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वाह रॆ ! कानून बनानॆ वालॊ

वाह रॆ !

कानून

कानून बनानॆ वालॊ

और

कानून के रखवालॊ

अपनी आपनी पगड़ी सँभालॊ,

राज्य सभा मॆं

पचास प्रतिशत का आरक्षण

और

चौराहॆ पर आबरू का भक्षण,

कहनॆ कॊ अधिकार दियॆ हैं सम,

मॆरॆ जन्म पर छा जाता है मातम,

और ज्यॊं- ज्यॊं मॆरी उम्र बढ़नॆ लगती है

परिवार पर नई आफ़त चढ़नॆ लगती है,

घर की चौखट दायरा समेटनॆ लगती है,

जब बॆटी अपना दुपट्टा लपॆटनॆ लगती है,

मॆरी किस्मत चूल्हा चौंका बर्तन रॊटी,

ऊपर सॆ घर भर की सब…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on December 24, 2012 at 5:30pm — 16 Comments

फुसलाने निकले

फुसलाने निकले

हम जिनको समझाने निकले
वो हमसे भी सयाने निकले

अनजाना समझा था जिनको
सब जाने पहचाने निकले

चेहरों पर लेकर खुशी
दर्द को छिपाने निकले

जिनको हमदम मान लिया था
दुश्मन वही पुराने निकले

जब पीने की दिल मे ठानी
बंद सभी मयखाने निकले

स्वांग ग़रीबी का करते थे
उनके घर तहख़ाने निकले

अब चुनाव जब सर पे आया
तो लोंगो को फुसलाने निकले

Dr. Ajay Khare Aahat

Added by Dr.Ajay Khare on December 24, 2012 at 12:00pm — 11 Comments

नारी -सम्मान

मात्री भगिनी भार्या रूप नारी

मान जिनका अब खो रहा

ठहाका लगा रहा दुराचारी

क्यों दुयोधन हो रहा

                                                        
निर्मल मन सरल कोमल

करुना धारा वो कल- कल

गले लगा सब गरल जल

पालन करती तेरा पल -पल

निर्मम कांटे क्यों बो रहा

क्यों दुयोधन हो रहा



साक्ष्य तुझे मैं क्या दूँ 
तू नर है , महा बलधारी 
पौरुष फिर भी ,तेरा तोल  दूँ 
उदित करती तुझे वो…
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Added by ritesh singh on December 24, 2012 at 11:00am — 6 Comments

आप तब गोली चलाना सीखिये..........

खुद को जब खुद से बचाना सीखिये

आप तब गोली चलाना सीखिये

पीर को खंजर, बनाना सीखिये

गर्दनें गम की उड़ाना सीखिये

पी रहे है खून दुनिया का बड़ा

खून के इनको बहाना सीखिये

दाग ये काले, घिनौने है बड़े

दाग को जड़ से मिटाना सीखिये

चोट से, मरते नहीं है नाग जो

आग से इनको जलाना सीखिये

.…

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Added by अमि तेष on December 23, 2012 at 9:30pm — 9 Comments

भेडियों के राज में शेरों की हस्ती देखिये

==========ग़ज़ल===========



भेडियों के राज में शेरों की हस्ती देखिये

फिर रहे डंडा दिखाते सरपरस्ती देखिये



राजधानी में लगी यूँ आग गर्मी आ गयी 

हो रही सड़कों में अब पानी से मस्ती देखिये 



वो बुरा कहते नहीं सुनते नहीं देखें नहीं

खामखा ही…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 23, 2012 at 8:29pm — 11 Comments

तुम्हारे साथ ....

