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All Blog Posts (19,151)

अच्छे दिन

अच्छे दिन की यही तो शुरुआत है

सब बिज़ी ही रहें,खुशनुमा बात है

बात तन्हाइयों की चलाना नही

सब अंधेरे हो रुखसत, तो क्या बात है!!

झटका बिजली का अबतक तो खाया नही

रोशनी है मुसलसल,बड़ी बात है

जिन्दगी के सबब, वे सिखाने चले

जो जिये ही नही,क्या अज़ब बात है

मुफलिसी जिन्द़गी की अमानत सही

नूर झांका कमश्कम शुरुआत है

फालतू जिन्दगी यूँ ही ढोते रहे

एक मिशन अब मिला, खुशनुमा बात है

संगदिल बिन हुये सब चलें संग संग

आज सूरज से अपनी मुलाकात है

रोशनी हाथ…

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Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on April 20, 2016 at 10:39am — No Comments

ग़ज़ल : पुल की रचना वो करते जो खाई के भीतर जाते हैं

बह्र : 22 22 22 22 22 22 22 22

 

वो तो बस पुल पर चलते जो गहराई से घबराते हैं

पुल की रचना वो करते जो खाई के भीतर जाते हैं

 

जिनसे है उम्मीद समय को वो पूँजी के सम्मोहन में

काम गधों सा करते फिर सुअरों सा खाकर सो जाते हैं

 

धूप, हवा, जल, मिट्टी इनमें से कुछ भी यदि कम पड़ जाए

नागफनी बढ़ते जंगल में नाज़ुक पौधे मुरझाते हैं

 

जिनके हाथों की कोमलता पर दुनिया वारी जाती है

नाम वही अपना पत्थर के वक्षस्थल पर खुदवाते…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 19, 2016 at 10:05pm — 4 Comments

ज़िंदगी डूब जाती है ....

ज़िंदगी डूब जाती है ....

ऐ बशर !

इतना ग़रूर अच्छा नहीं

ये दौलत का सुरूर अच्छा नहीं

साया तेरे करमों का

हर कदम तेरे साथ है

कुछ दूर तक दिन है

फिर लम्बी अंधेरी रात है

रातों में साये भी रूठ जाते हैं

दिन के करम

तमाम शब सताते हैं

शब की तारीकियों में

अहम के पैराहन

जिस्म से उतर जाते हैं

ज़न्नत और दोज़ख

सब सामने आ जाते हैं

बशर ख़ाके सुपुर्द हो जाता है

लाख चाहता है

फिर लौट नहीं पाता है

फिर न कोई रहबर होता…

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Added by Sushil Sarna on April 19, 2016 at 9:48pm — 4 Comments

चेहरा तेरा चाँद का टुकड़ा

चेहरा तेरा चाँद का  टुकड़ा

भौहें तनी कमान हैं क्या

इन आँखों में मैं मर जाऊँ

होंठों का तिल शान है क्या..2

तेरे तन की ख़ुशबू लेकर

फूल चमन में खिलते हैं

शायर तेरे हुशनो जवाँ की

दिल में किताबें लिखते हैं

उठी नज़र फिर झुक जाए तो

ढल जाती ये शाम है क्या

इन आँखों पे ...

तेरे लबों की बात करूँ तो

खिले कमल शर्माते हैं

तेरे क़दम जो पड़े जमी पे

शहंशाह झुक जाते हैं

तेरा खनकता स्वर गूंजा या

वीना की कोई तार है…

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Added by Amit Tripathi Azaad on April 19, 2016 at 6:14pm — No Comments

घूरे के दिन भी संवरते ...एक दिन

घूरे के दिन भी संवरते ....

 

ज़िंदगी जो आज है

वह कल थी

किसी घूरे पर पड़ी मल

गंध से कराहती.

