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औपचारिक्ता की दरकार

औपचारिक्ता की दरकार "

" पागलों की तरह भागते हुए लेक्चरर शिल्पी ने कॉलेज में आये उस नवयुवक को आलिंगन में यूँ जकड़ लिया जैसे वह भाग ना पाये।यह बात पुरे कालेज में जंगल में आग की तरह फैल गयी।जितने मुँह उतनी बातें और उतने ही लांछन!

अपने ऊपर लगते लांछनों ने उसे भीतर तक तोड़ दिया और आज तो उनकी पराकाष्ठा हो गयी थी ।लेकिन कभी-भी हार ना मानने वाली शिल्पी सभ्य सहयोगियों से दो-चार हो ली।



" मैं क्यों बदचलन आवारा हूँ कोई बताएगा मुझे ? क्योकि मैं सबसे हँसकर बात करती हूँ? क्योकि मैंने… Continue

Added by Archana Tripathi on February 18, 2016 at 3:34pm — 8 Comments

मोह के धागे / कहानी / कान्ता राॅय

घर से बहुत दूर निकल आई थी । जाने क्या उद्वेग था कि छोड़ आई पल भर में सब कुछ । पिछले कई सालों से मन बडा उद्विग्न था । जतन करके संभाल रखा  था  लेकिन बाढ़ का पानी ,  सुनता है क्या कभी किसी घाट या  तटबंध को ! सो वेग ना सम्भल सकी , टूट गई । आते वक्त , घर से चार कदम दूर ही निकली थी कि आॅटो मिल गया ।

ऐसा लगा जैसे वह मेरा इंतज़ार ही कर रहा था ।



" स्टेशन चलोगे ? "



" बैठिये "



" कितना लोगे ? "



" १६० रूपये "



" क्या ,मीटर से नहीं चलोगे ?… Continue

Added by kanta roy on February 18, 2016 at 12:55pm — 17 Comments

मेरे महबूब के आमद का जलवा

बहर 1222/1222/1222/1222



मेरे महबूब की आमद का जलवा खूब सूरत है//

जहाँ में रंग है जितने वो उतना खूब सूरत है//



मजे की बात है यारों कोई तारा नही वैसा/

फलक पर आज का महताब जितना खूब सूरत है/1/



चलो अब चाँद तुम अपनी मुहब्बत की सुनाओ कुछ/

सुना है चादनी मांझी का रिश्ता खूब सूरत है /2/



कोई हिंदी में लिखता है , कोई उर्दू में लिखता है/

लिखा जो भी गया है वो तराना खूब सूरत है/3/





कभी तुमसे गिरा था जो बरेली की बजारोमे /

तेरी… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on February 18, 2016 at 9:36am — 3 Comments

भीड़ में दुनिया के हम भी खो गए (ग़ज़ल)

2122 2122 212



भीड़ में दुनिया के हम भी खो गए

ख़ुद से जैसे अजनबी-से हो गए



ज़ख़्म-ए-दिल में थे तेरे बाकी निशां

अश्कों के सैलाब वो भी धो गए



आदमीयत होश में आने लगी

आदमी जब शह्र के सब सो गए



काटता हूँ फ़स्ल अम्न-ओ-चैन की

जो कभी पुरखे थे मेरे बो गए



आसमां ने सुन ली मेरी दास्तान

मेघ भी आके दो आंसू रो गए



लौटकर आए नहीं हैं आजतक

इस नगर से उस नगर तक जो गए

========================



जयनित कुमार… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on February 17, 2016 at 9:35pm — 8 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल प्रयास 6......डॉ. प्राची

2122 1212 22/112

फाइलातुन मुफ़ाइलुन फैलुन



वो जुनूँ है वो दिल की राहत है

हर घड़ी वो मेरी ज़रूरत है



इश्क ही कलमा इश्क ही रोज़ा

इश्क ही अब मेरी इबादत है



ज़र्रे-ज़र्रे में है महक उसकी

उसने हरसू बिखेरी जन्नत है



अब्र बन कर कभी तो बरसे वो

तर-बतर कर दे बस ये चाहत है



उसको पढ़ती हूँ बंद आँखों से

मन के मंदिर में उसकी मूरत है



वो ही दिखता मुझे जहाँ देखूँ

ये करिश्मा है या मुहब्बत है



वो शहंशाह है फकीरी… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 17, 2016 at 12:27pm — 4 Comments

पदोन्नति - ( लघुकथा ) –

पदोन्नति -  ( लघुकथा )  –

"डॉ साहब, बाबूजी ठीक तो हो जायेंगे ना"!

