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गजल(कर गुजरते कुछ.......)

छद्मवेशी देशभक्त दोस्तों को समर्पित)

2122 2122 2122 2

***

कर गुजरते कुछ अभी तैयार बैठे हैं

देख अपनों की दशा लाचार बैठे हैं।1



दुश्मनों की नस दबाते, शोर मच जाता,

इश्क के तो ढ़ेर सब बीमार बैठे है।2



दोस्त वह खंजर चलाता आँख बेपानी,

भर रहे हामी मुए इस पार बैठे हैं।3



जीतते आये दिलों पे राज भी करते

भेदियों की भीड़ है मन मार बैठे हैं।4



फूल कितने भी खिलाये चुभ रहे काँटे

बागवाँ पहले यहाँ सब हार बैठे हैं।5



रोशनी… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 28, 2016 at 8:34am — 13 Comments

ग़ज़ल -- मेयार शायरी का क़ायम जनाब रखना ( दिनेश कुमार दानिश )

221--2122--221--2122



मेयार शायरी का क़ायम जनाब रखना

ता-उम्र फ़िक्रो-फ़न के ताज़ा गुलाब रखना



जाती है जान जाए लेकिन न कम हो इज़्ज़त

सहराओं के मुक़ाबिल क्या चश्मे आब रखना



देना हिसाब होगा हम सबको रोज़-ए-महशर

गठरी में तुम भी अपनी कुछ तो सवाब रखना



तहज़ीब का तक़ाज़ा कहता है औरतों को

शर्मो हया का हर पल रुख़ पर नक़ाब रखना



हर वक़्त भागना ही जीवन नहीं है प्यारे

साँसों के इस सफ़र में कुछ सब्रो-ताब रखना



उम्मीद पर टिकी… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 28, 2016 at 7:17am — 2 Comments

माँ !तो आज तुम्हारा पहला श्राद्ध भी हो गया !

तुम्हारी तरह

आज तुम्हारी बहू भी सुबह अँधेरे उठ जायेगी



ठीक तुम्हारी तरह

साफ़ सुथरे चौके को फिर से बुहारेगी 

नहा धो कर साफ़ अनछूई एक्वस्त्रा हो

तुलसी को अनछेड़ जल चढ़ायेगी

ठीक तुम्हारी तरह 

आज फूल द्रूब लाने को भी बेटी को नहीं कहेगी

ठाकुर जी के बर्तन भी स्वय मलेगी

ज्योती को रगड़ -रगड़ जोत सा चमकायेगी

महकते घी से लबलाबायेगी

घर के बने शुद्ध घी शक्कर में लिपटा

चिड़िया चींटी गैया को हाथ से…

Continue

Added by amita tiwari on September 27, 2016 at 9:00pm — 1 Comment

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४२

रुख्सत/विदाई/ Departure

----------------------------------

 

साथ रहते हैं मेरे गम मैं जहां जाता हूँ

अब दरीचे पे ही रहता हूँ कहाँ जाता हूँ

 

हाय रे ये ज़िल्लतें जीने नहीं देतीं मुझे

मैं ज़मीं को छोड़कर अब आसमाँ जाता हूँ

 

अलविदा ऐ दोस्तोअहबाब हैं जिनके करम

ऐ मेरे प्यारे वतन हिन्दोस्ताँ जाता हूँ

 

दुःख न करना मेरा कोई पैकरेअल्ताफ़ में

मैं फ़लक के पार सू-ए-गुलसिताँ जाता हूँ

 

कुछ अधूरे ख़्वाब हैं…

Continue

Added by राज़ नवादवी on September 27, 2016 at 5:30pm — No Comments

जिंदगानी लुटाने की बात करते हो

किस ज़माने की बात करते हो
रिश्तें निभाने की बात करते हो

अहसान ज़माने का है यार मुझ पर
क्यों राय भुलाने की बात करते हो

जिसे देखे हुए हो गया अर्सा मुझे
दिल में समाने की बात करते हो

तन्हा गुजरी है उम्र क्या कहिये
जज़्बात दबाने की बात करते हो

गर तेरा संग हो गया होता "मदन "
जिंदगानी लुटाने की बात करते हो

मौलिक और अप्रकाशित

मदन मोहन सक्सेना

Added by Madan Mohan saxena on September 27, 2016 at 12:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल - जिंदगी है ढ़लान पर भाई

