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कबाड़ (लघुकथा)

" बाबू जी ! कबाड़ी वाले को क्यों बुलाया था ? "

" बस , यूँ ही . बेटा ."

" यूँ ही क्यों बाबू जी  ! आप तो उससे कह रहे थे कि इस घर का सबसे बड़े  कबाड़ आप हैं और वह आपको ही ले जाये ."

" इसमें झूठ क्या है ? इस घर में मेरी हस्ती कबाड़ से ज्यादा है क्या ? "

" बाबू जी , प्लीज़ आप  ऐसा न कहिये . क्या मैं या इंदु  आपका ख्याल नहीं रखते ? "

" दिन भर कबाड़ की तरह घर के इस  या उस कोने में पड़ा रहता हूँ और वक्त - बेवक्त तोड़ने के लिए दो रोटियाँ मिल जाती हैं , तुम दोनों  ने मेरे…

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Added by सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा on August 16, 2015 at 9:30am — 5 Comments

तरही ग़ज़ल -- 'चलते चलते हम कहाँ तक आ गए ' ( दिनेश कुमार )

२१२२-२१२२-२१२



तीर-ए-अब्रू जब कमाँ तक आ गए

उनकी ज़द में जिस्मो-जाँ तक आ गए

.

तिश्नगी-ए-बे-कराँ तक आ गए

अब्र-ए-तर मेरे मकाँ तक आ गए

.

दाग़ सीरत पर लगे थे और हम

बस्ती-ए-सूरत-गराँ तक आ गए

.

रफ़्ता-रफ़्ता कम हुआ ज़ब्त-ए-अलम

दर्द-ए-जाँ मेरी ज़ुबाँ तक आ गए

.

हम को भी इक गुलबदन की चाह थी

हम भी कू-ए-गुलिस्ताँ तक आ गए

.

मंज़िल-ए-मक़सूद भी दिखने लगी

हम जो मीर-ए-कारवाँ तक आ गए

.

याद आया जब हमें बचपन बहुत

हम… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 15, 2015 at 5:30pm — 7 Comments

सकल धरा पर तेरे रूप का ग्रन्थ लिखूँ

जितनी सुन्दर तुम हो उतने, सुंदर सुंदर छन्द लिखूँ।

जी करता है सकल धरा पर, तेरे रूप का ग्रन्थ लिखूँ ।।



झुकी निगाहें बिखरे गेसू, मन का मौसम सरस हुआ।

जी करता बस देखूँ देखूँ, तेरी छवि का दरश हुआ।।



रिमझिम बरस रहे सावन की, शीतल शीतल बूँद लिखूँ।

जी करता है सकल धरा पर, तेरे रूप का ग्रन्थ लिखूँ।।1।।



टपक रहीं बालों से बूँदें, धुली हुई इक पुष्पलता सी।

खुले अधर पर ठहरी बूँदें, जगी अभीप्सा यहाँ ख़ता की।।



बेसुध कर दे मन को पल में, ऐसी तुझे सुगंध… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 15, 2015 at 11:24am — 10 Comments

पीड़ाओं के इस दलदल में - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

2222    2222    2222    222

******************************

रोने का तुम नाम न लेना रीत बनाओ हँसने की

रोने धोने में क्या रक्खा  होड़ लगाओ हँसने की /1

******

माना पाँव धँसे हैं कब से पार उतरना मुश्किल है

पीड़ाओं के इस दलदल में गंग बहाओ हँसने की /2

******

परपीड़ा में सुख  मत खोजो ये पथ घेरे वाला है

दूर तलक जो ले जाती है राह बताओ हँसने की /3

******

पोंछो आँसू बाढ़ में इसकी खुशियों के घर बहते हैं

निर्जन में भी  यारो  बस्ती…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 15, 2015 at 10:30am — 12 Comments

छणिकाएँ

1.

तू मेरा हमसफ़र है

दुनिया को तो  क्या

तुझे ही  पता नहीं.

2.

अबकी सुबह

होगा  तेरा दीदार

सोचता तो रोज ही हूँ

3.

