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ख्वाब-ऐ-बशर ...

ख्वाब-ऐ-बशर ...

आज फिर

किसी का चूल्हा

उदास ही

बिन जले सो गया।

आज फिर

सांझ के दामन पे

भूख लिख गया कोई।

आज फिर

पेट की आग

झूठी आशा की बर्फ से

ठंडी कर

सो गया कोई।

आज फिर

कटोरे से

सिक्कों की आवाज़

रूठी रही।

आज फिर

खारा जल

पकी दाढ़ी को

धोता रहा।

आज फिर

निराशा का कफ़न ओढ़े

बिन साँसों के

सो गया कोई।

आज फिर…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 12, 2016 at 2:47pm — 6 Comments

कोई छेड़े न ग़र बेहतर- ग़ज़ल

बहुत बेचैन हूँ इस पल

कोई छेड़े न गर, बेहतर।

उठा भूकम्प है मन में

सभाले तो कोई ये घर।।



चली है आरी-ए-मतलब

नहीं बाक़ी शज़र कोई।

हुआ पूरा शहर नंगा

ये दिल तो हो गया बंज़र।।



कहाँ तुमको खिलाऊँगा

न वो पनघट न पानी है।।

लहर नफ़रत की बहती है,

बहुत ही ख़ार है अंदर।।



अभी तो नींद टूटी है

अभी दुनिया से मिलना है।

मिलाकर आँख कहना है

ज़रा दिखलाओ अपने "पर"।।



डरायेगा कोई मुझको

अतल गहराइयों से क्या?

बताया जाये… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 12, 2016 at 9:53am — 6 Comments

सदा सुन के ज़मीं की, चाँद तारे छोड़ आया हूँ (ग़ज़ल)

1222 1222 1222 1222



फ़लक पर के सभी दिलकश नज़ारे छोड़ आया हूँ

सदा सुन के ज़मीं की, चाँद-तारे छोड़ आया हूँ



मैं अपने बोरिये-बिस्तर शहर ले के तो आया, पर

वो पनघट,बाग़,पोखर,खेत...सारे छोड़ आया हूँ



जहाँ अपनी वफ़ा का मुस्कुराता एक गुलशन था

वहीं अश्कों के कुछ तालाब खारे छोड़ आया हूँ



वज़ूद उसका न मिट जाए कहीं दरिया के दलदल में

तड़पती मीन को सागर किनारे छोड़ आया हूँ



पिछड़ जाए न बेटा रेस में, ज्यों गोद से उतरा

उसे हॉस्टल प्रतिस्पर्धा के… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on May 12, 2016 at 8:46am — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
डूबता हूँ रोज़ मैं तिनके लिये

2122 2122 212
डूबता हूँ रोज़ मैं तिनके लिये
जिंदा हूँ यूँ जाने किस दिन के लिये

साँसें तो भरपूर दी अल्लाह ने
पर हिसाब इनके भी गिन-गिन के लिये

ज़िन्दगी से रोज़ पल चुनता रहा
पर नहीं दो पल भी जामिन के लिये

ये ख़याल आये न मुझको आख़िरश
उम्र भर मरता रहा किनके लिये

हाल तक वो पूछने आये नहीं
इक तरफ़ रख दी क़लम जिनके लिये

-मौलिक, अप्रकाशित

Added by शिज्जु "शकूर" on May 11, 2016 at 8:57pm — 7 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122

लोग कैसे रंग अपने कर लिये हैं

फूल की है चाह पर पत्थर लिये हैं।1



शेर मारे फिर रहे हैं दर- बदर अब

रोब उनके बकड़ियों ने हर लिये हैं।2



मुस्कुराकर मिल रहे हैं महफिलों में

हाथ में सब लोग तो खंजर लिये हैं।3



फूल की खेती करेंगे कह रहे सब

दिल बड़ा ही खुरदरा बंजर लिये हैं।4



भूलकर कल पार जाना था क्षितिज के

अस्थियों का वे अभी पंजर लिये हैं।5



दे रहे रिश्ते दुहाई देखिये भी

लोग अपनों का यहाँ तो डर लिये… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 11, 2016 at 8:04pm — No Comments

