For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,149)

एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए

थोडा सा मुस्काने से गम हल्का भी हो सकता है

हर पल की तड़पन से दिल को खतरा भी हो सकता है

अक्सर धोखा हो जाता है देर से प्यासी आंखों को

तुम जिसको दरिया कहते हो सहरा भी हो सकता है

मैं तो अपने दिल से ही हर बार शिकायत करता हूं

वो भी मुझको भूल गया हो ऐसा भी हो सकता है

अब तो मैं यह सोच कर उसकी राहों से हट जाता हूं

इन आंखों से उसका दामन मैला भी हो सकता है

लोग तो अपने मन से बस इल्जाम लगाते रहते हैं

जो दरिया…

Continue

Added by मनोज अहसास on December 5, 2018 at 11:30pm — 6 Comments

एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए

221    2121     1221     212

माबूद कह दिया कभी मनहूस कह दिया

उसकी निगाहों ने सदा तस्लीम ही कहा

मुझको ये कैसा दिल दिया तूने मेरे खुदा

जिसको खुशी और गम का सलीका नहीं पता

ओझल नजर से हो गई तस्वीर आपकी

बस इतना होने के लिए क्या-क्या नहीं हुआ

जीवन के सारे हादसे आंखो में आ गए

मुरझा के एक फूल जो मिट्टी में जा गिरा

आया है अब की बार इक दूजे ही रंग में

तन्हाइयों से दर्द का रिश्ता नया…

Continue

Added by मनोज अहसास on December 5, 2018 at 10:53pm — 4 Comments

ख़्याल ...

ख़्याल ...

मैं सो गयी
इस ख़्याल से
कि तेरा ख्याल भी
साथ मेरे सो जाएगा
मगर
तेरा ख़्याल
तमाम शब्
मेरी नींदों से
खिलवाड़ करता रहा
मैं उनींदी सी सोयी रही
उसके लम्स
मेरे ज़ह्न को
झिंझोड़ते रहे
अंततः
सौंप दिया स्वयं को
ख़्याल बनके
उस ख़्याल के हवाले

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 5, 2018 at 6:54pm — 3 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७८

१२१२ ११२२ १२१२ २२ 



कभी तो बख्त ये मुझपे भी मेहरबाँ होगा

मेरी ज़मीन के ऊपर भी आस्माँ होगा //१



गवाह भी नहीं उसका न कुछ निशाँ होगा

जो तेरे हुस्न के ख़ंजर से कुश्तगाँ होगा //२



हम एक गुल से परेशाँ हैं उसकी तो सोचो

वो शख्स जिसकी हिफ़ाज़त में गुलसिताँ होगा //३



ये ख़ल्क हुब्बे इशाअत का इक नतीजा है

गुमाँ नहीं था कि होना सुकूंसिताँ होगा…

Continue

Added by राज़ नवादवी on December 5, 2018 at 3:27pm — 6 Comments

ग़ज़ल

221 2121 1221 212

अच्छी लगी है आपकी तिरछी नज़र मुझे ।।

समझा गयी जो प्यार का ज़ेरो ज़बर मुझे ।।1

आये थे आप क्यूँ भला महफ़िल में बेनक़ाब ।

तब से सुकूँ न मिल सका शामो सहर मुझे ।।2

नज़दीकियों के बीच बहुत दूरियां  मिलीं ।

करना पड़ा है उम्र भर लम्बा सफर मुझे ।।3…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 5, 2018 at 12:34am — 10 Comments

गज़ल -14( खुदा की सारी रहमत इश्क के आँचल में रहती है)

1222-1222-1222-1222



अगर दिल को अदब औ शायरी से प्यार हो जाए

तुम्हें भी इश्क की खुशबू का कुछ दीदार हो जाए //१

मचलते दिल की धड़कन में चुभे जब इश्क का कांटा ।

ख़ुदा से रूह का रिश्ता तभी बेदार हो जाये//२

खुदा की सारी रहमत इश्क़ के आँचल में रहती है

छुपा लो सर को आँचल में हसीं संसार हो जाए//३

फ़ना हो जाए दीवाना जुनूने इश्क़ की ख़ातिर

खुशी से चूमे सूली को ख़ुदा का यार हो जाए//४

ये दिल बेजान वीना की तरह खामोश रहता…

Continue

Added by क़मर जौनपुरी on December 5, 2018 at 12:23am — 7 Comments

हौं पंडितन केर पछलगा -उपन्यास का एक अंश

 जायस के ऊसर में खानकाह बने कई माह बीत चुके थे I किछौछा से आये हजरत खवाजा मखदूम जहाँगीर किसी परिचय के मोहताज नही थे I बहुत जल्द ही उनके पास मुरीदों और मन्नतियों की भीड़ आने लगी i मुहम्मद यद्यपि छोटा था पर वह अक्सर वहाँ जाने लगा i वह बुजुर्ग पीर के छोटे-मोटे काम कर देता I पीर तो उसका भविष्य जान ही चुके थे I  वह भी उसे अपने पोते की तरह मानने लगे I

