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दीवाली पर एक नवगीत

क्यों रे दीपक

क्यों जलता है,

क्या तुझमें

सपना पलता है...?!

हम भी तो

जलते हैं नित-नित

हम भी तो

गलते हैं नित-नित,

पर तू क्यों रोशन रहता है...?!

हममें भी

श्वासों की बाती

प्राणों को

पीती है जाती,

क्या तुझमें जीवन रहता है...?!

तू जलता

तो उत्सव होता

हम जलते

तो मातम होता,

इतना अंतर क्यों रहता है...?!

तेरे दम

से दीवाली हो

तेरे दम

से खुशहाली…

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Added by VISHAAL CHARCHCHIT on October 27, 2013 at 5:00pm — 31 Comments

कवि की चाहत

सूरज की तपिश,

चॅाद की शीतलता,

फूलों की महक,

शब्‍दों से खुशी,

शब्‍दो से रास्‍ते,

दिखाता एक कवि है,

शब्‍दो केा माले में पिरोता,

एक कवि है,

फिर भी गुमनामी की जिन्‍दगी…

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Added by Akhand Gahmari on October 27, 2013 at 10:00am — 6 Comments

ग़ज़ल -निलेश 'नूर'- नहीं चलता है वो मुझ को

1222/ 1222/ 1222/ 1222

.

नहीं चलता है वो मुझ को जो कहता है कि चलता है,

यही अंदाज़ दुनियाँ का हमेशा मुझ को खलता है.

***

सलामी उस को मिलती है, चढ़ा जिसका सितारा हो,

मगर चढ़ता हुआ सूरज भी हर इक शाम ढलता है.

***

न तुम कोई खिलौना हो, न मेरा दिल कोई बच्चा,

मगर दिल देख कर तुमको न जाने क्यूँ मचलता है.

***

किनारे है…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 27, 2013 at 8:30am — 12 Comments

गीत (रिश्ते नाते हारे)

गीत (रिश्ते नाते हारे)

गया सवेरा, ख़त्म दोपहर, ढली सुनहरी शाम,   

आँखें ताक रहीं शून्य, और मुँह में लगा विराम,

गीत, गज़ल ख़ामोश खड़े औ कविता हुई उदास,

जब सबने छोड़ा साथ,…

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Added by Sushil.Joshi on October 27, 2013 at 7:48am — 16 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
दीपावली (नवगीत) // -- सौरभ



सामने

द्वार के

तुम रंगोली भरो   

मैं उजाले भरूँ

दीप ओड़े हुए.. .



क्या हुआ

शाम से

आज बिजली नहीं

दोपहर से लगे टैप…

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Added by Saurabh Pandey on October 27, 2013 at 1:00am — 30 Comments

बाज़ार में स्त्री

छोड़ता नही मौका

उसे बेइज्ज़त करने का कोई



पहली डाले गए डोरे 

उसे मान कर तितली 

फिर फेंका गया जाल 

उसे मान कर मछली 

छींटा गया दाना

उसे मान कर चिड़िया



सदियों से विद्वानों ने 

मनन कर बनाया था सूत्र 

"स्त्री चरित्रं...पुरुषस्य भाग्यम..."

इसीलिए उसने खिसिया कर 

सार्वजनिक रूप से 

उछाला उसके चरित्र पर कीचड...…

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Added by anwar suhail on October 26, 2013 at 8:30pm — 10 Comments

कुण्डलिया

रावण अंतस में जगा ,करता ताण्डव नृत्य
दमन करें इसका अगर फैले नहीं कुकृत्य/
फैले नहीं कुकृत्य ,सख्त कानून बनायें
पूजनीय हो नार,इसे सम्मान दिलायें
करना ऐसे काम ,धरा हो जाए पावन
अंतरमन हो शुद्ध, नहीं हो पैदा रावण //

...................................................

..........मौलिक व अप्रकाशित...............

Added by Sarita Bhatia on October 26, 2013 at 6:00pm — 6 Comments

दिगपाल छंद

(दिगपाल छंद विधान:- यह छंद 24 मात्रायों का, जिसमें 12 -12 में यति के साथ चरण पूर्ण होता है)

तजि अधर्म,कर्म,सुधर्म कर,
गीता तुझे बताए I 
हों शुद्ध,बुद्ध,प्रबुद्ध सब,
निज धर्म को न भुलाए I I 

धर नव नीव स्वधर्म की,
शिव ही सत्य मानिए I 
छोड़ सकल लोभ मोह,
ऒम ही सर्व जानिए I I

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Devendra Pandey on October 26, 2013 at 3:00pm — 18 Comments