मेरी परछाई

जीवन के हर मोड़ पर
हर मुश्किल के साथ
जब अपने बिछुड़ते गये
हर अँधेरे की दस्तक से
तथाकथित सच्चे मित्र
साथ छोड़ते गये
जीवन की नितांत
एकाकी सड़क पर
आज भी ‘वह’ लगातार
बिना थके, बिना रुके
मेरे साथ चली आ रही है
न सुख की आस
न आनंद की प्यास
न अभिलाषा प्रतिदान की
न लालसा सम्मान की
बगैर किसी शिकायत
एक निश्छल साथी
अविच्छिन्न सहचरी
मेरी परछाई I

तनूजा उप्रेती ,11.05.2016

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Tanuja Upreti on May 11, 2016 at 11:30am — 6 Comments

सावन की तैयारी है-ग़ज़ल

22-22-22-22-----22-22-22-2



प्रीत रीत हम निभा न पाये, खूब हुई गद्दारी है।

ग़म का ताप चढ़ा है मन पर, सावन की तैयारी है।।



इस गुलशन में स्वप्न पुष्प के, बाग़ लगाना अपनी ख़ता।

खारे जल से इसका सिंचन, करना तो लाचारी है।।



चिटख गया है शीशा-ए-दिल,चुभता है, हर धड़कन पर।

साँसें थामे रखना मुश्किल, जीना इक दुश्वारी है।।



उसे बेवफ़ा बोलूँ महफ़िल, में ये कैसे है सम्भव।

जिसे पूजता रहा उसे बदनाम करूँ, मक्कारी है।।



जब भी हाथ दुआ में उट्ठें, सिर्फ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 10, 2016 at 10:30pm — 3 Comments

वक्त बड़ा ही शरारती बच्चा

वक्त बड़ा ही शरारती बच्चा…

Continue

Added by amita tiwari on May 10, 2016 at 7:30pm — 3 Comments

ज़िंदगी के फ्रेम में ....

ज़िंदगी के फ्रेम में ....

यादें

आज पर भारी

बीते कल की बातें

वर्तमान को अतीत करती

कुछ गहरी कुछ हल्की

धुंधलके में खोई

वो बिछुड़ी मुलाकातें

हाँ ! यही तो हैं यादें

ये भीड़ में तन्हाई का

अहसास कराती हैं

आँखों से अश्कों की

बरसात कराती हैं

सफर की हर चुभन

याद दिलाती हैं

जब भी आती हैं

ये ज़ख़्म कुरेद जाती हैं

अहसासों के शानों पर

ये कहकहे लगाती हैं

ज़हन की तारीकियों में

ये अपना घर बनाती हैं…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 10, 2016 at 3:54pm — 4 Comments

गजल

2 1 2 2     2 1 2 2   2 1 2 2   2 2 2 1 

 फाईलातुन फाईलातुन फाईलातुन मफऊलात

 

कट गए  जंगल सभी  कैसे रहे  विवरों  में नाग

इसलिए सब भाग कर अब आ गए नगरों में नाग

 

चारपाई  पर  नहीं  चढ़ते  थे  जो  पहले  कभी

अब  वही  बेख़ौफ़  होकर  घूमते  शहरों में नाग

 

अब  बचाकर  जान  देखो  भागता  है  आदमी  

फन उठाये  मिल रहे हैं हर कही डगरों  में नाग

 

 हो  सके तो  बाज  आओ  प्यार से  इनके बचो

कौन जाने दंश…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 10, 2016 at 1:00pm — 3 Comments

गुमशुदा हूँ मैं

गुमशुदा हूँ  मैं

तलाश जारी है

अनवरत 'स्व ' की

अपना ‘वजूद’

है क्या ?

 आये खेले ..

कोई घर घरौंदा बनाए..

लात मार दें हम उनके 

वे हमारे घरों को....

