Added by जयनित कुमार मेहता on February 9, 2016 at 8:34pm — 11 Comments
वक़्त गुज़रता है गुज़र जाता है
जैसे धूप की सीढ़ियों से दिन
पहाड़ों की रेल पकड़े-पकड़े
हर रोज़ उतर जाता है
जैसे शाम से आगे
रात के अँधेरे में सूरज
किसी अपरास्त सैनिक की मानिंद
भरे-भरे कदमों घर जाता है
बच्चे स्कूल और कॉलेज चले जाते हैं
घर के कुत्ते भी खाना खाकर सो जाते हैं
तोता पिंजरे में टांय टांय करके
झूले से उतर जाता है
और घर के आँगन में
पीपल का…
Added by राज़ नवादवी on February 9, 2016 at 6:00pm — No Comments
हाँ, कुछ महीनों से घर बैठा हूँ
और इसलिए
आजकल कविता ही लिखता हूँ
मगर तुम तो जानती हो
कविता लिखने से काम तो नहीं चलता
बाजारों में कड़कते नोट चलते हैं
और खनकते सिक्के
रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए
शायर का नाम तो नहीं चलता
हाँ, वाहवाहियाँ मिलती हैं
और शाबाशियाँ भी खूब
इरशाद इरशाद कहके चिल्लाते हैं
और देते है तालियाँ भी खूब
लाइक्स भी मिलते हैं और…
Added by राज़ नवादवी on February 9, 2016 at 6:00pm — No Comments
दिल रेल की पटरी है
और तुम एक आती-जाती ट्रेन
तुम सीने को रौंद के जाते हो
तभी अच्छे लगते हो
जब मुफ़स्सिल बियाबानों से
कोहसारों की खुशबू लाते हो
तभी अच्छे लगते हो
कभी चलते-चलते सीटी बजाते,
कभी पहियों से गुनगुनाते हो
तभी अच्छे लगते हो
कभी सुबह की किरणों के संग जगाते
कभी रातों को झुरमुटों में सुलाते हो
तभी अच्छे लगते हो
कभी रुकने वाले स्टेशनों पर न रुक कर
किसी अनजान से मोहल्ले में…
Added by राज़ नवादवी on February 9, 2016 at 6:00pm — 4 Comments
1222 1222 1222 1222
**********************************
सदा सम्मान इकतरफा कहाँ तक फूल को दोगे
तिरस्कारों की हर गठरी कहाँ तक शूल को दोगे /1
उठेगी तो करेगी सिर से पाँवों तक बहुत गँदला
अगर तुम प्यार का कुछ जल नहीं पगधूल को दोगे /2
नदी आवारगी में नित उजाड़े खेत औ बस्ती
कहाँ तक दोष इसका भी कहो तुम कूल को दोगे /3
तुम्हारी सोच में फिरके उन्हें ही पोसते हो नित
सजा तसलीमा रूश्दी को दुआ मकबूल…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2016 at 11:00am — 12 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 9, 2016 at 9:18am — 8 Comments
“वह दौड़ कर अपने बड़े भाई के गले से लग गया और बोला, भईया कितने दिनों बाद मिल रहा हूँ आपसे, बता नहीं सकता कितनी ख़ुशी हो रही है मुझे, बस इस महानगर में अपना ही घर खोजने में जरा सी दिक्कत हुई..हा हा ।“
“हाँ –हाँ ठीक है छोटे, और बताओ कैसे आना हुआ, सब ठीक तो है ना, और माँ-पिताजी कैसे हैं, एक-आध दिन तो रुकोगे ना?”
भाई की नीरसता को देखकर वह कुछ देर के लिए उलझन में पड़ गया पर मुस्कराते हुए बोला नहीं भईया आज ही निकल जाऊँगा, शाम की गाड़ी है, मैं तो बस आपको चाचा की लड़की की शादी का…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on February 9, 2016 at 8:30am — 11 Comments
थाप पे तबले की ....
थाप पे तबले की घुंघरू बजने लगे
किसने पहचानी इनकी परेशानियां
दाम लगने लगे ज़िस्म थिरकने लगे
आई नज़र में नज़र तो बस हैवानियाँ
थाप पे तबले की ......
सब खरीददार थे कोई अपना न था
सूनी आँखों में कोई भी सपना न था
चीर डाला हर एक हाथ ने जिस्म को
बज़्म में चश्म से दर्द छलकना न था
शोर साँसों की सिसकी का हर ओर था
हर सिम्त थी बस नादान नादानियां
पाँव घुंघरू बंधे महफ़िल में बजते रहे
किसने …
Added by Sushil Sarna on February 8, 2016 at 9:58pm — 8 Comments
Added by Samar kabeer on February 8, 2016 at 3:00pm — 30 Comments
Added by Dr.Prachi Singh on February 8, 2016 at 12:30pm — 7 Comments
Added by Rahila on February 7, 2016 at 10:36pm — 27 Comments
ग़ज़ल
गा गा लगा लगा/ लल/ गा गा लगा लगा
.
झीलों में ऐसे..... चाँद डिबोता हूँ आज भी,
आँखों में रख के आप को रोता हूँ आज भी.
.
अब तक दरख्त जितने उगाए, बबूल हैं,
दिल में मगर मैं यादों को बोता हूँ आज भी.
.
आदत में था शुमार तेरे साथ जागना,
तेरे बगैर देर से सोता हूँ आज भी.
.
नमकीन पानियों से जो रंगत निखरती है,
रुख़सार आँसुओं से मैं धोता हूँ आज भी.
.
काँधे पे इक सलीब उठाए फिरा करूँ,
नाकामियों का बोझ मैं ढ़ोता हूँ आज…
Added by Nilesh Shevgaonkar on February 7, 2016 at 9:30pm — 16 Comments
आप कैसे देखते है?
