Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 21, 2015 at 9:27am — 9 Comments
2122 2122 2122
भागता ही जा रहा है बेतहाशा..
आदमी के हाथ लगती बस हताशा..
मुस्कराहट लब से गायब हो रही है,
पाँव फैलाए खड़ी जड़ तक निराशा..
नष्ट होती जा रही वो स्वर्ण-मूरत,
वर्षों में पुरखों ने जिसको था तराशा..
सुबह का भूला अभी लौटेगा शायद,
सूर्य की अंतिम किरण तक है ये आशा..
है न भक्तों को कफ़न तक भी मयस्सर,
देवता कुर्सी पे खाते हैं बताशा..
जान पंछी की निकलने पर तुली है,
और सारे…
Added by जयनित कुमार मेहता on November 20, 2015 at 10:02pm — 6 Comments
अरकान - 2122 2122 2122 212
आप आये और मेरा दिन सुनहरा हो गया|
आपको देखा तो मेरा फूल चेहरा हो गया|
कुछ समय पहले तलक तो थी हरी यें वादियाँ ,
आपके जाते ही तो हर सिम्त सहरा हो गया|
क़त्ल का ए सिलसिला क्यों और आगे बढ़ गया,
जब से मेरे गाँव में कुछ सख्त पहरा हो गया |
लाख चीखो और चिल्लाओ सुनेगा कौन अब,
हाय पत्थर दिल ज़माना आज बहरा हो गया|
जख्म तो बस जख्म था जो भर भी सकता था मगर…
ContinueAdded by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 20, 2015 at 10:00pm — 1 Comment
बढ़ती हुई महंगाई में हाल बुरा है,
कुछ पूछो तो कहते हैं, सवाल बुरा है।
पेट्रोल, डीजल, सब्जियां आकाश छू रहीं,
कम होने की उम्मीद का, खयाल बुरा है।
संसद में अमन चैन है, धमाल हो रहा,
जनता की रसोई में अब, बवाल बुरा है।
ठोकते हैं ताल, अपने राग में तल्लीन,
उठा पटक का इनका सब, चाल बुरा है।
दुश्मन हैं ये आपसी, दुनिया की नज़र में,
नेता की शकल में हर, दलाल बुरा है…
ContinueAdded by Ajay Kumar Sharma on November 20, 2015 at 9:05pm — No Comments
अजी सुनते हो ..... पप्पू के पापा ।
धीरे बोलो भागवान, पड़ोसी क्या सोचेंगे।
मैंने कहा छोटे बड़े मँझले साहित्यकारों और पुरस्कृत कुछ लोग लुगाइयों में सम्मान लौटाने की होड़ लगी है। इन सब के थोपड़े हर चैनल्स में बार बार दिखाया जा रहा है। आप भी अपना सम्मान लौटा दीजिये।
कौन सा सम्मान ?
ये लो, ऐसे पूछ रहे हो जैसे 10–20 पुरस्कार और सम्मान प्राप्त कर चुके हो और सिर्फ नोबेल पुरस्कार ही लेना बाकी है। अरे जीवन में एक ही बार तो सम्मानित…
ContinueAdded by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 20, 2015 at 2:19pm — 9 Comments
Added by आशीष यादव on November 20, 2015 at 7:30am — 8 Comments
श्याम हमारे दिल से पूछो, कितना तुझको याद किया|
भूल गई मैं सारे जग को, फिर भी तेरा नाम लिया|
यादों में तेरी मुरली वाले, जीवन यूँ ही गुजार दिया,
श्याम हमारे दिल से पूछो, कितना तुझको याद किया|
देख के तेरी भोली सूरत हम भी धोखा खा ही गए,
मोहन तेरी मीठी-मीठी बातों में हम आ ही गए,
हार गए जीवन में सब फिर भी तेरा नाम लिया
श्याम हमारे दिल से पूछो, कितना तुझको याद किया|
करती हूँ कोशिश मैं मोहन याद हमेशा तुम आओ,
रह नही सकती…
ContinueAdded by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 19, 2015 at 8:30pm — 2 Comments
मौन रहकर साज भी,
हैं ध्वनित होते नहीं,
कुछ बोलने दे आज,
मन की बात कहने दे मुझे ।
है नहीं ख्वाहिश कि,
सुन्दर सा सरोवर मैं बनूँ,
धार हूँ नदिया की मैं,
मत रोक बहने दे मुझे । हर एक पल भी…
ContinueAdded by Ajay Kumar Sharma on November 19, 2015 at 8:08pm — 5 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 19, 2015 at 8:06pm — 11 Comments
मेरी बेटी ने गमले में
लॉलिपॉप बो दिया हैI
खुद को पूरा भिगो कर
पानी भी देती है
मिठास की लहलहाती फसल का
इंतज़ार कर रही है I
पगली ने उस दिन
कागज़ का तिरंगा भी बो दिया था
कि ढेर सारे तिरंगे
ढेर सारा देश प्रेम उगेगा I
बच्चों की बातें हैं
ऐसी ही बेतुकी ,नासमझ I
हम तो बड़े हैं ,समझदार हैं
हम थोड़ी करते हैं विश्वास
इन बातों पर ,हैं ना ?