2122 1212 22

आज मुद्दा ज़ुबान पर भाई ।

गोलियां क्यूँ जवान पर भाई ।।



उठ रहीं बेहिसाब उँगली क्यूँ ।

इस लचीली कमान पर भाई ।।



कुछ वफादार हैं अदावत के।

तेरे अपने मकान पर भाई।।



बाल बाका न हो सका उनका।

खूब चर्चा उफान पर भाई ।।



मरमिटे हम भी तेरी छाती पर।

चोट खाया गुमान पर भाई ।।



बिक रही दहशतें हिमाक़त में ।

उस की छोटी दुकान पर भाई ।।



गीदड़ो का फसल पे हमला है ।

बैठ ऊँचे मचान पर भाई ।।



यार… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 27, 2016 at 12:34am — 4 Comments

मंज़र बदल जाएगा

जॉन एफ केनेडी

ने कहा

कि यह मत पूछो

कि देश ने तुम्हारे

लिए क्या किया,

यह पूछो कि

तुमने देश के

लिए क्या किया?

इन शब्दों ने मेरे

जीने का अन्दाज़

ही बदल दिया है



मैं शिक्षक हूँ

क्या मैंने छात्रों

का मनोबल

बढ़ा लिया है

पूछूँ मैं

ख़ुद से अब

क्या

तनख़्वाह लेके

सही किया है ?

मैं बेचता हूँ

दूध पानी मिला

मिला के क्या

गाय का नाम

मैंने ही

मिटा रखा है ?

मैने बनके… Continue

Added by S.S Dipu on September 26, 2016 at 11:46pm — 1 Comment

ग़ज़ल

काफिया : कर चल दिए  रदीफ़: आ

बहर : २२१२ २२१२ २२१२ २२१२

थी जान जब तक वो लडे  फिर जाँ लुटा कर चल दिये

इस देश की खातिर वे खुद को भी मिटा  कर चल दिये|

लड़ते गए सब वीरता से टैंकरों  के सामने

झुकने दिया  ना देश को खुद शिर कटा कर चले दिए |

परिवार को कर देश पर  कुर्बान खुद लड़ने गए

वो वीर थे  जो देश की इज्जत बचा कर चल दिये |

एकेक ने मारा कई को फिर शहीदों से मिले

अंतिम घडी  तक फर्ज अपना सब निभा कर चल दिए…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on September 26, 2016 at 10:34pm — No Comments

ग़ज़ल को ढूँढने, चलिए चलें खेतों में गाँवों में (ग़ज़ल)

1222   1222   1222   1222

न जाने धूल कब से झोंकता था मेरी आँखों में!

जो इक दुश्मन छुपा बैठा था मेरे ख़ैरख़्वाहों में!

भटकते फिरते थे गुमनाम होकर जो उजालों में!

हुनर उन जुगनुओं का काम आया है अंधेरों में!

फ़क़त इक वह्म था,धोखा था बस मेरी निगाहों का,

अलग जो दिख रहा था एक चेहरा सारे चेहरों में!

हक़ीक़त के बगूलों से हुए हैं ग़मज़दा सारे,

हुआ माहौल दहशत का,तसव्वुर के घरौंदों में!

ख़ता इतनी सी थी हमने गुनाह-ए-इश्क़…

Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on September 26, 2016 at 5:19pm — 9 Comments

बिगडती बात ( गजल )

१२२२    /    १२२२   /  १२२२   /   २२२ 

.

जमी जो बर्फ रिश्तों पे  पिघल जाये तो अच्छा है 

बिगड़ती बात बातों से सँभल जाये तो अच्छा है 

 

हमारी याद जब आये शहद यादों में घुल जाये

छिपी जो दिल में कडवाहट निकल जाये तो अच्छा है  

 

तमन्ना  चाँद पाने की बुरी होती नही लेकिन

जमीं से देखकर ही दिल बहल जाये तो अच्छा है

 