ओ तरुणी

मेरे आंसू

तेरे दुख

कम नहीं कर पाएँगे

मेरी संवेदनाएँ

तेरे जख्म नहीं भर पायेंगे 

तार -तार हैं सपने तेरे

रोम रोम में जहर भर गए

कुंठित होगा मन का कोना

घृणा के ज्वार पे तुम सवार

बदले की आग में भी जलोगी

ना कुछ करने की विवशता

आत्महत्या के लिए प्रेरित करेगी

ओ मेरी अनजान…

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Added by MAHIMA SHREE on December 23, 2012 at 6:30pm — 23 Comments

पुकार

पुकार 

---------

साहित्य के सिपाहसालारों
धार लेखनी क्यों पडी मंद 
हाहाकार मचा चहुँ ओर 
समर भूमि में…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 23, 2012 at 12:52pm — 17 Comments

इसी देश की धरती पे थे, जन्मे स्वयं विधाता

यही देश था वीरों की, गाता अद्भुत गाथा,

इसी देश की धरती पे थे, जन्मे स्वयं विधाता,



कभी यहाँ प्रेम -सभ्यता, की भी बात निराली,

आज यहाँ प्रणाम नमस्ते, से आगे है गाली,

इक मसीहा नहीं बचा है, कौन करे रखवाली,

शहरों में तब्दील हो रही, प्रकृति की…

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Added by अरुन 'अनन्त' on December 23, 2012 at 11:43am — 10 Comments

एक प्रयास दो रंग. मुक्तहरा सवैया (जगण x 8)

नवीन लगे दिन रात नवीन सुहावत है हर बात नवीन/

नवीन खिले सब फूल-बहार,बयार चली भर शीत नवीन/

नवीन मिला जब साथ भई हथ हाथ लिए कुछ बात नवीन/

नवीन प्रसंग नवीन उमंग मिला मन को मन मीत नवीन//

करो न बचाव मिले उसको भरपूर सजा अरु दंड कठोर/

बने जहं भी नर कोय पिशाच, चुभे उसको गल फांस कि डोर/

जहां नित शोषित नार रहे सरकार में शामिल हों सब चोर/

वहाँ न सुरक्षित नार रहे घरबार न द्वार न मित्र न मोर/

Added by Ashok Kumar Raktale on December 23, 2012 at 9:30am — 14 Comments

शीत के दुर्दिन का ढो रहे संत्रास , क्या करे क्या न करे फुटपाथ ||

शहरो के बीच बीच सड़कों के आसपास |

शीत के दुर्दिन का ढो रहे संत्रास , क्या करे क्या न करे फुटपाथ || 



सूरज की आँखों में कोहरे की चुभन रही 

धुप के पैरो में मेहंदी की थूपन रही 

शर्माती शाम आई छल गयी बाजारों को 

समझ गए रिक्शे भी भीड़…

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Added by ajay sharma on December 22, 2012 at 10:30pm — 3 Comments

समर्पण

                                                              समर्पण

          (यह कविता मैं अपनी जीवन साथी, नीरा जी, को सादर समर्पित कर रहा हूँ)

 

                             तुम

                             मेरे शब्दों को पी लेती हो,…

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Added by vijay nikore on December 22, 2012 at 8:18pm — 12 Comments

बलात

बलात 

-------



चप्पे चप्पे पर है दुशासन 

फिर मौन भला क्यों प्रशासन 

आपस में आलिंगन बद्ध 

करे किस का इन्तजार 

बलात्कार बलात्कार बलात्कार


था जिन पे हमें नाज 

आसमान लाल क्यों आज 

उड़ रहे अनगिनत बाज 

पंछी ले कैसे परवाज 

बताओ हमें इन्तजार 

बलात्कार बलात्कार बलात्कार


नन्ही कोमल सी कली 
नाज लाड़ पली बढ़ी 

नाग ने डस लिया

फंद में जकड़ लिया 

सुनाई पडी न…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 22, 2012 at 4:00pm — 14 Comments

"ग़ज़ल" शाम अब ढलने लगी है या सबेरा हो गया

इक ग़ज़ल पेशेखिदमत है दोस्तों 



उड़ गयी चिड़िया सुनहरी क्या बसेरा हो गया

देखते ही देखते बाजों का डेरा हो गया



कुर्बतों में मिट गयी तहजीब की दीवार यूँ

आपका कहते थे जो अब तू औ तेरा हो गया



कागजी टुकड़े खुदा हैं और उनके नूर से

बंद…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 22, 2012 at 4:00pm — 11 Comments