 एक दिन पीर सफ़ेद भेड़ की उन का लम्बा चोगा पहने अपनी पसंदीदा खानकाह में बैठे थे I उनके चेले और कुछ मजहबपरस्त लोग उन्हें घेरे हुए थे…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 4, 2018 at 8:57pm — 5 Comments

ग़ज़ल - 01

२१२२ २१२२ २१२२ २१२२

दुश्मनी को भूल जाऊँ दोस्ती की बात तो हो

नफरतों को छोड़ भी दूँ इश्क़ के हालात तो हो।…

Continue

Added by Ashish Kumar on December 4, 2018 at 1:30pm — 7 Comments

ओढ़े बुढ़ापा  जी  रहा  बचपन कोई न हो - ( गजल)- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१ २१२१/२२२/१२१२



घर में किसी के और अब अनबन कोई न हो

सूना  पड़ा  हमेशा   ही  आगन  कोई   न  हो।१।



कुछ  तो  सहारा  दो  उसे  हँसने  जरा लगे

होकर निराश  घुट  रहा  जीवन  कोई न हो।२।



झुकना पड़े तनिक तो खुद झुकना सदा ही तुम

यारो  मिलन  की  राह  में  उलझन  कोई न हो।३।



आओ बनायें आज फिर ऐसा समाज हम

ओढ़े बुढ़ापा  जी  रहा  बचपन कोई न हो।४।



जल जाएँ…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 4, 2018 at 12:22pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
लंगडा मज़े में है (हास्य व्यंग ग़ज़ल 'राज')

राजा ये सोचता है कि प्यादा मज़े में है 

प्यादा ये सोचता है कि राजा मज़े में है



लंगड़ा ये सोचता है कि अंधा मज़े  में है 

अंधा ये सोचता है कि लंगड़ा मज़े में है



हर नाज़ नखरे दिल के उठाता है  ज़िस्म ये 

पर दिल ये सोचता है कि गुर्दा मज़े में है 



गुल के बिना वुजूद तो इसका भी कुछ नहीं 

पर सोचता गुलाब कि काँटा मज़े में है 



उस वक्त  चढ़ गई थी  हवाओं…

Continue

Added by rajesh kumari on December 4, 2018 at 11:15am — 12 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७७

2122 2122 2122 212



बाग़पैरा क्या करे गुल ही न माने बात जब

शम्स का रुत्बा नहीं कुछ, हो गई हो रात जब //१



बाँध देना गाँठ में तुम गाँव की आबोहवा

शह्र के नक्शे क़दम पर चल पड़ें देहात जब //२



दोस्त मंसूबा बनाऊं मैं भी तुझसे वस्ल का

तोड़ दें तेरी हया को मेरे इक़दमात जब //३



इक किरन सी फूटने को आ गई बामे उफ़ुक़

रौशनी की जुस्तजू में खो गया…

Continue

Added by राज़ नवादवी on December 3, 2018 at 7:30pm — 7 Comments

३ क्षणिकाएँ ...

३ क्षणिकाएँ ...

छोटी सी बात

साँय-साँय करती रात

स्मृति पटल को दे गई

अमर

स्पर्श

सौग़ात

........................

व्योम

शून्यता के पर्याय के अतिरिक्त

आश्रय स्थल भी है

उन स्मृतियों का

जो जीती हैं

मिट कर भी

अंत से अनंत तक

.....................................

भला घर

खंडहर में

तब्दील कब होते हैं

जब तक

रस मधुरस में एक…
Continue

Added by Sushil Sarna on December 3, 2018 at 7:00pm — 8 Comments

'नव जागृति' (लघुकथा)

ट्रेन की बोगी में वह बालक न तो ख़ुश बैठा हुआ था और न ही दुखी। सजे-धजे किन्नरों से भरी बोगी में, पैसे गिनते हुए एक बुज़ुर्ग किन्नर को वह देख ही रहा था कि एक फेरी वाला मूंगफली बेचता हुआ वहां आया और दो-चार सवारियों को मूंगफलियां बेच कर,पैसे गिन कर उन्हें बाक़ी पैसे लौटाने लगा।

"अरे देखो, यह लंगड़ा और दोनों आंखों से अंधा है, फ़िर भी पैसों का सही हिसाब कर रहा है !" वह बालक बगल में बैठे उस किन्नर से बोल पड़ा, जो उसे समझा-बुझाकर उसके घर से अपने दल में शामिल करने के लिए लाया था उसके…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 3, 2018 at 4:00pm — 5 Comments

एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास

एक ताज़ा ग़ज़ल

वो खुद ही मजबूर बहुत हैं उनको हाल बताना क्या

जिनके दिल में प्यार नहीं है उन पर प्यार लुटाना क्या

हम तो तेरे नाम के जोगी अपना यार ठिकाना क्या

बिरहा में जलना है हमको महफिल क्या वीराना क्या

टूट गया है उस से नाता जो दुनिया का मालिक है

अब सारी दुनिया को अपने दिल के जख्म दिखाना क्या

सारे जीवन के पछतावे सांसो को झुलसाते हैं

अपनी किस्मत में लिक्खा है तिल तिल कर मिट जाना क्या

जीवन के…

Continue

Added by मनोज अहसास on December 2, 2018 at 11:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल

12221222 122



वो भौरे पास हैं जब से कली के ।

हैं बिखरे रंग तब से पाँखुरी के ।।

सुना है चांद आएगा जमी पर ।

बढ़े हैं हौसले अब चांदनी के ।।

जरा कमसिन अदाएं देखिए तो ।

अजब अंदाज़ उनकी बेख़ुदी के ।।

वो बेशक पास मेरे आ रही है ।

लगे हैं स्वर सही कुछ बाँसुरी के ।।

मुहब्बत हो गयी उनसे जो मेरी ।

हुए मशहूर किस्से आशिकी के ।।

तुम्हारा खत मिला जो…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 2, 2018 at 10:30am — 6 Comments

गज़ल -13( फिर भी नादान कलेजे में ज़हर रखता है)

2122 1122 1122 22/112

छोड़ जाएगा यहीं सब ये ख़बर रखता है

फिर भी दौलत पे वो मर मर के नज़र रखता है//१

ज़िन्दगी प्यार के अमरित से ही होती है रवां

फिर भी नादान कलेजे में ज़हर रखता है //२

कितना मज़बूर है वो रोड पे भूखा बच्चा

एक रोटी के लिए कदमों में सर रखता है//३

आदमी कितना अकेला है भरी दुनिया में

कहने को भीड़ भरे शह्र में घर रखता है//४

पहले शैतान से डरने की ख़बर आती थी

आज इंसान ही इंसान से डर रखता…

Continue

Added by क़मर जौनपुरी on December 2, 2018 at 8:17am — 7 Comments

गज़ल -12( जब मुल्क़ में नफ़रत का ये बाजार नहीं था)

221--1221--1221--122

जब मुल्क़ में नफऱत का ये बाज़ार नहीं था

हर शख़्स लहू पीने को तैयार नहीं था //१

अब बाढ़ सी आई है शबे ग़म की नदी में

जब तुम न थे दिल में तो ये बेज़ार नहीं था//२

जो देश की सरहद पे सदा ख़ून बहाए

क्या देेेश की मिट्टी से उन्हें प्यार नहीं था//३

मिट जाएं सभी जंग में हिन्दू व मुसलमाँ

ऐसा तो मेरे हिन्द का त्यौहार नहीं था//४

जब मुल्क़ परेशां था फिरंगी के सितम से

मिल जुुल के लड़े मुल्क ये लाचार नहीं…

Continue

Added by क़मर जौनपुरी on December 2, 2018 at 7:30am — 5 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७६

2121 2121 2121 212



उड़ रहे थे पैरों से ग़ुबार, देखते रहे

वो न लौटे जबकि हम हज़ार देखते रहे //१



ताब उसकी, बू भी उसकी, रंग भी था होशकुन

गुल को कितनी हसरतों से ख़ार देखते रहे //२



हम तो राह देखते थे उनके आने की मगर

वो हमारा सब्रे इन्तेज़ार देखते रहे //३

तोड़ते थे बेदिली से वो मकाने इश्क़, हम 

टूटते मकाँ का इंतेशार देखते रहे //४ …



Continue

Added by राज़ नवादवी on December 2, 2018 at 3:00am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मुझको मंजूर क़यामत से महब्बत होना (ग़ज़ल "राज")

गर है अंजाम महब्बत का क़यामत होना 

मुझको मंजूर क़यामत से महब्बत होना 



बे-मआनी नहीं ये सब है  महब्ब्त की  ख़ुराक

दरमियाँ  उसके गिले  शिकवे  शिकायत होना



आस्माँ  की ही अना का है नतीज़ा यारो  

उसके ही चाँद सितारों में बगावत होना



बेच दी है मेरे गुलशन की महक गुलचीं ने  

इसको कहते हैं अमानत में ख़यानत होना



ये ही करता है मुकम्मल मेरे…

Continue

Added by rajesh kumari on December 1, 2018 at 4:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल-खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

2122 2122 2122 212

खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

चाहो मत बढकर किसी को चाह की औकात से।

जिसकी ख़ातिर छोड़ दी दुनिया की सारी दौलतें

रख न पाया मन भी मेरा वो दो मीठी बात से ।

दे रहा है तुहमतें उल्टा मुझे ही बेवफ़ा 

बेहया से क्या कहूँ मैं, क्या कहूँ इस जात से।

मैं समझता था मुहब्बत की सभी को हैं तलब

उसको तो मतलब है लेकिन और कोई बात से।

हैं मुसलसल शिद्दतें कुछ यूँ जुदाई की…

Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on December 1, 2018 at 3:30pm — 6 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। "
5 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान…"
9 hours ago
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ…"
10 hours ago
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए…"
10 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की…"
10 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक…"
10 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२ **** तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१। * देवता…See More
17 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"अंत या आरंभ  --------------- ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल…"
yesterday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।हरती यही विडम्बना ,…"
yesterday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा मुक्तक. . . . . आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख…"
yesterday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सुशील जी। आप से मिली सराहना बह्त सुखदायक है। आपका हार्दिक आभार।"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
Wednesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service