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हौले हौले-(ग़ज़ल - एक प्रयास)

हौले हौले-(ग़ज़ल - एक प्रयास)

बहर -२२ २२ २२ २

हौले हौले रात चली

हौले हौले बात चली !!१!!

हौले हौले  होंठ  हिले

हौले से बरसात चली !!२!!

हौले  हौले   आँखों    में

प्यासी प्यासी रात चली !!३!!

हौले   हौले   जीत   हुई

आलिंगन की बात चली !!४!!

हौले  हौले  ख़्वाबों की

आँखों से बरसात चली !!५!!

हौले  हौले  आँखों   से

जागी जागी रात चली !!६!!

हौले  हौले  वो  महकी

जुगनू की बारात चली !!७!!



सुशील सरना…

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Added by Sushil Sarna on April 27, 2016 at 4:40pm — 15 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
बहुत मुमकिन है दिल की उलझनों का रुख बदल जाए... ग़ज़ल//डॉ. प्राची

1222,1222,1222,1222



अभी है वक्त हाथों में, कहीं ना ये निकल जाए

जरा लहज़ा बदल लें तो, जो बिगड़ा है सम्हल जाए



नज़र भर कर हमें देखो, फिर अपने दिल से सच पूछो

बहुत मुमकिन है दिल की उलझनों का रुख बदल जाए



हमें भी दिल की सब बातें तुम्हें खुल कर बतानी हैं

अभी ठहरो उजाला है ज़रा सी साँझ ढल जाए



लहर से तट का हर पत्थर किया करता है अठखेली

यहाँ डग सोच कर भरना, कहीं ना पग फिसल जाए



तुम्हें अपना समझ बैठेगा इसमें अक्स मत देखो

बहुत मासूम… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 27, 2016 at 2:15pm — 7 Comments

सुधि आँगन ....

सुधि आँगन ....

याद  आये  वो   बैन   तुम्हारे

तृषित नयनों का सिंगार हुआ

संग समीर के

उलझी अलकें

स्मृति कलश से फिर

छलकी पलकें

याद  आये  वो  अधर तुम्हारे

फिर मूक पल हरसिंगार हुआ



स्मृति मेघों की

निर्मम गर्जन

देह कम्पन्न का

करती अभिनन्दन



याद आये वो स्पर्श तुम्हारे

आलिंगन क्षण अंगार हुआ



जब देह से देह की

गंध मिली

तब स्वप्निल पवन

मकरंद चली

याद आये…

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Added by Sushil Sarna on April 26, 2016 at 9:41pm — 8 Comments

जिन्दगी का सफर

जिन्दगी के सफर पर
बढते रहो, मगर
किसी की राह मत देखो।
अपने कदमों के निशां
छोडते चलो।
उन्हीं कदमचिन्हों पर
बन जाएगा कारवां
एक दिन।
गमों की परवाह
मत करो, मगर
अधिक खुशियों से
तुम जरूर डरना।
खुशियों के साथ
गम
याद करते चलो।
अपने कदमों के निशां
छोडते चलो।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 26, 2016 at 8:29pm — 4 Comments

कुंडलिया छन्द

 

तपकर लोहा आग में, बन जाता फौलाद,|

मात-पिता की आँच में, संस्कारी औलाद |

संस्कारी औलाद, प्रगति में हाथ बँटाते

करते जो पुरुषार्थ, काम से कब घबराते

कह लक्ष्मण कविराय,युवक ले शिक्षा जमकर

सक्षम और कुशाग्र, बने गुरुकुल में तपकर  |

 

सुनकर लंबित फैसला, विधवा हुई निढाल

दुख सहते वादी मरा, घर का खस्ता हाल |

घर का खस्ता हाल, हुई जब पेंशन लंबित

सुनने हक़ में न्याय, हुआ न वहाँ उपस्थित

लक्ष्मण माँगे न्याय, परिस्थिति हो जब…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 26, 2016 at 5:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल-इस्लाह के लिये