रिश्ते  नाते उल्का से लुप्त

विनाश ईर्ष्या विध्वंस बस

'मैं ' ने जकड़ रखा  है मुझे

झुकने नहीं देता रावण सा

एक 'ओंकार'  सच सुन्दर

मैं ही हूँ - लगता है

और सब अनुयायी

'चिराग'  से डर लगता है

अंधकार समाहित है

मन में ! तन - मन दुर्बल…

Continue

Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 10, 2016 at 12:30pm — 5 Comments

तलाशी ले रहा है आइना, पर मैं लजाता हूँ- ग़ज़ल(इस्लाह के लिए)---संशोधित

1222 1222 1222 1222

तलाशी ले रहा है आईना, पर मैं लजाता हूँ।

लगे हैं दाग जो अंदर, मेरे उनको छिपाता हूँ।।



चढ़ा कर रंग रोगन का, कवर मैं खुद के चेहरे पर।

हूँ मैं भी खूबरू बस, ऐसा दुनिया को दिखाता हूँ।।



मग़र मालूम है मुझको, हक़ीक़त क्या है अन्तस की।

महज़ मैं मोह औ मद के लिए, महफ़िल सजाता हूँ

।।



यही सच है छिपाना व्यर्थ है सब जानता है "मन"

की मैं दौलत की ख़ातिर ही, तो बस जीवन गँवाता हूँ।।



इसे सुंदर बनाने को, हाँ अंदर घर सजाने… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 10, 2016 at 10:00am — 4 Comments

मशीन - डॉo विजय शंकर

अपने लिए बनाई थी ,

काम आसान करेगी ,

बहुत से काम करेगी ,

कुछ फुरसत देगी ,

शरीर को आराम देगी।

देखते देखते देखिये

बहुत काम करने लगी ,

अपने ही काम आने लगी ,

शरीर के काम आने लगी ,

शरीर के रोग बताने लगी ,

कि कितने बीमार हैं हम

हमें मशीन बताने लगी ,

रक्तचाप नापने लगी ,

रक्त निकालने लगी ,

खून , बदलने लगी ,

शरीर को बाहर से ,

अंदर से झाँकने लगी ,

किरण बन शरीर में जाने लगी ,

शरीर के हिस्से पुर्जे ,

बदलने… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on May 10, 2016 at 9:44am — 4 Comments

ग़ज़ल -नूर- ख़ुदाया आज फिर धडकन थमी है

१२२२/१२२२/१२२ 



ख़ुदाया आज फिर धडकन थमी है,

किसी की याद दिल में चुभ रही है.

.

मसीहा को मसीहाई चढ़ी है,

मसीहा को हमारी क्या पड़ी है.

.

कहीं पर अश्क मिट्टी हो रहे हैं

कहीं प्यासी तड़पती ज़िन्दगी है.

.

कई जुगनू चमक उट्ठे हैं

लेकिन कमी सूरज की रातों में खली है.

.

मेरी नज़रें जमी हैं आसमां पर,

न जानें क्यूँ वहाँ भी ख़लबली है.

.

रगड़ता है हर इक साहिल पे माथा,

समुन्दर की ये कैसी बे-बसी है.

.

गुनाहों में गिनीं जाएगी…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 10, 2016 at 8:23am — 8 Comments

प्रिय से रँगवावन को चुनरी

प्रिय से रँगवावन को चुनरी,

मन मोद लिए मुसकाय चली।

सब छाड़ि जहाँ के लाज सखे!

भरि थाल गुलाल उड़ाय चली।

पट पीतहि लाल हरा रँग से,

मन प्रेमहि रंग रँगाय चली।

नव यौवन के मद से सबके,

मन में मदिरा छलकाय चली।।1।।



सुंदर पुष्प सजा तन पे,

लट-केश -घटा बिखराय चली है।

अंजित नैन कटार बने,

अधरों पर लाल लुभाय चली है।।

अंगहि चंदन गंध भरे,

मदमत्त गयंद लजाय चली है।

हाय! गयो हिय मोर सखे!

