2222    222

*********************************

यौवन  भर  देखी  है  हमने  कैसी  कैसी  छाँव घनी

कहने से भी मन डरता अब मिलती थोड़ी छाँव घनी।1



धूप अगर  होती  राहों  में तो  साया  भी मिल जाता

लेकिन अपने पथ में यारो मंजिल तक थी छाँव घनी।2



हमको तो  आदत  सहने की  सर्दी गर्मी बरखा सब

दुख की धूप हमें दे रक्खो सुख की सारी छाँव घनी।3



छाया अच्छी तो है  लेकिन बढ़ने से जीवन जो रोके

कड़ी  धूप से  भी बदतर  है यारो  ऐसी छाँव घनी।4



फसलों…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 14, 2016 at 10:51am — 6 Comments

प्रार्थना

हे जग जननी आस तुम्हारा
शब्दों को देती तुम धारा
वाणी को स्वर मिलता तुमसे
कण-कण में है वास तुम्हारा |

दिनकर लेते ओज तुम्ही से
शशि की शीतलता में तुम हो
नभ गंगा की रजत धार में
झिलमिल करता सार तुम्हारा |

सिर पर रख दो वरद हस्त माँ
कलम चले अनवरत मेरी
अंतर्मन के हर पन्ने पर
लिखती हूँ उपकार तुम्हारा ||


मीना पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by Meena Pathak on May 14, 2016 at 8:54am — 3 Comments

गुस्ताख सवाल(लघुकथा)राहिला

स्वर्ग के प्रवेश द्वार के बाहर लंबी-लंबी कतारें लगी हुई थीं ।तभी खुद से बहुत आगे आ़ला दर्ज़े के स्वर्ग वाली कतार में अपने खा़दिम को खड़ा देख, उनकी अना को जबरदस्त ठेस पहुंची।लेकिन ये वो जगह नहीं थी जहां किसी के मन में किसी प्रकार की शिकायत या सवाल रह जाये ।सो मन में सवाल का आना हुआ नहीं कि वहाँ के दो कर्मचारियों ने फौरन उसे कतार से उठा कर परमेश्वर के समक्ष ला खड़ा किया ।

"बोलो. .!हमारे न्याय पर तेरे मन में क्या सवाल खड़ा हुआ है? "

"प्रभु! समस्त जीवन मेरा दान, पुण्य,पूजा-पाठ में गुजरा ।… Continue

Added by Rahila on May 13, 2016 at 4:24pm — 14 Comments

होली

आज सबके मन का उल्लास देखते ही बनता था। सभी के हाथ में पिचकारी व रंग की बाल्टी थी जिससे वे सभी राहगीर और परिचितों को सराबोर कर रहे थे। रास्ते से गुजरने वाले उधर जाने से डर रहे थे कि जाने कब बच्चों की पार्टी उन्हें देख ले और उन पर रंगों की बौछार कर दे। सभी प्रसन्न चित हो घूम रहे थे। रामू ने देखा कि एक आदमी तेजी से उस तरफ चला आ रहा है। वह बगैर इधर-उधर देखे चला आ रहा था लगता था कि उसे बड़ी जल्दी थी। वह जब नजदीक आया तो रामू ने अपने हथियार संभाले और प्रहार की तैयारी की निशाना लगा ही रहा था कि तब…

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Added by indravidyavachaspatitiwari on May 13, 2016 at 6:00am — 3 Comments

ख्वाब-ऐ-बशर ...

ख्वाब-ऐ-बशर ...

