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लघुकथा: नाक और पेट

एक तो उसके पिता जी के वकालत के दिनों में ही घर की माली हालत ठीक नहीं थी, तिस पर अचानक हुई उस दुर्घटना ने गरीबी में आटा गीला करने का काम किया। घर-गहने बिका देने वाले इलाज़ ने किसी तरह पिता जी की जान तो बचा ली गई लेकिन उनकी रीढ़ की हड्डी टूटने ने ना सिर्फ उन्हें बल्कि घर की अर्थव्यवस्था को ही अपाहिज बना दिया। खेलने-खाने के दिनों में जब उसने सिर पर घर के छः सदस्यों की जिम्मेवारी को मह्सूस किया तो गेंद-बल्ला सब भूल गया। पढ़ाई के साथ-साथ ही कुछ काम करने के बारे में सोचा। वामन पुत्र था और…

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Added by Dipak Mashal on December 17, 2012 at 7:47pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
नवगीत - चाहना // -- सौरभ

छू दो तुम.. . / फिर

सुनो अनश्वर ! 



थिर निश्चल

निरुपाय शिथिल सी

बिना कर्मचारी की मिल सी

गति-आवृति से

अभिसिंचित कर

कोलाहल भर

हलचल हल्की.. .

अँकुरा दो

प्रति विन्दु देह का   

लिये तरंगें

अधर पटल पर.. . !



विन्दु-विन्दु जड़, विन्दु-विन्दु हिम

रिसूँ अबाधित 

आशा अप्रतिम.. .

झल्लाये-से चौराहे पर

किन्तु चाहना की गति …

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Added by Saurabh Pandey on December 17, 2012 at 6:00pm — 29 Comments

मेरा परिचय .

समय से परे, अगर जो कभी हम मिले

अलग से ही कुछ नाम से

अलग से ही रंग-रुप में

क्या तुम मुझे पहचान लोगे?



शायद मेरा स्पर्श या हृदय का स्पन्दन अलग हो,

मेरी बोली, मेरी अभिव्यक्ति अलग हो,

मेरा चेहरा या मेरे भाव अलग हो,

क्या तुम मुझे पहचान लोगे?



गर पवन बन मैं छु लूं तुम्हे,

या वृष्टि बन तुम्हारे रोम-रोम को भिगाउँ ,

नीर…

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Added by Anwesha Anjushree on December 17, 2012 at 5:00pm — 7 Comments

क्यूँ सड़क पर बीनते हो पन्नियाँ



हास्य कहाँ कहाँ से निकलता है मुझे स्वयं यकीन नहीं होता



अब देखिये



सेठ जी ने सड़क पे पन्नी बीनते बच्चे से संवेदना भरे स्वर में पूछा



क्यूँ सड़क पर बीनते हो पन्नियाँ

मिल नहीं पाती है जब चवन्नियाँ

काम कर लो घर पे मेरे तुम अगर

रोज मिल जाएँगी कुछ अठन्नियां



लड़का बोला



जेब से सबकी चुरा चवन्नियां

हमको दोगे आप कुछ अठन्नियां

चोर के घर काम करना पाप है

उससे बेहतर है उठाना पन्नियाँ



आप भी मेहनत करो अब सेठ…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 17, 2012 at 3:59pm — 7 Comments

लघुकथा : पारदर्शी तंत्र

“तंत्र को पारदर्शी करो, तंत्र को पारदर्शी करो”। सरकारी दफ़्तर के बाहर सैकड़ों लोगों का जुलूस यही नारा लगाते हुए चला आ रहा था। अंदर अधिकारियों की बैठक चल रही थी। एक अधिकारी ने कहा, “जल्दी ही कुछ किया न गया तो जुलूस लगाने वाले लोग कुछ भी कर सकते हैं”। अंत में सर्वसम्मति से ये निर्णय लिया गया कि तंत्र को पूर्णतया पारदर्शी बना दिया जाय।

कुछ ही दिनों में दफ़्तर की सारी दीवारें ऐसे शीशे की बनवा दी गईं जिससे बाहर की रोशनी अंदर न आ सके लेकिन अंदर की रोशनी बाहर जा सके। अब दफ़्तर का सारा काम काज…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 17, 2012 at 3:25pm — 14 Comments

लघु कथा : "अधूरी"

हे ! शुभा तुम बहुत सुंदर हो , तुम्हें फुर्सत में बैठकर उस ऊपर वाले ने बनाया है, इंशा अल्लाह आँखें कितनी सुंदर हैं, ये सब सुनते समझते शुभा उम्र की दहलीज धीरे धीरे पार कर रही थी, ऊपर से जितनी चंचल और शोख अन्दर से कही बहुत शांत बिलकुल झील की सतह की तरह. 

