मेरे घर के पास है, एक खुला मैदान,
चार दिशा में पेड़ हैं, देते छाया दान
करते क्रीड़ा युवा हैं, मनरंजन भरपूर
कर लेते आराम भी, थक हो जाते चूर
सब्जी वाले भी यहाँ, बेंचे सब्जी साज.
गोभी, पालक, मूलियाँ, सस्ती ले लो आज…
ContinueAdded by JAWAHAR LAL SINGH on November 25, 2015 at 8:30pm — 4 Comments
संबोधन
“देखो ये बस अब नहीं जा सकेगी खराब हो चुकी है चारो और सुनसान है लगभग सभी सवारियां पैदल ही निकल चुकी हैं ये दो चार लोग ही बचे हैं और बहन, मेरा गाँव पास में ही है पैदल ही चले जाएँगे सुबह खुद मैं तुम्हारे गाँव छोड़ आऊँगा मेरे साथ चलो तुम्हारे लिए यही ठीक रहेगा” सतबीर ने कोमल से कहा |
कोमल ने मन मे बेटी संबोधन, जो कुछ देर पहले बस में बचे हुए उन लोगों ने दिया को बहन के संबोधन से भारी तौलते हुए तथा खुद को मन ही मन कोसते हुए कि किस मनहूस घड़ी में वो पति से लड़कर गाँव…
ContinueAdded by rajesh kumari on November 25, 2015 at 7:32pm — 9 Comments
जब जन्म लिया इस माटी में,
तब आँखो तले अँधेरा था,
जब पलक उठी इस दुनिया में,
माँ के आँचल में हुआ सवेरा था,
फिर दिन चढ़ने और ढ़लने कि,
गुत्थी सुलझाने बैठ गया...,
जब एक तरफ देखा उजियाला
तो दूजी तरफ अँधेरा था ।। 1 ।।
छोटा था तो मन में मेरे,
उठता था एक बड़ा अँधेरा ?
क्यूँ रात होती हैं काली,
क्यूँ दिन को होता हैं सवेरा,
किसी ने बोला ये नियम प्रकति का,
तो कोई कहे इन्हे ग्रहों कि चाल...,
पर सच…
ContinueAdded by DIGVIJAY on November 25, 2015 at 7:30pm — 2 Comments
1222 1222 122
कभी है ग़म,कभी थोड़ी ख़ुशी है..
इसी का नाम ही तो ज़िन्दगी है..
हमें सौगात चाहत की मिली है..
ये पलकों पे जो थोड़ी-सी नमी है..
मुखौटे हर तरफ़ दिखते हैं मुझको,
कहीं दिखता नहीं क्यों आदमी है..?
फ़िज़ा में गूँजता हर ओर मातम,
कि फिर ससुराल में बेटी जली है..
सभी मौजूद हों महफ़िल में,फिर भी,
बहुत खलती मुझे तेरी कमी है..
दहल जाए न फिर इंसानियत 'जय',
लड़ाई मज़हबी फिर से…
Added by जयनित कुमार मेहता on November 25, 2015 at 4:50pm — 8 Comments
सच है
कि, प्रकृति स्वयं जीवों के विकास के क्रम में
जीवों की शारिरिक और मानससिक बनावट में
आवश्यकता अनुसार , कुछ परिवर्तन स्वयं करती है
चाहे ये परिवर्तन करोड़ों वर्षों में हो
इसी क्रम में हम बनमानुष से मानुष बने …..
लेकिन ये भी सच है कि,
मानव कुछ परिवर्तन स्वयँ भी कर सकते हैं
अगर चाहें तो
और फिर हमारा देश तो आस्था और विश्वास का देश है
जहाँ यूँ ही कुछ चमत्कार घट जाना मामूली बात है
मै तो इसे मानता हूँ ,…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on November 25, 2015 at 7:00am — 7 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 25, 2015 at 4:16am — 5 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 25, 2015 at 1:19am — 5 Comments
न जग तेरा है .....
न जग तेरा है न मेरा है
बस दो साँसों का डेरा है
है पल भर की बस भोर यहां
पल अगला घोर अँधेरा है
न जग तेरा है ....
मैं पथ का कोई शूल कहूँ
या जीवन कोई भूल कहूँ
इक पल यहाँ पर है उत्सव
पल दूजा दुख का डेरा है
न जग तेरा है ....
स्वर प्रेम नीड को ढूंढ रहे
दृग पीर नीर में मूँद रहे
है नीरवता हर ओर यहां
विष सेज पे सुप्त उजेरा है
न जग तेरा है ....
