For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,174)

अहसास

अहसास क्रिसमस की छुट्टियों में आये पोता पोती ,दादी जी के लाड प्यार में पूरे घर में धमा चौकडी मचाये रखते हैं ।इस बार दादी को फेसबुक और इंटरनेट का पाठ याद करा दिया । आज न जाने क्या सूझी दादी को दोनों को लेकर रसोई में पहुंच गई ।सभी दालें दिखाई पर सिर्फ चना और राजमा पहचान पाये ,दादी ने सभी अनाजों की पहचान कराई ,नया पाठ था बच्चों को , जल्दी सीख गए । "बेटा सचिन कुकर उठाओ ,इसका ढक्कन लगाओ ।" "दादी यह तो लग ही नहीं रहा ।" "देखो बेटा यह गास्केट है ,यह सेफ्टी वाल्व है ,तुम्हें यह तो मालूम है कि कुकर…

Continue

Added by Pawan Jain on December 25, 2015 at 5:30pm — 4 Comments

तराशते पत्थर (कविता) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

चित्र या चलचित्र

से

चर्चित विचित्र

पथभ्रष्ट कट्टर

बस

तराशते पत्थर ।

किस निमित्त

बनती, टूटती

ईंट-पत्थर की इमारत

आस्थाओं की इबारत

किसकी, कैसी

प्रार्थना या इबादत

कुछ

हटकर

साम्प्रदायिकता से

सटकर डटकर

अमन-चैन को देकर

कठोर टक्कर

भावुक जन-गण से

चंदा जुटाकर

नमूने दिखाकर

अपने ही मुल्क के

क़ानून को

बस

ठेंगा दिखाकर

कौन, कैसे

कलाकारों के हाथों

उकेरते पत्थर

चर्चित… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 24, 2015 at 2:57pm — 1 Comment

चुटकियाँ- ….. …



चुटकियाँ- ….. …



नेता   क्या   और भाषण क्या

भाषण   पे   अनुशासन  क्या

मूक    बधिर   इस जनता को

व्यर्थ   में     आश्वासन    क्या !!1!!



देश   क्या     विकास      क्या

बिन    कुर्सी  मधुमास    क्या

छल करते जो नित् निर्बल  से

उस आवरण का विश्वास   क्या !!2!!



नीति   क्या    अनीति      क्या

भ्रष्ट की  सोच   से  प्रीति   क्या

जनता के जो खून  से   जिन्दा

उस   नेता   की  परिणति क्या !!3!!



फ़र्ज़    क्या  …

Continue

Added by Sushil Sarna on December 24, 2015 at 1:27pm — 6 Comments

गजल

2122 2112

आ रहा है साल नया

जा रहा है काल बचा।

तिक्त-मीठी बात रही

है सपन का जाल रचा।

अनसुनापन बोल रहा

लेख दुर्गम भाल खचा।

कर जतन मन डोल रहा

देख अब ढाढस न बचा।

थे चले उम्मीद लिये

दे गया गत साल गचा।

नाच आये थिर न हुए

मन कहा अब न नचा।

कह रहा है साल नवल

देख मेरी शान बचा।

लाज लुटती चूक गये

मैं सकूँ इसको न पचा।

चीर जोड़ो,गर न सको

बलि चढ़ो नर न लजा।

शांत रहने दे न मुझे

रक्त से दामन न सजा।

मच रही है… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 24, 2015 at 11:30am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - ग़म किसी का किसी की राहत है - गिरिराज भंडारी

2122  1212   22  /112

क्या नहीं ये अजीब हसरत है ?

ग़म किसी का किसी की राहत है

 

ख़ाक में हम मिलाना चाहें जिसे

उनको ही सारी बादशाहत है

 

रोटी कपड़ा मकान में फँसकर

बुजदिली, हो चुकी शराफत है

 

हर्फ करते हैं प्यार की बातें

आँखें कहतीं हैं, तुमसे नफरत है

 

मुज़रिमों को मिले कई इनआम

आज मजलूम की ये क़िस्मत है

 

बेरहम क़ातिलों को मौत मिली

सेक्युलर कह रहे , शहादत है

 

हाँ,…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on December 24, 2015 at 10:30am — 30 Comments

बेरोज़गारी - लघुकथा (जानकी बिष्ट वाही )

ठक-ठक की तेज़ आवाज़ के साथ वह सामने आ खड़ा हुआ।

" ओ बाबू अँधेरे में क्यों बैठे हो ? घर जाओ । अरे ! ऐसे क्या देख रहे हो?
क्या नाम है तुम्हारा ?"