आज फिर

किसी का चूल्हा

उदास ही

बिन जले सो गया।

आज फिर

सांझ के दामन पे

भूख लिख गया कोई।

आज फिर

पेट की आग

झूठी आशा की बर्फ से

ठंडी कर

सो गया कोई।

आज फिर

कटोरे से

सिक्कों की आवाज़

रूठी रही।

आज फिर

खारा जल

पकी दाढ़ी को

धोता रहा।

आज फिर

निराशा का कफ़न ओढ़े

बिन साँसों के

सो गया कोई।

आज फिर…

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Added by Sushil Sarna on May 12, 2016 at 2:47pm — 6 Comments

कोई छेड़े न ग़र बेहतर- ग़ज़ल

बहुत बेचैन हूँ इस पल

कोई छेड़े न गर, बेहतर।

उठा भूकम्प है मन में

सभाले तो कोई ये घर।।



चली है आरी-ए-मतलब

नहीं बाक़ी शज़र कोई।

हुआ पूरा शहर नंगा

ये दिल तो हो गया बंज़र।।



कहाँ तुमको खिलाऊँगा

न वो पनघट न पानी है।।

लहर नफ़रत की बहती है,

बहुत ही ख़ार है अंदर।।



अभी तो नींद टूटी है

अभी दुनिया से मिलना है।

मिलाकर आँख कहना है

ज़रा दिखलाओ अपने "पर"।।



डरायेगा कोई मुझको

अतल गहराइयों से क्या?

बताया जाये… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 12, 2016 at 9:53am — 6 Comments

सदा सुन के ज़मीं की, चाँद तारे छोड़ आया हूँ (ग़ज़ल)

1222 1222 1222 1222



फ़लक पर के सभी दिलकश नज़ारे छोड़ आया हूँ

सदा सुन के ज़मीं की, चाँद-तारे छोड़ आया हूँ



मैं अपने बोरिये-बिस्तर शहर ले के तो आया, पर

वो पनघट,बाग़,पोखर,खेत...सारे छोड़ आया हूँ



जहाँ अपनी वफ़ा का मुस्कुराता एक गुलशन था

वहीं अश्कों के कुछ तालाब खारे छोड़ आया हूँ



वज़ूद उसका न मिट जाए कहीं दरिया के दलदल में

तड़पती मीन को सागर किनारे छोड़ आया हूँ



पिछड़ जाए न बेटा रेस में, ज्यों गोद से उतरा

उसे हॉस्टल प्रतिस्पर्धा के… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on May 12, 2016 at 8:46am — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
डूबता हूँ रोज़ मैं तिनके लिये

2122 2122 212
डूबता हूँ रोज़ मैं तिनके लिये
जिंदा हूँ यूँ जाने किस दिन के लिये

साँसें तो भरपूर दी अल्लाह ने
पर हिसाब इनके भी गिन-गिन के लिये

ज़िन्दगी से रोज़ पल चुनता रहा
पर नहीं दो पल भी जामिन के लिये

ये ख़याल आये न मुझको आख़िरश
उम्र भर मरता रहा किनके लिये

हाल तक वो पूछने आये नहीं
इक तरफ़ रख दी क़लम जिनके लिये

-मौलिक, अप्रकाशित

Added by शिज्जु "शकूर" on May 11, 2016 at 8:57pm — 7 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122

लोग कैसे रंग अपने कर लिये हैं

फूल की है चाह पर पत्थर लिये हैं।1



शेर मारे फिर रहे हैं दर- बदर अब

रोब उनके बकड़ियों ने हर लिये हैं।2



मुस्कुराकर मिल रहे हैं महफिलों में

हाथ में सब लोग तो खंजर लिये हैं।3



फूल की खेती करेंगे कह रहे सब

दिल बड़ा ही खुरदरा बंजर लिये हैं।4



भूलकर कल पार जाना था क्षितिज के

अस्थियों का वे अभी पंजर लिये हैं।5



दे रहे रिश्ते दुहाई देखिये भी

लोग अपनों का यहाँ तो डर लिये… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 11, 2016 at 8:04pm — No Comments

मेरी परछाई

जीवन के हर मोड़ पर
हर मुश्किल के साथ
जब अपने बिछुड़ते गये
हर अँधेरे की दस्तक से
तथाकथित सच्चे मित्र
साथ छोड़ते गये
जीवन की नितांत
एकाकी सड़क पर
आज भी ‘वह’ लगातार
बिना थके, बिना रुके
मेरे साथ चली आ रही है
न सुख की आस
न आनंद की प्यास
न अभिलाषा प्रतिदान की
न लालसा सम्मान की
बगैर किसी शिकायत
एक निश्छल साथी
अविच्छिन्न सहचरी
मेरी परछाई I