"देखिये कुमार बाबू, ऐसे तो इन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं है मगर इनका मानसिक संतुलन बडी जल्दी जल्दी बिगडता है,उससे ब्लड प्रैसर तेज़ी से  बढ जाता है! इससे लक़वा होने की संभावना रहती है!यदि इसमें सुधार नहीं हुआ तो मानसिक रुग्णालय भेजना पडेगा"!

"आपका मतलब पागलखाने"!

"जी हॉ, वैसे इनको यह दौरे कब से आते हैं"!

"बाबूजी सरकारी विभाग में अधीक्षक थे!बहुत मेहनत और ईमानदारी से कार्य करते थे!समय के पाबंद…

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Added by TEJ VEER SINGH on February 17, 2016 at 11:14am — 14 Comments

सुख के सागर.....

आनंद..!

आनंद का आकार.....

निराकार!

बात-बात पर अट्टहास करते

पल झपकते ही स्वर

हवा में बह जाते.

दिशाओं की कोंख

नित्य जन्मतीं

सूर्य-चंद्र अगणित तारे

सृष्टि के सृजन में

सत्यम शिवम सुंदरम

स्वयं शव!

शांति का संदेश देते ब्रह्म !

ऊंकार,

जीवन पुष्ट करता

जीव !

चक्रवत निरंतर खोजता

जीवन का आनंद..

परमानंद...पर,

आनंद की अनुभूति कभी न हो पाती

मिलता केवल दु:ख

सुख…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 17, 2016 at 8:17am — 4 Comments

वापसी जीवन के उस पार से /कहानी / कान्ता रॉय , भोपाल।

अचानक से कुछ होने लगा था । हल्का सा चक्कर और  पेपर हाथ से सरककर नीचे गिर पडा़ । उठाने को हाथ बढाया तो एहसास हुआ कि  शिथिल पड़ चुका  था मै । देह भी निष्प्राण से हो चले थे । आँखों में ही अब   होश बाकी था शायद ।सब देख और सुन पा रहा था  ।  बगल वाले कमरे में नये साल की पार्टी  अब भी जारी  थी । घर के सब सदस्य ,  बेटे- बहू, नाती- पोते , आज इकट्ठे हो गये थे  जश्न मनाने के लिए ।

मुझे पार्टी में ही तबियत नासाज   लग  रही थी । मै चुपके से  अपने कमरे में आकर  इस आराम चेयर पर एकदम…

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Added by kanta roy on February 16, 2016 at 11:45pm — 7 Comments

प्यार में ....

प्यार में .......

नहीं नहीं

मैं अभी मृत्यु को

अंगीकार नहीं करना सकता//

अभी तो प्रेम सृजन का

शृंगार अधूरा है//

वृक्ष विहीन प्रेम पंथ पर

तलवों की तपिश का

संहार अधूरा है//

पाषाण बने पलों में

किसी लहर के

तट से मिलन का

इंतज़ार अधूरा है//

अभी तो मृत्यु से पूर्व

मुझे उसके लिए जीना है

जिसने आसमान के टूटे तारे से

बंद आँखों से

संग संग जीने की

दुआ माँगी है…

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Added by Sushil Sarna on February 16, 2016 at 9:02pm — 4 Comments


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सूफी शैली में एक गीत ............//डॉ० प्राची सिंह

माही मुझे चुरा ले मुझसे, मेरी प्याली खाली कर दे।

रम जा या फिर मुझमे ऐसे, छलके प्याली इतना भर दे।



मैं बदरी तू फैला अम्बर

मैं नदिया तू मेरा सागर,

बूँद-बूँद कर प्यास बुझा दे

रीती अब तक मन की गागर,

लहर-लहर तुझमें मिल जाऊँ, अपनी लय भीतर-बाहर दे।

रम जा या फिर मुझमे ऐसे, छलके प्याली इतना भर दे।



शब्द तू ही मैं केवल आखर

तू तरंग, मैं हूँ केवल स्वर,

रोम-रोम कर झंकृत ऐसे

तेरी ध्वनि से गूँजे अंतर,

माही दिल में मुझे बसा कर, कण-कण आज तरंगित…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 16, 2016 at 1:37pm — 3 Comments