उसकी छोटी बहन की शादी की तैयारियां चल रही हैं शुभा ने अपनी सबसे प्रिय दोस्त सुप्रिया से बताया -क्यों ? वो तो सुंदर भी…

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Added by SUMAN MISHRA on December 17, 2012 at 2:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल - खूब भटका है दर-ब-दर कोई

एक और ग़ज़ल पेश -ए- महफ़िल है,

इसे ताज़ा ग़ज़ल तो नहीं कह सकता, हाँ यह कि बहुत पुरानी भी नहीं है

गौर फरमाएँ



खूब भटका है दर-ब-दर कोई |


ले के लौटा है तब हुनर कोई |



अब पशेमां नहीं बशर कोई…

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Added by वीनस केसरी on December 17, 2012 at 4:17am — 12 Comments

आज चांदनी नहीं अन्धेरा

आज चांदनी नहीं अन्धेरा

खतम हुआ सूरज का फेरा

आधा अधूरा चाँद ना आया

राह पे तम ने जाल विछाया

स्वेद बूँद बस मोती छलका

कदम थका तो ख़तम प्रहर था

कांटे विछे या पुष्प सुरभि हो

मलय तेज या…

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Added by SUMAN MISHRA on December 17, 2012 at 12:30am — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हिम सौंदर्य

अनुपम अद्दभुत कलाकृति है या द्रष्टि का छलावरण

जिसे देख विस्मयाभिभूत हैं द्रग और अंतःकरण

त्रण-त्रण चैतन्य औ चित्ताकर्षक रंगों का ज़खीरा

पहना सतरंगी वसन शिखर को कहाँ छुपा चितेरा

शीर्ष पर बरसते हैं रजत,कभी स्वर्णिम रुपहले कण

जिसे देख विस्मयाभिभूत हैं आँखें और अंतःकरण…

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Added by rajesh kumari on December 16, 2012 at 10:30pm — 11 Comments

सुखी सवैया (सगण x 8 + लघु + लघु ) एक प्रयास.

फिरि आवत जावत जाकर आवत, आवत है ऋतु ठंड कि ये पुनि/

फिरि सुर्य छिपा अरु धुंध बढ़ी, बदली दिखती नभ में बिछि ये पुनि/

सब लोग लिए कर कंपन कुम्पन, तांक रहे नभ में रवि को पुनि/

अरु सुर्य लगे धरती पर से, निकला सुबहा नभ में शशि है पुनि//

Added by Ashok Kumar Raktale on December 16, 2012 at 9:16pm — 3 Comments

हम ही अब लाचार

एक से बढ़कर एक रहे,घोटाले इस बार,
जन जन की यही व्यथा, साँसत में सरकार ।
 
ठप्पा अब यह लग गया, घोटाला सरकार,
मत इनको हमने दिया, हम ही अब लाचार । 
 
अब…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 16, 2012 at 2:25pm — 2 Comments

चांदनी आज फिर विदा होगी.........

एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ ...... गुरुजनों से अनुरोध है कृपया मार्गदर्शन किजिए 



चांदनी आज फिर विदा होगी

रोशनी आज फिर फना होंगी



जब कभी रंग रोशनी होंगे

आपके हाथ में हिना होगी



दर्द दे आज फिर हमें मौला

दर्द की आज इन्तहा होगी



हो गया एक नज़्म का सौदा

शायरी देख कर खफा होगी



चूम लों आँख, सोख लों…

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Added by अमि तेष on December 16, 2012 at 1:30pm — 9 Comments

लड़खड़ाते पांव मेरे - जबकि मैं पीता नहीं

याद में तेरी जिऊँ, मैं आज में जीता नहीं,

लड़खड़ाते पांव मेरे, जबकि मैं पीता नहीं,

नाज़ नखरे रख रखें हैं, आज भी संभाल के,

मैं नहीं इतिहास फिरभी, सार या गीता नहीं,…

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Added by अरुन 'अनन्त' on December 16, 2012 at 12:59pm — 10 Comments

"ग़ज़ल"गर खराबी है तो ये सिस्टम बदलना चाहिए

==========ग़ज़ल============



आ गया है वक़्त सबको साथ चलना चाहिए

दोस्तों दिल में अमन का दीप जलना चाहिए



खून की होली, धमाके, रेप, हत्या देख कर

जम चुका बर्फ़ाब सा ये दिल पिघलना चाहिए



मात देने मुल्क में पसरे हुए आतंक को 

बाँध कर सर…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 16, 2012 at 11:00am — 13 Comments

एक भिक्षुक की याचना .....