22-22-22-22-22-22-222

मेरे शब्दों को तुम अपनी ख़ुश्बू सा महका दो तो।

मेरे छंदों को तुम अपनी पायल सा खनका दो तो।।



ये जो मनमोहक सी तेरी चाल में इक चञ्चलता है।

अधरों से छू कर ग़ज़लों को, हिरनी ज़रा बना दो तो।।



रेशम सी आवाज़ का ज़ादू, इन भावों में जगा ज़रा।

सुर सरगम का गहना इनको, प्रिये आज पहना दो तो।।



हर्फ़ बिछे हैं कागज़ पर सब, प्राण हीन तन के जैसे।

इन काली रेखाओं को भी, ज़िंदा आज बना दो तो।।



क्यों कहती हो प्रीत नहीं जब, झूठ बोलना नहीं… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 25, 2016 at 11:02pm — 15 Comments

ग़ज़ल

1222-1222-1222-1222 

दिवाना आप का होकर फिरे वो यार बरसों से

लिए फिरता है दिल में वो तो तेरा प्यार बरसों से

हुआ है ज़िक्र महफ़िल में उसी की बात का लेकिन

बना रहता है वो मजनू करे दीदार बरसों से



अदालत ये अनोखी है जहाँ पे झूठ चलता है

हुए कैदी मिली फांसी जो थे सरदार बरसों से



जरा दिल की सुनो तो जी बड़ा मासूम भोला है

पड़ा धोखे में जाकर ये लुटा घर बार बरसों से



मेरे मौला सफर में हूँ अता कर फ़िक्र ना मुझको

दे वो ढूँढा…

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Added by munish tanha on April 25, 2016 at 10:00pm — 3 Comments

ग़ज़ल-"नूर-ये ताबीज़ मुझ को फला देर से.

१२२/१२२/१२२/१२ 

.

कोई राज़ मुझ पर खुला देर से,

वो आँसू वहीँ था,, बहा देर से.

.

चिता की हुई राख़ ठंडी मगर,

सुलगता हुआ दिल बुझा देर से.

.

मैं दुनिया से लड़ने को तैयार था,

मगर ..ख़त तुम्हारा मिला देर से.  

.

तेरा नाम धडकन पे गुदवा लिया,

ये ताबीज़ मुझ को फला देर से.

.

हमारी सिफ़ारिश फ़रिश्तों ने की,

मगर आसमां ही झुका देर से.

.

अजब सी नमी लिपटी हर्फ़ों से थी,

वो ख़त तो जला पर जला देर से.

.

कई खेत…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2016 at 8:32pm — 23 Comments

आज़ादी का भ्रम छलावा है

आज़ादी का भ्रम छलावा है

कौन यहाँ आज़ाद हो सका…
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Added by amita tiwari on April 25, 2016 at 8:00pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
रफ़्ता रफ़्ता महके गुलशन साँसों के (ग़ज़ल राज )

२२  २२   २२   २२   २२  २

 

हँसते दर्पण जब जब तेरी आँखों के

रफ़्ता रफ़्ता महके गुलशन साँसों के

 

धीमे धीमे होती है ये  रात जवाँ

ख़्वाब मचलते हैं प्यासे पैमानों के

 

कैसे डूबे  भँवरों में  किश्ती नादां

सिखलाते हमको गड्ढे रुखसारों के

 

गोया नभ से चाँद उतर आया कोई        

चेह्रे से  हटते ही साए  बालों के

 

पार उतर आये हम  तूफां से बचकर

मस्त सफीने पाए  तेरी  बाहों  के 

 

खूब शफ़ा…

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Added by rajesh kumari on April 25, 2016 at 8:00pm — 19 Comments

भगौड़े (लघुकथा) राहिला

मरणोपरांत मृतक युवक के कर्मो का हिसाब किताब करने की कार्यवाही शुरू हो चुकी थी। दूसरी दुनिया का दरोगा लेखा-जोखा देखने वाले से पूछताछ कर रहा था ।