मुकद्दर में मुहब्बत के लिखी हैं ठोकरें ही जब 

गमों से पेशतर ये दिल सँभल जाये तो अच्छा…

Continue

Added by Sachin Dev on September 26, 2016 at 3:00pm — 4 Comments

एक ग़ज़ल

बह्र 1222 1222 1222 1222





तेरी बस याद आने से सभी दुःख-दर्द टलतेे हैं।

तेरे ही नाम पे जीवन युँही हम काट चलते हैं।



गमों का दौर है आया नहीं सुख अब दिखाई दे

इसी में डूब कर अबतो सभी दिन-रात ढलते हैं।



यहाँ जो भी मुकम्मल है हिफाज़त को जमाने की

उसी के जह्न में देखो गलत अरमान पलते हैं।



कभी सोचा नहीं जिसने हो जाए अम्न ही कायम

लिए उम्मीद फिर ऐसी उसी के पास चलते हैं।



अदाकारी में जो माहिर समझ में वे नहीं आते

कभी तोला कभी… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 26, 2016 at 1:00pm — 19 Comments

करबटें बदलता हूँ

करबटें बदलता हूँ रात भर मैं गलता हूँ

जख्म दिए औरों ने पर मैं खुद ही सिलता हूँ

 

मुँह मोड़ लिया हो अपनों ने तोड़ दिया हो सपनों ने

हर बार मगर हँसकर सबसे अक्सर मैं मिलता हूँ

 

जिन गलियों में बस शूल मिले यादों की बस कुछ धूल मिले

कभी रहे काशी काबा में हर रोज मैं पैदल चलता हूँ

 

वक्त के इस दौर में निकला मैं जिस भी ओर में

सदा बचा मैं शोलों से पर पानी से मैं जलता हूँ

 

सुबह भी देखी थी निराली पल भर में जो हुई थी…

Continue

Added by anupam choubey on September 26, 2016 at 1:00pm — 5 Comments

अब नहीं मेरे गांव में(छंदमुक्त चतुष्पदी कविता)

वो बगिया पनघट शीतल-अब नहीं मेरे गाँव में।

बुढ़ा बरगद झूमता पीपल-अब नहीं मेरे गाँव में।

परोसा करते थें तृप्त भोजन पानी जो आतिथ्य में,

वो बर्तन कांसे और पीतल-अब नहीं मेरे गाँव में।

-----

भाभी पानी छिट जगाती-अब नहीं मेरे गाँव में

लचका लोरी सोहर गाती-अब नहीं मेरे गाँव में

चाची भाभी बहना को पिछड़ा ये सब लगता है

हँसुली विछुआ झांझ भाती-अब नहीं मेरे गाँव में

-------

फाग चैत की राग गूंजता-अब नहीं मेरे गाँव में

बैल अकड़ ट्रैक्टर से जूझता-अब नहीं मेरे… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on September 26, 2016 at 9:21am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -चरागों को जलाने का कोई तो ढब ज़रूरी है ( गिरिराज भंडारी )



1222    1222    1222    1222 

मुख़ालिफ इन हवाओं में ठहरना जब ज़रूरी है

चरागों को जलाने का कोई तो ढब ज़रूरी है

 

रुला देना, रुलाकर फिर हँसाने की जुगत करना

सियासत है , सियासत में यही करतब ज़रूरी है

 

उन्हें चाकू, छुरी, बारूद, बम, पत्थर ही दें यारो  

तुम्हें किसने कहा बे इल्म को मक़तब ज़रूरी है

 

तगाफुल भी ,वफा भी और थोड़ी बेवफाई भी

फसाना है मुहब्बत का, तो इसमें सब ज़रूरी है

 

पतंगे आसमाँनी हों या रिश्ते…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on September 26, 2016 at 8:30am — 24 Comments

गजल (फूलों की बात)

2122 2122 2122 2



फूल हैं खिलते निगाहें चार करते हैं,

बागवाँ पर हम बड़ा एतबार करते हैं।1



बाँटते खुशबू जमाने से रहे सब हम,

झेलते झंझा कहाँ तकरार करते हैं?2



हम बटोही प्यार के दो बोल के भूखे ,

खुशनुमा बस आपका संसार करते हैं।3



हैं विहँसते हम सदा बगिया सजाने को,

प्यास आँखों की बुझा आभार करते हैं।4



हो नहीं सकता मसल दे पंखरी कोई,

खार भी रखते बहुत हम प्यार करते हैं।5



जां लुटाने की अगर नौबत हुई तब भी,…

Continue

Added by Manan Kumar singh on September 26, 2016 at 7:00am — 6 Comments

ग़ज़ल -- हरगिज़ न हमको मूकदर्शक पासबानी चाहिए ( दिनेश कुमार 'दानिश' )