मुझे जानो समझो
पर इतना न झकझोरो
कि मैं नग्न हो जाऊं
अपमानित फिरू !

यह जो पाने, न पाने के दायरे है
तुम्ही कहो, इन्हें मैं कैसे तोडू ?
अगर मुझे पूर्ण न कर सको
तो न समझने का भान करो !
पर इतना भी न झकझोरो
कि मैं नग्न हो जाऊं
अपमानित फिरू !
अन्वेषा....
हम सब के ह्रदय में कही न कही एक भिक्षुक छुपा हुआ है !

Added by Anwesha Anjushree on December 16, 2012 at 9:00am — 10 Comments

चर्चा के विषय

ज्यादा क्या कोई फर्क नहीं मिलता

हुक्के की गुड़गुड़ाहटों की आवाज़ में

चाहे वो आ रही हों फटी एड़ियों वाले ऊंची धोती पहने मतदाता के आँगन से

या कि लाल-नीली बत्तियों के भीतर के कोट-सूट से...

नहीं समझ आता ये कोरस है या एकल गान

जब अलापते हैं एक ही आवाज़ पाषाण युग के कायदे क़ानून की पगड़ियां या टाई बांधे

हाथ में डिग्री पकड़े और लाठी वाले भी

किसी बरगद या पीपल के गोल चबूतरे पर विराजकर

तो कोई आवाजरोधी शीशों वाले ए सी केबिन में..

गरियाना तालिबान को,…

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Added by Dipak Mashal on December 15, 2012 at 11:30pm — 7 Comments

हरसिंगार की खुशबू हो तुम

मेरे मन के दरख्त की डाली

झुकी झुकी सी, फूलों सी है

लरज लरज कर बाहों जैसी

याद तुम्हारी कर लेते हैं .

अब यादों की बदली से हम

भीग भीग कर सूख रहे हैं,

एक तुम्हारी चाहत ही है

जिसे अभी तक सींच रहे है

एक अंजुरी नयन नीर से,

एक एक पल जैसे हो पीर से

हर पल हरसिंगार की खुशबू

एक दिलासा मन के तीर (किनारा)…

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Added by SUMAN MISHRA on December 15, 2012 at 10:00pm — 8 Comments

लघु कथा : "अधिकार"

सूरज  बदहवास सा खेतों के मेड़ों पर चला जा रहा था , बचपन में पिता का साया सर से छिन गया था , बहनों की शादी हो चुकी थी, जिनसे उसके उम्र का फासला बहुत था, उम्र अभी १७ वर्ष मगर जिम्मेदारियों का पहाड़ सर पर, गरीबी हो तो इंसान के लिए छोटी छोटी जरूरतें भी पहाड़ जैसी ही लगती हैं. छोटे चाचा ने सारी जमीने अपने नाम करा ली थी..सुरजू,,,,यही नाम था घर में सब प्यार से विषाद…

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Added by SUMAN MISHRA on December 15, 2012 at 9:30pm — 2 Comments

छन्न पकैया : अविनाश बागडे

छन्न पकैया छन्न पकैया ,पढ़ते दांत पहाडा।

खड़ा हुआ है सर के ऊपर , डंडा लेकर जाड़ा।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,पार तभी हो नाव।

सर्द हवा के बीच रात में, जलता रहे अलाव।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,ठिठुर रहें फुटपाथ।

काली कुतिया साथ ठिठुरती,सोती है जो साथ।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,नहीं गल रही दाल।

शीत युद्ध के चलते पहनो,स्वेटर मफलर शाल।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,सड़कें हैं सुनसान।

ऊपर वाले का कर्फ्यू है ,लो अच्छे से जान।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,कहता है…

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Added by AVINASH S BAGDE on December 15, 2012 at 8:30pm — 9 Comments

मेरी चाहत की दुनिया आ के फिर संवार दो

मेरी चाहत की दुनिया आ के फिर संवार दो



ठिठुरती शीत में सिमटी हुई सी रात है

अकेलेपन का गम ये इश्क की सौगात है

विरह ये लग रहा जैसे हृदय आघात है

वक़्त के सामने मेरी भी क्या औकात है



प्रिये तडपाओ न अब और जरा प्यार दो

मेरी चाहत की दुनिया आ के फिर संवार दो



सुबह है शबनमी प्यारी गुलाबी शाम है

हवा के हाथ में कोई तिलिस्मी जाम है

युगल स्वक्छंद फिरते दे रहे पयाम हैं

इश्क करते रहो ये आशिकों का काम है



प्रिये मेरे गले को बाहों का…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 15, 2012 at 4:17pm — 12 Comments

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