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दोहा --:ःबम-बम भोलेःः--

दोहा --:ःबम-बम भोलेःः--


तन मन भय रगड़ भसम, सब गण करत बखान!
कण कण सत रज तम रमत,समरथ सकल इशान!!1

चरण कमल रज लख करत,शत शत नमन महेश!
भजत भजन हर हर भवम, भय तज मरम गणेश!!2

सगर-तगड़-तरवर-तरन, हर जन धरत परान!
अलख झलक नर मन समझ,पल क्षण बनत महान!!3

जनत झरत लट पट उड़़त, हलचल अवघड़ जान!
तमस शमन भव भय हरत, सत मन बरगद शान!!4

सत्यम/मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 12, 2013 at 10:30am — 6 Comments

करो कुछ नवनिर्माण

(मौलिक और अप्रकाशित)



अरुणोदय से हुआ

नील गगन लोहित सा

गिरीश्रृगों के मध्य से

ललाट उठा रहा

संदेश दे रहा

जनमानस को

उठो जागो

आलस त्यागो

करो कुछ नवीन

गत दिवस के अनुभव

अपने मानस में पिरोकर

भूलों को सुधारो

अर्द्धकार्य पूर्ण करो

बनो संकल्पवान

अर्द्धविक्षिप्त से

अपूर्ण मत बनो

पूर्ण बनकर

पूर्ण कार्य करो

भरते जैसे नयी उमंग

पक्षी हृदय में

अरुणोदय वेला

भरो निजमानस में

हे मानव!

तुम भी… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 12, 2013 at 9:00am — 10 Comments

नारी (घनाक्षरी)

नारियों के सम्मान में,मिल अभियान करें,
लाज आज देवियों का,देश में बचाइये।
प्रेम की प्रतीक नारी,जीवन सरीक नारी,
माँ-बहन रूप नारी,सकल बचाइये॥
नारियां जो नहीं रहीं,नर भी बचेंगे नहीं,
प्रकृति और पुरुष,रूप को बचाइये।
दुर्गा-भवानी पूजे,घर में बहू को फूँकें,
बेटी-भ्रूण कोख मारें,सृष्टि को बचाइये॥

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 12, 2013 at 7:58am — 5 Comments

ग़ज़ल - जिससे सब घबरा रहे हैं ...- वीनस

हज़रात,

एक और ताज़ा ग़ज़ल आपकी मुहब्बतों के हवाले कर रहा हूँ, लुत्फ़ लें .....

-

-

जो ये जानूं, मुख़्तसर हक आप पर मेरा भी है |

तब तो समझूं, मुन्तज़िर हूँ, मुन्तज़र मेरा भी है |



जिससे सब घबरा रहे हैं वो ही डर मेरा भी है |…

Continue

Added by वीनस केसरी on March 12, 2013 at 3:30am — 8 Comments

पत्थरों के शहर में शीशे का घर मेरा भी है

पत्थरों के शहर में शीशे का घर मेरा भी है।

खौफ़ में साये में जीने का हुनर मेरा भी है॥

क़त्ल, दहशत, बम धमाके, हैं दरिंदे हर तरफ,

वहशतों के दौर…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on March 11, 2013 at 10:30pm — 14 Comments

याद तेरी

ये बहारें ये फिजा सौगात तेरी आ गयी है

चांद ने घूंघट उतारा बात तेरी आ गयी है

 

याद आई, तू न आया, क्या गिला करना किसी से

रात भर आंसू बहाएं बात तेरी आ गयी है

 

इन घटाओं ने न जाने कौन सा जादू किया जो…

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Added by बृजेश नीरज on March 11, 2013 at 10:18pm — 11 Comments

कलियुग मंथन

कलियुग मंथन

कलिकाल अकाल बढ़ा जग मा। अस मात विक्राल हलाहल सा।।

जन जीव अजीव समीर दुःखी । जगती तल अम्बर ताल बसी।।

सब देव अदेव गंधर्ब डरे । ब्रहमा - विशनू - महदेव कहे ।।

अब तो बस एक उपाय करें। गुरू नाम जपें सब राम रटे ।।

जग मा रस गंध सुगन्ध बहे । भजनादि संकीर्तन गूॅज रहे ।।

मन -मान समान धरे उर मा। सतसंग उमंग अनन्य रस मा।।

कह गीत सुनीति कही सुनहीं। पर मान बढ़ाहि बुझाइ सही ।।

इतना कहिके प्रभु जोरि हॅसें । कलि काल सुमीत मिले जिनसे।।

चित शान्ति विचार उठा नभ…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 11, 2013 at 9:56pm — No Comments

