Added by Manan Kumar singh on October 6, 2015 at 11:09pm — 3 Comments
तुम न समझ पाओगे .....
तुम न समझ पाओगे
मुहब्बत की ज़मीन पर
कतरा कतरा बिखरते
रूमानी अहसासों के सायों का दर्द
तुम तो बुत हो
सिर्फ बुत
जिसपर कोई रुत असर नहीं करती
तुम से टकराकर
हर अहसास संग -रेज़ों में तक़सीम जाता है
और साथ चलते साये का वज़ूद
सिफर में तब्दील हो जाता है
रह जाते हैं बस शानों पर
स्याह शब में गुजरे चंद लम्हे
जो आज मुझे किसी माहताब में
लगे दाग़ की तरह लगते हैं
तुम्हारी याद का हर अब्र
मेरी चश्म…
Added by Sushil Sarna on October 6, 2015 at 9:42pm — 10 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 6, 2015 at 6:13pm — 9 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 6, 2015 at 6:02pm — 2 Comments
औपचारिकता – ( लघुकथा )
शहर के मशहूर,युवा व्यवसायी और समाजसेवी राहुल जी का सडक हादसे में निधन हो गया!पार्थिव शरीर घर आ गया था!सारा शहर उमड पडा था!कोठी में पैर रखने को जगह नहीं थी!मातम का माहौल था!औरतों के रोने के अलावा अन्य कोई आवाज़ नहीं आरही थी! करीबी लोग दाह संस्कार की व्यवस्था में लगे थे!
राहुल जी के बहनोई विनोद जी भी मौजूद थे!मगर वे जब से आये थे , तभी से अपने मोबाइल को कान से लगाये हुए थे!अन्य सभी उपस्थिति लोगों ने माहौल की नज़ाकत को देखते हुए अपने मोबाइल बंद कर दिये…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on October 6, 2015 at 5:25pm — 6 Comments
Added by kanta roy on October 6, 2015 at 4:00pm — 12 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 12:07pm — 4 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 8:29am — 3 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 7:31am — 6 Comments
Added by shashi bansal goyal on October 5, 2015 at 8:44pm — 7 Comments
कुम्हार हैं हम
सपनों को दीयों
हंडियों
और गुल्लकों की
शक्ल देते हुए
समय और बाज़ार से बेख़बर
चाक के साथ
घुमाते हैं अपनी ज़रूरतें
नही जानते
कि चाक है हमारी पृथ्वी
और बदलने के लिए
समय और मौसम
पृथ्वी का अपने अक्ष पर
घूमना आवश्यक है......
मौलिक व अप्रकाशित
Added by Jayprakash Mishra on October 5, 2015 at 4:27pm — 5 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 5, 2015 at 9:26am — 8 Comments
उलटी गंगा
बात जब तक घर में थी, सभी परिवार के मैंबर उसे समझा रहे थे । ये तुम गलत कर रहें हो ,रौशनी का ख्याल हमें पहले रखना चाहिए था, न कि अब हमसाया के घर की तरफ खिड़की रख कर । मगर वह अपनी फौजियों सी ज़िद छोड़ नहीं रहा था ।
पड़ोसी तो इस कि बारे पहले ही विरोध दर्ज करवा चुके थे, “क्योंकि कि बिल्डिंग के पीछे कोई अधिकारित रास्ता न होने की वजह से अपना हक भी नहीं बनता है” उसकी घर वाली ने कहा। पड़ोसी के पास अब क़ानूनी करवाई कि सिवाए कोई चारा नहीं रहा था । पर फिर…
ContinueAdded by मोहन बेगोवाल on October 4, 2015 at 7:30pm — 3 Comments
1222 1222 122
बहुत बेकार सा चर्चा रहा हूँ
मैं सच हूँ, आँख का कचरा रहा हूँ
बहा हूँ मै सड़क पर बेवजह भी
लहू इंसाँ का हूँ , सस्ता रहा हूँ
जो समझा वो सदा नम ही रहा फिर
मै आँसू ! आँखों से बहता रहा हूँ
महज़ इक बूँद समझा तिश्नगी ने
भँवर के वास्ते तिनका रहा हूँ
जलादूँ एक तो बाती किसी की
इसी उम्मीद में दहका रहा हूँ
मुझे मानी न पूछें ज़िन्दगी का
अभी…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on October 4, 2015 at 10:43am — 28 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on October 4, 2015 at 10:31am — 20 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 4, 2015 at 12:38am — 16 Comments
Added by Samar kabeer on October 3, 2015 at 11:41pm — 13 Comments
ख़ौफ़ खाता हूँ …
ख़ौफ़ खाता हूँ
तन्हाईयों के फर्श पर रक्स करती हुई
यादों की बेआवाज़ पायल से
ख़ौफ़ खाता हूँ
मेरे जज़्बों को अपाहिज़ कर
अश्कों की बैसाखी पर
ज़िंदा रहने को मज़बूर करती
बेवफा साँसों से
ख़ौफ़ खाता हूँ
हयात को अज़ल के पैराहन से ढकने वाली
उस अज़ीम मुहब्बत से
जो आज भी इक साया बन
मेरे जिस्म से लिपट
मेरे बेजान जिस्म में जान ढूंढती है
और ढूंढती है
ज़मीं से अर्श तक
साथ निभाने की कसमों के…
Added by Sushil Sarna on October 3, 2015 at 8:30pm — 12 Comments
Added by shashi bansal goyal on October 3, 2015 at 5:56pm — 6 Comments
Added by Janki wahie on October 3, 2015 at 5:53pm — 4 Comments
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