"इस लड़के की उम्र विधाता ने कम लिखी थी क्या? "

"नहीं दरोगा साहब! उम्र तो खूब लिखी थी। लेकिन इसने खुदकुशी कर ली ।"

"क्यूं? "

"इसका इम्तेहान चल रहा था, पर ये बीच में ही भाग निकला। "

"क्यूं क्या इसने जीने की कला नहीं सीखी? "

"नहीं, ये सतयुग के प्राणी नहीं, कलयुग की खुदपरस्त पीढ़ी है।ना सब्र,ना मर्यादा, ना अनुशासन और ना…

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Added by Rahila on April 25, 2016 at 7:30pm — 49 Comments

ये गठरी!

165

ये गठरी!

======

ये गठरी!

कब होगी हलकी,

परायों के समानार्थी,

अपनों के कर्ज से छलकी!

मूलाॅंश को पटाने की

योजना बनाई मैंने,

तत्क्षण,

अपनी अपनी व्याज दर बढ़ाई इन्होंने।

जिंदगी की रेलगाड़ी,

कभी पा न सकी पटरी!

कुछ लोग,

सुखपूर्वक जीते हैं,

कर्ज लेकर भी घी पीते हैं!

और,

चुकाने के नाम पर---

देते हैं धमकी!

सुख! क्या है?

क्या पता।

घर! क्या है?

नहीं सकता बता।

किराये की…

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Added by Dr T R Sukul on April 25, 2016 at 6:19pm — 6 Comments

माँ पर एक ग़ज़ल.....मनोज अहसास

121-22 121-22 121-22 121-22



ख़ुशी में तू है,है ग़म में तू ही,नज़र में तू, धड़कनों में तू है ।

मैं तेरे दामन का फूल हूँ,माँ मेरी रगों में तेरी ही बू है ।।



हरेक लम्हा सफ़र का मेरे ,भरा हुआ है उदासियों से ।

ये तेरी आँखों की रौशनी है, जो मुझमे चलने की आरज़ू है ।।



है तेरे क़दमों के नीचे जन्नत, ज़माना करता तेरी इबादत ।

तेरे ही रुतबे का देख चर्चा, माँ सारे आलम में चार सू है ।।



तमाम है रौनके जहाँ में ,जो बेकरारी नज़र में भर दें ।

मगर जो खाता है…

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Added by मनोज अहसास on April 25, 2016 at 3:00pm — 9 Comments

चिन्तामग्न

चिन्तामग्न

 

तुमसे मिलने पर

और तुमसे न मिलने पर भी

काँपते हुए, डरे हुए

पिघलते हुए प्रश्न

 

व्यथाओं की उलझन के अंतर्वर्ती विस्तार में

दर्दीली रातों में द्वंद्व की आड़ी-टेड़ी…

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Added by vijay nikore on April 25, 2016 at 1:30pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
आहों को हम रख लेते हैं...गीत//डॉ. प्राची

तुमको बहुत मुबारक मंज़िल, राहों को हम रख लेते हैं।

खुशियों की सौगातें तुम लो, आहों को हम रख लेते हैं।



कसमें वादे तोड़ चले तुम,

हमको तन्हा छोड़ चले तुम,

जोड़ी थीं जो राहें तुमने

उनको खुद ही मोड़ चले तुम,

तूफ़ाँ देख मुङो तुम, पर मझधारों को हम रख लेते है....



हर इक रंग तुम्हीं से लेकर

सतरंगी थे ख्वाब सँवारे,

तुम क्या बिछुड़े,अब तो अपने

साथी हैं केवल अँधियारे

सुबह सुनहरी तुम ही रख लो, रातों को हम रख लेते हैं....



गीली मेहँदी, महके… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 25, 2016 at 10:28am — 9 Comments

किस तरह का ये कहो नाता है.