" बेरोज़गारी ।"
पीछे से आवाज़ सुनाई दी -
" लगता है पगला गया है बेचारा ।"


मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by Janki wahie on December 23, 2015 at 11:11pm — 2 Comments

राह हमें उत्कर्ष की, नित दिखला नववर्ष......

दोहा छंद आधारित गीत

================

मन सहिष्णु भटके नहीं,

लेकर भाव अमर्ष

राह हमें उत्कर्ष की, नित दिखला नववर्ष.....

 

झाँक रही दीवार से,

खूंटी ओढ़े  गर्द

साल मुबारक हो नया,

कहता मौसम सर्द

जंत्री नूतन साल की, करती ध्यानाकर्ष

 

लौटें लेकर सुदिन सब,

उत्सव औ त्यौहार

मिलना जुलना हो सहज,

सरल भाव व्यवहार

जाति धर्म के नाम पर, हो न कभी संघर्ष

 

गीत छंद कविता गजल,

ललित कलेवर…

Continue

Added by Satyanarayan Singh on December 23, 2015 at 9:00pm — 12 Comments

लबों पर रख हँसी हरदम अगर को भुलाना है- बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’

 

अरकान – 1222    1222     1222     1222

 

लबों पर रख हँसी हरदम अगर को भुलाना है|

दिखा मत दर्दे-दिल अपना बहुत ज़ालिम ज़माना है|

 

तेरा गम तेरा अपना है न जग समझा न समझेगा,

तू अपने पास रख इसको कि ये तेरा ख़जाना है|

 

नजूमी हाथ की रेखाएं पढ़कर मुझसे यूँ बोला,

पुजारी है तू किस्मत का कि दिल तेरा दिवाना है|

 

कभी मायूस मत होना भले कुटिया में रहना हो,

बचाती धूप से तुझको वो तेरा आशियाना…

Continue

Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 23, 2015 at 6:29pm — 4 Comments

बेरोज़गारी - लघु कथा ( जानकी बिष्ट वाही )

" अरविन्द ! लो तुम्हारी पसन्द की खीर ।"

" माँ ! आज़ खीर ? कोई खास बात है क्या ?"

" हाँ बेटा ! मेरे लिए तो खास ही है। आज़ तुम्हारा जन्मदिन है।तुम कैसे भूल गए ? याद है बचपन में महीने भर पहले से जन्मदिन मनाने और पसन्द की चीजों का आग्रह शुरू हो जाता था।"



" हाँ माँ ! वे दिन ही अच्छे थे ,मस्त। न कोई फ़िक्र न कोई उलझन।

जाने कहाँ उड़ गए पँख लगा कर।"



" ऐसे उदास नहीं होते बेटा ! "माँ का गला रुंध आया ।

" माँ ! हर सुबह मुझे डराती है। आईना मुझे नहीं भाता ।हर जन्मदिन… Continue

Added by Janki wahie on December 23, 2015 at 5:05pm — 1 Comment

हर बार उन्हें आप ने सुल्तान बनाया (ग़ज़ल)

बह्र : २२११ २२११ २२११ २२

 

ये झूठ है अल्लाह ने इंसान बनाया

सच ये है कि आदम ने ही भगवान बनाया

 

करनी है परश्तिश तो करो उनकी जिन्होंने

जीना यहाँ धरती पे है  आसान बनाया

 

जैसे वो चुनावों में हैं जनता को बनाते

पंडे ने तुम्हें वैसे ही जजमान बनाया

 

मज़लूम कहीं घोंट न दें रब की ही गर्दन

मुल्ला ने यही सोच के शैतान बनाया

 

सब आपके हाथों में है ये भ्रम नहीं टूटे

यह सोच के हुक्काम ने मतदान…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 23, 2015 at 10:00am — 32 Comments

वादे इरादे (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी (46)

दस साल बाद एक समारोह में उन दोनों की अप्रत्याशित मुलाक़ात हो गई। न चाहते हुए भी बात चल पड़ी।



"मैंने तुमसे वादा किया था कि मैं आई.ए.एस. अधिकारी बनकर दिखाऊंगा, मैंने पाँच साल ख़ूब मेहनत की, साक्षात्कार तक पहुंच जाता था लेकिन नसीब में तो प्रोफेसर बनना ही लिखा था !"