कटि जूँ गगरी छलकाय चली… Continue

Added by रामबली गुप्ता on May 9, 2016 at 5:30pm — 5 Comments

क्षितिज

यह कौन है वहां उस छोर पर

जो देख रहा बादलों के कोर से

बैठ गया है जो वहां सालों से

न वो कोई ज़मीन पर रहता है

न ही आसमान को कोई हिस्सा है

दिखता है वो बहुत करीब मगर

जाने किस जहां में बस्ता है

दूर है वो पर करीब ही दिखता है

जब पूछते है पता उसका

कुछ मुस्कुराकर वो यह कहता है

बांवरा मन यह तेरा क्यों मुझको

इस बेचैनी से क्यों मुझको तू देखता है

क्षितिज हूँ मैं ,

आसमान का नहीं ,ज़मीन का भी नहीं

यह मेरा जहां है जहाँ तू मुझको…

Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 9, 2016 at 3:30pm — 5 Comments

नज़्म - तुम्हारे ख़त

कितना अच्छा होता न ?

अगर वो सारे ख़त तुम्हारे

जिन्हें मैं रोज़ पढ़ता हूँ

पढ़ कर मुस्कुराता हूँ

कभी आंसू भी आते हैं

मगर गिरने नहीं देता

कि कोई लफ्ज़ जो तुमने लिखा

मिट जाए न मेरे आंसू से

कितना अच्छा होता

जो ये सारे ख़त तुम्हारे

तुमने न लिखे होते

या मेरा पता गलत होता

तो आज जब तुम अहद सारे भूल बैठे हो

मैं भी भूल सकता था

सभी क़समें सभी वादे

सभी शिकवे सभी आहें

जो हैं जा ब जा बिखरे हुए

हर एक ख़त की भीगी सत्रों में

और जो… Continue

Added by saalim sheikh on May 8, 2016 at 11:41pm — 5 Comments

पुण्य-तिथि .... (विजय निकोर)

पुण्य-तिथि

(२७ वर्ष उपरान्त भी लगता है ... माँ अभी गई हैं, अभी लौट आएँगी)

माँ ...

रा्तों में उलझे ख्यालों के भंवर में, या

रंगीले रहस्यमय रेखाचित्रों की ओट में

कभी चुप-सी चाँदनी की किरणों में

श्रद्धा के द्वार पर धुली आकृतिओं में

सरल निडर असीम आत्मीय आकृति

माँ की खिलखिलाती मुसकाती छवि

समृतिओं के दरख़तों की सुकुमार छायाएँ

स्नेह की धूप का उष्मापूरित चुम्बन

मेरे कंधे पर तुम्हारा स्नेहिल हाथ…

Continue

Added by vijay nikore on May 8, 2016 at 1:30pm — 31 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 212

कुर्सियों का खेल बस चलता रहा

आदमी हर बार कर मलता रहा।1



रोशनी की खोज में निकले सभी

रोज सूरज भी उगा, ढलता रहा।2



फैलता जाता तिमिर घर-घर यहाँ

बस उजाला हाथ है मलता रहा।3



सींचते बिरवे रहे हम श्वेद से

सूखना असमय जरा खलता रहा।4



मुश्किलें हों लाख दर पे देखिये

हर घड़ी सुंदर सपन पलता रहा।5



पंछियों का क्या ठिकाना,उड़ गये,

है अलग कलरव अमर चलता रहा।6



जो बुझाता आग तपकर रोज ही

आदमी वह आज भी… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 8, 2016 at 7:30am — 6 Comments

मातृ-दिवस पर एक ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222



गगन मेरा पिता है और ये धरती है मेरी माँ

मैं जिसमें लोटता रहता हूँ वो मिट्टी है मेरी माँ



कुशलता से सभी रिश्तों के मनकों को पिरोती है

बड़ी ही नर्म और' मजबूत-सी डोरी है मेरी माँ



ज़माने के सभी रिश्तों को पल-भर में भुला दूँ,पर

मैं उसकी कोख से जन्मा, मेरी अपनी है मेरी माँ



फ़िज़ा में गूंजता हर ओर मातम,जब सिसकती है

दहल जाती है पृथ्वी, जब कभी रोती है मेरी माँ



यही कारण है शायद, मैं कभी मंदिर नहीं जाता

मेरी… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on May 8, 2016 at 7:00am — 5 Comments

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