मौलिक व् अप्रकाशित
Added by pratibha pande on November 19, 2015 at 5:30pm — 8 Comments
ईश कृपा से ही हुऐ, सात दशक ये पार,
बाँट सका सुख-दुख सदा,उन सबका आभार | - 1
सहयोगी मन भाव से, दिया जिन्होनें साथ,
आभारी उनका सदा, भली करेंगे नाथ | - 2
सीख मिली जिनसे सदा, उनका ऐसा कर्ज,
चुका सकूँ क्या मौल मै, पूरा करने फर्ज | = 3
गुरुजन को मै दे सकूँ, क्या ऐसी सौगात,
सूरज सम्मुख दीप की, आखिर क्या औकात |-4
कृपा करे माँ शारदा, तब कुछ मिलता ज्ञान,
विद्वजनों के योग से, लिया सदा संज्ञान | =…
ContinueAdded by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 19, 2015 at 5:00pm — 8 Comments
122 122 122 122
अजब इक तमाशा है ये ज़िन्दगी भी।
बिछड़ना है सबकुछ मगर दिल्लगी भी।।
बहुत बेमुरव्वत है तासीर दिल की।
मिली जितनी उतनी बढ़ी तिश्नगी भी।।
जमीं हो या आँखें...ख़ुशी हो या हो गम।
है अच्छी नही देर तक खुश्कगी* भी।। (सूखापन)
कहानी मुहब्बत की है तो पुरानी।
नयी सी मगर इसमें है ताजगी भी।।
न समझा कोई हुस्नो-इश्को-वफ़ा पर।
हरिक को है पर इनसे बावस्तगी* भी।। (सम्बद्धता)
ये माना कि बरबादियाँ भी बहुत की।…
Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on November 19, 2015 at 1:30pm — 6 Comments
Added by गिरिराज भंडारी on November 19, 2015 at 9:47am — 9 Comments
221-2121-1221-212 |
|
चैनो-सुकून, दिल का मज़ा कौन ले गया |
दामन की वो तमाम दुआ, कौन ले गया? |
|
ताउम्र समंदर से मेरी दुश्मनी… |
Added by मिथिलेश वामनकर on November 18, 2015 at 10:12pm — 10 Comments
अरकान - 122 122 122 122
नया कोई सपना सजाकर तो देखो|
परायों को अपना बनाकर तो देखो
लगेगी ए दुनिया तुम्हें खूबसूरत,
ज़रा दिल से नफ़रत भुलाकर तो देखो|
सफलता मिलेगी तुम्हें भी यकीनन,
कदम अपने तुम भी बढाकर तो देखो|
बहू-बेटियाँ क्यों न पर्दा करेगी,
हया उनको तुम भी सिखाकर तो देखो|
करोगे जहां को भी सूरज –सा रोशन,
तुम अपने को पहले तपाकर तो देखो|
बनेंगे…
ContinueAdded by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 18, 2015 at 6:30pm — 9 Comments
सोहन नर्मदा किनारे महिष्मति क्षेत्र में नर्मदा परिक्रमावासियो की लिए सदाव्रत प्रारम्भ करने जा रहा है। उसकी आँखों में वह दृश्य घूमने लगा। जल पीकर सीढ़ियों पर लेटे सोहन को बेहोशी छाने लगी। उस पार से आ रही एक नाव की सवारी ने उसे जगाया।
"भाई तू ब्राह्मण का बालक है ना ? यह अन्न दान लेI"
अपनी पहनी हुई धोती में वह अन्न लेकर सोहन मौत के मुँह से घर लौटा आया।
"आज घर में केवल दलिया शेष बची थी। तेरे पिता जी को जोरो से भूख लगी थी, सो मैंने खिला दी,बेटा|" स्कूल से लौटकर…
Added by Vijay Joshi on November 18, 2015 at 12:00pm — 4 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 18, 2015 at 3:55am — 9 Comments
कुछ एक बातें …
कुछ एक बातें ऐसी हैं
कुछ एक बातें वैसी है
होठों पर लज्जा वाली
भीगी रातों जैसी हैं
कुछ एक बातें …
हृदय के सागर पर लिखी
अमर प्रीत की बात कोई
शब्द नीड़ में जागी सोई
अलसायी बातों जैसी हैं
कुछ एक बातें …
मन के अम्बर पर कोई
दीप प्रीत के जला गया
मधुपलों की सिमटी सी
कुछ यादें मेघों जैसी हैं
कुछ एक बातें …
इक शीत बूँद अंगारों पर
तृप्ति पूर्व ही झुलस गयी
हार जीत की नैनझील पर…
Added by Sushil Sarna on November 17, 2015 at 7:21pm — 4 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 17, 2015 at 5:09pm — 4 Comments
तेरी याद आई, तो आती चली गई|
गहरे तक दिल को जलाती चली गई||
.
कितने दिन हुए तुमसे मिले हुए|
याद तेरी हमको, याद दिलाती चली गई||
कौन मानेगा , हम तड़प रहे हैं यहाँ|
तुम वहां दूर, ललचाती चली गई||
.
मुझको यकीन है हम एक ही तो हैं|
यही सोच दूरी, मिटाती चली गई||
.
कितने मंजर नजर के सामने से गुजरे|
हर मंजर में तू, झलक दिखलाती चली गई||
.
लिखने को गज़ल लिख रहा हूँ मैं|
सच तो ये है कि तू लिखती…
ContinueAdded by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on November 17, 2015 at 4:56pm — 1 Comment
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