कोई पूंछने को न आता

सितारे दूर से निकल…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 19, 2016 at 5:30pm — No Comments

मेरे सपनों का गाँव

मेरे सपनों में अक्सर ही

आकर मुझे जागता है

गाँव मेरा मुझको फिर यारों

वापस मुझे बुलाता है

वो खलिहानों की पगडंडी

सड़क बन गई काली है

दीपक भी अब नहीं रह गए

लाइट चमक निराली है

जिनके ख़ातिर दूर गया तू

वो सब मुझे दिखाता है

गाँव मेरा ....

मिट्टी के घर नहीं रहे अब

ईंटों के माकान बने

निर्मल निश्चल दिल वाले

अब पत्थर के इंसान बने

दिन प्रति दिन उन पत्थर में

इंसान नज़र ना आता है

गाँव...

हरे भरे तालाब सूखकर खेलों के…

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Added by Amit Tripathi Azaad on April 19, 2016 at 1:09pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
वो जो तेरे काम का होता नहीं- ग़ज़ल

2122 2122 212

वो जो तेरे काम का होता नहीं

उससे तेरा वास्ता होता नहीं



राह कोई गर मिली होती मुझे

अपने अंदर गुम हुआ होता नहीं



अपने लोगों में रहा होता जो मै

तो सरे महफ़िल लुटा होता नहीं



लग रहा है हादसों को देखकर

यूँ ही कोई हादसा होता नहीं



खुद पे काबू रखना मुझको आ गया

रात भर अब ‘जागना’ होता नहीं



चन्द शर्तों से बँधा है आदमी

अब कोई दिल से जुड़ा होता नहीं



वो सफ़र है ज़िन्दगी जिसमें ‘शकूर’

वापसी का… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on April 19, 2016 at 9:36am — 5 Comments

ग़ज़ल -- "मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ" बशीर साहब की ज़मीन में एक कोशिश। ( दिनेश कुमार )

11212--11212--11212--11212



लो गुनाह और सवाब की, मैं ये रहगुज़ार बुहार लूँ

या तो खुद को कर लूँ तबाह मैं , या हयात अपनी सँवार लूँ



तू हर एक शै में समाया है...के वो ज़र्रा हो या हो आफ़ताब

मेरी बन्दगी है यही ख़ुदा, के मैं खुद में तुझ को निहार लूँ



मुझे माँगने में हिचक नहीं, न वो नाम का ही रहीम है

जो लिखा न मेरे नसीब में.. उसे मैं ख़ुदा से उधार लूँ



मेरी साँस साँस तड़फ रही, तेरी इक नज़र को मिरे ख़ुदा

मुझे अपने पास बुला या फिर,मैं तुझे… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 17, 2016 at 8:52am — 6 Comments

कन्या दान

कन्या दान के बाद से बिदाई तक लगातार रोती रही । रोते रोते सोफे पर बेसुध सी पडी़ रही।सभी बिदाई में व्यस्त जो थे।

दादा जी ने गोदी में उठाया,"उठ बिट्टो खाना खा ले, बुआ तो गई।"

तुनक कर गुस्से से बोली "नहीं कुछ नहीं खाउंगी आपने मेरी कल्लो बुआ और लाली बछिया दोनों को दान में दे दिया।बुआ को दूल्हा अपने साथ ले गया।"

"बुआ की शादी हुई है बिट्टो,बे तुम्हारे फूफा जी है।"

"कोई फूफा जी नहीं, मैं और बुआ दोनों रोते रहे फिर भी बुआ को साथ ले गए।"

"अगले हफ्ते ले आयेगे बुआ को।"

"अब…

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Added by Pawan Jain on April 17, 2016 at 7:30am — 5 Comments

ग़ज़ल

22 22 22 22

मुझसे रोज़ कहा करता है।
दिल में इक दरिया रहता है।।

बे मौसम बारिस भी होगी।
आँखों का काज़ल कहता है।।

सूरज शायद गुस्से में है।
गर्मी में ज्यादा तपता है।।

उसकी भी मज़बूरी होगी।
अंदर ही अंदर घुटता है।

मुझको पूछ रहा था वो।
आँखों से ये क्या बहता है।।

राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on April 16, 2016 at 2:25pm — 2 Comments

पुल बने हैं कागजों पर कागजों पर ही नदी -ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