तनूजा उप्रेती ,11.05.2016

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Tanuja Upreti on May 11, 2016 at 11:30am — 6 Comments

सावन की तैयारी है-ग़ज़ल

22-22-22-22-----22-22-22-2



प्रीत रीत हम निभा न पाये, खूब हुई गद्दारी है।

ग़म का ताप चढ़ा है मन पर, सावन की तैयारी है।।



इस गुलशन में स्वप्न पुष्प के, बाग़ लगाना अपनी ख़ता।

खारे जल से इसका सिंचन, करना तो लाचारी है।।



चिटख गया है शीशा-ए-दिल,चुभता है, हर धड़कन पर।

साँसें थामे रखना मुश्किल, जीना इक दुश्वारी है।।



उसे बेवफ़ा बोलूँ महफ़िल, में ये कैसे है सम्भव।

जिसे पूजता रहा उसे बदनाम करूँ, मक्कारी है।।



जब भी हाथ दुआ में उट्ठें, सिर्फ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 10, 2016 at 10:30pm — 3 Comments

वक्त बड़ा ही शरारती बच्चा

वक्त बड़ा ही शरारती बच्चा…

Continue

Added by amita tiwari on May 10, 2016 at 7:30pm — 3 Comments

ज़िंदगी के फ्रेम में ....

ज़िंदगी के फ्रेम में ....

यादें

आज पर भारी

बीते कल की बातें

वर्तमान को अतीत करती

कुछ गहरी कुछ हल्की

धुंधलके में खोई

वो बिछुड़ी मुलाकातें

हाँ ! यही तो हैं यादें

ये भीड़ में तन्हाई का

अहसास कराती हैं

आँखों से अश्कों की

बरसात कराती हैं

सफर की हर चुभन

याद दिलाती हैं

जब भी आती हैं

ये ज़ख़्म कुरेद जाती हैं

अहसासों के शानों पर

ये कहकहे लगाती हैं

ज़हन की तारीकियों में

ये अपना घर बनाती हैं…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 10, 2016 at 3:54pm — 4 Comments

गजल

2 1 2 2     2 1 2 2   2 1 2 2   2 2 2 1 

 फाईलातुन फाईलातुन फाईलातुन मफऊलात

 

कट गए  जंगल सभी  कैसे रहे  विवरों  में नाग

इसलिए सब भाग कर अब आ गए नगरों में नाग

 

चारपाई  पर  नहीं  चढ़ते  थे  जो  पहले  कभी

अब  वही  बेख़ौफ़  होकर  घूमते  शहरों में नाग

 

अब  बचाकर  जान  देखो  भागता  है  आदमी  

फन उठाये  मिल रहे हैं हर कही डगरों  में नाग

 

 हो  सके तो  बाज  आओ  प्यार से  इनके बचो

कौन जाने दंश…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 10, 2016 at 1:00pm — 3 Comments

गुमशुदा हूँ मैं

गुमशुदा हूँ  मैं

तलाश जारी है

अनवरत 'स्व ' की

अपना ‘वजूद’

है क्या ?

 आये खेले ..

कोई घर घरौंदा बनाए..

लात मार दें हम उनके 

वे हमारे घरों को....

रिश्ते  नाते उल्का से लुप्त

विनाश ईर्ष्या विध्वंस बस

'मैं ' ने जकड़ रखा  है मुझे

झुकने नहीं देता रावण सा

एक 'ओंकार'  सच सुन्दर

मैं ही हूँ - लगता है

और सब अनुयायी

'चिराग'  से डर लगता है

अंधकार समाहित है

मन में ! तन - मन दुर्बल…

Continue

Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 10, 2016 at 12:30pm — 5 Comments

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