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फागुन का मास

फागुन का मास

तारों की बारात

चाँदनी के रथ पर

आएगा मोहन

यमुना के तीर

होके अधीर, में तो उसकी हो जाऊँगी ।

श्यामल सा मनोहर गात

पीला सा सिर पर पाग

कानों में कुंडल

अधरों पे मोती

धरे तिरछा पैर

छोड़ सब की खैर, मै तो चरणन में गिर जाऊँगी ।

होंठों की शान

प्यारे की मुस्कान

मीठी सी चितवन

सखियों का लूटे मन

कर के सब जतन, मै तो उनकी हो जाऊँगी ।

माँ यशोदा का…

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Added by kalpna mishra bajpai on March 2, 2014 at 2:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल

वो होगा जो कभी न हुआ, देखते रहो 

इक दिन खुलेगा बाबे वफा, देखते रहो ...

जो शख्स मुझ से रूठ गया है वो दोस्तो

आएगा मुसकुराता हुआ, देखते रहो....

ज़िंदाने ग़म में जिसने मुझे कैद कर दिया 

वो ही करेगा मुझ को रिहा , देखते रहो...

अशकों से कैसे बनते हैं मेरी ग़ज़ल के शेर 

लिक्खेगी मेरी नोके मिज़ा देखते रहो ...

फूलों में कौन भरता है ये रंगो बू अजय …

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Added by Ajay Agyat on March 2, 2014 at 2:00pm — 6 Comments

मैदानी हवाएँ .... (विजय निकोर)

मैदानी हवाएँ

 

 

समेट नहीं पाती हूँ चाह कर भी  कभी

अनमनी यादों की चँचल-सी धारा-गति

लौट-लौट आते हैं दर्द भरे धुँधले

अधबने अधजले सपने

छिपाए न छिपें अर्थहीन समर्थों से अश्रु मेरे

क्यूँ आते हो जगा जाते हो तुम आन्दोलन,

इस अथाह सागर में प्रिय रोज़ सवेरे-सवेरे ?

 

हो दिन का उजाला

भस्मीला कुहरा

या हो अनाम अरूप अन्धकार

तुम्हारी यादों का फैलाव पल-पल

स्वतन्त्र मैदानी अनदिखी…

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Added by vijay nikore on March 2, 2014 at 1:00pm — 17 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हर रास्ता दुश्वार होगा ( ग़ज़ल ) गिरिराज भन्डारी

2122    2122   2122  2122

गर यक़ीं ख़ुद पर नहीं हर रास्ता दुश्वार होगा

ख़्वाब मे भी फूल देखोगे वहाँ पर खार होगा

 

बात बाहर जब गई है तो कोई गद्दार  होगा

कल्पनाओं से ही तो छपता नही अखबार होगा

 

चौक में जो रात को चिल्ला रहा था बात…

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Added by गिरिराज भंडारी on March 2, 2014 at 10:00am — 24 Comments

कविता -( बात ही बात है)

बात ही बात है

हर जगह बात है

हवा थक चुकी है

बात ही बात से,

बूँदों को बार बरसना पड रहा है

ताकि उसकी तरफ भी कोई देखे,

लेकिन लोगों को बात से फुरसत नहीं है।

बात को बात से लडाया जा रहा है

बात किसी को नहीं देख पा रही है

कौन उसका है,और कौन पराया है

बात लोगों से नाराज है।

बात ही बात से।

लोगों के दिमाग़ पर छाई है बात

बात लोगों से तंग है

लोग बातों से तंग हैं

ये वर्तमान में जीने के…

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Added by सूबे सिंह सुजान on March 1, 2014 at 11:30pm — 9 Comments

कविता : विकास का कचरा और कचरे का विकास

शराब की खाली बोतल के बगल में लेटी है

सरसों के तेल की खाली बोतल

 

दो सौ मिलीलीटर आयतन वाली

शीतल पेय की खाली बोतल के ऊपर लेटी है

पानी की एक लीटर की खाली बोतल

 

दो मिनट में बनने वाले नूडल्स के ढेर सारे खाली पैकेट बिखरे पड़े हैं

उनके बीच बीच में से झाँक रहे हैं सब्जियों और फलों के छिलके

 

डर से काँपते हुए चाकलेट और टाफ़ियों के तुड़े मुड़े रैपर

हवा के झोंके के सहारे भागकर

कचरे से मुक्ति पाने की कोशिश कर रहे…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 1, 2014 at 11:03pm — 4 Comments

चॉंद मुस्काता रहा हर रात में

तरही गजल- 2122 2122 212

आग में तप कर सही होने लगी।

प्यार में मशहूर भी होने लगी।।

जब कभी यादों के मौसम में मिली,

राज की बातें तभी होने लगी।

तुम बहारों से हॅंसीं हस्ती हुर्इं,

आँंख में घुलकर नमी होने लगी।

उम्र से लम्बी सभी राहें कठिन,

पास ही मंजिल खुशी होने लगी।

तुम नजर भी क्या मिलाओगी अभी,

शाम सी मुश्किल घड़ी होने लगी।

चॉंदनी अब चांद से मिलती नहीं,

खौफ हैं बादल…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 1, 2014 at 6:53pm — 6 Comments

अकेलापन

हाय! अकेलापन क्यों?