2212--2212--2212--2212



हरगिज़ न हमको मूकदर्शक पासबानी चाहिए

दुश्मन का मुँह जो तोड़ दे अब वो जवानी चाहिए



फ़िरक़ा परस्ती की जड़ों को काटना है गर हमें

लफ़्ज़े-सियासत के लिए उम्दा म'आनी चाहिए



ये क्या कि हम बँटते गए दैरो-हरम के नाम पर

जम्हूरियत जब हो, रेआया भी सयानी चाहिए



उस उम्र में बच्चों के हाथों में यहाँ हथियार हैं

जिस उम्र में ख़ुशियों की उनको मेज़बानी चाहिए



ग़ुरबत अशिक्षा भुखमरी के मुद्दए तो गौण हैं

संसद में चर्चा… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 26, 2016 at 5:32am — 4 Comments

मेरे चेहरे पर है जमाने के पहरे कितने

मेरे चेहरे पर है जमाने के पहरे कितने

मै हँसूंगा तो उतर जाएंगे चेहरे कितने



मेरी जफाओं का रोना रोते हो बहोत

तुम अपनी वफाओं मे ठहरे कितने



आस्मा अपनी उसत लिए ठहरा है

है समंदर तुम्हारे गहरे कितने



काम थोडा कर लेते है लेकिन

लोग सजा लेते है सहरे कितने



मोहब्बत का पैगा़म सुनाना है मुझे

देखिए तो ये लोग है बहरे कितने



ताबिर जो बतलाते है आज ख़्वाबों कि

बता नही सक्ते दरपेश है ख़तरे कितने



ये तो अपनी नज़र तय करेगी… Continue

Added by Azeem Shaikh on September 25, 2016 at 11:30pm — 5 Comments

मत्तगयंद सवैया: अलका चंगा

छाँव बने तन भाव जगे मन चाव सजे चहकी फुलवारी ,

पावन भाव जगे मन में जब मात बनी यह देह हमारी,

ये वरदान मिला जग में जब बिटिया खेलत गोद हमारी,

चाव जगे इस जीवन के जब आँगन बीच सजी किलकारी,

.

नन्हि परी जब मात पुकारत आतम हो जय धन्य हमारी

झांझर डोलत कोयल बोलत व्याकुल हो महकी अंगनारी

मीत सखी बन जाय सदा सब बात सुने अब मोरि दुलारी

मान करे सबका फिर भी प्रतिपात सहे जग में हर नारी

.

जोगन प्रीत तजे रसना सब भोग सजे मुख खावत नाही

कृष्ण सदा बसते मन में सब भार…

Continue

Added by अलका 'कृष्णांशी' on September 25, 2016 at 11:00pm — 6 Comments

श्रद्धा और श्राद्ध/सतविन्द्र कुमार राणा

आस्थाओं का ढोल बजा है



श्रद्धा का बाजार सजा है



विश्वासों की लगती बोली



मानवता को मारो गोली।





मैं बिकता हूँ तू बिकता है



अब बिकता ईश्वर दिखता है



मान बड़ों का कब होता है



श्रद्धा का मतलब खोता है।





श्रद्धा आडम्बर  बन जाती



जब दुनिया पाखण्ड दिखाती



जीते जी टुकड़ों को तरसे



फिर भोजन कागों पर बरसे।





श्रद्धा से अपनों को मानों



कीमत जीते जी की… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 25, 2016 at 10:34pm — 8 Comments

ग़ज़ल - मेरी ग़ज़ल पे निशाना है बात क्या करना

1212 1122 1212 22



बड़ा खराब ज़माना है बात क्या करना ।

मेरी ग़ज़ल पे निशाना है बात क्या करना ।।



नहीं है नज्म की तहजीब जिस मुसाफिर को ।

उसी से दिल का फ़साना है बात क्या करना ।।



अजीब शख़्स यूँ पढ़ता उन्हीं निगाहों को ।

किसी को वक्त गवाना है बात क्या करना ।।



बिखर गए है तरन्नुम के हर्फ़ महफ़िल में ।

नजर नज़र से मिलाना है बात क्या करना ।।



हुजूर जिन से दुपट्टे कभी नही सँभले ।

उसे भी घर को बसाना है बात क्या करना ।।



दिखी है… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 25, 2016 at 6:00pm — 16 Comments

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