प्रतिबिंम्‍ब

चॉदनी रात में

खुले आसमान में

विचरण करते चॉंद को देख रहा था

कितना निश्‍चल कितना शांत

चला जा रहा है अपने रस्‍ते

पर प्रकाश से प्रकाशमान पर

ना ईष्‍या ना कुंठा,ना हिनता

प्रकाश दाता के अस्‍त पर

बन कर प्रतिबिम्‍ब उसका

अंधेरे को दूर कर उजाले के

लिये सदैव प्रत्‍यनशील

भले रोक ले आवारा बादल

उसका रास्‍ता

छुपा ले प्रकाश उसका

मगर फिर भी प्रत्‍यन कर

बादलो से निकल कर

पुन: धरती को, अंबंर को, मानव को…

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Added by Akhand Gahmari on October 26, 2013 at 10:30am — 6 Comments

फुलमनी

रांची का रेलवे स्टेशन.

फुलमनी ने देखा है

पहली बार कुछ इतना बड़ा .

मिटटी के घरों और

मिटटी के गिरिजे वाले गाँव में

इतना बड़ा है केवल जंगल.

जंगल जिसकी गोद में पली है…

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Added by Neeraj Neer on October 26, 2013 at 9:30am — 20 Comments

चोरी (लघु कथा)

“इन्सपैक्टर साहब, मैं तो कहती हूँ कि हो न हो मेरे गहने मेरी सास ने ही चुराए हैं..... बहुत तिरछी नज़र से देखती थी उनको...... अब सैर के बहाने चंपत हो गई होगी उन्हें लेकर।“ – बड़े गुस्से में रौशनी ने कहा

वहीं रौशनी का पति दीपक चुपचाप खड़ा था।

इससे पहले की इन्सपैक्टर साहब कुछ कहते रौशनी की सास घर वापस लौटती दिखी। अपने घर पर भीड़ देखकर वे कुछ परेशान हुईं और कारण जानकर वे फिर से साधारण हो गईं जैसे कि वे चोर के बारे में जानती हों। अंदर अपने कमरे में जाकर वो दो कड़े और एक चेन लेकर वापस…

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Added by Sushil.Joshi on October 26, 2013 at 6:30am — 26 Comments

दोहे -७ (खिचड़ी)

लोभ कपट को त्यागकर ,रखो परस्पर नेह !

शुद्ध विचारों से करो ,शीतल अपनी देह !!१

याचक भी राजा बना ,राजा मांगे भीख !

काल चक्र से भी तनिक ,ले लो भाई सीख !!२

इतना तुम क्यूँ रो रहे ,भाई घोंचू लाल !

किसने पीटा आपको ,गाल दिखे हैं लाल!!३

अधर तुम्हारे पुष्प से ,मेरे प्यासे नैन !

जिस दिन तुम दिखती नहीं ,रहता हूँ बेचैन !!४

उन्हें देख जलने लगा ,मन का बुझा चिराग !

शनै: शनै: अब फैलती ,पूरे तन में आग…

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Added by ram shiromani pathak on October 25, 2013 at 6:51pm — 24 Comments

गजल : इश्क में हम यूं हद से गुजर जायेंगे

बह्र-ए-मुतदारिक-मुसम्मन-सालिम

फाइलुन-फाइलुन-फाइलुन-फाइलुन

२१२.....२१२.....२१२.....२१२



इश्क में हम यूं हद से गुजर जायेंगे

आओगे पीछे पीछे जिधर जायेंगे



आजमाने की खुद को जरूरत नहीं

जादू जब चाह लें तुम पे कर जायेंगे



चाहने वाले तुमको कई होंगे पर

एक हम होंगे जो हँस के मर जायेंगे



जो सहारा तुम्हारा मिला जानेमन

तो अमर हम मुहब्बत को कर जायेंगे



हम तो 'चर्चित' हैं पहले से ही इश्क में

अब तुम्हें साथ चर्चित यूं…

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Added by VISHAAL CHARCHCHIT on October 25, 2013 at 6:38pm — 16 Comments

तुम्हारी मुझे जुस्तजू न होती...

 बेहतर था

कुछ कमी न होती,

आँखों में

यूँ नमी न होती...

तुम न आते गर

‘’जान ‘’यूँ

अधूरी न होती...

बंद ही रहता

अँधेरा कमरा,

रौशनी की

फिर गुंजाइश न होती...

न देखते सपने

न पंखों की

उडान होती...

फूंका न होता

दिल अपना,

तुम्हारी हाथ सेकने की

जो फरमाइश न होती...

तुम्हारा ख्याल ही जो

झटक दिया होता,

मेरे प्यार की

फिर पैमाइश न होती...