बोझिल सा लगता है

अकेलापन तो स्वर्णिम क्षण है

अपने आप को जानने का पल है

क्यों मानव इससे घबराए?

यह तो सबका बल है। 

अकेलापन शक्ति देता है…

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Added by kalpna mishra bajpai on March 1, 2014 at 6:00pm — 12 Comments

कह मुकरियाँ 26 से 35 (कल्पना रामानी)

26)

अपने मन का भेद छिपाए।

मेरे मन में सेंध लगाए।

रखता मुझ पर नज़र निरंतर।

क्या सखी साजन?

ना सखि, ईश्वर!

27)

हरजाई दिल तोड़ गया है।

मुझे बे खता छोड़ गया है।

नहीं भूल पाता उसको मन।

क्या सखि साजन?

ना सखि बचपन!

28)

जब से उससे प्रीत लगाई।

थामे रहता सदा कलाई।

क्षण भर ढीला करे न बंधन।

क्या सखि साजन?

ना सखि, कंगन!

29)

जब भी देना चाहूँ प्यार।

बेदर्दी कर देता…

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Added by कल्पना रामानी on March 1, 2014 at 11:30am — 22 Comments

पुष्प की पीड़ा

एक मासूम कली

भंवरे के स्पर्श से

खिल उठी

मुस्काई

हर्षाई

लिया पुष्प सा रूप

एक दिन

भंवरा उसका खो गया

पुष्प का हाल बुरा हो गया

उदास बेचैन पुष्प को चाहिए था

थोड़ा प्यार

थोड़ा दुलार

थोड़ी हंसी

थोड़ी हमदर्दी

जो ना मिल पाई



फिर एक दिन

आया एक भंवरा

जो उसके आसपास मंडराता

उसे तराने सुनाता

उसे खिलखिलाना सिखाता

पुष्प हुआ पुनर्जीवित

उसके प्यार से

दुलार से

पर

चिंतित…

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Added by Sarita Bhatia on March 1, 2014 at 9:30am — 16 Comments

ग़ज़ल- जिंदगी कितनी हंसीं है आओ आकर देख लो

जिंदगी कितनी हंसीं है आओ आकर देख लो

एक पिंजराबंद पंछी को उड़ाकर देख लो



तुम हमें समझा रहे हो बेवफाई का सबब?

फैसला हो जायेगा नज़रें मिलाकर देख लो



मंजिलें जब पास हों तब और करती हैं भ्रमित

जो न हो विश्वास क़दमों को बढ़ा कर देख लो



हम निहत्थे हैं मगर माँ की दुवाएँ साथ हैं

जीत किसकी, हार किसकी आज़मा कर देख लो



माँ मुझे मालूम है हालात कुछ अच्छे नहीं

हौसला हो जायेगा गर मुस्कुरा कर देख लो



लोग मुझसे पूछते हैं शायरी कैसे… Continue

Added by Anurag Anubhav on March 1, 2014 at 12:20am — 19 Comments

ग़ज़ल..........बृजेश

2122       2122       212 

फाइलातुन   फाइलातुन   फाइलुन

(बहरे रमल मुसद्दस महजूफ)

वृत्ति जग की क्लिष्ट सी होने लगी

सोच सारी लिजलिजी होने लगी

भीड़ है पर सब अकेले दिख रहे 

भावनाओं में कमी होने लगी

चाहना में बजबजाती देह भर 

व्यंजना यूँ प्रेम की होने लगी

धर्म के जब मायने बदले गए 

नीति सारी आसुरी होने लगी

सूखती…

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Added by बृजेश नीरज on February 28, 2014 at 10:31pm — 54 Comments

कुछ कह मुकरियां

१. लगे अंग तो तन महकाए,

जी  भर देखूं  जी में आये,

कभी कभी पर  चुभाये शूल,

का सखी साजन ? ना सखी फूल.

 

 

२. गोदी में सर रख कर सोऊँ,

मीठे मीठे ख्वाब में खोऊँ,

अंक में लूँ, लगाऊं छतिया.

का सखी साजन? ना सखी तकिया .

 

 

३ उससे डर, हर कोई भागे,

बार बार वह लिख कर माँगे.

कहे देकर फिर करो रिलैक्स.

का सखी साजन? ना सखी टैक्स ..