वज्न - 2122---1122---22 / 112

किस तरह का ये कहो नाता है

उनके बिन पल न रहा जाता है

 

लूट ले जाता है खुशियाँ सारी

उसका जाना न हमें भाता है

 

रात लाती है उम्मीदें लेकिन

दिन का सूरज हमें तड़पाता है

 

धूल हो जाते हैं अरमां सारे,

चैन इस दिल को नहीं आता है

 

रात आती है सितारे लेकर

चाँद रातों की नमी लाता है

 

मौलिक/अप्रकाशित.

Added by Ashok Kumar Raktale on April 24, 2016 at 4:30pm — 12 Comments

बुखार

" क्यों बे तुझे कहा था ना चाय देके जल्दी आ जाना पर तू यहाँ टीवी देखते खड़ा है। वहां काम कौन करेगा तेरा बाप ? चल दूकान पे। " लडके पर झल्लाते हुए चायवाले ने कहा।

" बस एक ओवर देख के आता हूँ भैयाजी। आखरी ओवर है जीत-हार की बात है। " उत्सुकता से आईपीएल देख रहे लड़के ने कहा।

" अबे एक ओवर के बच्चे, वहाँ चार ओवर जितने गिलास जमा हो गए है, चल बोला ना। " चायवाले ने फिर चिल्लाते हुए कहा।

" हाँ हाँ भैयाजी चल रहा हूँ। और ये आऊट। येsssss मैच जीत गये भैयाजी। " ख़ुशी में झूमते हुए लड़का चिल्लाया और…

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Added by Er Nohar Singh Dhruv 'Narendra' on April 24, 2016 at 4:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल ...चार दीवारें भी हों छतों के लिये

212   212    212    212

चार दीवारें भी हों छतों के लिये

और क्या चाहिये मुफलिसों के लिये

महफिलें भूख की हो रहीं हैं ज़बां

है सियासत मगर रहबरों के लिये

अत्ड़ियाँ पेट की घुटनों से मिल गईं 

अब कहाँ तक झुकें रहमतों के लिये

जिन दरख्तों तले पल रहा आदमी 

प्यार की हो नमी उन जड़ों के लिये 

लाख ​दौलत अकूबत है हासिल जिन्हें  ​

वो तरसते ​मिले ​कहकहों के लिये

ठोकरें नफरतें झिड़कियों के सिवा

और…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 24, 2016 at 4:30pm — 12 Comments

अशुद्ध व्याख्या (लघुकथा)

अपनी क्षमता से अधिक भारी दाना उठा कर धीरे-धीरे दीवार पर चढती एक चींटी को देख उसके साथ चल रही दूसरी चींटी चौंकी और उसने कहा, "इतना भारी दाना! तुम फिसल जाओगी|"

पहली चींटी कुछ क़दमों ही में हांफ चुकी थी, लेकिन उसने दृढ शब्दों में उत्तर दिया, "कल सभा में हमारे नेता हाथी ने कहा था कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती, चींटियों को भारी से भारी दाना उठाना चाहिये, तभी हमारी गरीबी खत्म होगी, हमारे सपने पूरे होंगे|"

दूसरी ने मुस्कुरा कर कहा, "लेकिन अपने सामर्थ्य के अनुसार ही कोशिश…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on April 24, 2016 at 3:00pm — 2 Comments

आप पहले झोपडी तो इक बनाकर देखिये

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

आप पहले झोपडी तो इक बनाकर देखिये

ख्वाब फिर महलों के भी दिल में सजा कर देखिये

मैं नहीं हूँ तो हुआ क्या ये ग़ज़ल मेरी तो है

मेरी गजलें  भी कभी तो गुनगुना कर  देखिये

जिस तरफ देखोगे, तुमको बस नजर आयेंगे हम

है मगर बस शर्त इतनी मुस्कुराकर देखिये

है विरह के बाद में ही यार मिलने का मज़ा

आग पहले ये विरह की खुद लगा कर देखिये

चीज़ मय अच्छी…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on April 24, 2016 at 2:00pm — 13 Comments

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