खोटा सिक्का हो गया है आज अय्यारों का फन

हर तरफ  छाया  हुआ है  आज बाजारों का फन

कर रही है अब समर्थन पप्पुओं की भीड़ भी

क्या गजब ढाने लगा है आज गद्दारों का फन

हौसला  देते  जरा  तो  क्या  गजब  करती  सुई

आजमाने में लगे सब किन्तु तलवारों का फन

पुल  बने  हैं  कागजों  पर  कागजों पर ही नदी

क्या गजब यारो यहा आजाद सरकारों का फन

पास जाती नाव है जब साथ नाविक छोड़ता

आपने देखा न होगा यार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 16, 2016 at 11:21am — No Comments

ग़ज़ल -- ख़बर कहाँ थी मुझे पहले इस ख़ज़ाने की ( दिनेश कुमार )

1212--1122--1212--22





ख़बर कहाँ थी मुझे पहले इस ख़ज़ाने की

ग़मों ने राह दिखाई .........शराबख़ाने की



चराग़े--दिल ने की हसरत जो मुस्कुराने की

तो खिलखिला के हँसी आँधियाँ ज़माने की



मैं शायरी का हुनर जानता नहीं ....बेशक

अजीब धुन है मुझे क़ाफ़िया मिलाने की



वजूद अपना मिटाया किसी की चाहत में

बस इतनी राम कहानी है इस दिवाने की



वो घोसला भी बनाएगा बाद में ...अपना

अभी है फिक्र परिन्दे को आबो-दाने की



मैं अश्क बन… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 15, 2016 at 6:08pm — 4 Comments

बाबा हम शर्मिंदा

चिंचोली की दशा देखकर बाबा हम शर्मिंदा हैं

छद्म भेष में प्रतिद्वंदी समाज को धोखा देता है

स्ंग्रहालय के संरक्षण मे करते कितना खोट

कुर्सी के लालच में फंस समाज पे करते चोट  

जर-जर होकर फट रही आज तेरी टाई कोट

तेरी निशानी मिटती देख बाबा हम शर्मिंदा है

चिंचोली की दशा देखकर बाबा हम शर्मिंदा हैं

छद्म भेष में प्रतिद्वंदी समाज को धोखा देता है

टंकण मशीन धूल खा रही मेरे कर्मो में खोट

भारत का संविधान लिख बाबा ने किया भेंट

तेरी धरोहर आज…

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Added by Ram Ashery on April 15, 2016 at 3:30pm — No Comments

तुम तो जिगरी यार हो

तुम तो जिगरी यार हो

==================

दोस्त बनकर आये हो तो

मित्रवत तुम दिल रहो

गर कभी मायूस हूँ मैं

हाल तो पूछा करो ..?

-------------------------------…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 15, 2016 at 1:00pm — 4 Comments

दिनरात चिरागों सा जला अपने वतन में

बह्र:-221-1221-1221-122



रुतबा -ए-उजाला है मिया अपने वतन में।

अब चैन मुहब्बत ओ मजा अपने वतन में।



अनपढ़ सा अंधेरा है मिटा अपने वतन में।

जैसे कोई खलिहान सजा अपने वतन में।।



वो रोज मुझे याद है वो ख़ूनी नजारा।

जब जुल्म से इन्सान लड़ा अपने वतन में।।



मुश्किल से हवा देश में लौटी है अमन की।

मजहब की न अब आग लगा अपने वतन में।।



बस चैन मुहब्बत -ओ-दुआ फर्ज के खातिर।

दिन रात चिरागों को जला अपने वतन में।।



आमोद… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on April 15, 2016 at 12:00am — 9 Comments

जहाँ में पाप जो पर्वत समान करते हैं (ग़ज़ल)

बह्र : 1212 1122 1212 22

 

जहाँ में पाप जो पर्वत समान करते हैं

वो मंदिरों में सदा गुप्तदान करते हैं

 

लहू व अश्क़, पसीने को धान करते हैं

हमारे वास्ते क्या क्या किसान करते हैं

 

कभी मिली ही नहीं उन को मुहब्बत सच्ची

जो अपने हुस्न पे ज़्यादा गुमान करते हैं

 

गरीब अमीर को देखे तो देवता समझे

यही है काम जो पुष्पक विमान करते हैं

 

जो मंदिरों में दिया काम आ सका किसके?