 

४. गाँठ खुले तो इत उत डोले,

जिधर हवा उधर ही हो…

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Added by Neeraj Neer on February 28, 2014 at 8:00pm — 31 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हे माँ श्वेता शारदे , सरस्वती वन्दना (उल्लाला छंद पर आधारित )

सरस्वती वंदना  (उल्लाला छंद पर आधारित )

हे माँ श्वेता शारदे , विद्या का उपहार दे

श्रद्धानत हूँ प्यार दे , मति नभ को विस्तार दे

तू विद्या की खान है ,जीवन का अभिमान है

भाषा का सम्मान है ,ज्योतिर्मय वरदान है

नव शब्दों को रूप दे ,सदा ज्ञान की धूप दे

हे माँ श्वेता शारदे ,विद्या का उपहार दे

कमलं पुष्प विराजती ,धवलं वस्त्रं  शोभती

वीणा कर में साजती ,धुन आलौकिक…

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Added by rajesh kumari on February 28, 2014 at 3:54pm — 13 Comments

मोहब्बत के कलैंडर में कभी इतवार ना आए..

मुक्तक

फकत मेरे ​सिवा तुमको किसी पर प्यार ना आए,

मेरे गीतों में तेरे बिन कोई अशआर ना आए,

मिलन होता रहे तब तक कि जब तक चांद तारे हैं

मोहब्बत के कलैंडर में कभी इतवार ना आए।।

-------------------------------------------

तुम्हारे साथ…

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Added by atul kushwah on February 27, 2014 at 11:00pm — 22 Comments

मैं और मेरा "मन"

मैं आज चिड़ी सी उड़ती फिरती हूँ,

खुद चढ़ अंबर का व्यास नापती हूँ ,

कर दिया किसी ने झन-झन मेरे पर को,

मैं आँखों के दो दीप लिए फिरती हूँ ।

मैं प्रेम-सुधा रस पान किया करती हूँ ,

मैं कभी ना खुद का ध्यान किया करती हूँ ,

जग जाकर पूछे उनसे जो अपनी कहते ,

मैं अपने दिल का गीत सुना करती हूँ ,

मैं सुर- बाला सा, उन्माद लिए फिरती हूँ ,

मैं नए -नए उपहार लिए फिरती हूँ ,

यह मंगलदाई, संसार ना मुझ को भाता ,

मैं खुद की…

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Added by kalpna mishra bajpai on February 27, 2014 at 7:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल - जीत गाएगी थोड़ा सबर कीजिए - पूनम शुक्ला

2122. 1221. 2212





जा चुकी यामिनी मुश्तहर कीजिए

हो सके अब तो थोड़ा सहर कीजिए



भेज दें गंध जो भी हो आकाश में

गुलशनों को कहीं तो खबर कीजिए



हर तरफ आग ही आग जलती तो है

तान सीना उसे बेअसर कीजिए



झूठ की आज चारों तरफ जीत है

सत्यता की कहानी अमर कीजिए



जुल्म की रात हरदम डराती हमें

जालिमों का खुलासा मगर कीजिए



तीरगी घेर ले गर कभी राह में.

अश्क से फिर न दामन यूँ तर कीजिए.



रेत सी जिन्दगी हाथ आती… Continue

Added by Poonam Shukla on February 27, 2014 at 12:05pm — 9 Comments

शिवरात्रि दोहावली

उत्सव भारत देश के ,करें सभी हम गर्व

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी , महाशिवरात्रि पर्व /



फाल्गुन में शिवरात का होता पर्व विशेष

रंगों भरी फुहार से मिटाओ गिले द्वेष /



मध्यरात अवतरित हो धरा रूप सारंग

गले में सर्प हार औ रमे भस्म से अंग/



रूद्र रूप को देख के भर लो ह्रदय उमंग

शिव शक्ति का मिलनदिवस मनाओ प्रेम संग /



सदा ही मिले आपको शिव का आशीर्वाद

शिव के नित उपवास से मिले दुआ प्रसाद /



धतूरे बेलपत्र से, करना कर्म विशेष…

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Added by Sarita Bhatia on February 26, 2014 at 7:34pm — 14 Comments

आयी चंद्रिका धवल..............( अन्नपूर्णा बाजपेई )

चाँदी के रथ पे सवार लिए जीवन नवल 

चिर प्रीतम संग चंद्रिका आयी धवल .............. 

प्रिय सखी निशा संग 

भरती किलकारियाँ 

गगन से धरा तक 

करती अठखेलियाँ 

रूप किशोरी सी चंद्रिका आयी धवल .........

शशि प्रियतम संग

चमचम सितारों वाली 

श्याम चुनरिया ओढ़े  

धीरे धीरे दबे पाँव 

प्रिय सुंदरी सी चंद्रिका आयी धवल ................ 

दुग्ध अभिसिंचित हये 

सभी तरुवर तड़ाग 

मुसकुराती…

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Added by annapurna bajpai on February 26, 2014 at 4:30pm — 9 Comments

बिटिया [कुण्डलिया]

बिटिया ना अपनी हुई कैसा रहा विधान 

राजा हो या रंक की बिटिया सभी समान /

बिटिया सभी समान रहेंगी सदा बेगानी

छोड़ेगी वो गेह रीत पड़ेगी निभानी 

चाहे गेह अमीर या रही गरीब की कुटिया 

सरिता कहती मान पराई होती बिटिया//…

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Added by Sarita Bhatia on February 26, 2014 at 10:27am — 3 Comments

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