यह नारा कमजोर था, नारा नारीखोर-

मौलिक/अप्रकाशित

नारा की नाराजगी, जगी आज की भोर ।

यह नारा कमजोर था, नारा नारीखोर ।

नारा नारीखोर, लगे सड़कों…

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Added by रविकर on March 11, 2013 at 9:04pm — 4 Comments

"गर्मी "

(1)तपता तन
सूरज की किरणें
लाचार जन

(2)धूप का घर
तरुवर की छाया
ठंडी बयार

(3)सभी बेकल
अनुभव करते
उष्ण कम्बल

(4)संध्या हो जाये
रजनी आगमन
सभी मगन

(५) उड़ती जाती
बंद मुठ्ठी में कैद
भाप बनती

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक /अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on March 11, 2013 at 8:45pm — 8 Comments

आत्म साक्षात्कार

       इस सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव ह्रदय में अपने अस्तित्व को लेकर अनेक प्रश्न उठते रहे हैं। 'मैं कौन हूँ' 'इस धरती पर मेरे आगमन का क्या औचित्य है' ' वह कौन है जो इस सम्पूर्ण सृष्टि को नियंत्रित करता है'…

Continue

Added by ASHISH KUMAAR TRIVEDI on March 11, 2013 at 8:30pm — 4 Comments

'सुखद छांव'

मैं श्रमित

जिन्दगी की जद्दोजहद से व्यथित

चली जा रही थी

अज्ञात गन्तव्य की ओर

प्रेममय संवाद सुनकर रुकी

सघन छांव ने दिया ठौर

मतवाली लतिका

तरु के उर पर करती बिहार

गद गद था तरु

जो लतिका बनी गले का हार

तूफां हो या भानु-ताप

थामे थे इक-दूजे का हाथ

मैं 'भाग्यवान ज्यादा',था विवाद का मसला

सुनकर हृदय मेरा मचला और बोला-

मैं धन्य तुम दोनों से कहीं अधिक हूं

शीतल छांव का भाजक एक पथिक हूं

त्याग समर्पण प्रीति के प्राण हैं

चैन… Continue

Added by Vindu Babu on March 11, 2013 at 6:27pm — 9 Comments

दुनिया है रंगों का मेला (चौपाई गीत)

आदरणीय गुरुजनवृंद सादर नमन!यथा सम्भव प्रयास के बाद में ओ.बी.ओ महोत्सव में मैं अपनी उपस्थिति नहीं हो सका,जिसका मुझे हार्दिक कष्ट है।बंगलौर से एक सेमिनार के बाद अभी घर पहुँच रहा हूँ।हालांकि अब तो आयोजन में शामिल नहीं हो सकता किन्तु उसी पृष्टभूमि में एक चौपाई गीत प्रस्तुत कर रहा हूं-

*****************************

दुनिया है रंगों का मेला।

कितना उजला कितना मैला॥



जीवन ने बहु रंग दिखाया।

बचपन अरुण रंग मन भाया॥

यौवन का वह चटकीलापन।

अल्हड़ मस्ती… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 11, 2013 at 6:17pm — 10 Comments

रंगों की दुनियां

ओ बी ओ महोत्सव २९ - विषय - रंग पर यह कुछ लिख डाला था पर सुबह देखा  कि वह तो सिर्फ १० तारीख तक ही के लिए था जबकि आज तो ११ तारीख है| अब सोचा क्यूँ ना उस विषय की इस पोस्ट को यहाँ ओ बी ओ के ब्लॉग में ही डाला जाए,  तो अब उस आड़ी तिरछी रचना को अपने पन्ने पर रख रही हूँ ...



