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फागुनी दोहे " होली 2013 " -

दस फागुनी दोहे  " 2013 "

तेरी ही खातिर सजे रंग अबीर के थाल ,

तेरे आने से हुई मेरी होली लाल ।

रंग पर्व में घुल गए इंतज़ार के रंग ,

होली सच में शोभती अपनों के ही संग ।

सरसों टेसू और पलाश हैं बसंत के दूत ,

रंग रूप से कर रहे मादकता आहूत ।

लज्जा तेरा रंग है मेरा रंग संकोच ,

ऐसे में…

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Added by Abhinav Arun on March 25, 2013 at 9:30am — 14 Comments

कुछ ख़ास लिए आई होली

कुछ ख़ास लिए आई होली 

मौसम भी अब रुख बदल रहा 
कभी सर्द  लगा , कभी गर्म रहा 
बेमन सा सब ,बेस्वाद हुआ 
चलते चलते ज्यों ठिठक रहा 
ऐसे में रंग को संग लिए 
उत्साह लिए आई होली ..
दुर्भाव गया ,न भेद रहा 
न क्रोध रहा ,न खेद रहा 
शत्रु भी मिल कर मित्र…
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Added by Lata R.Ojha on March 24, 2013 at 11:30pm — 9 Comments

रंगों के बाज़ार में खड़ी हूँ

रंगों के बाज़ार में खड़ी हूँ सखि !

मेरा घर सूना , आंगन सूना ,

बाग बगीचे , पेड़ पात सूना

दिन रात सूना, सूना मेरा आंचल,

पिया परदेश , संसार मेरा सूना.

होली रंगों की थाल लिये

द्वार खड़ी हँस रही , क्या करूँ सखि !

उदासी मेरा रूप श्रृंगार, हाय !

नौकरी बनी सौतन मेरी.

बिन बादल बरसात होती नहीं,

डाल पर मैना अब गाती नहीं -

उ‌ड़ता है रंग हर कहीं,

कोई रंग मुझको भाता नहीं.

फूलों की बरसात हो रही,

मेरे जूड़े में फूल लगता नहीं -

अंतहीन…

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Added by coontee mukerji on March 24, 2013 at 7:16pm — 5 Comments

मैं हूं मौन!

"मैं हूं मौन!"

मैं कौन हूं ?

मैं हूं मौन!

महिलाओं की चैन लुटती रही

सरे राह।

दामिनी-दिल्ली की अस्मिता बनी

लाचारी।

सड़क पर बिफर गई

बेचारी।

और मैं मोमबत्ती जलाकर देखता रहा!

मैं कायर हूं ? नहीं!

कायरता नहीं मुझमें!

बस उन अबलाओं और अपने घरों की सुरक्षा में

सेंध देखता रहा !

और मैं मौन रहा।1



पुलिस की घूस, ठूंस, लाठी

बेवजह चलते रहे

अविराम!

नौकरशाही घोटाले…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 24, 2013 at 4:35pm — 14 Comments

मंहगाई में होली

(पति पत्नी में मंहगाई को लेकर होली पर नोकझोक)

बलम ना करो बलजोरी

अबके फागुन खेलूंगी ना

तोरे संग मैं होरी .

बलम ना करो बलजोरी .

 

मेरी बात माने नाहीं  

मैं ना मानूंगी तोरी.

बलम ना करो बलजोरी.

बलम ना करो बलजोरी.

 

चांदी की पिचकारी लाओ,

लाओ रंग गुलाबी लाल,

जयपूर से लंहगा लाओ

तब जाकर छुओ गाल.

***********

मंहगाई की मार ने गोरी

जीना किया मुहाल.

पिचकारी मंहगी…

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Added by Neeraj Neer on March 24, 2013 at 11:44am — 8 Comments

लहराती चांदनी

मै हूँ धरती

आसमान पे चाँद

साथ साथ है

....................

शीतल तन

लहराती चांदनी

छटा बिखरी

...................

ठंडी हवाएं

जल रहा बदन

तड़पा जाती

.................

स्नेहिल साथ

अंगडाई प्यार की

बहार आई

..................

