बात करियॆ,,,,
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साफ़गॊई सॆ आप यूं, सब सॆ बात करियॆ ॥
जिस सॆ भी करियॆ, अदब सॆ बात करियॆ ॥१॥
बॆ-वज़ह बात करना, भी मुनासिब नहीं,…
Added by कवि - राज बुन्दॆली on February 3, 2012 at 7:30pm — 9 Comments
Added by dilbag virk on February 3, 2012 at 5:30pm — 8 Comments
ग़ज़ल...
Added by AVINASH S BAGDE on February 2, 2012 at 4:30pm — 5 Comments
अभी तक गई नहीं तुम्हारी आदत
Added by rajesh kumari on February 2, 2012 at 11:39am — 11 Comments
कुछ दोहे श्रृंगार के
संजीव 'सलिल'
*
गाल गुलाबी हो गये, नयन शराबी लाल.
उर-धड़कन जतला रही, स्वामिन हुई निहाल..
पुलक कपोलों पर लिखे, प्रणय-कथाएँ कौन?
मति रति-उन्मुख कर रहा, रति-पति रहकर मौन..
बौरा बौरा फिर रहे, गौरा लें आनंद.
लुका-छिपी का खेल भी, बना मिलन का छंद..
मिलन-विरह की भेंट है, आज वाह कल आह.
माँग रहे वर प्रिय-प्रिया, दैव न देना डाह..
नपने बौने हो गये, नाप न पाये चाह.
नहीं सके विस्तार लख, ऊँचाई या थाह..
आधार चाहते…
ContinueAdded by sanjiv verma 'salil' on February 1, 2012 at 10:30pm — 3 Comments
कामनाएँ
साल दर साल रैन बसेरा के साथ मत दो
बस एक ख्याल ही अपना आने दो ।
गगन के विस्तार सा आयाम मत दो
बस एक कोने में सिमटा सूर्य बन रहने दो ।
सावन की हरियाली सा संजीवनी अहसास मत दो
बस एक अमलतास बन मुस्काने दो ।
सर्द रातों में बाहों के घेरे का जकड़न मत दो
बस टिकने के लिए कंधे का सहारा दे दो ।
आँखों में बंद ख्वाबों का आसरा मत दो
बस अपनी एक बेचैन पल का हवाला दे दो ।
दूब की मखमली चादर पर साथ न चलने दो
बस ओस की एक बूँद बन गिर जाने…
Added by kavita vikas on February 1, 2012 at 10:25pm — 3 Comments
Added by Nazeel on January 31, 2012 at 4:30pm — 5 Comments
एक बार मेरे आँगन में कदम रखो श्रीमान ,
फिर समझ में आएगा कितने हो महान ,
एक तस्वीर जिसपे हम वर्षो से फूल चढ़ाते हैं ,
एक तस्वीर ऐसा भी आओ तो तुझे दिखाते हैं ,
मरने वाला मर गया तुम बन गए महान ,
एक बार मेरे आँगन में कदम रखो श्रीमान ,
पार्टी बाजी गुट बाजी उनको हमसे दूर किया ,
आपने उनको बा इज्जत शहीद ऐलान किया ,
फिर मेरे आँगन में उनका पुतला लगा दिया ,
कमाने वाला चला गया हमें मझधार दिया ,
और आप…
Added by Rash Bihari Ravi on January 31, 2012 at 4:00pm — 2 Comments
पास हो मेरे ये कितनी
बार तो बतला चुके तुम !
कौन कहता जा चुके तुम ?
आँख जब धुंधला गई तो
मैंने देखा
तुम ही उस बादल में थे ,
और फिर बादल नदी का
रूप लेकर बह चला था ,
नेह की धरती भिगोता
और मेरी आत्मा हर दिन हरी होती गई !
उसके पनघट पर जलाए
दीप मैंने स्मृति के !
झिलमिलाते , मुस्कुराते
तुम नदी के जल में थे !