धन के बल पर नदी मुहाने -ग़ज़ल-(लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

2222    2222    2222    222

********************************

कौन कहेगा  यारो  बोलो बस्ती की मनमानी की

दोष लगाता हर कोई है गलती कहकर पानी की /1



राह रही जो नदिया की वो घर आगन सब रोक रहे

खादर  बंगर पाट रखी  है  नींव नगर रजधानी की /2



भीड़ बड़ी हर ओर  साथ  ही कूड़े का अम्बार बढ़ा

धन के बल पर नदी मुहाने आज पँहुच शैलानी की /3



हम को नादाँ  कहकर कोई बात न कहने देते पर

यार सयानों ने हर दम ही बात बहुत बचकानी की /4



माना सुविधाओं का यारा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 16, 2016 at 12:23pm — 6 Comments

वो बचपन .......

बहर :- 122/122/122/122



हमें प्यार पहलू तू फिर से पढ़ा दे

न चुप बैठ ऐसे हदें सब मिटा दे



तकिया नकूशी रिवाजे बुझा के

तू मजहब भुला प्यार दीपक जला दे



मेरे गांव की तंग गलियों में उनसे

मेरा आमना सामना ही करा दे



बनाये मेरे साथ माटी खिलौने

वो बचपन वो घोड़े वो हांथी दिला दे



वो कश्ती वो बादल वो सावन वो झूले

मुझे आज सारे के सारे हि ला दे



समय तोड़ हद और दे फिर जवानी

मुहब्बत अता कर वो मैकश अदा दे



मेरे… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on February 15, 2016 at 3:33pm — 3 Comments

वेदना

मेट्रो में दो व्यक्तियों को 
वार्तालाप करते हुए पाया 
जब ध्यान से सुना 
तो समझ  में  आया 
ये तो सरकार का 
क्रियाकलाप बता रहे हैं 
देश के भविष्य पर 
भारी चिंता जता रहे हैं 
अपने राजनीतिक ज्ञान पर …
Continue

Added by Sudhanshu Gupta "AGYAAN" on February 15, 2016 at 2:03pm — No Comments


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ग़ज़ल प्रयास 5.....डॉ. प्राची

212 212 212 212



मेरा आँगन गुँजाती है नन्ही परी ।

पंछी बन चहचहाती है नन्ही परी ।



उसकी मुस्कान से फूल सारे खिले

हँस के गुलशन सजाती है नन्ही परी ।



पंखुड़ी सी नज़ाकत को ओढ़े हुए

मेरा मन गुदगुदाती है नन्ही परी ।



सुबह की गुनगुनी धूप जैसी निखर

पूरा घर जगमगाती है नन्ही परी ।



अपनी आँखों में झिलमिल सितारे लिए

स्वप्न अनगिन जगाती है नन्ही परी ।



बाँसुरी की मधुर तान सी लोरियाँ

मेरे होठों पे लाती है नन्ही परी… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 15, 2016 at 1:22pm — 17 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल प्रयास 4.....डॉ. प्राची

1222 1222 122

मुफाईलुन मुफाईलुन फऊलुन



कहा जो सच तुम्हें दिल में चुभा क्या ?

बनी ये दोस्ती अब आइना क्या ?



कहो इस दिल में कोई आ बसा क्या ?

उसे तुम कर रहे हो अनसुना क्या ?



बुरा सपना समझ भूले जिसे थे

अचानक मोड़ पर वो फिर मिला क्या ?



सहन करती है बेटी त्रासदी जो

कभी उसका थमेगा सिलसिला क्या ?



परों को काट बेड़ी डाल दी क्यों

मेरी चाहत का है ये ही सिला क्या ?



बहुत गुमसुम हो, क्यों हो तुम रुआँसे ?