रात की रानी

दुधिया चांदनी है

महके धरा

अप्रकाशित एवं मौलिक 

Added by Rekha Joshi on March 23, 2013 at 11:21pm — 4 Comments

'अंश हूं तुम्हारा'

जब जिन्दगी की किनारों की
हरियाली सूख गई हो,
पक्षी मौन होकर
आपने नीड़ों मे जा छुपे हों,
सूरज पर ग्रहण की कालिमा
गहराती ही जा रही हो,
मित्र,स्वजन कंटीली राह में
अकेले छोड़कर चल दिये हों,
संसार की सारी नाखुशी
मेरे ललाट को ढक रही हो,
तब मेरे प्रभु!
मेरे होठों पर हंसी की
उजली किरण बनाए रखना।
मैं अंश हूं तुम्हारा
कायरता को न सौंप देना।।
-विन्दु

Added by Vindu Babu on March 23, 2013 at 11:11pm — 8 Comments

चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें- द्वितीय खंड (2)

गंगा, (ज्ञान गंगा व जल  गंगा) दोनों ही अपने शाश्वत सुन्दरतम मूल  स्वभाव से दूर पर्दुषित व  व्यथित,  हमारे काव्य नायक 'ज्ञानी' से संवादरत हैं। 

अब यह सर्वविदित है कि मनुष्य की तमाम विसंगतियों, मुसीबतों, परेशानियों   का कारण उस का ओछा ज्ञान है जिसे वह अपनी तरक्की का प्रयाय मान रहा है. इसी ओछे ज्ञान से मानव को निकालना और सही व ज्ञानोचित अनुभूति का संप्रेष्ण करना अब ज्ञानि का लक्ष्य है. इस के लिये उस ने मानवीय अधिवासों में जा कर प्रवचन देने का मन बना लिया है.

प्रस्तुत…

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Added by Dr. Swaran J. Omcawr on March 23, 2013 at 1:30pm — 2 Comments

मत्तगयन्द संग होरी.

लाल ललाम ललाट लिए,

ललि लागत है ललना अति गोरी,

 

      गाल गुलाल गुबार गुमा,

      गम गौण गिनावत है यह होरी,

 

            नाच नचावत नाम…

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Added by Ashok Kumar Raktale on March 22, 2013 at 10:44pm — 7 Comments

छन्द

1.किरीट सवैया



कोमल कोपल आमन बीचल, बैठि गयी धुन ताल सुनावत !

आय गयो फिर पीत बसन्तम, प्यार रसाल अलाप लुभावत!!

बागन बीच उड़े तितली मधु, बालक भांवर सो इतरावत !

फूल हँसे विहसे तन औ मन,‘सत्यम‘ ज्ञान विराग लुटावत!!

2.दुर्मिल सवैया



जब कन्त नहि हमरे घर मा, यहु बैरन कोकिल छेड़ रही !

फल फूल फले बगिया वनमा, पिक काक तिलेर चिढाये रही!!

ऋतुराज भले तुम जार मरो, वन .केसर. टेसु जलाय रही!

फिर काम रती धनुवा न चलो, महदेव उमा समुझाय रही!!…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 22, 2013 at 8:12pm — 6 Comments

मनहरण घनाक्षरी /होली

होली के शुभ कामनाओं और बधाई सहित 

रंग की उमंग में है या है भंग की....... तरंग,

मौसम की चाल में है लहरें...........गज़ब की…

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Added by seema agrawal on March 22, 2013 at 7:46pm — 11 Comments

बर्फ (ग़ज़ल)

हल्की फुलकी ग़ज़ल पेश है दोस्तों



बर्फ दिल में जब जमी होती,

तभी आँखों में नमी होती।



धुँआ उठता जब आग जलती,

हवा चलती कब थमी होती।



फकत मिलते हाथ हाथों से,

दिलों में दूरी बनी होती।



हसीं मौसम देख मत इतरा,

ख़ुशी गम की भी सगी होती।…

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Added by rajinder sharma "raina" on March 22, 2013 at 5:30pm — 2 Comments

"प्यारे बच्चे "

कपोल पुष्प 

अधर पंखुडियां

मनमोहिनी 

तोतली बोली

नटखट,चंचल

मन मोहक

खिलखिलाता 

बिगड़ता बनाता 

बच्चे प्यारे है…

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Added by ram shiromani pathak on March 22, 2013 at 5:04pm — 1 Comment

"बैठक"

याद है

वो अपना दो कमरे का घर

जो दिन में

पहला वाला कमरा

बन जाता था

बैठक !!