माँगा  था उसे 

इबादत की तरह 

सुना है इबादत

कभी बेकार नहीं जाती

  

 

4. बड़ी शिद्द्त के बाद

तेरा सामना हुआ

तू तो उम्मीद से आगे

खूबसूरत निकला 

 

5. चलो छोड़ो बहुत हो गया

कोई भला इतनी देर के लिए

भी रूठता है क्या…

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Added by सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा on August 14, 2015 at 6:00pm — 3 Comments

आज़ादी की तलाश

आज़ादी के कई सालों बाद

उसकी तलाश ज़रूरी लगती है .

प्रजातन्त्र की भौतिकवादी

प्रवित्रियो में लिप्त आज़ादी  अधूरी लगती है.

आज़ादी की तलाश  उन बcचो के सपनों में है

जिनका बचपन कलम-किताब छोड़  होटलों में बिकता है

आज़ादी की तलाश  किसानों के खेतों में है

जिनके आखों में पानी  और गले मे मौत है

आज़ादी की तलाश  वेरोज़गार युवीमन में है

जहाँ आखरी डिग्री की आस है

जिससे भूखा पेट भरा जा सके

आज़ादी की तलाश  फूटपाथ पर सोए लोगों…

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Added by दिलीप कुमार तिवारी on August 14, 2015 at 1:30am — 4 Comments

ग़ज़ल इस्लाह के लिए (मनोज कुमार अहसास)

2122 2122 2122 212



लड़खड़ाहट चाहता हूँ मैं संभल जाने के बाद

धूप दिल में चुभ रही है दिन निकल जाने के बाद



सबसे पहला शेर था मैं एक ग़ज़ल की सोच का

और खारिज हो गया था लय बदल जाने के बाद



ठोस उस आधार पर लिपटी थी इक चिकनी परत

खुद से शिकवा कर रहे है हम फिसल जाने के बाद



खुश्क आँखों की ज़ुबा को यूँ समझ लो तुम सनम

ख़ाली बरतन जल रहा है सब उबल जाने के बाद



सर छुपाये फिर रहा था रौशनी में दर-ब-दर

चाँद सा खिलने लगा गम शाम ढल जाने के…

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Added by मनोज अहसास on August 13, 2015 at 9:30pm — 15 Comments

दादी-नानी सँग गए वो - सुलभ

गजल

बहर - 212 1212 1212 1212

काफिया - अर, रदीफ - मियाँ

पत्थरों के जंगलों से भर गए शहर मियाँ

दादी-नानी सँग गए वो सांस लेते घर मियाँ

कल को एक बार आसमान से वो झांक लें !

किस तरह मिला सकोगे पुरखों से नजर मियाँ ?

मत उखड़ ! यही लिहाज कर लिया, बहुत किया

जो नजर बचा के दूर से गए गुजर मियाँ

आग का उफान कौन सा ये इन्कलाब है

लाए किसके वास्ते दहकती दोपहर मियाँ

हमको क्या पता हमारा तो कभी दखल न था

तुम…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 13, 2015 at 8:33pm — 2 Comments

बोध (लघुकथा)

फैंसी ड्रैस का आयोजन था।वृद्धाश्रम के सभी वृद्ध तरह - तरह की वेशभूषा में सजे थे। कोई किसान,कोई सब्जी बेचने वाला,कोई पुजारी ,कोई माली तो कोई संत।

उन्हीं में से एक वृद्धा ने कटोरा हाथ में लिया व अपनी वेशभूषा के अनुरूप वह भीख माँगने लगी।

फैंसी ड्रेस का माहौल ही बदल गया। सबके हाथ पीछे हट गए,आँखे पनीली हो गईं,ह्रदय करूण भाव से भर गया ।सभी के मन के एक कोने में एक पछतावा, एक पश्चाताप सा जाग गया।सब यही सोच रहे थे ओह! ये हमने क्या कर दिया।सबकी संवेदना ने विचारों पर ताला लगा दिया ये दृश्य…

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Added by Mamta on August 13, 2015 at 5:30pm — 8 Comments

बटवारा ( लघुकथा)

बटवारा

“माँजी के सामान पर हम सब का बराबर अधिकार है.” सास की तेरहवीं के दिन ही बड़ी बहू ने कहना शुरू कर दिया. मझली ने भी हाँ में हाँ मिलाई. “हाँ हाँ क्यों नहीं भाभी वैसे भी हम अपने साथ कहाँ कुछ ले जा पाएंगे..” छोटे पुत्र अमर ने कहा तो पत्नी ने खा जाने वाली नज़रों से घूरा.अब तक जो आँगन मेहमानों से भरा था वो घर-गृहस्थी के सामान से भर गया.चांदी के गिलास-प्लेट,पीतल के कलश,बड़े-बड़े थाल, सब आँगन में सज गए. पुराने डिब्बों से लेकर दीवार घड़ियाँ बिस्तर सब छोटा बड़ा सामान आँगन में जुट गया था..