उसे कैसे स्वीकारते है
दुलार्ते हैं या नकारते हैं
यह आप पर निर्भर है.
आपके समाज पर निर्भर है.
कैकेई भी, कौशल्या भी,
देवकी और यशोदा भी
वाचाल मंथरा भी.
पुरुष की जननी भी
माता और भगिनी भी.
ज्वाला की अग्नि भी.
आप कैसे देखते है?
आधुनिकसमाज सुधारकों के अनुसार
दलित, शोषित, पीड़ित,उपेक्षित
वंचित, कुचलित भी वही है.
आप कैसे देखते है?
मौलिक व अप्रकाशित
Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on February 7, 2016 at 4:03pm — 6 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on February 7, 2016 at 12:23pm — 6 Comments
Added by Vijay Joshi on February 7, 2016 at 3:15am — 6 Comments
2122 2122 2122 2122
बत्तियाँ सारी बुझा कर द्वार पर साँकल चढ़ा कर
मस्त वो अपनी ही धुन में मुझको मुझसे ही चुरा कर
साँस हर मदहोश करती हाथ में खुशबू बची बस
फूल सब मुरझा चुके हैं राह में काँटे बिछा कर
क्या उसे एहसास भी है उस सुलगती सी तपिश का
जिस सुलगती राख में वो चल दिया मुझको दबा कर
सींच कर अपने लहू से ख्वाब की मिट्टी पे मिलजुल
जो लिखी थी दास्तां वो क्यों गया उसको मिटा कर
मेरी पलकों पर सजाए उसने ही सपने सुनहरे
जब कहा…
Added by Dr.Prachi Singh on February 6, 2016 at 8:00pm — 13 Comments
संध्या के बाद पूर्व ऊषा तक जो निशि भाग चुना मैंने I
उस शब्द-हीन सन्नाटे में ईश्वर का राग सुना मैंने II
पुच्छल तारे की थी वीणा
शशि-कर के तार सजीले थे
उँगलियाँ चलाता था मारुत
रजनीले लोचन गीले थे
सरगम संगीत प्रवाहित था अपना प्रतिभाग गुना मैंने I
संध्या के बाद पूर्व ऊषा ---------------------------------
मुखरित होता है मौन कभी
नीरवता में भी रव होता
धरती…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 6, 2016 at 2:54pm — 8 Comments
उस गाँव के छोटे से स्टेशन में कोई गाड़ी नहीं रूकती थी , एक दो पैसेंजर गाड़ियों को छोड़कर I वो और जस्सी ,धड धड करके मुहँ चिढ़ाकर निकलती गाड़ियों को खुले मुहँ और फैली आँखों से देर तक देखते रहते थे I उन गाड़ियों के ठन्डे डब्बे जो कांच से एकदम बंद होते थे ,जस्सी को बहुत लुभाते थे I उन दोनों सात आठ साल के बच्चों की आँखों में एक ही सपना हुआ करता था कि ठंडे डब्बे वाली गाड़ी में बैठना है एक दिनI
स्टेशन की बैंच में बैठा वो इन्हीं पुरानी यादों में खोया था I आज स्टेशन का नज़ारा कुछ और…
ContinueAdded by pratibha pande on February 6, 2016 at 2:40pm — 21 Comments
फिर करीने से सजा लूँ मैं तेरी सौगात को
वेदना को कल्पना को इश्क़ को जज़्बात को
इसमें युग युग की विवशता है या कोई शाप है
छूने को साहित्य आतुर सत्ता वाली लात को
अपनी ही करनी का फल है ज़िन्दगी में हर सजा
उनको आँखों में बसाकर जागते हैं रात को
खुद के जैसा रह न पाये और जिन्दा भी रहे
इससे ज्यादा चोट क्या है आदमी की जात को
दूजे पलड़े में सजेगी फलसफा ए ज़िन्दगी
एक पलड़े में चढ़ा दो इश्क़ की शह मात को…
Added by मनोज अहसास on February 5, 2016 at 11:00pm — 5 Comments
१- अच्छे दिन !
सुबह-शाम !
घर-चौबारे आशंकित
प्रतीक्षारत सहेजते हैं...
दीप-बाती और तेल
आक्रोशित तम व्यग्रतावश बिखेर देता
असंख्य नक्षत्र....
भद्रा से प्रभावित
आर्द्रा-रोहिणी
व्यथित कृष्ण-ध्रुव की राह तकती
चांद, बादलों के घात से दु:खी
हवायें दृश्य बदल देतीं
बसंत के इशारों पर पतझड़
होलिका दहन कर बिखेरते
रोशनी,
चांदनी में लम्बी-लम्बी छाया...
ठूंठ वृक्ष,
नंगी टहनियां सब…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 5, 2016 at 10:05pm — 27 Comments
2026
2025
2024
2023
2022
2021
2020
2019
2018
2017
2016
2015
2014
2013
2012
2011
2010
1999
1970
आवश्यक सूचना:-
1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे
2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |
3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |
4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)
5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |
© 2026 Created by Admin.
Powered by
महत्वपूर्ण लिंक्स :- ग़ज़ल की कक्षा ग़ज़ल की बातें ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ रदीफ़ काफ़िया बहर परिचय और मात्रा गणना बहर के भेद व तकतीअ
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम साहित्यकारों व पाठकों का एक साझा मंच है, इस मंच पर प्रकाशित सभी लेख, रचनाएँ और विचार उनकी निजी सम्पत्ति हैं जिससे सहमत होना ओबीओ प्रबन्धन के लिये आवश्यक नहीं है | लेखक या प्रबन्धन की अनुमति के बिना ओबीओ पर प्रकाशित सामग्रियों का किसी भी रूप में प्रयोग करना वर्जित है |