"मेरे परिवार के स्टेटस का सवाल था। हमारे यहाँ कोई भी रिश्ता प्रशासनिक सेवा से नीचे के लोगों में नहीं हुआ ! आई.ए.एस. बनने के बाद मैं अपने माँ-बाप को और ज़्यादा इंतज़ार नहीं करा सकती थी ! .... लेेेेकिन तुमने तो पागलपन… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 22, 2015 at 11:37pm — 12 Comments

किसी की झील सी आँखों में फिर से खो के देखूँ

मुहब्बत की डगर में फिर किसी का हो के देखूँ

किसी की झील सी आँखों में फिर से खो के देखूँ

 

अब इन आँखों से उसके प्यार का चश्मा उतारूँ

जहां में हैं बहुत से रंग आँखें धो के देखूँ

 

जिसे मैं प्यार करता था वो मेरा हो न पाया

जो मुझसे प्यार करता है मैं उसका हो के देखूँ

 

बहुत दिन हो गए आँखों को कोई ख़्वाब देखे

चलो शानो पे सर रख कर किसी के सो के देखूँ

 

कोई तो बढ़ के 'सूरज' आँसुओ को पोछ लेगा

मुहब्बत में चलो इक…

Continue

Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on December 22, 2015 at 11:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

२१२ २१२ २१२ २१२

इक सवाल आँखों में ही बसा रह गया

यूँ लगे जैसे इक ख़त खुला रह गया

रेल से वो चली शहर ये छोड़कर

और टेशन पे  मैं बस खड़ा रह गया

दाग गिनवा रहा था जमाने के मैं

सामने मेरे बस आइना रह गया

वक़्त सा वैध भी कर ना पाया इलाज

देखिये ज़ख्म तो ये हरा रह गया

शख्स हर जानता जिंदगी है सफ़र

मंजिलें हर कोई ढूंढता रहा गया

दम निकलते समय भूला मैं रब को भी

इन लबों पर तेरा नाम सा…

Continue

Added by gumnaam pithoragarhi on December 22, 2015 at 8:27pm — 10 Comments

गिरगिट (लघुकथा )राहिला

"ओह, श्रीमती रोहन आप वाकई बहुत भाग्यशाली हैं । कि आप को रोहन जैसा हंसमुख ,जिंदादिल,स्वतंत्र विचारधारा का धनी पति मिला ।ऑफिस की तो जान है,मजाल जो किसी के चेहरे पर उसके रहते उदासी छा जाये।" रात के खाने पर आमंत्रित उनकी महिला मित्र काफ़ी देर से उनकी शान में कसीदे पढ़े जा रही थी ।

"वैसे बुरा ना मानियेगा, अगर रोहन की शादी ना हुई होती तो उसे किसीभी कीमत पर हाथ से नहीं जाने देती । आखिर ऐसे इंसान की पत्नी होना अपने आप में गर्व की बात है ।सच कह रही हूं ना! " वो अब मेरी राय जानने के लिये…

Continue

Added by Rahila on December 22, 2015 at 1:00pm — 18 Comments

झील ठहरी है बहुत वक्त से कंकड़ मारो -( ग़ज़ल ) -लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

2122    1122    1122    22

****************************

प्यार  कहते  हैं  कि  हर  चाव  बदल  देता है

एक  मरहम  की  तरह   घाव  बदल  देता है /1



अश्क लेकर  भी किसी को न  तू रोते दिखना

कहकहा  आँख  का   बरताव   बदल   देता है /2



झील  ठहरी  है  बहुत  वक्त से  कंकड़ मारो

एक  कंकड़   ही  तो   ठहराव   बदल  देता  है /3



अजनवी  सोच  के   यूँ    दूर  न   बैठो  हमसे  

मिलना  जुलना  ही  मनोभाव  बदल  देता   है /4



माँ की ममता से मिली सीख ये  हमको…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 22, 2015 at 11:55am — 22 Comments

परख / लघुकथा

" आइये ,अपनी कुर्सी पर विराज लीजिए   ।" इतना तंज ! ऐसे कह गये वे जैसे उसके सिर पर ही बैठने वाली हो ।



"जी , अब काम समझा दिजीए कि मेरा काम क्या होगा यहाँ ?" उनके लहजे से अपमानित सा महसूस कर रही थी । क्या इनके साथ ही काम करना होगा उसे ? कैसे झेलेगी ? हृदय रूआँसा हो रहा था ।



" अरे ,आप क्या काम करेंगी ? आप तो बस पगार उठा कर ऐश करेंगी , काम तो हमें करना होगा ।" वह चिढ़ कर बोला ।



"मतलब ?" सुनकर अनमना उठी । सतीश आप कैसे झेलते रहे होंगे ऐसे लोगों को , पति की याद में…

Continue

Added by kanta roy on December 22, 2015 at 11:30am — 4 Comments

निर्भया कौन ? (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी (45)

उन दोनों की भटकती आत्माओं की मुलाक़ात आज निर्भया की आत्मा से हो गई। उन की हरक़त पर कटाक्ष करते हुए वह बोली-



"कुछ भी हो, तुम दोनों को ख़ुदकुशी कतई नहीं करनी थी !"