अभिलाष हृदय की…
Added by Sushil Sarna on November 24, 2015 at 9:35pm — 4 Comments
Added by gumnaam pithoragarhi on November 24, 2015 at 7:37pm — 8 Comments
"लाहोल विला कुव्वत! जाने इतनी रात गए कहां आवारगी करता फिरता है ये लड़का।" अम्मीजान की कोशिश के बाद भी जफ़र के रात दूसरे पहर घर में घुसते ही अब्बूजान की आँख खुल गयी और वो बड़बड़ाने लगे।
"कुछ गलत न करे है मेरा ज़फर, अब सारा दिन किताबो में मगजमारी करने के बाद कुछ देर दोस्तों में गुजार ले तो हर्ज ही क्या है?" अम्मी ने उसकी तरफदारी की कोशिश की।
"तो वही जाहिल लोग रह गए है दोस्ती के लिए।" अब्बु ने अम्मी पर तंज भरी नज़र डालते हुए कहा।
"अब्बु अब ऐसे भी जाहिल न है वो लोग।" ज़फ़र चुप न…
Added by VIRENDER VEER MEHTA on November 24, 2015 at 6:30pm — 5 Comments
२१२२ ११२२ ११२२ २२
अपनी खुशियों पे नया रंग चढ़ाकर देखो
बंद पिंजरे के ये पंछी तो उड़ाकर देखो
मेरी आँखों से बहा जाता है आँसू बनकर
अपनी यादों में कभी खुद को जलाकर देखो
बात बन जायेगी बिगड़ी है जो सदियों से यहाँ
तुम ज़रा अपनी अना को तो झुकाकर देखो
सिर्फ बातों के सहारे न हवा में उड़ना
तुम हकीकत नज़र आज मिलाकर देखो
तुमको हर नेकी के बदले में मिलेगी खुशियाँ
राह में सबके…
ContinueAdded by नादिर ख़ान on November 24, 2015 at 6:30pm — 12 Comments
22---22---22---22---22---2 |
|
दुख देने को आये जो हालात, सुनो |
अपना दिल भी पहले से तैनात सुनो |
|
दे देना फिर तुम भी उत्तर, सुन लूँगा… |
Added by मिथिलेश वामनकर on November 24, 2015 at 11:25am — 22 Comments
29
आँखों में भय लिये
आज्ञाकारिता तय किये,
क्षुधोदर की भूले
बड़ी देर के बाद बैठ पाया था।
कंपायमान हाथों से
चलायमान श्वासों से ,
भुंजे हुए महुओं की छोटी सी
पोटली बस खोल ही पाया था।
जीवन समर्पित कर
मालिक को अपना कर
स्मृत अहसानों ने
छोटा सा उलहना दे पाया था।
ज्वार की वह बासी रोटी
गिजगिजी बहुत मोटी
महुओं सहित इस अनोखे भोजन को
कर ही न पाया था।
मालिक ने पुकारा...…
ContinueAdded by Dr T R Sukul on November 23, 2015 at 10:30pm — 4 Comments
Added by amod shrivastav (bindouri) on November 23, 2015 at 2:28pm — 6 Comments
Added by amod shrivastav (bindouri) on November 23, 2015 at 2:24pm — 5 Comments
Added by शिज्जु "शकूर" on November 23, 2015 at 12:57pm — 13 Comments
जिन्दगी में जीत का तब,
कुछ नहीं संशय रहा,
धैर्य का जब जब सहारा,
हर घड़ी , हरशय रहा ।
जिन्दगी में दिन सितम के,
भी सभी कट जायेंगे ।
जिन्दगी की ठोकरों ने ,
जब मुस्कुरा कर ये कहा।
रात काली भी गुजर…
ContinueAdded by Ajay Kumar Sharma on November 22, 2015 at 11:52am — 3 Comments
दुनिया देती मुझे बधाई, कि मैं कितना संभल गया
मुझे ग्लानि, आंख में पानी, कि मैं इतना बदल गया
एक समय होता था जब मैं,
न्याय की बात पर अड़ जाता था
आग धधकती थी सीने में
हर जुल्मी से भिड़ जाता था
अब रोज़ द्रौपदी होती नंगी, खून ज़रा भी नहीं खौलता
कोई सूरज को भी चांद कहे तो, चुप रहता हूं नहीं बोलता
कहते हैं सब भला हुआ कि अब चुक सा गया हूं मैं
सच तो ये है लेकिन अब, ज़रा थक सा गया हूं मैं .
थक गया हूं झूठे रिश्तों का, बोझ…
ContinueAdded by प्रदीप नील वसिष्ठ on November 22, 2015 at 10:00am — 11 Comments
२१२२ २१२२ २१२२ २१२२ - रमल मुसम्मन सालिम
जो ख़ुशी से दान दे वो ग़म कभी करता नही है।
जो किसी पे जान दे वो आह भी भरता नहीं है ।
है अगर दिल में ख़ुशी तो चैन से सोते सभी हैं,
गम समाया है कहीं तो नींद भी भरता नहीँ है ।
हार हो या जीत हो ये तो कहीं वश में नहीं है ,
दिल लगाकर छोड़ देता वो कभी डरता नहीं है।
राह में चलते हुए भी घर बसा लेते कहीं भी ,
रेत का घर जब गिरे ग़म कोई भी हरता नहीं है ।
फूल हो जब डाल पे झूमे हवा में हर ख़ुशी में ,
तोड़ कर कोई रखे जब आह…
Added by Shyam Narain Verma on November 21, 2015 at 4:30pm — 2 Comments
आगरा से लखनऊ का छ-सात घंटे का सफ़र | ट्रेन खचाखच भरी हुई थी, पर भला हो उस दलाल का,जिसने सौ रूपये ज्यादा लेकर सीट कन्फर्म करा दी थी | वरना सिविल सेवा परीक्षा देने जाना बड़ा भारी लग रहा था | दोनों ही सहेलियों ने गेट से लगी सीट पर धम्म से बैठ कब्ज़ा जमा लिया था | सामने फर्श पर सामान्य कद-काठी का शरीरधारी, किसी दूसरे ग्रह का प्राणी लग रहा था | मैला-कुचैला सा कम्बल अपने शरीर के चारो तरफ लपेटे बैठा था | रह-रह सुमी उसे हिकारत…
ContinueAdded by savitamishra on November 21, 2015 at 10:00am — 11 Comments
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