दस… Continue

Added by Seema Singh on August 13, 2015 at 2:38pm — 6 Comments

चेतना की चाभी /लघुकथा / कान्ता राॅय

आज भी आँख खुलते ही रोज की ही तरह सुबह -सुबह इंतज़ार किया उसका । दरवाजा खोला ही था कि सायकिल पर चढा दुबला सा लडका दरवाजे पर चेतना की चाबी फेंक गया । रोज की ही तरह ऐसे लपककर स्वागत किया मानो बरसों से इंतज़ार किया हो उसका । अंदर ले आया और टेबल पर फैला कर परत -दर- परत तहों को खोलता गया ।चेतना मन- पौध खुलकर कुलबुलाती हुई जन्म से परिपक्व होने तक का सफर शनैः शनैः तय करने लगी ।तहें अब अपने आखिरी विराम को पहुँच , मन को गहन चिंतन में डाल ...... चेतना अपने सम्पूर्ण यौवन में स्थापित थी । तभी सहसा घड़ी…

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Added by kanta roy on August 13, 2015 at 2:00pm — 4 Comments

एक बड़ा सवाल (लघुकथा )

स्कूल में मध्यांतर हुआ |सब बच्चे अपने अपने टिफिन बॉक्स लेकर मैदान में जमा थे |रीना बड़े चाव से दादी के हाथ के बने आलू के पराठे खा रही थी |उसकी सहेली कुहू टिफिन खोल कर चुपचाप बैठी थी|

“कुहू जल्दी से टिफिन ख़त्म करो, घंटी बजने वाली है “

“रीना मुझे गणित का सवाल नहीं आया |देखना, मुझे शून्य अंक मिलेगा और घर पर मम्मी की डांट पड़ेगी| “

“हाँ कल मुझे भी नहीं आ रहा था| तुमने नेट पर सर्च किया था?”

“किया था |अर्जुन अकादमी व मैथ्स ऑन लाइन दोनों पर उदाहरण देखे थे |मैं बार बार गलती…

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Added by Manisha Saxena on August 13, 2015 at 1:30pm — 3 Comments

चेप्टर-२ -कुछ क्षणिकाएँ :....

चेप्टर-२ -कुछ क्षणिकाएँ :

1.

वो साकार है या निराकार है

पता नहीं

वो है

मगर दिखता नहीं

फिर भी वो

जीवन का आधार है

शायद उसी को

दुनिया कहती है

ईश्वर



………………............

2.

कितना विचित्र है

हमारा साथ होना

एक लम्बी चुप

सांसें भी निःशब्द

एक दूसरे के वास्ते

भाव शून्यता

पत्थर सा प्यार

दम तोड़ते सात फेरों के वादे

उठायेंगे सात जन्म

जर्जर  होता …

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Added by Sushil Sarna on August 13, 2015 at 12:30pm — 2 Comments

गीत -मेरा देश भारत जवाँ हो रहा है

122122122122

मेरा देश भारत जवाँ हो रहा है

कि बदलाव पल पल यहाँ हो रहा है



नये लोग आये नई बात की है

नये ही विचारों की बरसात की है

बहुत कुछ बदलना,बहुत कुछ है करना

अभी आए हैं बस शुरूआत की है

हम आगे बढ़ेंगे,कदम ना रूकेंगे

सितारों से आगे जहाँ हो रहा है .......



सभी साथ लेकर हम आगे बढ़ेंगे

कि दुर्गम कठिन राह को तोड़ लेंगे

न अब तक हुआ जो वो करके रहेंगे

अगर आप विश्वास हम पर करेंगे

तभी तो हरिक मुश्किलों से लड़ेंगे

नकारात्मक… Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on August 13, 2015 at 10:08am — 5 Comments

वीरो की धरती....