तुम्हें भी… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 15, 2016 at 1:19pm — 3 Comments

चोट खाकर देखिए-ग़ज़ल-(लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

2122    2122    2122    212



इस नगर में हर किसी को इक फसाना चाहिए

ऊँघते  को  ठेलते  का  इक  बहाना  चाहिए /1



कब से ठहरा ताल अब तो मारिए कंकड़ जरा

जिंदगी का लुत्फ  कुछ तो  यार आना चाहिए /2



बेबसी क्यों  ओढ़नी  जब हाथ लाठी कर्म की

द्वार किस्मत का चलो अब खटखटाना चाहिए /3



चोट खाकर देखिए खुद दर्द की तफतीस को

बोलना  फिर  दर्द में  भी  मुस्कुराना चाहिए /4



हो गयी हो पीर  पर्वत  हर दवा जब बेअसर

आँसुओं को किसलिए फिर छलछलाना चाहिए…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 15, 2016 at 12:22pm — 6 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122 2

भौंकते कुत्ते ठिकाना चाहिए अपना

टोकते हर शख्स आना चाहिए अपना।1



राह इतनी है नहीं आसां कि चाहे वह

घुस चले घर में बताना चाहिए अपना।2



देख कुत्ते भी नहीं गाते कभी ऐसे

जय कहें घर की फसाना चाहिये अपना।3



पल गये हो पौध तुम रस पी रहे घर का

शाख भटकी क्यूँ बचाना चाहिये अपना।4



साख कुत्तों ने बचायी है अभी तक भी

ताव दुश्मन को दिखाना चाहिये अपना।5



है नहीं पहचान करने क्या चले हो तुम

जल रहे हैं घर बुझाना… Continue

Added by Manan Kumar singh on February 15, 2016 at 10:08am — 2 Comments

उतार-चढ़ाव (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

घोर निराशा से घिरे पुत्र को जीवन की सच्चाई बताते हुए पिताजी सीख देने की कोशिश कर रहे थे।

"बेटा, ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव से व्यथित मत हो, हर इन्सान के हमसफ़र होते हैं ये सब!"

" लेकिन पिताजी, हमसफ़र के तेवर सबके साथ एक से नहीं होते! स्वाभाविक उतार-चढ़ाव और बनाये गये या थोपे गये उतार-चढ़ाव में ज़मीन आसमान का फर्क है इस स्वार्थी युग में!"- पुत्र ने अपने शैक्षणिक दस्तावेजों की फाइल बंद करते हुए कहा।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 15, 2016 at 9:29am — 8 Comments

चिडिया उड गयी - ( वैलेंटाइन डे पर विशेष ) – ( लघुकथा ) -

चिडिया उड गयी - ( वैलेंटाइन डे पर विशेष ) –  ( लघुकथा ) - 

गोपाल के परिवार को  तीन महीने हो गये थे नये मुहल्ले मेंआये हुए!उसके पडोस में एक सुंदर लडकी रहती थी!शायद कमला नाम था!उसकी मॉ सारे दिन कम्मो कम्मो चिल्लाती रहती थी क्योंकि उसका पैर घर के अंदर नहीं टिकता था!!कमला अधिकतर घर के दरवाज़े पर ,लॉन में,छत पर या झूले पर ही दिखती थी ! धूप हो या ना हो हर समय काला धूप का चश्मा लगाये रहती थी !

गोपाल जब भी उस तरफ़ देखता कुछ ना कुछ इशारे करती दिखती!कभी कभी उसके हाथ में कोई खतनुमा कागज़ भी…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on February 14, 2016 at 10:08pm — 8 Comments

कबाड़ी काल

 कुछ भी

अनुपयोगी नहीं है

उसके लिए

सभी पर है

उसकी निगाहें 

गहन कूड़े से भी

बीन और लेता है छीन

वह

प्राप्य अपना 

जो है जगद्व्यव्हार में

वह भी

और जो नहीं है वह भी

बीन लेगा एक दिन वह 

पेड़ –पौधे,  नदी=-पर्वत

और पृथ्वी

यहां तक की जायेगा ले    

सूरज गगन, नीहार, तारे

चन्द्र भी

ब्रह्माण्ड के सारे समुच्चय

लोग कहते हैं प्रलय 

कहते रहे  

किन्तु तय है

बीन…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 14, 2016 at 7:22pm — 4 Comments

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