जब भी दिल धडका मेरा तब
तुम ही उस हलचल में थे…
Added by Arun Sri on January 31, 2012 at 12:00pm — 6 Comments
चुन चुन कर जमा किये थे
Added by rajesh kumari on January 31, 2012 at 11:00am — 2 Comments
आज महात्मा गांधी जी की पुन्य तिथि पर एक बालकविता प्रस्तुत है:
अपने प्यारे बापू
कितने अच्छे थे अपने बापू
सादा सा जीवन था उनका
लड़े लड़ाई सच की ही वह
ध्यान हमेशा रखा सबका l
हिंसा ना भाती थी उनको
साथ अहिंसा का अपनाया
सबके लिये थी दया-भावना
काम बड़ा करके दिखलाया l
भारत को आज़ाद कराने में
लगा दिया जीवन था सारा
देश छुड़ाया जब अंग्रेजों से
सबसे ऊँचा था उनका नारा l
दुबली-पतली काया थी…
Added by Shanno Aggarwal on January 30, 2012 at 10:30pm — 3 Comments
Added by rajesh kumari on January 30, 2012 at 8:43am — 9 Comments
ज़िन्दगी कॆ रंग,,,,,,,,
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ज़िंदगी कॆ रंग पिचकारी,सॆ सब छूट गयॆ ॥
कैसॆ बतायॆं हम लाचारी, सॆ सब छूट गयॆ ॥१॥
घर, कुआं, खॆत,बगीचा,सब हमारॆ भी…
ContinueAdded by कवि - राज बुन्दॆली on January 30, 2012 at 1:59am — 1 Comment
हाइकू.
Added by AVINASH S BAGDE on January 27, 2012 at 7:03pm — 5 Comments
बीत गए बरस तिरसठ
Added by rajesh kumari on January 26, 2012 at 12:30pm — 10 Comments
हाँ, आज का दिन छुट्टी का दिन l
आजाद देश के पंछी हम
जय हिंद ! वन्दे मातरम् !
सुबह-सुबह उठी जब मुन्नी
बोली मेरी स्कूल से छुट्टी
भैया की कालेज से छुट्टी
पापा की आफिस से छुट्टी
मौज ही मौज है सारा दिन l
हाँ, आज का दिन छुट्टी का दिन l
आजाद देश के पंछी हम
जय हिंद ! वन्दे मातरम् !
निकलेगा जलूस सड़कों पर
देखेंगे टीवी हम मिलकर
हाथों में सधा तिरंगा होगा
भरत नाट्यम डांस भी होगा
होगी तब खूब ताक धिना-धिन l
हाँ, आज का दिन…
Added by Shanno Aggarwal on January 26, 2012 at 4:00am — 4 Comments
उठो साथियों!
Added by AVINASH S BAGDE on January 25, 2012 at 11:41pm — 3 Comments
बहती गंगा मॆं,,,,,
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स्वार्थ की चादर, तानकर सॊयॆ हैं सब ॥
न जानॆ कौन सॆ, भ्रम मॆं खॊयॆ हैं सब ॥१॥
समय किसी का, उधार रखता नहीं है,…
ContinueAdded by कवि - राज बुन्दॆली on January 25, 2012 at 9:23pm — 1 Comment
नाशाद मेरा मिहिर तो जिंदगी वफात है
साँसों के गिर्दाब में इस रूह की निजात है l
साहिर है तेरी कलम में कुछ कमाल का
जैसे खून में भरा हो कुछ रंग गुलाल का l
हर्फों में छुपा रखी है सदियों की बेबसी
तेरे चेहरे पे अब देखती हूँ ना कोई हँसी l
बातों में बेरुखाई अब होती है इस कदर
बेजार सी जिंदगी जैसे बन गई हो जहर l
तासीर न कम होती है होंठों को भींचकर
या बेसाख्ता बहते हुये अश्कों से सींचकर…
ContinueAdded by Shanno Aggarwal on January 24, 2012 at 7:50pm — 9 Comments
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