नमन उन्हें जो सदा रक्तदान करते…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 14, 2016 at 10:10pm — 14 Comments

तुम गए तो प्राण का जाना लिखा

तुम गए तो प्राण का जाना लिखा

बिन तेरे निःश्वांस हो जाना लिखा।

देखिये ना प्रेम की जादूगरी

स्वयं को मीरा तुम्हें कान्हा लिखा।।1।।

जब कभी भी पूर्णिमा का चाँद निकला

खिडकियों से झांककर आगे चला।

भाग कर छत पर गया देखा तुम्हें

और झट से तेरा आ जाना लिखा।।।।2।।

एक भीनी सी सुरभि जब भी कभी

मेरे कमरों की हवाओं में घुली।

मैंने खुद को फिर मचलता देखकर

रात रानी का महक जाना लिखा।।3।।

जब कभी अवसाद सागर में मेरी



नाव मन की…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 14, 2016 at 6:35pm — 10 Comments

सेल्फी विद डाॅटर

दोपहर का समय था।सूर्य की प्रचंड किरणें आग के गोले बरसा रही थी।रश्मि अभी-अभी काॅलेज से आई थी, जबकि रूपेश अपने आॅफिस से पहले ही आ चुका था।



परंतु आते ही आज फिर वही बात हो गई जो प्रायः इस समय घटित होती थी।प्रतिदिन लडाई जूते-चप्पलों को सही जगह पर रखने को लेकर होती थी।ज्योंही रश्मि ने रूपेश के जूतों को बैडरूम में देखा तो वह भडक उठी।

"अपने आप को एक मैनेजिंग डायरेक्टर कहते हुए शर्म नहीं आती, न जाने अपने जूतों को भी सही जगह पर मैनेज करना सिखोगे_ _ _ _।"

"तुम किसलिए हो? इतना भी…

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 14, 2016 at 9:30am — 10 Comments

अतुकांत-तुम तो न जानते थे न महात्मन्!

हे महात्मन्!

हे वयोवृद्ध!

तेरी मृतात्मा सुने!

राम-गौतम की इस भूमि पर

अब वटवृक्ष छोड़,

उसकी टहनियों को

पूजा जायेगा।

तूने जो किये थे,

निः स्वार्थ कृत्य,

कर विस्मृत उन्हें,

बस तेरी कमियों को ही

उकेरा जायेगा।

इस सत्य-भूमि पर,

सत्यता को झुठलाकर

इतिहास को ही

तोड़ा मरोड़ा जायेगा,

तेरी रीतियों-नीतियों की

प्रबुद्ध आवाज को

अब अहिंसात्मक असहिष्णुता

बोला जायेगा।

जिन घटितों का तुझसे

दूर तक रिश्ता… Continue

Added by रामबली गुप्ता on April 13, 2016 at 2:15pm — 2 Comments

जलेबी बाई और जलेबियां (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

जलेबी चौक पर प्रसिद्ध चाट वाले की दुकान पर कॉलेज की कुछ लड़कियाँ समोसा-कचौड़ी के मज़े लेते हुए बगल की लोकप्रिय दुकान में जलेबियां बनते हुए ग़ौर से देख रहीं थीं।



"क्या देख रही हो बहनों, हमारी-तुम्हारी ही कथा सुनाती हैं जलेबियां!"



"क्या? क्या मतलब?" - एक ख़ूबसूरत चंचल लड़की ने पूछा।



"ये देखो, ये वाली कड़ाही है जलेबी का मायका। यहाँ माँ-बाप की पोटली से निकल कर रूप-रंग और सांचे में ढलकर गरम तेल में तली जाती हैं जलेबियां!" -यह कहकर शहर की मशहूर जलेबी बाई ने कड़ाही में… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 13, 2016 at 8:28am — 7 Comments

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