प्यार न…

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Added by Priyanka singh on October 25, 2013 at 6:27pm — 21 Comments

क्षणिकाएं(राम शिरोमणि पाठक)

१-मीठा ज़हर

आज फिर खाली हाथ लौटा घर को

मायूसी का जंगल उग आया है

चारों तरफ

फिर भी मै

हँस के पी जाता हूँ दर्द का मीठा ज़हर

२- एहसान

एक एहसान कर दो

जाते जाते

समेट कर ले जाओ अपनी यादें ।

आज जी भर कर सोना है मुझे

३-महान

सम्मान बेचकर भी

ह्रदय अब तक स्पंदित है

आप महान हो

४-तकिया

अब बहुत अच्छी नींद आती है मुझे

पता है क्यूँ?…

Continue

Added by ram shiromani pathak on October 25, 2013 at 4:30pm — 32 Comments

ग़ज़ल : वो पगली बुतों में ख़ुदा चाहती है

बह्र : फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

 

मेरे संगदिल में रहा चाहती है

वो पगली बुतों में ख़ुदा चाहती है

 

सदा सच कहूँ वायदा चाहती है

वो शौहर नहीं आइना चाहती है

 

उतारू है करने पे सारी ख़ताएँ

नज़र उम्र भर की सजा चाहती है

 

बुझाने क्यूँ लगती है लौ कौन जाने

चरागों को जब जब हवा चाहती है

 

न दो दिल के बदले में दिल, बुद्धि कहती

मुई इश्क में भी नफ़ा चाहती है

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 25, 2013 at 1:50pm — 25 Comments

कुण्डलिया

रावण जितने देश में घूम रहे हैं आज
हर बाला सहमी हुई, फैला रावण राज
फैला रावण राज, माँ बहनों को बचाओ
कपटी, नेता, भ्रष्ट ,जेल इन्हें पहुँचाओ
नहीं जमानत होय, बेल लें पापड़ कितने
घूम रहे हैं आज देश में रावण जितने //

.............मौलिक व अप्रकाशित ........

Added by Sarita Bhatia on October 25, 2013 at 1:38pm — 15 Comments

इक शख़्स इस हयात का नक़्शा बदल गया

इक शख़्स इस हयात का नक़्शा बदल गया।

दिल के चमन का रंगो बू सारा बदल गया॥

सोचा था अब न प्यार करेगा किसी से दिल,

उससे मिला तो सारा इरादा बदल गया॥

महफिल में हो रही थी उसी की ही गुफ़्तगू,

देखा उसे तो सबका ही चेहरा बदल गया॥

जबसे उसे सहारा किसी और का मिला,

उस दिन से बातचीत का लहज़ा बदल गया॥

अब रात दिन ख़यालों में ख़्वाबों में है वही,

अंदाज़ मेरे जीने का सारा बदल गया॥

आए गए हज़ार मगर कुछ नहीं…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on October 25, 2013 at 1:00am — 16 Comments

दीपावली : एक

घर में वह नोट कितना बड़ा लग रहा था , मगर बाज़ार में आते ही बौना हो कर रह गया । वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या खरीदें , क्या न खरीदें । मुन्ना निश्चय ही पटाखे - फुलझड़ियों का इंतज़ार कर रहा होगा । उसकी बीवी खोवा, मिठाई , खील- बताशे और लक्ष्मी - गणेश की मूर्तियों की आशा लिए बैठी होगी, ताकि रात की पूजा सही तरीके से हो सके ।



वह बड़ी देर तक बाज़ार में इधर उधर भटकता रहा । शायद कहीं कुछ सस्ता मिल जाए । मगर भाव तो हर मिनट में चढ़ते ही जा रहे थे । हार कर उसने कुछ भी खरीदने का इरादा छोड़ दिया ।…

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Added by ARVIND BHATNAGAR on October 24, 2013 at 9:00pm — 23 Comments

शाम

मैं लेटा हूँ घास पर / सूखी भूरी घास 

जिसके होने का एहसास भर है

 

जमीन गरम है

लेकिन लेटा हूँ 

धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी

तपन की अनुभूति

 

उड़े जा रहे हैं

पंछी एक ओर 

शरीर के नीचे

रेंगती चींटियाँ 

पास ही खेलते कुछ बच्चे 

कुछ लोग भी

इधर-उधर छितरे, घूमते-बैठे

 

मैं निरपेक्ष

लेटा तकता आसमान

कि कभी टूटकर गिरेगा

और धरती का

रंग बदल जाएगा

             …

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Added by बृजेश नीरज on October 24, 2013 at 8:00pm — 29 Comments

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