देश भक्ति गीत...01

-----------------------------------------------

वीरो की धरती में हूँ जन्मा

कायरता न करनी है

नब्ज में है खून वीरों का

रक्षा इसकी करनी है

-------------------------------------------------

न्योछावर हो जाना है हँस

तिरंगा हांथों में लिए

वीरो की क़ुरबानी की अब

लाज हमें ही रखनी है

--------------––---------------------------

वीरो की धरती में हूँ जन्मा

कायरता न करनी है…

Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on August 13, 2015 at 9:30am — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - नींद वाली थीं कभी रातें नहीं -- गिरिराज भंडारी

2122 2122 212

आप सीमायें अगर लांघें नहीं

बाड़ हम भी आपकी फांदें नहीं



वो समर के वास्ते तैयार हैं

हाथ मेरे आप यूँ बांधें नहीं



हक़ हलाली की कोई रोटी दिखा

भीख से जी कर तो यूँ नाचें नहीं



शेर बन के सामने आजा कभी

गीदड़ों सी पीठ पर घातें नहीं



चैन खातिर दिन तरसता रह गया

नींद वाली थीं कभी रातें नहीं



दिल पढ़ें , नज़रें पढ़ें , आँसू पढ़ें

अस्लिहा के बाब यूँ बांचें नहीं

अस्लिहा – हथियारों , बाब – अध्याय



आप…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 13, 2015 at 8:30am — 18 Comments

गीत -मेरा देश भारत जवाँ हो रहा है

122122122122

मेरा देश भारत जवाँ हो रहा है

कि बदलाव पल पल यहाँ हो रहा है



नये लोग आये नई बात की है

नये ही विचारों की बरसात की है

बहुत कुछ बदलना,बहुत कुछ है करना

अभी आए हैं बस शुरूआत की है

हम आगे बढ़ेंगे,कदम ना रूकेंगे

सितारों से आगे जहाँ हो रहा है .......



सभी साथ लेकर हम आगे बढ़ेंगे

कि दुर्गम कठिन राह को तोड़ लेंगे

न अब तक हुआ जो वो करके रहेंगे

अगर आप विश्वास हम पर करेंगे

तभी तो हरिक मुश्किलों से लड़ेंगे

नकारात्मक… Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on August 12, 2015 at 11:34pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- उछाल के बिजली के तार पर (मिथिलेश वामनकर)

221 2121 1221 212

 

अपनी ख़ुशी उछाल के बिजली के तार पर

रौशन किया है देखिये घर  जोरदार पर

 

आसान लग रहा है अगर तै सफ़र मियां…

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Added by मिथिलेश वामनकर on August 12, 2015 at 11:00pm — 26 Comments

तमीज से गुजर मियाँ - सुलभ

गजल

====

बहर - 212 1212 1212 1212

काफिया - अर, रदीफ - मियाँ

किस्म-किस्म के जहर हैं हमपे बेअसर मियाँ

उम्र बीती आदमी का झेलते जहर मियाँ

दर्द बाँटने अगर तू आया है अवाम का

आसमान से जरा जमीन पर उतर मियाँ

सब तुम्हारे गुम्बदों की शान से सिहर गए

झोपड़ी मेरी तबाह कर गए कहर मियाँ

चाह मंजिलों की थी न जीत की ललक रही

वक्त ही गुजारना था, तय किए सफर मियाँ

अंधड़ों से लड़ता एक दीप मिल ही जाएगा

देख अपने…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 12, 2015 at 6:39pm — 17 Comments

ग्रीटिंग कार्ड (लघु कथा)......

 ग्रीटिंग कार्ड (लघु कथा).......

आज सुशील अपने बेटे के बर्थडे पर बहुत खुश था। कवि होने के नाते उसने अपने पितृभाव को तो कागज़ पर उतार दिया था लेकिन फिर भी सोचा कि इसके साथ अगर एक ग्रीटिंग कार्ड भी दे दिया जाए तो बेटा खुश हो जाएगा। ग्रीटिंग कार्ड की बड़ी सी शॉप में जाकर वो कार्ड देखने लगा। कुछ देर के बाद दुकानदार ने पास आकर कहा '' सर, क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूँ। '' सुशील ने युवा जोड़ों की भीड़ में सकपकाते हुए कहा '' अरे हाँ , देखिये दरअसल मुझे बाप द्वारा बेटे को बर्थडे पर दिए…

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Added by Sushil Sarna on August 12, 2015 at 3:50pm — 22 Comments

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