तलाश
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निकल पड़ा हूँ
रोज की तरह आज भी
तलाश में ?
रोटी की
गोल हो , पतली या मोटी
जली काली , सफ़ेद
क्या फर्क
स्वाद तों एक ही होगा
कैसे ढूंढ लेते हो
अंतर
पांच सितारा होटल के नीचे पड़े
बजबजाते कूड़े में पडी
और
सुखिया के चूल्हे में सिंकी
सोंधी गंध वाली रोटी में
तुम्हें पता है ?
भूख कैसी होती है ?
मैं जानता हूँ।
मौलिक और अप्रकाशित
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा
Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 16, 2015 at 11:45am — 4 Comments
२२ २२ २२ २
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यार कभी तू ऐसा कर
रस्ता मेरा देखा कर
याद किया बरसों तुझको
इक पल तू भी सोचा कर
अपने दाम लगा फिर तू
हाट लगा कर बेचा कर
सूरज चाँद पकड़ने में
जुगनू को मत छोड़ा कर
फोन खरीदा महँगा तो
इक दो कॉल मिलाया कर
बन झूठा बीमार कभी
रस्ता सबका ताका कर
तेरा भी है नाम…
ContinueAdded by gumnaam pithoragarhi on July 16, 2015 at 11:17am — 3 Comments
22 22 22 22 22 22 22 2 ---
पेडों पर इल्जाम लगा वो ख़ुद की खातिर जीता है
सोच रहा हूँ मैं सागर क्या अपना पानी पीता है ?
झूठा- सच्चा , सही ग़लत ये सब बे पर की बातें हैं
दिखे फाइदा, सच को मोड़ो जिसको जहाँ सुभीता है
सभी उँगलियाँ अलग हो गईं अहम बीच में आने से
चुल्लू में कुछ रुका नहीं , जो रीता था, वो रीता है
शब्द कोश बस रट लेने से भाव नहीं पैदा होता
व्यर्थ हाथ में रख लेना क़ुरआन बाइबिल गीता…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on July 16, 2015 at 7:39am — 15 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on July 16, 2015 at 1:00am — 10 Comments
Added by amod shrivastav (bindouri) on July 16, 2015 at 12:10am — No Comments
Added by amod shrivastav (bindouri) on July 16, 2015 at 12:06am — No Comments
Added by amod shrivastav (bindouri) on July 16, 2015 at 12:02am — No Comments
Added by amod shrivastav (bindouri) on July 15, 2015 at 11:50pm — No Comments
Added by amod shrivastav (bindouri) on July 15, 2015 at 11:48pm — No Comments
Added by amod shrivastav (bindouri) on July 15, 2015 at 11:30pm — 5 Comments
ऐसी दुनिया संभव ही नहीं है
जिसमें ढेर सारे बाज़ हों और चंद कबूतर
बाज़ों को जिन्दा रहने के लिए
जरूरत पड़ती है ढेर सारे कबूतरों की
बाज ख़ुद बचे रहें
इसलिए वो कबूतरों को जिन्दा रखते हैं
उतने ही कबूतरों को
जितनों का विद्रोह कुचलने की क्षमता उनके पास हो
कभी कोई बाज़ किसी कबूतर को दाना पानी देता मिले
तो ये मत समझिएगा कि उस बाज़ का हृदय परिवर्तन हो गया है
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(मौलिक एवं अप्रकाशित)
Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 15, 2015 at 10:55pm — 10 Comments
मॉनसून का मौसम इस वर्ष भी ना के बराबर ही रहा प्रदेश में , तेज चटक धूप ने धरती को चीर कर रख दिया था , भूमि बंजर हो गई थी । ठीक वही हालात अनन्या के भी थे ।
छोटी उम्र में शादी , दूसरे दिन पति के स्वर्गवास होने का दंश भी ससुराल वालों ने उसके मत्थे मड़ दिया । बापू आये और बिटिया को वापस घर ले गये ।
कुछ ही वर्षों में बिटिया के वैधव्य के गम में पिता भी चल बसे । घर का सारा बोझ उसने अपने कन्धे पर ले लिया ।
एक बार सावन में अपनी सखियों के साथ बारिश में…
ContinueAdded by Pankaj Joshi on July 15, 2015 at 4:38pm — 6 Comments
Added by babita choubey shakti on July 15, 2015 at 4:18pm — 2 Comments
विश्लेषण
फिर आज समय है विश्लेषण का
क्या खोया क्या पाया हमने
क्या अपराधी नहीं बने हम
विस्मृत कर बापू के सपने
डटे रहे जो निर्भय रण में