बड़े करीने से लगा होता था

तख्ता, लकड़ी वाली कुर्सी

और टूटे हुए स्टूल पर रखा…

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Added by Amod Kumar Srivastava on March 22, 2013 at 4:30pm — 4 Comments

खोखले नारे उठाए/भागता जाता शहर है (राजेश झा)

काग़जी

सारी कवायद

बोल में

रेशम-तसर है

*गुंजलक में

कै़द वादों

से हकीकत

मुख्‍तसर है

खोखले नारे उठाए ...............

*कर्दमी

लोबान जलते

टापता

दूभर डगर है

बेरूखी

कहती हवा की

फाग कितना

बेअसर है

खोखले नारे उठाए ...............

स्‍तब्‍ध

चंपा, नागकेसर

बर्खास्‍त सेमल

की बहर है

बिलबिलाते

नीम, बरगद

*भवदीय भौंरा

ही निडर…

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Added by राजेश 'मृदु' on March 22, 2013 at 1:43pm — 5 Comments

मन ना कभी उदास होगा, हरदम रहेगा वहाँ सवेरा।

(मौलिक और अप्रकाशित रचना)



पूरब से उदित हुआ, दिनकर सबका जीवनदाता।

अंगङाई लेते पक्षी जागे, कोई सो न रहता।।



अरुण की लालिमा फैली, तम तज धरा भागा।

मुर्गा बोला तजो बिस्तर, कर्म प्रवृत हों सब जागा।।



गोरैया चहकी लगी फुदकने, आँगन में वो आकर।

टुकुर-टुकुर ताके वो, माँ के हाथ के दानों पर।।



रोज आना नियम उसका, नहीँ कभी वो भूलती।

इंतजार अगर करना पङे उसको, शोर मचाती हुई चीखती।।



दाना चुगती रोटी खाती, मजे से फिर वो खेलती।

पेट भर जाता… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 22, 2013 at 11:49am — No Comments

गज़ल/ अनजान रहा अक्सर

दीदार का बस तेरे अरमान रहा अक्सर

इस प्यार से तू मेरे अनजान रहा अक्सर

 

बाजार में दुनिया के हर चीज तो मिलती है

तेरे हबीबों में भी धनवान रहा अक्सर

 

जिस वक्त दुनिया में था घनघोर कहर बरपा

उस…

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Added by बृजेश नीरज on March 22, 2013 at 11:29am — 12 Comments

फा+गुन का मौसम

फा+गुन का मौसम

 

फा=फाल्गुन खेलते

गुन=गुनगुनाने का मौसम

-लक्ष्मण लडीवाला                   

 

ऋतुओं में ऋतू राज बसंत,

बसंत में फाल्गुन मास-

माह में भी होली ख़ास,  

गाँव गाँव खिलते, महकते 

चहुँ ओर खेतो…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 22, 2013 at 10:00am — 12 Comments

ग़ज़ल : अब तो मक्खी यहाँ कोई भी निगल जाता है

बहर : २१२२ ११२२ ११२२ २२

 ----------------------------------------------

भिनभिनाने से तेरे कौन बदल जाता है

अब तो मक्खी यहाँ कोई भी निगल जाता है

 

यूँ लगातार निगाहों से तू लेज़र न चला

आग ज्यादा हो तो पत्थर भी पिघल जाता है

 

जिद पे अड़ जाए तो दुनिया भी पड़े कम, वरना

दिल तो बच्चा है खिलौनों से बहल जाता है

 

तुझ से नज़रें तो मिला लूँ प’ तेरा गाल मुआँ

लाल अख़बार में फौरन ही बदल जाता है

 

थाम लेती है…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 22, 2013 at 12:14am — 8 Comments

‘‘मैं बाहर थी”

जब तुम बुझा रहे थे अपनी आग,

मै जल रही थी.

मैं जल रही थी  पेट की भूख से,

मैं जल रही थी माँ की बीमारी के भय से,

मैं जल रही थी बच्चों की स्कूल फीस की चिंता से .

जब तुम बुझा रहे थे अपनी आग,

मै जल रही थी.

*******

मैं बाहर  थी

जब तुम मेरे अंदर प्रवेश कर रहे थे

मैं बाहर  थी

हलवाई की दुकान पर.

पेट की जलन मिटाने के  लिए

रोटियां खरीदती हुई.

मैं बाहर  थी ,

दवा की दुकान पर

अपनी अम्मा के…

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Added by Neeraj Neer on March 21, 2013 at 10:31pm — 10 Comments

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