"क्या करती ? पेट से थी ! कब तक छिपाती ? नाबालिग को तो कोई कसूरवार नहीं मानता ! मानता भी तो क्या मुझे इंसाफ़ मिलता ?" - एक ने कहा ।



दूसरी ने निर्भया की आत्मा को दुखी स्वर में बताया - "एक तरफ़ तो उस कुकर्मी नाबालिग के सामने देश के क़ानून भी उलझन में पड़ गये ! दूसरी तरफ़ तुम्हारी निर्मम हत्या के बाद वैसे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 22, 2015 at 1:06am — 9 Comments

तो कुछ देखूँ- ग़ज़ल (पंकज)

1222 1222 1222 1222



तुझे मैं चित्त से अपने मिटा पाऊँ तो कुछ देखूँ।

तेरे अवधान को मन से घटा पाऊँ तो कुछ देखूँ।।



हे प्रियतम रूप रस तेरा मनस पर इस कदर हावी।

ये दृग रस पान से तेरे हटा पाऊँ तो कुछ देखूँ।।



ये पर्वत पेड़ ये नदिया, ये शीतल सी हवाएँ भी।

अलग तुमसे हैं ये खुद को बता पाऊँ तो कुछ देखूँ।।



कि मन्दिर चर्च मस्ज़िद और गुरुद्वारे बहुत हैं पर।

तेरे छवि धाम से मन को बुला पाऊँ तो कुछ देखूँ।।



ये पंकज खिल भी सकता है हाँ जी… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 22, 2015 at 12:15am — 8 Comments

कुछ छन्नपकैया सारछन्द (एक प्रयास)

छन्न पकैया छन्न पकैया,ओ.बी.ओ है बहतर

सारी बातें हो जाती हैं,यहाँ अदब में रहकर



छन्न पकैया छन्न पकैया, प्रभू की है माया

आज हुवा जाता है देखो,अपना ख़ून पराया



छन्न पकैया छन्न पकैया ,मंहगी बहुत दवाई

बिन इलाज के मर गए देखो,अपने बाबू भाई



छन्न पकैया छन्न पकैया,बढ़ा लो सब नाख़ून

इस दुनिया में लागू होगा,जंगलों का क़ानून



छन्न पकैया छन्न पकैया,वाणी अच्छी बोली

जब भी अपने लब खोलो तो बोलो सच्ची बोली



छन्न पकैया छन्न पकैया ,ग़ज़लें कहते… Continue

Added by Samar kabeer on December 21, 2015 at 10:00pm — 16 Comments

ये सिलसिला .......

ये सिलसिला .......

सच ! कितना स्वार्थी है इंसान

हर जीत पे मुस्कुराता है

हर हार से जी चुराता है

अपने स्वार्थ की पगडंडी पर अक्सर

वो हर रास्ते से नाता जोड़ लेता है

हर मोड़ पे इक दर्द को छोड़ देता है

हर कसम तोड़ देता है

मुहब्बत की पाक इबारत पे

वासना की कालिख पोत देता है

जिस्म के रोएँ रोएँ में

नफ़रत की फसल छोड़ देता

किसी ज़िंदगी को नरक कर

उसके अरमानों को रौंद देता है

किसी की पाकीज़गी को

चीत्कारों से ढक देता है

उफ़ !…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 21, 2015 at 8:08pm — 4 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

amita tiwari posted a blog post

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें बेगुनाही और इन्साफ की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप अहिल्या बन…See More
15 hours ago
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post गर्भनाल कब कट पाती है किसी की
" मान्य,सौरभ पांडे जीआशीष यादव जी , , ह्रदय से आभारी हूँ. स्नेह बनाए रखियगा | सौरभ जी ने एक…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on amita tiwari's blog post बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें
"आदरणीया अमिताजी, तार्किकता को शाब्दिक कर तटस्थ सवालों की तर्ज में बाँधा जाना प्रस्तुति को रुचिकर…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, आपकी प्रस्तुति निखर कर सामने आयी है. सभी शेर के कथ्य सशक्त हैं और बरबस…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय नीलेश भाई, आपका स्वागत है.     करेला हो अथवा नीम, लाख कड़वे सही, लेकिन रुधिर…"
yesterday
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय बाग़ी जी एवं कार्यकारिणी के सभी सदस्यगण !बहुत दुखद है कि स्थिथि बंद करने तक आ गयी है. आगे…"
Wednesday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता जी, आपकी भावनाओं और मंच के प्रति आपके जुड़ाव को शब्द-शब्द में महसूस किया जा सकता…"
Tuesday
amita tiwari and आशीष यादव are now friends
Monday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
Monday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
Monday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
Monday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आदरणीय सुशील जी बड़े सुन्दर दोहे सृजित हुए...हार्दिक बधाई "
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service