सत्य अहिंसा का संबल ले
डिगे तनिक न सत्य मार्ग से
अविजित दुरूह आत्मबल ले
पर उनकी संतान आज
सब भूल रही है
विचलित औ ' पथ भ्रष्ट
अधर में झूल रही है
स्वर्णिम भारत के सब सपने
पिघल रहे हैं
धनिक आज…
ContinueAdded by Tanuja Upreti on July 15, 2015 at 10:30am — 6 Comments
2122 2122 2122 212
क्या मरासिम को हमारे इक सज़ा ही मान लूँ
क़ातिबे तक़दीर की कोई जफ़ा ही मान लूँ
भीड़ में मुझ तक पहुँच के थम गये थे जो क़दम
तुम कहो तो इत्तफाकन सामना ही मान लूँ
आपकी आँखों ने लिक्खे थे कई ख़त जो मुझे
हर्फ़े बेमानी समझ उनको अदा ही मान लूँ
बन्द आखें , हाथ ऊपर कर जो मांगी थी कभी
अब असर से क्या उसे मैं बद दुआ ही मान लूँ
अब परिंदे प्यार के उड़ कर नहीं आते इधर
क्यों न…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on July 15, 2015 at 9:16am — 22 Comments
नीरवताएँ
दुखपूर्ण भावों से भीतर छिन्न-भिन्न
साँस-साँस में लिए कोई दर्दीली उलझन
मेरे प्राण-रत्न, प्रेरणा के स्रोत
तुम कुछ कहो न कहो पर जानती हूँ मैं
किसी रहस्यमय हादसे से दिल में तुम्हारे
है अखंडित वेदना भीषण
चोट गहरी है
दुख का पहाड़ है
दुख में तुम्हारे .. तुम्हारे लिए
दुख मुझको भी है
रंज है मुझको कि संवेदन-प्रेरित भी
मैं कुछ कर नहीं पाती
खुले रिसते घाव को तुम्हारे
सी नहीं…
ContinueAdded by vijay nikore on July 15, 2015 at 3:30am — 14 Comments
बरसों से पति का शराब पीकर मारने की आदत सह रही थी वो , लेकिन कल रात उसका पीकर आने के बाद बेटी का हाथ पकडना अखर गया था ।
सुबह अंगीठी के साथ वह भी सुलगती रही. क्षोभ , घृणा , मोह और कुंठाओं को सिलबट्टे पर बरसों से संचित आँखों का नमकीन पानी डाल - डाल कर जोर - जोर से पीसती जा रही थी । आज वह कुछ तय कर बैठी थी ।
कान्ता राॅय
भोपाल
मौलिक और अप्रकाशित
Added by kanta roy on July 14, 2015 at 11:00pm — 4 Comments
इस बार वह अकेली मायके आई थी. वो जब भी आती, बाबा से लिपट जाती. बाबा खूब दुलारते. बाबा की परी थी वो.
लेकिन इस बार बाबा बस ससुराल वालों की खैर-खबर पूछकर बाहर चले गए. माँ ने भी उसकी पसंद का भोजन पकाया था. तृप्त तो हो गई वो, मगर उसे घर के माहौल में आये बदलाव को भांपते देर न लगी. आज पूरे पंद्रह दिन हो गए थे उसे यहाँ आये हुए. बाबा बेटे की बेरोजगारी और आवारागर्दी से अब अधिक ही परेशान दिखने लगे थे. उसकी उलटी सीधी मांगों को इसी भय से मान लेते कि कहीं कुछ कर न ले. उसे भी भइया को देख कर…
ContinueAdded by मिथिलेश वामनकर on July 14, 2015 at 10:30pm — 27 Comments
वृक्ष ने बादलों से पूछा, "हर साल की तरह इस बार कोयल को साथ क्यों नहीं लाये, उसकी कूक के बिना बरसात अच्छी नहीं लगेगी?"
"तुम्हारी जिस डाली पर वो बैठती थी, उसके ऊपर के पत्ते झड़ गये हैं, वो भीग कर मर जाये, इससे अच्छा आये ही नहीं|"
पास ही घर में एक गर्भवती पलंग पर अधलेटी नम आँखों से अपने गर्भ परिक्षण के परिणाम का इंतजार कर रही थी|
(मौलिक और अप्रकाशित)
Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 14, 2015 at 9:30pm — 5 Comments
बारिश थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। कच्ची छत से पानी की धाराएं निरंतर बह रहीं थीं। टपकते पानी के लिए घर में जगह जगह रखे छोटे बड़े बर्तन भी बार बार भर जाते। उसके बीवी बच्चे एक कोने में दुबके बैठे थे। परेशानी के इसी आलम में कवि सुधाकर टपकती हुई छत के लिए बाजार से प्लास्टिक की तरपाल खरीदने चल पड़ा। चौक पर पहुँचते ही पीछे से किसी ने आवाज़ दी:
"सुधाकर जी, ज़रा रुकिए।" आवाज़ देने वाला उसका एक परिचित लेखक मित्र था।
"जी भाई साहिब, कहिए।"
"अरे भाई कहाँ रहते हैं…
Added by योगराज प्रभाकर on July 14, 2015 at 8:30pm — 15 Comments
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