रंगों की दुनियाँ

इस बीच

मैंने पाया है…

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Added by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on March 11, 2013 at 4:30pm — 12 Comments

छंद और कविता (कुंडलिया)

रचें छंद में काव्य



छंदों में ही बात हो,छंदों में लें सांस।

छंद बद्ध कविता रचें,नित्य करें अभ्यास॥

नित्य करें अभ्यास,शिल्प तब सधता जाये।

लेकिन भाव प्रधान,नहीं इसको बिसरायें॥

अंलकार,रस,छंद,और गुण हो शब्दों में।

वेद मंत्र की शक्ति,निहित तब हो छंदो में॥



कविता को मत ढूढ़िये



कविता तो मिल जायगी,यदि हो कवि की दृष्टि।

जिसका जितना पात्र हो,भर पाता जल वृष्टि॥

भर पाता जलवृष्टि,ठीक कविता ऐसी है।

मन में उठी तरंग,और सरिता जैसी… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 11, 2013 at 3:56pm — 8 Comments

आगंतुक

       

 

    (निराश को आशाप्रद करती रचना)

     

 

         आगंतुक

                                        
मन के द्वंद्वात्मक द्वार पर
दिन-प्रतिदिन   दस्तक   देती
ठक-ठक  की वही  एक  आवाज़,
पर दरवाज़े पर खड़ा हर बार
आगंतुक   कोई   और…
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Added by vijay nikore on March 11, 2013 at 12:00pm — 24 Comments

हंसबैंड,

हंसबैंड

बिल शोपिंग का देते –देते, जिसकी ढीली हो गई पेंट

फिर भी हंसते हंसते जो , खुद की बजवाये बैण्ड ...

उसको कहते है हंसबैंड, की भईया कहते है हंसबैंड,

भोर भई जब सोते सोते बीबी बोले डार्लिंग,

देखो बाहर सूरज निकला, हो गई है गुड मार्निग.

यदि…

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Added by बसंत नेमा on March 11, 2013 at 11:30am — 5 Comments

दास्ताने होली

दास्ताने होली (होली के पावन पर्व पर जनहित में जारी)

होली के हुरियारों ने, मुझे पिला दी भंग

अंग अंग में छा गई, भंग की तरंग

गिरते पड़ते जैसे तैसे, वापिस घर मै आया

बाहर खड़े खजहे कुत्ते को, खूब गले लगाया

वो मुझे चाट रहा था, मै उसको चूम रहा था

मदहोश था यारो, मेरा सर घूम रहा था

रंगरंगीली छैलछबीली, वहाँ एक नार खड़ी थी

वो मुझे देखकर मुस्काई, मेरी उससे आँख लड़ी थी

उसकी कातिल मुस्कान ने, मेरे अरमानो को हवा दी

रोमांटिक हुआ…

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Added by Dr.Ajay Khare on March 11, 2013 at 11:00am — 4 Comments

!! टीका !! ’’ढोल गवार शूद्र पशु नारी। यह सब ताड़न के अधिकारी।‘‘

जस गॅवार गुण हीन अज्ञानी। आशा विपरीत सदा दुःख मानी।।

उलटि भजे सुनि कर्म भय ताहू। क्षमा राखि इच्छित फल पाहू।।

ज्यों ढोल मढि़ पोल उर राखा। गावहिं सगुन भवानहि भाषा।।

ढमढम ढोल ताल बिनु बाजा। नटसि नाथ हिय सुर ताल साजा।।

जनम जनम सेवा शूद्र वारे। दुःख दरिद्र त्यों जीवन धारे।।

कबहु न सीस मान अधिकारी। निषाद मित्र शबरी पय वारी।।

ज्यों समाज पशु धन श्री साजे। शत विधि भला असत रस राजे।।

बलि शीशा नर क्षुधा मिटाही। गिघ्द भालु कपि प्रभु जिय माही।

सकल ब्रहम संग रहे…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 11, 2013 at 10:30am — No Comments

होली गीत / मंजरी पाण्डेय

   

रंग गई रंग गई हे री सखी

मैं तो फाग के रंग में रंग गई।

1 - रंग ना गुलाल मै तो शर्म से लाल हुई

पिया घर आये मै आप गुलाल हुई

छेड़ो न छेड़ो न हे

मोहे छेड़ो न छेड़ो न छेड़ो सखी

मै तो अपने पिया रंग रंग गई।

रंग गई .........................

2 - धानी चुनर सरक सरक जाय रही

कान्हे से माथे की दौड़ लगाय रही

पकड़ो न पकड़ो न हे

अरे पकड़ो न पकड़ो न हे री सखी

मैं अपने पिया संग हो ली।

रंग गई…

Continue

Added by mrs manjari pandey on March 11, 2013 at 12:00am — 4 Comments

ॐ .............

Continue

Added by Deepika Mandal on March 10, 2013 at 9:30pm — 6 Comments

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