आज मैं चुप नहीं रहूंगी /कहानी

वो हडबडा कर उठ बैठी , तेज़ गति से चलतीं साँसें ,पसीने से भीगा माथा,थर-थर कांपता शरीर उसकी मनोदशा बयान कर रहे थे I वो बार-बार बचैनी से अपना हाथ देख रही थी I अकबका कर तेज़ी से उठी और बाथरूम की तरफ भागी I कई बार साबुन से हाथ धोया, उसकी धड़कने अभी भी तीव्र गति से चल रहीं थीं, शरीर अभी भी काँप रहा था I बेडरूम में वापस न जाकर ड्राइंग रूम में बिना…

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Added by seema agrawal on December 22, 2012 at 3:00pm — 13 Comments

महिला उत्पीडन -कारण और निवारण

 
नारी  शब्द की ही क्यों बात करे, लड़की हो, महिला हो, स्त्री हो, पर अकेली हो, तो जो आकर्षण होता है, यह सर्व विदित है। 
यह इस समस्या के मूल में है । कैसा आकर्षण बनाया है नियति ने । जब आकर्षण होता है, मन लालायित होता है और 
भोग की वस्तु की तरह मन टूट पड़ता है । या तो सन्यासी जीवन हो, या फिर शिक्षा व्यवस्था प्राचीन…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 22, 2012 at 11:00am — 18 Comments

ग़ज़ल ....

"
अपनी कमजोरियों का शिकार आदमी,

बस दलीलों से है ज़ोरदार आदमी..



बारहा माफ़ करता रहे, वो खुदा,

गलतियां जो…
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Added by rajneesh sachan on December 21, 2012 at 4:40pm — 14 Comments

मेरा रस्‍ता रोक रही हैं/तेरी ही बातें अक्‍सर

कटु-मधु
कुछ भींगी यादें
लेकर आई
हर दुपहर
ढूंढा जब भी
नया ठिकाना
पहुंच गई
लेकर नश्‍तर

कमतर जिनको आंक रहे थे
कर गए आज मुझे बेघर

घुटने भर की
आशा लेकर
उड़ा विहग
जब भी खुलकर
काली स्‍याही
लेकर दौड़े
लिए पंख
धूसर-धूसर

हमने जिनको गले लगाया
कर गए वे जीना दूभर

Added by राजेश 'मृदु' on December 21, 2012 at 2:00pm — 6 Comments

उठे दर्द जब - उमड़े समंदर

लगी आग जलके, हुआ राख मंजर,

जुबां सुर्ख मेरी, निगाहें सरोवर,

लुटा चैन मेरा, गई नींद मेरी,

मुहब्बत दिखाए, दिनों रात तेवर,

सुबह दोपहर हर घड़ी शाम हरपल,

रही याद तेरी हमेशा धरोहर,…

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Added by अरुन 'अनन्त' on December 21, 2012 at 11:09am — 12 Comments

"पाषाण"

कहने को तो चाँद तारे,

आसमा की चादरों से

जड़ के सलमा और सितारे

हम को ये भरमा के हारे

"हैं तो ये पाषाण ही ना "

नदियों का तट चाँद मद्धिम

सूर्य की आभा हुयी कम ,

सतह जल की तल निहारे

चांदनी की परत डारे

"तल में बस पाषाण ही ना"

ह्रदय कोमल, मन सु-कोमल

त्वरित धडका, दौड़ता सा

पागलों की भाँती चाहा

फिर भी उसका मन न…

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Added by SUMAN MISHRA on December 21, 2012 at 2:00am — 3 Comments

शैतान हँस रहा है

लड़की चीख़ी

चिल्लायी भी

मगर हैवानों के कान बंद पड़े थे

नहीं सुन पाये

उसकी आवाज़ का दर्द

 

वह रोयी बहुत

आँखों से उसके

झर-झर आँसू…

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Added by नादिर ख़ान on December 21, 2012 at 12:24am — 2 Comments

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